सबसे बड़ा उपहार

 

जीवन के आठवें  साल में

प्रवेश करने पर

बच्चे को गोद में उठाया मां ने।

और कहा - "मेरे लाल! 

तुझे देने के लिए इस वक्त 

मेरे पास कुछ भी नहीं रहा

परंतु 

आज मैं तुझे दे रही हूं वही 

जो लव कुश को दिया मां सीता ने

और पार्थ को गीता ने।

जिसे कहते हैं जीवन-मूल्य।

यही होगा उपहार

 

तेरे लिए अमृत तुल्य।

कभी किसी निर्दोष पर

मत करना अत्याचार।

वर्षाना सभी पर करुणा

और करना सद्व्यवहार।

 

दुनिया में सबसे अमूल्य हैं शुभाशीष,

शुभकामना और प्यार।

किसी निर्दोष, कर्मनिष्ठ के रास्ते

में कभी मत बनना दीवार ।

ताउम्र निभाना रिश्ते

और

समाज देश तथा जगत के प्रति कर्तव्य।

तभी जीवन बनेगा भव्य।

 

मत भूलना 

अंतिम विजयी होता है सत्य ।

इसे उतार लेना हृदय पटल पर

और रखना 

सुंदर पारदर्शी चरित्र।

 

करना सभी के साथ न्याय,

करना हिंसा का प्रतिकार।

मैं जो दे रही हूं 

आदर्शों की शिक्षा।"

 

बेटे ने कहा - "मां यही तो है

सबसे बड़ा उपहार।

संभाल कर रखूंगा इसे 

विरासत की तरह। 

इस शिक्षा से

जीवन को उन्नत बनाऊंगा।

तथा लव, कुश, ध्रुव और प्रहलाद का

उदाहरण बन जाऊंगा।।

 

       

 आचार्य नीरज शास्त्री

34/2, लाजपत नगर, एन. एच-2, मथुरा281004

संपर्क सूत्र- 9259146669

shivdutta121@gmail.com

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload

eKalpana literary magazine

​​Contact & Social Media -

ekalpanasubmit@gmail.com

सभी रचनाएं
ekalpanasubmit@gmail.com पर भेजें
Please reload

Please reload

 

... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

ई-मेल में सूचनाएं, पत्रिका व कहानी पाने के लिये सब्स्क्राइब करें (यह निःशुल्क है)