हथेली में अंगारे

 

छितरूराम ने ज़ोर से नाक में सांस खींची। होठों से बहता शीम तेज़ी से वापिस नाक में घुस गया। बार-बार उसकी नाक से शीम लुढ़क कर होठों तक आ रहा था। इसे वापिस ले जाने के लिए उसे नाड़ी शोधन करना पड़ रहा था। आखिरी बार तंग आ कर उपने दो उंगलियों से नाक पकड़ कर ज़ोर से शीं ... कर उंगलियां झटकीं और दीवार से पोंछ मैले कुर्ते से हाथ मल दिए।

‘‘थोड़ा अग्गे निकाल़णा था कंजरा! गंदा ही रिहा तू।’’

आजकल उतनी ठण्ड भी नहीं थी। बचपन से ही छितरूराम को यह बीमारी थी। नाक बहती रहती। होंठों पर स्थायी निशान बन गए थे। उसके साथ के सभी बच्चों की नाक हमेशा बहती रहती। ये बीमारी उन सभी बच्चों को थी जो गांव से दूर जंगल के किनारे बनी झोंपड़ियों से पढ़ने आते थे।

हाथ पोंछ कर ओखली के पास से चिलम उठाई छितरू ने और भीतर की ओर मुंह कर ज़ोर से पुकारा: ‘‘देईजी! अग्ग दिया।‘‘

‘‘मुआ तू। कितणा तमाकू पीणा!’’ लम्बरदार ने हुंकार भरी,‘‘मुआ फेफड़े सड़ी जाणे।“

 ‘‘बच्चू! सट्ट अंगारे।“ लम्बरदार ने बरामदे में बैठे-बैठे ही रसोई की ओर देख कर कहा।

देईजी ने अंदर से चिमटे में पकड़ अंगारे आंगन में फैंके।

छितरूराम ने झट हाथ से अंगारे उठा चिलम में डाल लिए।

‘‘हथ्था च देया देईजी! एह ता बुझी जाणे।“

दूसरी बार छितरू ने अंगारे हथेली में थाम लिए और एक हाथ से दूसरे में पकड़ते हुए चिलम में डाल लिए।

आंगन के कोने में फटाफट सुट्टे पर सुट्टा मार चिलम गर्म कर दी छितरू ने।

चिलम के ऊपर आग दहकी तो छितरू के मुंह से रेलगाड़ी के इंजन की तरह धुआं निकलने लगा।

जब से सरकार ने मनरेगा में काम देना शुरू किया है, सभी मजदूर निकम्मे हो गए हैं। आज काम के लिए आदमी नहीं मिलता। सब अपने-अपने पैतृक काम छोड़ मनरेगा में लग गए। ये तो बड़ी मुश्किल से लम्बरदार ने लालच दे दे कर छितरू को मनाया , तब काम के लिए राजी हुआ। पहले सड़क के काम ने ऐसे लोगों की चाल ही बिगाड़ दी। सड़क में रोड़ी का तसला उठा कर टांगें एक दूसरे में फंसाते हुए ऐसे रेंगते हैं जैसे जोरों का पेशाब आया हो। कोलतार का फव्वारा ऐसे पकड़ते हैं जैसे टीबी के मरीज हों। और अब मनरेगा ने रही सही कसर निकाल दी। क्या मर्द तो क्या औरतें; सभी धीमी गति से मनरेगा योजना के अंतर्गत सड़क बनाने में लग गए कोई बिल्डिंग बनाने में लग गए। बच्चों को मुफ्त खिचड़ी खाने स्कूलों में भेजने लगे। पढ़ने नहीं, खिचड़ी खाने ही वे स्कूल जाते हैं।

अब पुराना ज़माना भी नहीं रहा कि तगड़े बैलों से दो दिन में पूरे के पूरे खेतों में बीज डाल दो। घर में दूध-घी भी नहीं रहा। अब सारे पशु सड़क में छोड़ दिए गए। बचे हुए कुछ उद्यमी लोहे के हल से खेत जोतने लगे। एक आदमी ही चला लेता है लोहे का हल, बैल क्या करने!

       वैसे भी जब से सारी फसलें बंदरों ने तबाह कर दी हैं, लोगों ने फसल ही बोनी छोड़ दी। एक दो साल तो उन्हें भगाते-भगाते बीजते रहे। जब कुछ नहीं बचने लगा तो खेत खाली छोड़ दिए। बंदर बीज तक निकाल देते। घरों में आ उत्पात मचाने लगे। सब्जी, अदरक बीजा तो खाया नहीं पर खेतों से उखाड़ फैंका। शहर से सारे बंदर गांव में आ घुसे और घमासान मचा दिया। कमबख्त खाते कम हैं, उखाड़ते और उजाड़ते ज्यादा हैं। बीज भी वापिस नहीं आने लगा तो नुकसान क्यों सहें। चाहे कम ही सही बाजार से ले कर गुजारा कर लेंगे।

लम्बरदार को खेतों से मोह था। कुछ खेत अवश्य बोता है। इन्हीं खेतों के लिए छितरूराम जैसे आदमी चाहिए जो कुछ बोएं। उगने पर परवरिश करें। बंदरों से कुछ बच गया तो ताज़ा खाने को मिलेगा। बंदरों के आतंक से अब मक्की तक भून कर खाने को नसीब नहीं होती। घिया-तोरी जैसी सब्जी नहीं मिलती।

लोगों ने फसल बोना छोड़ा तो खेत उजाड़ और बियावान हो गए। उनमें जंगली घास उग आई। सांप, बाघ घरों में घुसने लगे। फसल नहीं होगी तो पशुमवेशी किस काम के! यह तो प्रकृति का एक सर्कल है। फसल होगी तो दाणे घर आएंगे। भूसे से पशुओं को घास मिलेगा। घास खाएंगे तो खाद बनेगी। खाद होगी तो फसल होगी।

ऐसे समय में जब चारों ओर ऑरगेनिक-ऑरगेनिक गाया जा रहा है। हर्बल-हर्बल का बोलबाला है।

देसी गाय का शुद्ध घी पन्द्रह सोलह सौ रुपए किलो भी नहीं मिल रहा। यह कह कर ठगा जा रहा है कि जो देसी गाय जड़ी बूटियां खाती है, यह उसका घी है। भाई! पहले तो गाएं जंगलों में चरने पर ही दूध देती थीं। आज गरीब लोग गौमूत्र बेचने और अमीर घास का रस पीने पर आ गए हैं।

इधर घासचारा न मिलने पर जब घरों से दुत्कार कर पशु छोड़ दिए तो इधर उधर उजाड़ करने लगे। लोग इन्हें शहतूत की सोटियों से मार-मार कर जंगलों में छोड़ने लगे। जंगलों में बाघ भेड़िये का डर, खेतों और खाली जगहों में मालिकों का डर। जाएं तो कहां जाएं!

इस उपेक्षा और तिरस्कार के मारे वे गांव और जंगल से हट कर सड़कों पर रहने लगे। सालो! सड़क तुम्हारे बाप की नहीं है। सड़क सरकार की है। लोग यहां हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। न हमें मार सकते हैं, न यहां से खदेड़ सकते हैं। यहां बाघ भेड़िए का भी डर नहीं। रात को वे बड़ी चतुराई और समझदारी से सड़क के किनारे मोड़ पर खुली जगह में जुगाली करते हुए विश्राम करने लगे। रात को एक दूसरे के ऊपर सिर रखे मजे से सोने लगे। उनमें प्रेमभाव बढ़ गया और एक दूसरे की चिंता करने लगे।

सड़क के किनारे रहते-रहते जब निडर हो गए तो जहां मन किया आंखें बंद कर विश्राम करने लगे। दिन दिहाड़े सड़क में बीचों-बीच बैठ गए तो कोई ग़म नहीं, कोई डर नहीं। निश्चिंत बैठे रहो। बसें, कारें तेजी से आसपास से गुजर जाती हैं। क्या मजाल उन्हें जरा सी भी खरोंच लगे। चुस्त और कुशल चालक गाय को सोया देख बिना हॉर्न बजाए तीव्र गति से गुजर जाते हैं कि पता ही नहीं चलता। वे निश्चिंत सोई रहती हैं। मुख्यमंत्री ने निकलना है, निकल जाए; मंत्री ने निकलना है, निकल जाए। बड़े से बड़े अफसर ने निकलना है, निकल जाए।

दिन में धीरे-धीरे सड़क में रेंगते हैं, सड़क बड़े आराम से पार करते हैं। उनके लिए काफिले रुक जाते हैं। अभी भी कुछ न कुछ दया बची है इस संसार में। लोग दयावान हैं। वे हॉर्न बजाते रहते हैं कि भाईयों! बहनों! माताओं! हट जाओ। किसी को लग गई तो हम पाप के भागी बन जाएंगे। हम पर लांछन लग जाएगा और गौ-भगत डंडे ले कर हमारे पीछे पड़ जाएंगे। हे गौ माता! हमें क्षमा करो! क्षमा करो!!

मजेदार बात और देखिए। बसों कारों में आने जाने वाले रहमदिल इंसान उनके लिए बची हुई रोटियां, फल सब्जियां, छिलके फेंकते जाते हैं। वे इन चीजों को बड़ी उपेक्षा के भाव से देखते हैं। ज्योतिषियों के सताए कुछ लोग आटे के पेड़े, मीठी रोटियां, गुड़ नीचे उतर कर उन्हें चाव से खिलाते हैं। बच्चों को दिखाते हैं। देखो, गाय कैसी होती है, गाय कैसे खाती हैं! जो थैली में दूध आता है वह यही देती है बच्चू! बच्चे हैरानी से गाय के थनों को निहारते। जाती बार उन्हें नमस्कार करते हैं।

पशु समझदार हो गए हैं, मनुष्य से भी ज्यादा। पहले जैसे लालची भी नहीं रहे कि गुड़ या नमक के ढेले पर एकदम टूट पड़े। समझदार तो पहले भी थे, जब से फुटपाथ पर सोने लगे और समझदार हो गए। पहले शाम होने से पहले सीधे घर लौट कर अपनी घराल़ में चले जाते थे। अब शाम होने से पहले ही सड़क के किनारे खुली जगह ढूंढ सिर से सिर जोड़े खड़े हो जाते हैं। थक जाने पर वहीं एक दूसरे का मुंह गोद में लिए सो जाते हैं।

पहले भी पशु इधर उधर मुंह न मार कर शाम होते ही सीधे गांव में अपने अपने घर जाते थे। क्या मजाल कोई दूसरे की घराल़ में चला जाए। घराल़ें बंद हो गई और धीरे धीरे गिर गईं। इन्हें वहां से खदेड़ दिया गया।

छितरूराम जब छोटा बच्चा था तो तीन चार गांवों के ढोर चराता था। सुबह ही घर घर से ढोर ले जाता। दिन भर जंगल में, चरागाहों में चराता और शाम को ले आता। ऐसे ही बहुत गांवों में ढोर चराने वाले थे जो पशुओं को सुबह ले जाते और शाम होते-होते छोड़ जाते। बदले में उन्हें घर-घर से रोटियां मिल जातीं। पुराने कपड़े, अनाज या दूसरी चीजें सभी अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार देते।

छितरू जैसे बच्चे ढोर चराते तो उनके बाप पशु के मरने पर उनका निपटारा करते। उनका चमड़ा सुखा कर बेचते। कुछ कारीगर जूते भी बनाते थे। बापू जब किसी मरे हुए पशु का झाड़ियों में घुस कर चमड़ा उतारता तो चारों ओर गिद्ध उसके उठ कर जाने के लिए बेसब्रे हो चारों ओर मंडराते। उन परिवारों पर यह भी इल्जाम लगता था कि ये पशुमांस खाते हैं।

कुछ कारीगर उसी चमड़े के जूते भी बनाते थे। देसी चमड़े के जूते कोई दमदार ही पहन सकता था। तेल डाल-डाल कर नरम किए जाते फिर भी एड़ियों में जख्म कर देते। चलने पर चर्र-चर्र आवाज करते रहते। जिसके सख्त पैर के नीचे कांटा टूट जाए, वही उस जूते का उपयोग कर सकता था। बाजार में तरह-तरह के बूट आ जाने से यह काम बंद हो गया। बापू तो घर में जूते गांठने का काम भी करता था। गांव वाले दूर से आवाज़ लगा कर जूते फैंक जाते। फटेपुराने जूते को ही ‘छितर’ कहा जाता और उसका नाम बापू ने फटे जूते पर ही रखा है, यह मालूम था छितरू को।

पशु आवारा छोड़ देने के बाद भी छितरूराम उन्हें हरा घास डाल आता। कभी सड़क के किनारे लगे हैंड-पंप से बाल्टी में पानी पिलाता। कभी वहां बैठ कर उनसे बतियाता, उन्हें प्यार करता। यह गाए, यह बैल किसका है, यह उसे पता था। कौन सी गाय ने दूध देना बंद कर दिया तो प्रधान ने उसे घर से खदेड़ दिया। कौन सा बैल कमजोर हो गया तो जैलदार ने उसे सोटियां मार भगा दिया।

हां, एक आश्चर्यजनक बात जरूर थी। बेसहारा हो जाने, आवारा हो जाने, सड़क के किनारे भटकने पर भी ये पशु कमजोर नहीं थे बल्कि और तगड़े हो गए थे। जब मालिकों ने पाल रखे थे तो केवल बरसात में ही हरा घास मिलने पर तगड़े होते थे वरना हड्डियां निकल आती थीं।

 

‘‘कल नीं औणा मालका!’’ छितरूराम ने कहा तो मंजे पर उंघते लम्बरदार की तन्द्रा भंग हुई।

 ‘‘क्यूं! कल क्या है! काम तो पूरा कर जो लिया है।’’

 ‘‘कल दरबार है म्हाराज!’’

  ‘‘दरबार! कौन सा दरबार! राज्जे महाराज्जे तो अब रहे नहीं।’’

 ‘‘सरकार का दरबार म्हाराज कल मंतरीजी औणे स्कूल में।’’

  ‘‘अच्छा! वो दरबार भुक्खे नंगे बणे मंतरी, लगाणा दरबार।’’ लम्बरदार हंसाः

 ‘‘मुआ! पजामा पहनी जाणा दरबार। मंतरिए साह्मणे नंगा मत खड़ोई जांदा मूरखा। ऐस्से ही नंगी जंघें जाएगा तो तुझे घुसने नहीं देंगे दरबार में। बड़े बड़े अफसर आए होणे।’’ लम्बरदार ने हिदायत दी।

 ‘‘जी म्हाराज! पजामा रखेया है धो सुखाकर। आत रात सराहणे के नीचे रख दूंगा।“

बारहों महीने लंगोट पहनता था छितरू। कुर्ता जरूर लम्बा पहनता। लम्बे कुर्ते से लंगोट दिखता नहीं था। लगता, नंगा ही है। अंदर कुछ नहीं पहना।

बहुत पहले राजा का दरबार होता था। राजपाट चले गए,दरबार तब भी लगता रहा। जो गरीब गुरबा बेहड़े में जाता, कहता दरबार जा रहा हूं। कई दिनों तक राजा साब बेहड़े के बड़े कमरे में बड़ी कुर्सी पर बैठते रहे और शिकायतें सुनते रहे। लोग भी जाते रहे। राजा साब चाहे सुस्ता रहे हों, बतिया रहे हों, जो भी जाए, कहता दरबार जा रहा हूं।

आजादी मिली। राजा गए, रजवाड़े गए। अब नए अफसर आ गए जो अपना दरबार लगाने लगे।

अब लोकशाही है। लोकतंत्र है। दरबार वैसा ही लगाया जा रहा है। जनता को बुलाया जाता है। उनकी शिकायतें सुनी जाती हैं। मौके पर ही फैसले सुना दिए जाते हैं।

दरबार में रौब झाड़ने के लिए मुख्यमंत्री कमजोर मंत्री को झाड़ लगाते हैं। मंत्री सब के सामने डीसी को झाड़ देते हैं। डीसी दरबार ले रहे हों तो एसडीएम की शामत आ जाती है। विधायक बात-बात में बीडीओ पर बरस पड़ते हैं। बहुत बार अख़बारों में ख़बर आती है फलां मंत्री ने गुस्से में आ कर मौके पर ही बीडीओ को सस्पेंड कर दिया। विधायक अफसरों को यह कहते हैं कि आप जनता के कामों पर कुंडली मार किंग कोबरा बन बैठे रहते हैं। हमारे सामने ही बहस कर रहे हैं तो पीछे से क्या करते होंगे!

बहुत अजीबोग़रीब होता है यह जनता का दरबार जिसमें जनता नहीं बोलती। बोलते हैं तो मंत्री और आला अफसरान। जनता अपनी अर्जी दे कर बस सुनती रहती है।

 ‘‘म्हाराज! वहां लिख कर देना पड़ेगा। साब लोक लिखत मांगते हैं। आप मेरी अरज लिखवा दो मालका!’’ छितरू ने अरज की तो लम्बरदार ने बेटे को आवाज दीः‘‘मनोज! आओ तो! अर्जी लिख दो छितरू की।’’

मनोज भीतर से कागज पैन ले आया।

 ‘‘आपको है तो कष्ट पर वहां सब लोग लिखुआं मांगते हैं।’’ छितरू ने आग्रह किया।

 ‘‘कोई नीं छितरू ... बताओ क्या क्या लिखना है। ... हां, पहले तो नाम ... छितरू राम। ये क्या नाम हुआ अरा छितरूआ!’’

 ‘‘क्या बताणा म्हाराज। जैसा बाप ने रखा।’’

 ‘‘बाप का नाम!’’

  ‘‘पता तो है आपको ... मटरूराम।’’

 ‘‘जात!’’

  ‘‘पता तो है आपको। क्यूं पूछ रहे म्हाराज! पर हरिजन जरूर लिखना।’’

लिक्खो आप ... ‘‘मेरे मालको! माई बाप! ... मैं छितरूराम ... जब छोटा था, एह ही काम करता था। सारे गांव के ढोर डंगर सुबह ही चराने ले जाता। तब सारी की सारी जगा खाली थी। चरान ही चरान थे। अब तो लोगों ने वहां कोठे डाल लिए हैं। ... जंगल थे म्हाराज! ... घासणियां थीं। मैंने तो क्या चराणे मालका! मैं तो बच्चा था। डंगर खुद ही चरते थे। खुद ही नाले में जा कर पानी पीते थे। खुद ही सांझ को गला उठा घर की ओर हो लेते। गोहर तक इकट्ठे आ कर सब अपनी अपनी घराल़ की ओर चले जाते। क्या मजाल कोई इधर उधर मंुह मारे। मैं तो गोहर से आवाज़ लगा देता कि सम्भालो अपने गौरू! मुझे शाम सेबेरे घरों से रोटियां मिल जातीं। पहनने को पराण सराणा कपड़ा मिल जाता। ... और चाहिए भी क्या!

... अब मैं वही काम करना चाहता। जितनी भी गांए, जितने भी बैल लोगों ने छोड़ रखे हैं। जो सड़कों के कनारे डर डर कर रात काटते हैं। मैं लाऊंगा सब को कट्ठा कर के। मैं चराऊंगा इन सब को। मैं सम्भालूंगा इन सब को।

... मैं गऊ सेवा करनी मालका! मुझे मौका मिलणा चाइए। बचपन से मैंने गोऊओं की सेवा की है। सब जानते हैं।

मालका! जिसकी गाएं सूने को आए, दूध देने को आएं उससे पहिले ही वह उसे अपने घर ले जाए। दूध पीएं। घी मक्खण खाएं; जो मर्जी करें। हां, जब सूख जाए तो आवारा न छोड़े। मैं घर से ले जाऊंगा। तगड़े बैल ले जाओ। उनसे काम लो। कमजोर हो जाएं तो मेरे पास छोड़ दो।

मालका! मैं जो हूं।’’

मनोज बोलाः ‘‘छितरू! बात तो तू पते की कर रहा है। दरबार में मानेगा कौन! ... ट्राई कर ले। तेरी अर्जी पीले कागज़ा में लिखी है, दूर से पच्छाणी जाएगी।’’

 ‘‘कोई नीं मालका! ... एक बार दरबार में हाजिर होणा है। अपणी बात रखणी है।’’

  

आज छुट्टी के दिन स्कूल में लगा था दरबार। गेट के बाहर भीतर लम्बी लम्बी गाड़ियां खड़ी थीं। ड्राइवर लोग स्कूल की दीवार के साथ सिग्रेट बीड़ी फूंक रहे थे जहां लिखा थाः धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक है। छुट्टी होते हुए भी हैडमास्टर, मास्टर, मास्टरनियां हाजिर थे। सारे मास्टर चाय पाणी के इंतजाम में लगे थे। चाय का जिम्मा स्कूल का था, धाम का पंचायत का। गांव वालों से भी चंदा इकट्ठा किया गया था। पिछवाड़े धाम बन रही थी। धाम की खुश्बू से मुंह में पानी आ गया छितरूराम के। वन अधिकारी ने सौ ग्राम गुच्छियां (जंगली मशरूम) दी थीं अलग से मंत्रीजी के लिए मधरा बनाने के लिए। अरे गुच्छियां पन्द्रह बीस हजार रूपए किलो हैं। बड़े बड़े राजे महाराजे भी नहीं बनाते अब। भले जमाने में तो लोग जंगलों से इकट्ठा कर एकाध सब्जी दे जाते थे.....पर अब तो। डीसी ने प्रधान और हैडमास्टर को हिदायत थी, दरबार से कोई भूखा न जाए।

वन मंत्री आए थे। डीसी साहेब, एसडीएम साहेब, जिले के बड़े-बड़े हाकिम, डॉक्टर, हेल्थ-वर्कर, बिजली पानी महकमे के अफसर, बीडीओ, सारी पंचायत।

छितरू स्कूल के हॉल में डरते हुए घुसा तो डीसी साहेब का भाषण हो रहा थाः

’’भाईयो और बहनो! आपकी समस्याएं मौके पर ही हल करने के लिए सरकार ने दरबार लगाए हैं। आपको मेरे दफतर, एसडीएम साहिब के दफतर या किसी भी दफतर के चक्कर न काटने पड़ें, इसलिए सरकार ने पूरे प्रदेश में ऐसे दरबार शुरू किए हैं। आप अपनी समस्याएं निडर हो कर बताएं। पानी की समस्या, बिजली की समस्या, डिपू के राशन की समस्या; जो भी हो, हम मौके पर हल करेंगे। कुछ अर्जियां आई हैं। मैं देख रहा हूं कुछ लोग देरी से आए हैं। आप अभी भी अपनी अर्जियां दे सकते हैं। जनता के पास जाने का सरकार का यह एक अनूठा माध्यम है। माननीय वन मंत्री यहां तशरीफ रख रहे हैं। सब अफसरान आपके पास हैं। पूरी सरकार आपके पास आई है।’’

डीसी साहेब ने मंत्रीजी की ओर इशारा किया तो एकाएक तालियां बज उठीं।

एक कर्मचारी अर्जियां ले रहा था। छितरूराम ने एकाएक अपनी उसे पकड़ा दी।

एसडीएम, बीडीओ के भाषणों के बीच डीसी साहेब अर्जियों पर नज़र दौड़ा कर कोई कोई जरूरी अर्जी मंत्री महोदय को भी पकड़ाने लगे।

डीसी का चेहरा सपाट था। पता नहीं लग रहा था कि वे नाराज हैं या खुश हैं, उदासीन हैं या सामान्य हैं।      

डिपो में कई महीनों से आटा नहीं आ रहा था। दालें खराब थीं। डिस्पेंसरी में दवाएं नहीं थीं। बिजली का बल्ब ऐसे जलता था जैसे लैंम्प हो। नलों में रेत मिट्टी भरा पानी आ रहा था। इन सब बातों की चर्चा नहीं हुई। हो सकता है किसी ने शिकायत ही न की हो। हां, वन मंत्री की उपस्थिति में जंगल में हरे पेड़ न काटने, वहां से बंदरों को भगाने, जंगलों की रक्षा करने की बात जंगलात महकमे के अधिकारी ने उठाई जिसका सिर हिला-हिला कर मंत्री महोदय ने स्वागत किया।

डीसी साहेब के हाथ में पकड़ी अर्जियों पर नज़र रखे हुए था छितरूराम कि पीले रंग की अर्जी उनके हाथ में आई। उन्होंने सरसरी उसे पढ़ा, पेन से लकीरें मारीं और पहली बार मुंह थोड़ा टेढ़ा किया जैसे मुस्काए। छितरूराम मारे खुशी के दो हाथ ऊपर उठ गया। क्या पता उसे आवाज लगाई जाए।

आधे मुख से मुसकाते हुऐ डीसी साहेब ने अर्जी मंत्रीजी को पकड़ाई। मंत्रीजी ने एक नज़र अर्जी पर डाली और खुल कर हंस दिए। छितरूराम पूरा खड़ा हो गया।

मंत्रीजी ने पुनः डीसी को अर्जी पकड़ा दी। डीसी ने एसडीएम को दी। एसडीएम ने एक नज़र देख बीडीओ को पकड़ा दी। बीडीओ ने पंचायत प्रधान को।

प्रधान ने अर्जी पर नज़र दौड़ाई और सामने देखा। उसे सामने छितरूराम खड़ा दिखाई दिया। प्रधान ने गहरी आंखों से छितरू को घूरा। वह एकाएक सीधा खड़ा हुआ और तेजी से दोनों हाथ जोड़ झुक गया। प्रधान ने गुस्से में उसे बैठने का इशारा किया। टांगें कांप उठी छितरू की और धम्म से बैठ गया।

तभी मंत्रीजी बोलने के लिए खड़े हुएः

 ‘‘भाईयो! बहनों! नारी शक्ति यहां बड़ी संख्या में आई है, मैं इनका स्वागत करता हूं।’ एकाएक तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूंज उठा।

 ‘‘मित्रों! हमारी सरकार ने आपके द्वार आने का फैसला किया है, न कि आप हमारे द्वार आओ। हम नहीं चाहते कि जनता किसी भी सरकारी दफतर में धक्के खाए। पानी, बिजली के दफतरों के चक्कर काटे।’’ मंत्रीजी एक क्षण रुके।

 ‘‘हमारी सरकार तो जनहित के अनेकों काम करना चाहती है। पर क्या करें केन्द्र में दूसरी सरकार है। वह हमें कोई भलाई का काम करने नहीं दे रही। हमारे कामों में अड़ंगे अड़ाए जा रहे हैं। हमारे प्रदेश को वित्तीय सहायता नहीं दी जा रही। जो कोटा इस पिछड़े राज्य को मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है।’’

 मंत्रीजी ने पानी का घूंट पिया।

 ‘‘और सबसे बड़ी बात संविधान से छेड़छाड़ की जा रही है। आपने सुना होगा अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकारों पर रोक लगाने के लिए संविधान में संशोधन कर उसकी हत्या की जा रही है। हमें संविधान की इस निर्मम हत्या को रोकना होगा। संविधान को बचाना होगा।’’

एकाएक मंत्रीजी चिंतित से दिखे।

 ‘‘मुझे एक और कार्यक्रम में जाना है वरना आपके साथ और समय बिताता। लेकिन मित्रों! ध्यान रहे। हमें संविधान की हत्या होने से उसे बचाना होगा।‘‘

 

 अगले दिन छितरू काम पर लौट आया।

  ‘‘क्या हुआ छितरूआ!’’ लम्बरदार ने पूछा।

 ‘‘होणा क्या मालका! ... दिल्ली में कोई संविधान है न, उसकी हतिया हो रही है।’’

       ‘‘किसने कहा!’’

       ‘‘मंतरीजी ने ... मालका मंतरीजी को बड़ी चिंता हो रही थी। जल्दी ही चले भी गए।’’

       ‘‘संविधान की हत्या से तुम्हारा क्या नाता।’’

       ‘‘पता नीं मालका! एह तो इन्दिरा गान्धी की हतिया से भी कोई बड़ी हतिया है।’’

    उदास हो गया छितरूराम।

       ‘‘अग्ग देया देईजी!’’ वह चिल्लाया।

    धरती पर गिरने से पहले ही अंगार हथेली पर थाम लिए छितरू ने।

 

 

 

 

 

परिचय

24 सितम्बर 1949 को पालमपुर (हिमाचल) में जन्म। 125 से अधिक पुस्तकों का संपादन/लेखन।

    वरिष्ठ कथाकार। अब तक दस कथा संकलन प्रकाशित। चुनिंदा कहानियों के पांच संकलन । पांच कथा संकलनों का संपादन।

   चार काव्य संकलन, दो उपन्यास, दो व्यंग्य संग्रह के अतिरिक्त संस्कृति पर विशेष काम। हिमाचल की संस्कृति पर विशेष लेखन में ‘‘हिमालय गाथा’’ नाम से सात खण्डों में पुस्तक श्रृंखला के अतिरिक्त संस्कृति व यात्रा पर बीस पुस्तकें। पांच ई-बुक्स प्रकाशित।  

   जम्मू अकादमी, हिमाचल अकादमी, तथा, साहित्य कला परिषद् दिल्ली से उपन्यास, कविता संग्रह तथा नाटक पुरस्कत। ’’व्यंग्य यात्रा सम्मान’’ सहित कई स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा साहित्य सेवा के लिए पुरस्कृत।

    अमर उजाला गौरव सम्मानः 2017। हिन्दी साहित्य के लिए हिमाचल अकादमी के सर्वोच्च सम्मान ‘‘शिखर सम्मान’’ से 2017 में सम्मानित।

     कई रचनाओं का भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद। कथा साहित्य तथा समग्र लेखन पर हिमाचल तथा बाहर के विश्वविद्यालयों से दस एम0फिल0 व दो पीएच0डी0।

पूर्व सदस्य साहित्य अकादेमी,

पूर्व सीनियर फैलो: संस्कृति मन्त्रालय भारत सरकार, राष्ट्रीय इतिहास अनुसंधान परिषद्, दुष्यंतकंमार पांडुलिपि संग्रहालय भोपाल।

वर्तमान सदस्यः राज्य संग्रहालय सोसाइटी शिमला, आकाशवाणी सलाहकार समिति, विद्याश्री न्यास भोपाल।

पूर्व उपाध्यक्ष/सचिव हिमाचल अकादमी तथा उप निदेशक संस्कृति विभाग।

 

सम्प्रति: ‘‘अभिनंदन’’ कृष्ण निवास लोअर पंथा घाटी शिमला-171009.

94180-85595 

vashishthasudarshan@yahoo.com                 

 

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