साहित्य में आतंकवाद

            

 

 

   

अचानक विमल कुमार की रचनाएं संपादकीय कार्यालयों से गुम होने लगीं। लम्बे इंतजार के बाद जब पता करता तो संपादक बोलते, रचना मिली ही नहीं। कई बार लिफाफा फटने से रचना गिर जाती है, संपादकीय कार्यालय से तर्क दिया जाता।

क्या उसी का लिफाफा फटता है, दूसरों के साबुत पहुंच जाते हैं। वह तो फेविकोल लगा कर बंद करता है। उसकी रचनाएं क्यों हाईजैक हो रही हैं!

मित्रों के कहने पर ही उसने अपना नाम उलट कर ‘कुमारविमल‘ लिखना शुरू किया था। आए दिन रचनाएं छपने में दिक्कत आने लगी तो साहित्यिक मित्रों ने सुझाव दिया ‘कुमार‘ की जगह ‘सिंह‘ लगाओ, तभी ज्यादा वजन पड़ेगा। साहित्य में सिंहों की भरमार है ... जगतपालसिंह, महेन्द्रप्रतापसिंह, विजेन्द्रनागपालसिंह, गंगानाथप्रसादसिंह, वीरविक्रमप्रताप सिंह आदि आदि। साहित्य में आज कोमलकांत और कमजोर नाम का समय नहीं है। नाम के साथ राम, दयाल, नाथ, प्रसाद, कुमार आदि लगाने का समय नहीं रहा। अपसंस्कृति के इस समय में कोई हिंसक नाम ही प्रभावी रहेगा। उसने विमल सिंह नाम से एक रचना भेजी और तुरंत छप भी गई। इस पत्रिका के संपादक भी नागनारायणसिंह थे।

धीरे धीरे सिंह का जादू समाप्त होने लगा और रचनाएं लौटने के बजाय गुम होने लगीं जिसका कोई ईलाज नहीं था। चिंता में मगन विमल सिंह ने प्रज्ञानाथ से मश्विरा किया। प्रज्ञानाथ ने सुझाया, ‘‘भैया! तुम साहित्य के किसी अखाड़े से जुड़ो, तभी सफल होओगे। अकेले चल कर तुम्हें कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। एकला चलो का ज़माना लद गया। संत भी टोली में चलते हैं। तुम अपने नाम के साथ ‘नाथ‘ लगाओ। मैं तुम्हें अपने मंहतजी से मिलवाता हूं। वे शब्दनामी अखाड़े के मंहत हैं। सबसे बड़ा अखाड़ा है उनका। जैसे जूनागढ़ अखाड़ा है जिसके नागा साधु महाकुम्भ में सबसे पहले स्नान करते हैं। वैसे ही इस अखाड़े के नागा लेखक हर बड़ी पत्रिका में सबसे पहले छपते हैं।"

प्रज्ञानाथ उसे महंत जी से मिलवाने ले गए। महंतजी का सिर मुंडा हुआ था। वदन पर कपड़े के नाम पर केवल एक अधोवस्त्र था। विमलसिंह उनके आगे दण्डवत् हुआ तो उन्होंने सबसे पहले नाम बदलने को कहाः ‘‘यह क्या विमलसिंह नाम धरा है। विमलनाथ नाम धरो। सिर के ये लम्बे लम्बे बाल काट दो। भारतीय बनो। हम तुम्हें अपनी ‘आस्था‘ पत्रिका में छापेगें।"             

विमलनाथ सिर मुंडा कर ‘आस्था‘ में छपने लगे किन्तु दूसरी पत्रिकाओं के द्वार उनके लिए बंद हो गए। अकेले आस्था में छप कर तो साहित्यकार नहीं बन सकते। ‘शंखनाद‘ नाम से एक अख़बार भी था। अख़बार में छपने से तो आदमी को साहित्यकार माना ही नहीं जाता।

चिंतामग्न विमलनाथ को एक संपादकीय कार्यालय में हरिभाई मिल गये। हरिभाई हर पत्र पत्रिका में धड़ाधड़ छप रहे थे। जैसे सौरभ गांगुली धड़ाधड़ रन बनाते रहे, सालों से, वैसे ही हरिभाई पिछले पन्द्रह साल से साहित्यजगत में छाए हुए थे। उनकी लेखनी से निकली हर रचना छक्का लगा रही थी। समारोहों में पहले संचालन और अब अध्यक्षता भी करने लगे थे। मुद्रा अतिगम्भीर और चेहरा ओजस्वी हो गया था।

हरिभाई का वास्तविक नाम हरिसिंह तलवार था। सिंह जैसे ख़ूंखार और तलवार जैसे धारदार नाम को छोड़ कर ‘भाई‘ लगा रहे हैं और, और पैने हुए जा रहे हैं, इससे अचम्भा था। दाढ़ी होते हुए उन्होंने ‘सिंह‘ लगाना भी छोड़ दिया था। हरिभाई ने बतायाः

‘‘भैया! आपको साहित्य जगत के किसी भाई से मिलना होगा, उसकी गैंग में शामिल होना होगा, नाम के साथ ‘भाई‘ लगाना होगा, जैसे मैं लगाता हूं। यह वैसा ही उपनाम है जैसा मुन्ना ‘भाई‘। तुम चाहो तो मैं तुम्हें साहित्य के एक गिरोह के भाई से मिलवा सकता हूं। वे अपने इलाके से सबसे बड़े भाई हैं। उनके इलाके में कई पत्रिकाएं चलती हैं। कोई भी नई पत्रिका उनकी इजाजत के बिना न शुरू को सकती है, न चल ही सकती है और न ही बंद हो सकती है।। तुम्हें अगर उन्होंने अपने गिरोह में ले लिया तो न्यारे व्यारे हो जाएंगे। हां, उनके लिए काम तो करना ही पड़ेगा।"

हरिभाई उसे प्रचंडभाई से मिलाने ले गये। बहुत बड़ा मगर पुराना सा दिखने वाला घर था उनका। घर क्या हवेली ही थी। आंगन में पाजामा कुरता पहने, कन्धे पर झोला लटकाए कई लेखकनुमा लोग घूम रहे थे जिनके डील डौल पहलवानों से थे। ऐसा लग रहा था, उनके झोलों में कलम न हो कर पिस्तौल हो। हरिभाई उनसे दुआ सलाम करते हुए मुख्य द्वार तक पहुंच गए। द्वार पर धोती कुरता पहने लम्बे चैड़े द्वारपाल से व्यक्ति के कान में फुसफुसाए ... नया लड़का है ... बहुत काम का है ... गिरोह में शामिल होना चाहता है, भाई से मिलवा दो। दरबान से उस तगड़े आदमी ने विमल को ऊपर से नीचे तक घूरा और अंदर आने का संकेत किया।

भीतर बड़े कमरे के बीचोंबीच एक सज्जन झूले पर बैठे थे। चारों ओर पुस्तकों से भरी अलमारियां, मेज पर कई पत्रिकाएं पंखे की हवा से फड़फड़ा रही थीें। सफेद धोती, सिल्क का खुला और लम्बा कुरता, कन्धे पर कीमती शाल, आंखों में मोटा काला चश्मा। एक ऊबड़ खाबड़ दाढ़ी वाला कविनुमा लड़का उनकी टांगें दबा रहा था।

 धड़कते दिल से विमल कुमार अंदर घुसा। पहले झिझका, फिर हरिभाई के पीछे लगभग छिप कर खड़ा हो गया। जब हरिभाई ने उन्हें झुक कर सलाम किया तो विमल एकदम दण्डवत् हो गया। हरिभाई ने उसका परिचय कराया: ‘‘ये नये लेखक हैं। भले चंगे छप रहे थे कि एकाएक इनकी रचनाएं गुम होने लगीं। साल भर से इनकी रचनाएं संपादक तक पहुंच ही नहीं पा रही हैं।‘‘

उन्होंने चश्मा खोल उसे गौर से देखा, मुंह से भाप निकाल चश्मे के शीशे साफ किएः ‘‘भैया! इस धण्धे में आजकल पैर जमाना मुश्किल हो गया है। कई संकट हैं अब ... प्रेमचंद का जमाना तो रहा नहीं, अब यहां भी गांठ में रूप्पैया चाहिए। कब से हो इस धण्धे में......।"

‘‘साल दो साल हो गए भाई ... कुछ करिए ..." वह गिड़गिड़ाया।

‘‘हूं ...‘‘ उन्होंने हुंकारा भरा तो वह एक दम सहम सा गया।

 ‘‘इस धण्धे में पैर जमाना बहुत मुश्किल है ... हम फिर कह रहे हैं ... सोच लो। वैसे भी इस काम में रक्खा कुछ नहीं है। बेहतर हो तुम गुटके की दुकान खोल लो। किसी भी पेड़ के नीचे टहनियों से गुटके के पैकट लटका लो।"

‘‘भाई, ये कलमजीवी बनना चाहता है। इसका दिमाग हमेशा चलायमान रहता है। लिखेगा नहीं तो पागल हो जाएगा। शौक है बच्चे को, कुछ करिए। आपके दरबार में हाजिर हुआ है।"

हरिभाई ने सिफारिश की।

 

‘‘ये तो तुम जानते हो हरिभाई कि हमारे रसालों में हमारे भाईलोग ही छपते हैं। वही छापे जाते हैं, वे ही पढ़ते हैं, उन्हें ही पढ़ाया जाता है। उन पर ही तफसरा किया जाता है, उन पर ही चर्चा होता है। अब इस में और लोगों की गुंजाइश कहां रह जाती है!’’

वे विमल कुमार को ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोले।

‘‘भाई! बस कुछ करिए आप बच्चे का ... आपके द्वारे आए हैं।’’ हरिभाई गिड़गिड़ाए।

 ‘‘भैया! तुम्हें पता है इस धण्धे में अब कई लोग आ गए हैं। फिल्म वाले आ गए हैं। हीरोइन सुनीता की कविता की किताब पता है कितनी बिकी थी ... अब फिल्म गीतकार ‘बेबस’ साहब को ही लीजिए। हर पत्रिका में नम्बर एक पर बेधड़क आ रहे हैं। कजरारे कजरारे से लेकर मुन्नी के बदनाम होने और शीला की जवानी तक गीतकार कवियों ने गीत रच डाले हैं। जहां कवि ‘क्रांति’ को होना चाहिए, वहां ‘जलती जवानी’ फिल्म के गीतकार आ खड़े होते हैं। बेचारे आम और नवोदित कवि कहां जाएं। नेता अभिनेताओं की कविताएं संगीतबद्ध हो कर सुर और ताल में गाई जा रही हैं। नेता यदि कवि हो जाए तो कविताओं के अनुवाद के लिए लाइन लग जाती है। उधर संगीतकार धुन गुनगुनाने लग जाते हैं। उस पर आलम यह है कि फिल्मी नायक और निर्देशक ही अब कहानीकार और गीतकार हैं। फिर एनआरआई लेखक ... एक और जमात ... बाहर से रचना भेजते हैं। रोकड़ा तो बहुत है, ‘सहयोगी प्रकाशन’ को एक खोखा दे कर चकाचक किताब छपवा लेते हैं। उनकी प्रकाशन सूची देख लो। पत्रिकाओं में ‘प्रवासी कलम से‘ एक काॅलम नियत कर दिया गया है। भारतीय गरीब लेखकों के लिए विदेशों में आकर्षक ईनाम स्थापित हो गए हैं। जैसे बहुत बार ईमेल द्वारा आपको अचानक लाख डालर ईनाम के लिए चुन लिया जाता है जिसे पाने के लिए कुछ हजार रूपये जमा करने के निर्देश दिए जाते हैं। वैसे ही ये ईनाम हैं। भारतीय लेखक के लिए तो दस डालर का सम्मान ही काफी है। इधर भारत में भी प्रवासी लेखकों को सम्मानित करने का प्रयास किया जाता है। मगर उनके लिए एक लाख का सम्मान वहां के एक हजार के बराबर है जिसका वे आपस में मजाक उड़ाते हैं। अब भारत के साहित्य को विदेशी ख़तरों से सुरक्षा की जरूरत आन पड़ी है।’’

वे एकाएक चुप हो कर विमल कुमार की प्रतिक्रिया जानने के लिए उसके चेहरे को एकटक देखने लगे और पुनः बोले: ‘‘अब तो भईया! फिल्मी लेखक, ईल्मी लेखक, अफसर लेखक, नेता लेखक, अध्यापक लेखक, संपादक लेखक, बोल्ड लेखक, कोल्ड लेखक, प्रवासी लेखक, अप्रवासी लेखक, बकवासी लेखक, बनवासी लेखक, चापलूस लेखक, मक्खीचूस लेखक, श्रमजीवी लेखक, बुद्विजीवी लेखक, संत लेखक, महंत लेखक, भ्रांत लेखक, संभ्रांत लेखक, काॅलम लेखक, सालम लेखक, नर लेखक, वानर लेखक, नारी लेखक, अर्धनारी लेखक, पिछड़ा लेखक, बिगड़ा लेखक, दबंग लेखक, अपंग लेखक, दलित लेखक, फलित लेखक, फाॅरवर्ड लेखक, बैकवर्ड लेखक, वरिष्ठ लेखक, कनिष्ठ लेखक, अतिवादी लेखक, विवादी लेखक, आस्तिक लेखक, नास्तिक लेखक, लोकधर्मी लेखक, विधर्मी लेखक, देशभक्त लेखक, देशद्रोही लेखक, जुझारू लेखक, सुधारू लेखक, स्वयम्भू लेखक, शम्भू लेखक, पुरस्कृत लेखक, तिरस्कृत लेखक, खिलाड़ी लेखक, अनाड़ी लेखक, सरकारी लेखक, भिखारी लेखक। अब तो फेसबुकिया लेखक, वाट्सएप लेखक। अरे, एक हो तो गिनाएं ... साहित्य में आज कई आरक्षण हैं, जिसके हम सख्त खि़लाफ रहे हैं। बड़े संकट हैं आज। देश में जितनी जातियां नहीं, उससे ज्यादा लेखकों के प्रकार हैं। फिर भी तुम चाहते हो तो फीस जमा करवाओ और बाहर अपना नाम दर्ज करवा दो।  और सुनो, दाढ़ी बढ़ाओ। अरे! मुफ्त की फसल है ये तो कंजूसी काहे की। हो, हो, हो।‘‘ वे हंसते चले गये।

 हरिभाई बाहर आ गए। बरामदे के एक कोने में मेज़ कुर्सी लगाए एक सज्जन बैठे थे। इनकी जीन कई जगह से फटी थी, टाट सा कुरता पहन रखा था। खिचड़ी दाढ़ी, लगता था, नहाए कई दिन हो गए हैं। हरि भाई ने दाखिले की फीस जमा करवा कर नाम लिखवा दिया: ‘विमलभाई‘! अब आप अपनी रचना यहां जमा करवाईएगा, सीधे कभी न भेजना। उन सज्जन ने कहा।

 नया लौंडा है!  वे सज्जन आंख मारते हुए भाई की तरह हंसेः हो, हो, हो। उनके मुंह से निकली पीक विमलभाई की नई सफेद कमीज को लाल कर गई।

 

परिचय

24 सितम्बर 1949 को पालमपुर (हिमाचल) में जन्म। 125 से अधिक पुस्तकों का संपादन/लेखन।

    वरिष्ठ कथाकार। अब तक दस कथा संकलन प्रकाशित। चुनिंदा कहानियों के पांच संकलन । पांच कथा संकलनों का संपादन।

   चार काव्य संकलन, दो उपन्यास, दो व्यंग्य संग्रह के अतिरिक्त संस्कृति पर विशेष काम। हिमाचल की संस्कृति पर विशेष लेखन में ‘‘हिमालय गाथा’’ नाम से सात खण्डों में पुस्तक श्रृंखला के अतिरिक्त संस्कृति व यात्रा पर बीस पुस्तकें। पांच ई-बुक्स प्रकाशित।  

   जम्मू अकादमी, हिमाचल अकादमी, तथा, साहित्य कला परिषद् दिल्ली से उपन्यास, कविता संग्रह तथा नाटक पुरस्कत। ’’व्यंग्य यात्रा सम्मान’’ सहित कई स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा साहित्य सेवा के लिए पुरस्कृत।

    अमर उजाला गौरव सम्मानः 2017। हिन्दी साहित्य के लिए हिमाचल अकादमी के सर्वोच्च सम्मान ‘‘शिखर सम्मान’’ से 2017 में सम्मानित।

     कई रचनाओं का भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद। कथा साहित्य तथा समग्र लेखन पर हिमाचल तथा बाहर के विश्वविद्यालयों से दस एम0फिल0 व दो पीएच0डी0।

पूर्व सदस्य साहित्य अकादेमी,

पूर्व सीनियर फैलो: संस्कृति मन्त्रालय भारत सरकार, राष्ट्रीय इतिहास अनुसंधान परिषद्, दुष्यंतकंमार पांडुलिपि संग्रहालय भोपाल।

वर्तमान सदस्यः राज्य संग्रहालय सोसाइटी शिमला, आकाशवाणी सलाहकार समिति, विद्याश्री न्यास भोपाल।

पूर्व उपाध्यक्ष/सचिव हिमाचल अकादमी तथा उप निदेशक संस्कृति विभाग।

 

सम्प्रति: ‘‘अभिनंदन’’ कृष्ण निवास लोअर पंथा घाटी शिमला-171009.

94180-85595 

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