मरहूम अम्मी की स्मृति में

 

 

यह छप्पन साल का इंसान जो आज 

पढ़ रहा है, लिख रहा है, सुन रहा है 

उसे तुमने आकार दिया था माँ वरना

ज़माने में इतनी मुहब्बतें कहाँ मिल पातीं

मैं तुम्हारी चाहतों का मुजस्समां हूँ

चाहूँ फिर भी कड़ुवाहटें दूर भागती हैं 

कितनी शीरनी भर दी थी तुमने मुझमें

 

अदब-आदाब, लबो-लहज़ा सभी कुछ

तुम्हीं से मिला, तभी तो जो बयान करता हूँ

उसमें बला का असर होता है मैंने देखा

तुम जो सिर्फ़ बनाना जानती थीं माँ

टूटी चीजों को जोड़ना, नहीं देना बिखरने

तुमने सीखा था सिर्फ़ देना, अपने लिए

कुछ पाने कहाँ थी कोई लालसा तुममें 

 

रंगमंच सजाकर तुमने हमें बना दिया पात्र

खुद सूत्रधार की तरह पर्दे के पीछे छिपी रही

हम क्या कभी सीख पाएंगे माँ तुम्हारी 

यह छिपकर भी दीखने वाली जादूगिरी?

 

 

अनवर सुहैल

09 अक्टूबर 1964 /जांजगीर छग/

 

प्रकाशित कृतियां:

कविता संग्रह:

गुमशुदा चेहरे  

जड़़ें फिर भी सलामत हैं

कठिन समय में

संतों काहे की बेचैनी

और थोड़ी सी शर्म दे मौला

कुछ भी नहीं बदला

कहानी संग्रह 

कुजड़ कसाई

ग्यारह सितम्बर के बाद

गहरी जड़ें

उपन्यास 

पहचान

मेरे दुख की दवा करे कोई

सम्पादन 

असुविधा साहित्यिक त्रैमासिकी

संकेत /कविता केंद्रित अनियतकालीन

सम्मान / पुरूस्कार 

वर्तमान साहित्य कहानी प्रतियोगिता में ‘तिलचट्टे’ कहानी पुरूस्कृत

कथादेश कहानी प्रतियोगिता में ‘चहल्लुम’ कहानी पुरूस्कृत

गहरी जड़ें कथा संग्रह को 2014 का वागीश्वरी सम्मान / मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल द्वारा

सम्प्रति:

    कोल इंडिया लिमिटेड की अनुसंगी कम्पनी साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स के हसदेव क्षेत्र /छग/  में वरिष्ठ प्रबंधक खनन के पद पर कार्यरत

सम्पर्क:

    टाईप 4/3, आफीसर्स काॅलोनी, पो बिजुरी जिला अनूपपुर मप्र 484440     

 

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संपर्क : 7000628806

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