शुकराना

रोज़ की तरह उस दिन भी ठीक साढ़े छः बजे मेरी आँख तो खुल गई पर बदन अलसाया ही रहा। बिस्तर छोड़ने को मन नहीं कर रहा था। हीटिंग ऑन हो चुकी थी। घर अच्छा ख़ासा गरम था। दिन का उजाला अभी सोया पड़ा था। अचानक मुझे याद आया, सवा आठ पर मुझे फ़ियोना से इंश्योरेन्स के सिलसिले में उसके ऑफ़िस मिलना है। अब चाहे तन आलस करे या मन, उठना ही होगा। किसी तरह बदन को पैरों पर घसीटते हुए शावर के नीचे ले आई। शावर के तीखे धार वाले गुनगगुने पानी ने बदन को गुदगुदाया। सारी खुमारी क्षण भर में छू मंतर हो गई। फिर तो बीस मिनट में मैं अपने पूरे फ़ार्म में आ गई।

ठीक सवा सात पर मैंने घर का दरवाजा बंद किया और गेट से बाहर आई। सड़क के दोनों ओर काले बैग के ढेर करीने से लगे हुए थे। कूड़ा-गाड़ी अगले मोड़ पर खड़ी, आरा-मशीन की तरह शोर मचा रही थी। डस्टबिन-मेन पूरी मुस्तैदी से गमबूट और रबर के दस्ताने पहने कूड़ा उठा-उठा कर वैन में फेके जा रहे थे। गाड़ी में लगी कचरा-मशीन, कूड़े के बड़े-बड़े बैगों को किसी दैत्य की तरह निगले जा रही थी। घड़ी भर में सड़क साफ़ हो जाएगी। फिर हफ़्ते भर घरों में कूड़ा इक्ट्ठा होगा। उन्हें छोटे-छोटे बैगों में बाँधा जाएगा। मंगल की रात को घर के लोग उन्हें काले बैग में इकट्ठा कर सुतली से बांधेंगे। और सड़क के किनारे डस्टबिन-मेन के लिए सजा कर रख देंगे। और यह सिलसिला चलता रहेगा.....

अभी मैं यह सब सोच ही रही थी कि किसी ने पीछे से आवाज़ दी,

‘‘एक्सक्यूज़ मी, मिसिज़...’’ मैंने पलट कर देखा आवाज़ डस्टबिन-मेंन के पहनावे से मैच नहीं कर रही थी, क्यों कि आवाज़ ज़नानी थी

‘‘क्यों क्या बात है?’’ मैंने आवाज़ को संतुलित करके कहा।

‘‘आपसे कुछ बात करनी है।’’ डस्टबिन-मेन के पहनावे में खड़ी लंबी तड़ंगी उस औरत ने कहा।

‘‘मैं जल्दी में हूँ, ब्रिक्सटन में मेरा किसी से अप्वाईंटमेंट है। मेरे घर के कचरे में सिर्फ़ हाउस रबिश ही होता है। गार्डन का कचरा मेरा गार्डनर ले जाता है। बाक़ी इधर-उधर की चीज़ें मेरी क्लीनर आक्स-फ़ैम या किसी चैरिटी संस्था को दे आती है।’’ इस पराए देश के कानून काफी सख़्त है। ज़रा सी लापरवाही मुझे किसी बड़ी मुसीबत में डाल सकती थी। हमेशा की तरह मैं अपने बचाव के लिए तैयार खड़ी थी।

वह ज़रा हँसी। डस्टबिन-मेन के उन कपड़ों में से आती वह मादक-सी हंसी बड़ी भली-सी लगी।

‘‘वह बात नहीं है, आपने शायद मुझे पहचाना नहीं!’’ उसकी आवाज़ कुछ थर्राई और नम-सी लगी,

‘‘मैं शुकराना हूँ।’’

आज से ठीक छः साल पहले की बात है, मेरे दोनों बच्चों की ‘ए’ और ‘ओ’ लेवल की परीक्षा अगले साल होने वाली थी। सजग और महत्वकांक्षी हिन्दुस्तानी माँ होने के नाते मेरा ख़याल था कि उन्हें गर्मियों की छुट्टियों में घर पर बैठ कर पढ़ाई करनी चाहिए। पर उन्होंने मेरी एक ना मानी तमाम अँग्रेज़ बच्चों की तरह दोनो ने हैरड्स डिपार्टमेंटल स्टोर में नौकरी के साथ-साथ शाम को कैरेबियन कारनिवल शो में डान्स का रिहर्सल भी शुरू कर दिया। उनका काले लोगों से मिलना-जुलना हम दोनों को बिल्कुल नापसंद था पर इस परमिसिव सोसाइटी के कानून ने किशोरों को ऐसी स्वतंत्रता दे रखी है कि हम बहुत बार अपने को मजबूर और असहाय पाते हैं।  

 

उस दिन मुझे इन्हें छोड़ने एयरपोर्ट जाना था, दोनों बच्चों ने मनुहार करी, कि डैडी को एयरपोर्ट छोड़ कर मैं सीधे घर जाने के बजाए पोर्टोबेलो पहुँच जाऊँ; क्यों कि उस दिन उनके कार्निवल का सबसे बड़ा और आखिरी शो होने वाला है। शो ख़त्म होने के बाद हम सब कहीं बाहर खाना खानें के बाद साथ ही घर आ जाएंगे। मुझे उनका सुझाव ठीक लगा आख़िर घर आ कर मैं या तो चुपचाप सो जाती या टी.वी देखते हुए उनका इंतज़ार करती। इस तरह तो मैं यह भी देख पाऊँगी कि आख़िर यह लोग रिहर्सल वगैरह करते कैसे हैं, कहीं बीच-बीच में हशिश, गाँजा, शराब वगैरह का सेवन तो नहीं करते हैं। जवान बच्चों की माँ इस देश में वैसे भी हर समय घबराई हुई रहती है। सो इनको एयरपोर्ट छोड़ने के बाद मैं सीधे, बच्चों के बताए हुए स्थान पर पहुँच गई। जगह बिल्कुल सून-सान, ‘डिप्राइव्ड’ और ‘डेरेलिक्ट’ थी। कहीं कोई ढंग की दुकाने आदि भी नहीं थीं। कालों का इलाका था। जगह कुछ मनहूस सी लग रही थी। साढ़े पाँच बज रहे थे। बच्चों को साढ़े छः से सात बजे के बीच आना था। अब यह एक घंटा कैसे बिताया जाए। कहीं कोई बैठने की जगह नहीं थी। जिस मैदान में शो होने वाला था, उसके चारो ओर टिन की चादरें लगी हुई थीं; जिसपर तबियत से ग्रफ़ीटी की गई थी। मुझे जिंदगी में ऐसी जगहों पर जाने का कोई अनुभव नही था। हम लोग हमेशा सिर्फ अपने-आप में सिमटे अपनी कम्यूनिटी में ही रहना पसंद करते हैं इसलिए ब्रिटेन के अन्य समुदायों के बारे में हमारा ज्ञान बड़ा आधा-अधूरा है। मैं बहुत अजीब-सा महसूस कर रही थी। पर बच्चे आप से वह सब कुछ करवा लेते है जो आप कभी सपनों में भी करने को नहीं सोचते हैं। फिर लंदन एक इंद्रजाल है जिसमें हम सब भरमाए हुए हैं। तमाम दुविधाओं, घबराहटों और विषमताओं के बावजूद भी इस देश को छोड़ कर हम अपने देश वापस नहीं लौट पाते हैं। 

मैं अभी वहाँ खड़ी यही सब सोच रही थी कि गाड़ी में बैठी रेडियो सुनती रहूँ या बाहर मैदान में टहलते हुए समय काटूँ। तभी एक बारह-तेरह साल की लम्बी-सी लड़की ढ़ीला-सा फ्राक पहने अपने छोटे भाई का हाथ पकड़े टहलती हुई दिखाई दी। इस इलाके में अंग्रेज़ नहीं रहते हैं, यह कालों का इलाका है। अँग्रेज़ यहाँ परदेसी लगता है। लड़की काली नहीं थी। उन दिनों, काबुल, बोसनिया और सर्ब से काफ़ी युद्ध-पीड़ित लोग इंग्लैंण्ड में शरण ले रहे थे। बच्चों के अनुसार इस कार्निवल से आए हुए चँदों के पैसे भी, युद्ध-पीड़ितों को ही जाना था। भारी संख्या में छात्र लोग इस तरह का कार्य कर रहे थें। मेरे दोनो बच्चे भी अपनी स्वैक्षिक सेवा, हर तरह से इस नेक कार्य में देने का प्रयास कर रहे थें। यद्यपि हम दोनों सदा अजीब से संशय और उलझन में रहते कि ये बच्चे वास्तव में चैरिटी का काम करते हैं या इस बहाने मस्ती मारते हैं। आज मौक़ा था सबकुछ अपनी आँखों से देख का तसल्ली कर पाने का।

लड़की को शायद मुझे वहाँ देख कर कुछ कौतूहल-सा हुआ। वह धीरे-धीरे टहलते हुए, अपने भाई के साथ मुझसे कुछ दूरी पर खड़े हो कर मेरा निरीक्षण कर रही थी। मैंने इशारे से उसे पास बुलाया, शायद वह मेरे बुलाने भर का इंतज़ार कर रही थी। भाई को तक़रीबन घसीटती हुई-सी वह मेरे पास आकर खड़ी हो गई। गंदुभी रंग की पतले नाक-नक्शे वाली उस लड़की के चेहरे पर बिल्ली-सी हरी आँखें निडर और रोज़ कुछ नया देखने की आदी-सी लगी। वह बेफ़िक्री से खड़ी कभी मेरे कार को और कभी मुझे देखती रही।

मैंने उससे पूछा, ‘‘क्या तुम यहीं रहती हो?’’ उसने क्षण भर को मुझे ऊपर से नीचे तक अजीब नज़रों से देखा, फिर हाँ में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘तुम तो यहाँ के लिए बिल्कुल नई लगती हो? रास्ता भूल गई हो क्या?’’ उसके प्रश्न पूछने के ढँग पर मुझे हँसी-सी आ गई। उसकी अँग्रेज़ी बता रही थी कि उसको ख़ुद इस मुल्क में आए हुए साल-दो साल से अधिक नहीं हुए होंगे।      

मैंने मज़े लेते हुए कहा, ‘‘हाँ बात तो सही है, पर पहले यह तो बताओ कि यहाँ पर कोई ‘‘डीसेंट कैफ़े’ है क्या?’’                

‘‘हाँ-हाँ है क्यों नहीं! मैं एक कैफ़े जानती हूँ जो बहुत अच्छा है जहाँ बड़े-बड़े अंग्रेज़ कॉफ़ी पीने आते हैं।’’

और वह मुझे अपने साथ ले कर इस तरह चलने लगी मानो मैं कोई भटकी हुई राही हूँ। थोड़ी ही देर में हम एक रोड-साईड कैफ़े के सामने खड़े थे। कैफ़े क्या था सड़क पर बने हुए कई छोटे-छोटे दुकानों के बीच एक चटक नीले रंग का कमरा जिसके बाहर बेकन और सॉसेज के तलने की तीखी दुर्गन्ध आ रही थी।

मैंने उससे कहा, ‘‘अरे, नहीं यहाँ नहीं।’’ उसे कुछ निराशा-सी हुई, उसका मुँह कुछ लटक सा गया।  तभी मुझे अस्पताल का साइन दिखा, मैंने उससे कहा,

‘‘चलो वहाँ चलते हैं। वहाँ साफ-सुथरा और अच्छा कैफ़े होगा। खाने-पीने की काफ़ी वराईटी होगी।’’

इतनी बड़ी जगह देख कर उसे कुछ घबराहट-सी होने लगी और अब वह मेरे पीछे-पीछे चलने लगी। जगह-जगह लगे साइनबोर्ड से कैफ़े ढूँढने में मुझे कोई दिक्क़त नहीं हो रही थी। और वह अपने बनाए हुए वाहृय व्यक्तित्व के घेरे से निकल कर सहज और सरल हो रही थी। चूँकि इस तरह के वातावरण से वह पूर्णरूप से अनभिज्ञ थी। अतः अब वह मेरे साथ बिल्कुल मुर्गी के चूज़े के माफ़िक चिपकी हुई चल रही थी। उसका भाई उसके साथ दुबका हुआ-सा चल रहा था। कैफ़े ‘सेल्फ़ सर्विस’ था। मैंने ट्रे में तीन कप कॉफ़ी और तीन टुकड़े ब्लैक फ़ारेस्ट गैटो रखा साथ ही बच्चों के लिए चिप्स और मटन के कुछ टुकड़े। पेमेंट करने के बाद काटे, छूरी, चम्मच और नैपकिन भी रखे। वह चकित, सम्मोहित-सी सब कुछ देखती रही। मैं कॅाफ़ी में चीनी नहीं लेती हूँ इसलिए चीनी के सैशे रखना भूल गई। टेबुल पर बैठते ही मुझे याद आया बच्चों को तो चीनी चाहिए ही होगी। अतः मैंने लड़की से कहा,

‘‘जाकर अपने और भाई के लिए चीनी ले आओ। देखो वहाँ उस डब्बे में सफ़ेद और भूरी चीनी के सैशे रखे हुए हैं। कॉफ़ी में ज़्यादातर लोग भूरी चीनी डालते हैं, पर तुम्हें अगर सफ़ेद चीनी अच्छी लगती है तो वही ले लेना, वर्ना दोनों ही ले लेना। तुम पढ़ तो सकती हो न?’’ अभी तक मैंने उससे उसकी पढ़ाई के बाबत कुछ भी नहीं पूछा था।

उसने सकारात्मक सिर हिलाया, पर वह उठी नहीं। शायद उसका आत्मविश्वास डोलने लगा था या वह अंग्रेज़ी में साक्षर नहीं थी।

मुझे उसका मनोविज्ञान कुछ-कुछ समझ आ रहा था। अतः उसके कंधे पर स्नेह से हाथ रखते हुए मैंने कहा,  

‘‘आओ, मेरे साथ आओ, चीनी के कोई पैसे नहीं देने होते हैं। तुम जितना चाहो अपने कॅाफ़ी में डाल सकती हो। उसके आँखों और चेहरे पर आई हुई खुशी की दमक मुझे अच्छी लग रही थी। मेरे खुद के अंदर एक अच्छी अनुभूति का सृजन हो रहा था। 

‘‘अ....आपने यह सब केक, कॅाफ़ी मटन और चिप्स हमारे लिए ख़रीदा है?’’

‘‘हाँ, आज तुम मेरी मेहमान हो। तुम्हें यह खाना पसंद है ना।’’ मुझे उस बच्ची के हाव-भाव और बातचीत के तरीक़े में आनंन्द-सा आने लगा था।  

‘‘हाँ अगर आप खाएंगी तो...’’

‘‘अरे नहीं, मैं तो वैसे भी कम ही खाती हूँ, वह तो वक़्त गुज़ारने के लिए कैफ़े ढूँढ रही थी। फिर अब तुम मिल गई हो तो अच्छा लग रहा है। मुझे बच्चे अच्छे लगते हैं। और तुम तो बहुत अच्छी लड़की हो।’’

क्षण भर को उसकी आँखों में उदासी तिरी फिर चहँकती-सी बोली ‘‘क्यों, क्या आपके बच्चे नहीं हैं?’’

‘‘हैं क्यों नहीं? यह जो कार्निवल हो रहा है उसमें वह लोग डान्स कर रहे हैं ना, वही तो देखने आई हूँ मैं।’’ मैंने उत्फुल्ल हो कर कहा।

‘‘ओ, हाँ, अच्छा तुम्हारी लड़की है ना, तुम्हारे जैसी ही लगती है। कंधे तक काले बाल हैं उसके। वह भी तुम्हारी तरह बहुत अच्छी है।’’

‘‘अच्छा, तो तुम उसे जानती हो?’’

वह जल्दी-जल्दी खाना खाती जा रही थी और साथ ही मेरी आँख बचा कर कुछ आलू के चिप्स और चीनी के सैशे अपने फ्राक में बने हुए पॅाकेट में रखती जा रही थी। जैसे-जैसे उसका पेट भरता जा रहा था वैसे-वैसे वह मुझसे बेतकल्लुफ़ होती जा रही थी।    

‘‘हाँ- हाँ, वह तो मेरी दोस्त है ना।’’

मुँह में मटन का टुकड़ा डालते हुए जल्दी-जल्दी दाँतों से उनकी पिसाई करती हुई वह बोली।

‘‘अच्छा!’’ मैंने कहा।

मुझे लगा, भगोड़े, अस्थिर, अभावग्रस्त जीवन में अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उसने इस तरह अंधेरे में तीर चलाने और सहजता के साथ सफ़ेद झूठ बोलने की आदत अनजाने ही डाल रखी थी।

‘‘तुम यहाँ कबसे हो.... तुम्हारे घर में कौन-कौन है।’’ मैंने उससे पूछा।

वह थेाड़ी देर मुझे देखती रही। उसके चेहरे से साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि वह अंदर-अंदर यह निर्णय ले रही है कि सच बोलने में ज़्यादा फ़ायदा है या झूठ बोलने में। साथ ही मैंने यह भी नोट किया कि जिन प्रश्नों का उत्तर वह नहीं देना चाहती थी उनके बदले में वह मुझसे ही बिना झिझक प्रति- उत्तर में प्रश्न कर लेती है। मेरे सवाल के जवाब में इसबार फिर उसने मुझसे एक प्रश्न किया। 

‘‘तुम रईस हो?’’

मैंने कहा ‘‘नहीं, मैं माँ हूँ, मेरे दो बच्चे हैं जो तुमसे बड़े हैं और अगले साल से कॉलेज की पढ़ाई करेंगे।’’

‘‘अच्छाऽऽ’’ वह मुस्कराई, उसकी मुस्कराहट में बाल-सुलभ चतुराई के साथ-साथ कृतज्ञता भी थी। उसने घड़ी भर रुक कर मेरी आँखों में देखा फिर कहा,

‘‘मेरा ख़याल है कि तुम रईस और नेकदिल दोनो हो। मुझे इंसान की अच्छी पहचान है।’’ प्लेट में पड़े मटन के आख़िरी टुकड़े को काँटे में फंसा कर मुँह में रखते हुए वह पल भर के लिए रुकी, फिर मुझसे मुख़ातिब होते हुए बोली,

‘‘मैंने इस छोटी-सी उम्र में दुनियां की गज़ालत देखी है युद्ध की विभीषिका देखी है। इंसान को दरिंदा होते देखा है। कान फाड़ने वाले तोप-गोले, बंदूके, लाश, खून से रंगी धरती, बलात्कार, घृणा-प्रेम, जन्म-मरण सब एक साथ देखे हैं।’’ उसकी चमकती हुई हरी ऑंखें अचानक यादों के काले साये से स्याह-सी हो गई । 

वह अपने हिस्से का खाना खा चुकी थी और अपनी भाषा में बार-बार अपने छोटे भाई को शायद यह समझा रही थी कि ऐसा खाना रोज़-रोज़ नही मिलेगा। इसलिए उसे वह सब कुछ खा लेना चाहिए जो उसकी प्लेट में है। अब भाई से और अधिक खाया नही जा रहा था। फिर अभी पुडिंग और कॉफ़ी भी रखी हुई थी। मैंने उसकी मन स्थिति को समझते हुए कहा, ‘‘क्या तुम बाक़ी का खाना घर ले जाना चाहती हो।’’ उसकी आँखों में कुछ लज्जा और कुछ विनय सा उभर आया, फिर उसने अंग्रेज़ वेटर और कुक की ओर देखते हुए कहा,

‘‘ऐसा करने से वह लोग मुझे और मेरे भाई को मारते-मारते रेस्ट्रां से बेइज्ज़त कर के निकाल तो न देंगे।’’ मुझे उसका सावधान होना अच्छा लगा। मैंने कहा,

‘‘नहीं, हमने मुफ़्त में खाना नहीं खाया है। पूरे पैसे दिए हैं। हम अपना खाना खाएं या घर ले जाए, उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है। मैं अभी एक कैरियर बैग का इंतजा़म करती हूँ।’’

कहती हुई मैं टिल पर बैठी महिला के पास गई और उससे एक कैरियर बैग की माँग की, उसने कैरियर बैग के साथ-साथ मुझे कुछ डिसपोज़ेबल डब्बे भी पकड़ा दिए।

लड़की मेरे तरीकों से बहुत प्रभावित लग रही थी। और उसके बाल-सुलभ मन में संभवतः बहुत सारे प्रश्न उठ रहे थे।  

हमने खाना पैक किया।     

छोटा भाई जो अभी तक ख़ामोश था, बहन के कान में कनखियों से मुझे देखते हुए शर्मीली मुस्कान के साथ अपनी भाषा में कुछ बोला। लड़की ने उसकी पीठ को प्यार से थपथपाया फिर मेरी ओर देखते हुए बोली, ‘‘मेरा भाई आपको किसी जागीरदार की बेहद रहमदिल और नेक किस्म की बेगम समझ रहा है।’’

मैंने जल्दी से कहा, ‘‘नहीं, नहीं! मैं बेगम वगैरह कुछ नहीं हूँ मैं तो यहाँ बच्चों के स्कूल में पढ़ाती हूँ। और एक माँ हूँ। उससे कहो, वह स्कूल जाया करे और दिल लगा कर पढ़ा करे, तो एक दिन वह भी अच्छा कमाता-खाता हुआ इंसान बन जाएगा। ’’

लड़की थोड़ी देर चुप रही फिर बोली बोली,

‘‘नहीं, सब कुछ इतना आसान नहीं है। मेरा भाई स्कूल जाना चाहता है पर वहाँ उसे कुछ समझ नहीं आता। उसे अंग्रेज़ी नहीं आती और वहाँ कोई बोसनियन नहीं जानता है। लोग उसे गूंगा, बेवकूफ़ और पागल समझते हैं। लड़के उसे मारते है। बुली (दादागिरी) करते हैं। इसलिए वह स्कूल से भाग आता है। टीचर्स सहृदय तो है पर उससे संप्रेषण नहीं कर पाती हैं। वह इसे हर वक्त ऐसे ही क्लास में खेलने देती हैं, तो यह बच्चों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने के लिए शरारतें करता है। फिर खेल के मैदान में बच्चे इसकी मार-कुटाई करते हैं। हर रोज़ यह बदन पर नीले दाग़ ले कर आता है। सच! माँ कहती है हमारी ज़िन्दगी ही एक दाग़ बन कर रह गई है।’’

 

‘‘अरे! ऐसा क्यों कहती हो, तुमने अभी ज़िन्दग़ी देखी ही कहाँ हैं, तुम्हारी जिंदगी में कोई दाग नहीं है। अभी तो तुम बच्ची हो।’’

लड़की के बात-चीत और तौर-तरीके से धीरे-धीरे मैं प्रभावित होती जा रही थी। और अब वह मुझे बच्ची नहीं बल्कि एक मुसीबतज़दा भटकी हुई मायूस किशोरी-सी लग रही थी।

‘‘तुम स्कूल जाती हो?’’ मैंने उससे पूछा ।

इस बार उसने मेरे प्रश्न को दूसरे प्रश्न से टाला नहीं, मैंने नोट किया उसके चेहरे पर दुःख की एक काली घटा उमड़ी और उमड़ कर लुप्त हो गई। फिर उसने कॉफ़ी के एक हल्के सिप से ख़ुद को संतुलित किया और बोली, ‘‘आज से साल भर पहले जब हम यहाँ आए थें तो मैं स्कूल जाती थी। वहीं मैंने अंग्रेज़ी सीखी। पर फिर माँ को अस्पताल जाना पड़ा वह पेट से थी। घर के ख़रीद-फ़रोख्त आदि के लिए या फिर किसी भी सरकारी काम के लिए, अगर कहीं भी जाना होता तो मुझे ही साथ जाना होता था क्योंकि हमारे घर में मेरे अतिरिक्त किसी को अंग्रेज़ी नहीं आती है। इस तरह मेरा स्कूल जाना रुक-सा गया।’’

‘‘तुम्हारे पिता क्या काम करते हैं?’’

‘‘मिनी कैब ड्राइवर है, पर मेरी माँ को उस पर यक़ीन नहीं है वह कहती है, वह झूठ बोलता है। उसे कार चलानी ही नहीं आती। वह कैब ड्राइवर कैसे बन सकता है? फिर वह हमेशा मेरी माँ से ही पैसे माँगता है और खाने के वक़्त, देगची से गोश्त के सारे टुकड़े वह अपनी तश्तरी में डलवा लेता है। हमें सिर्फ़ सालन से खाने को ब्रेड मिलता है वह भी आधे पेट। माँ उसकी तश्तरी में बचे हुए सालन और ब्रेड के टुकड़े चाट कर ही सब्र कर लेती है।’’

‘‘अच्छा तो तुम्हारी माँ काम करती है। क्या काम करती है?’’ उसने एक पल मेरी ओर देखा फिर बगैर किसी झिझक के कहा, ‘‘वह मर्दों के साथ सोती है। और उनसे पैसे लेती है। मुझे भी शायद यही करना पड़े। पर मेरी माँ कहती है अगर यही काम मैंने किया तो वह मेरा मुँह कभी नहीं देखेगी- और ख़ुदकुशी कर लेगी।’’

‘‘ठीक कहती है तुम्हारी माँ, उसके लिए तो यह बहुत बड़ी मजबूरी की बात है। एक माँ अपने बच्चों को भूखा नहीं रख सकती हैं। उनके लिए वह अपने जिस्म को टुकड़े-टुकड़े काट कर भरे बाज़ार में बेच सकती है। तुम अभी बच्ची हो। तुम्हारे सामने संभावनाओं का एक विशाल विस्तार है। तुम और बहुत से काम कर सकती हो। अभी तो तुम किसी भी तरह स्कूल जाती रहो। पढ़ लिखकर कोई भी नौकरी कर लेना। तुम सफ़ाई कर्मचारी बन सकती हो, गार्डनिंग कर सकती हो, बस कन्डक्टर बन सकती हो। इन कामों के लिए किसी ख़ास पढ़ाई की ज़रूरत नहीं होती। ग़ैर मर्दों के साथ पैसे के लिए सोना अच्छी बात नहीं है। तुम्हारी माँ की मजबूरी तुम्हें थोड़े ही मजबूर कर सकती है।’

मैंने उसके चेहरे पर दृष्टि डाली वह मेरी बातों को बड़े ध्यान से सुन रही थी। अतः मैंने उससे आगे कहा, ‘देखो! जब घर में इस तरह की परेशानियाँ होती हैं तो अक्सर लड़कियाँ मुसीबतों से निजात पाने के लिए कोई सहारा खोज लेती हैं और अक्सर वह सहारा किसी ऐसे ग़ैरजिम्मेदार आदमी या औरत का होता है जो तुम जैसी मजलूम और नासमझ बच्चों को ग़लत राह पर ले जा कर दुनिया के सबसे गलीज़ धंधे में झोंक देते है जिसमें उन्हें सिर्फ बीमारियाँ, निराशाएँ और कुंठाएँ ही हाँसिल होतीं हैं।’

आगे फिर इतना और कहुँगी शादी के लिए कभी जल्दी मत करना। शादी कोई ऐसी ज़रूरी चीज़ नहीं है। जब खूब अच्छी समझ आ जाए, किसी नौकरी में आ जाओ तभी शादी करना, खूब समझ-बूझ कर। अभी तुम्हारी उम्र क्या है तेरह या चौदह साल?’’

‘‘सो तो है मेरे खुदगर्ज़ कमीने बाप ने मेरी उम्र स्कूल में पंद्रह साल लिखा दी है। उस हिसाब से मैं अगले महीने सोलह की हो जाऊँगी, फिर वह मुझे भी माँ की तरह धंधे पर लगा देगा, और मैं कुछ भी नहीं कर पाऊँगी। मेरा बाप आलसी तो पहले भी था पर इतना बुरा आदमी नहीं था। यहाँ आ कर उसे बुरी लतें पड़ गई हैं। वह बुरा नहीं है, हमारा वक्त बुरा है, उसकी संगत बुरी है। ’’

‘‘तुम एक बेहद ज़हीन और अक्लमंद लड़की हो। कल तुम किसी तरह स्कूल चली जाओ और अपनी टीचर को अपनी मजबूरियाँ खुल कर बताओ, इस मुल्क में बच्चों के साथ बदसलूकी करने की बहुत कड़ी सजा़ होती है। सोलह साल तक हर बच्चे को कानूनन स्कूल जाना ज़रूरी है। अपने भाई को भी स्कूल भेजो। आज-कल छुट्टी के दिनों में भी बच्चों को लाइब्रेरी में बिना किसी खर्चे के तरह-तरह की दस्तकारी सिखाई जाती है। आत्मसम्मान से जीने के लिए मेंहनत करनी पड़ती है बेटी। मेहनत से मत घबड़ाना ईश्वर भी उसकी ही मदद करता है जो अपनी मदद खुद करने को तैयार होते हैं।’’

उसी समय दीवार पर टंगी घड़ी ने सात घंटियाँ बजाईं। ‘‘मेरी बेटियाँ आ गई होगी और मुझे खोज रही होंगी, हमें चलना चाहिए।’’ 

उसने खाने का थैला हाथ में पकड़ते हुए कॅाफ़ी की आखीरी चुस्की के साथ केक का अंतिम टुकड़ा मुँह में डालते हुए भरे हुए गले और नीची नज़र किए मुझसे पूछा, ‘‘सब कुछ जान कर आप मुझसे नफ़रत तो नहीं करेंगी?’’

‘‘ओह! कैसी बात करती हो। सब कुछ जान कर मुझे तुमसे केवल हमदर्दी ही नहीं स्नेह भी हो गया है। मुझे पूरी आशा है तुम्हारा भविष्य उजला है। मेरी कही बात को ध्यान में रखना और कल से स्कूल ज़रूर जाना।’’

उसने मेरे हाथ को पकड़ कर अपराधबोध ग्रस्त आवाज़ में कहा, ‘ज़रूर, पर देखिए, मैं आपके बेटी को नहीं जानती हूँ।’’

मैने उसके सिर पर हाथ फिराते हुए कहा, ‘‘जानती हूँ। तुम मेरी बेटी को नहीं जानती हो।’’

‘‘आप फरिश्ता हैं।’’ कहते हुए उसने मेरा हाथ चूम लिया ।

‘‘मैं सिर्फ़ एक इंसान हूं, और एक अदना इंसान... ’’ मैंने उससे कहते हुए, खुद को याद दिलाया।

अगले सैटर-डे को ठीक साढ़े दस बजे शुकराना मेरे दरवाज़े पर महकते हुए फूलों का गुलदस्ता लिए खड़ी थी। उसका चेहरा आत्मविश्वास से दीप्त था।

‘‘कैसी हो शुकराना?’’ के जवाब में उसने कहा ‘‘आपके आर्शिवाद से बहुत अच्छी तरह से’’ कहते हुए उसने मेरे हाथो में फूलों का वह खूबसूरत गुलदस्ता पकड़ा दिया साथ ही बोसनियन ढंग से मेरे गालों को आद्रता से चूम कर अभिवादन किया।

‘‘इस औपचारिकता की तो कोई आवश्यकता नहीं थी शुकराना’’ मैंने महकते हुए फूलों के गुलदस्ते को ग़ुलदान में सजाते हुए कहा

‘‘जानती हूं। यह मात्र मेरे आंतरिक भावों का प्रतीक है ।’’ शुकराना ने विह्वल हो कर कहा ।

आपको नहीं मालूम उस दिन, उस कार्निवल में यदि आप ना मिली होती तो मेरे जीवन को कोई दिशा नहीं मिली होती। आज मैं डस्ट-कार्ट ड्राइवर हूं तो केवल आपकी वजह से। मैं किसी पर आश्रित नहीं हूँ। मेरी माँ मेरे साथ रहती है। मेरा भाई बस कंडक्टर है। छोटी बहन इस वर्ष ‘ए’ लेवल की परीक्षा देगी ।

‘‘और ....’’ मैं पूछने ही वाली थी कि वह खुद ही बोली,-

‘‘उसकी बात मत करिए वह खुदग़र्ज मेरी बीमार माँ और हम सबको अंधी गली में छोड़ कर किसी कम उम्र लड़की के साथ मैनचेस्टर चला गया और पलट कर उसने कभी हमारी कोई ख़बर नहीं ली । पर आप और आपके के शब्द हमारे साथ सदा एक देवदूत की तरह रहें और सदा रहेंगे....हर मुसीबत में रास्ता दिखाते हुए....

मैंने शुकराना को क्या दिया था? केवल कुछ शब्द ही तो दिए थे...... शब्दों के अर्थ तो उसने ही पकड़े थे...

उषा राजे सक्सेना

साहित्यिक परिचय

 

 

गोरखपुर में जन्मी, ब्रिटेन की प्रतिष्ठित कथाकार उषा राजे सक्सेना दशकों से, कहानियों के साथ-साथ कविताओं, ग़ज़लो, निबंधों एवं समकालीन रपटों के लिए भी चर्चित हैं। उषा जी यू.के हिंदी समिति की पूर्व उपाध्यक्ष होने के साथ-साथ प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘पुरवाई’ की सह-संपादिका भी रही हैं.

सम्मान- 1.उत्तर-प्रदेश- हिंदी-संस्थान-लखनऊ, 2. भारतीय उच्चायोग- लंदन-, 3. विश्व हिंदी सम्मेल भोपाल एवं 4. केंद्रीय हिंदी संस्थान- आगरा द्वारा विदेशों में हिंदी-भाषा और साहित्य के लिए पुरस्कृत एवं सम्मानित.    …

प्रकाशित कृतियाः1.‘इंद्रधनुष की तलाश में’ ( कविता संग्रह, रस वर्षा सम्मान- बनारस)- 2.‘विश्वास की रजत सीपियाँ’(कविता संग्रह) 3.‘क्या फिर वही होगा’- (कविता संग्रह) 4.‘प्रवास में’, (कहानी संग्रह) 5.‘वाकिंग पार्टनर’ (कहानी संग्रह- पद्मानंद साहित्य सम्मान-कथा यू.के.) 6.‘वह रात और अन्य कहानियाँ-’कहानी संग्रह,  7.‘ब्रिटेन में हिंदी’(ब्रिटेन में हिंदी का इतिहास)  8.मिट्टी की सुगंध- कहानी संग्रह, संपादन। 9.‘देशांतर’ काव्य संग्रह- संपादन.

अवकाशप्राप्त, स्वतंत्र-लेखन। विश्व की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में आलेख, समीक्षाएँ, संस्मरण, यात्रा-वृतांत और कहानियाँ आदि.

संपर्क-

54. Hill Road, Mitcham, Surrey.

CR4 2HQ. UK

ई-मेलःusharajesaxena@gmail.com

मोबाइलः + 44 744 34 83235

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