... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

लेखक परिचय

डॉ. स्वाति तिवारी

रचना प्रक्रिया का कोई निर्धारित फार्मूला नहीं होता

      जब भी कहानी शुरू होती है तो कहानीकार चाहता है कि परिकथाओं की तरह उसका सुखद अन्त हो कहानी के पात्र राजा-रानी की कहानी की तरह खुशी-खुशी मिल जाए, उड़नखटोले वाला राजकुमार आए और राजकुमारी को ले जाए वे साथ रहने लगे.....वगैरह....वगैरह....पर किसी भी कहानी की रचना प्रक्रिया इतनी सरल नहीं होती. राजा-रानी की कहानियाँ तो परिकल्पनाओं से रची परिकथाएँ होती हैं. जीवन परिकल्पना नहीं होता, वहाँ यथार्थ का खुरदरा धरातल होता है और मेरी और मेरे समकालीन कथाकारों की आज की कहानियाँ उसी खुरदरे धरातल से उठती हैं. मैं लाख चाहूँ कहानी के अंत को सुखान्त करने की पर ऐसा होता नहीं है क्योंकि हर कहानी जीवन के भिन्न-भिन्न संघर्षों में उलझी हुई होती है....और यह सच व स्वाभाविक भी हैं क्योंकि रचना प्रक्रिया का कोई निर्धारित फार्मूला नहीं होता कि हम ऐसा करेंगे तो ऐसी रचना तैयार होगी. जब जैसे समय मिलता है, कोई विषय कोई बात कचोटती है लिख लेती हूँ. दरअसल सोचकर कोई कहानी नहीं लिखी जाती क्योंकि सोचना एक बात है और लिखना एक रचनात्मक सृजन प्रक्रिया है उनके लिए जब कोई चीज परेशान कर रही होती है पीड़ा दे रही होती है...या कोई विचार किसी घटनाक्रम से उद्वेलित कर रहा होता है तो स्वत: वह लेखन में उतर जाता है. रचना उसी बिन्दु से शुरू होती. कहने का तात्पर्य यही है कि हर कहानी का एक प्रस्थान बिन्दु होता है वह जब भी उभरकर आता है तब लिखने की छटपटाहट होती है. कह सकते है एक बैचेनी एक अनम....बना रहता है. तब वहीं से कुछ आकार बनने लगते है कुछ खाके खिचने लगते है...रचना प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष ही वह बैचेनी है जो मन को विचलित करती है..लिखने के लिए बाध्य करती है शायद उस पीड़ा से निजात पाने के लिए लिखती हूँ लिखते हुए साहित्य के मायने मन की वही बेचैनी और छटपटाहट या कहूँ आत्मिक विचलन भी हैं और लिखने के बाद वह मन और मेरा आत्मिक स्थापन भी है. मैंने कल्पना के आधार पर नहीं लिखा जीवन में जिसे जैसा देखा उसको वैसा ही चित्रित करती हूँ लेकिन ये जरूर है कि जब उसमें भीतर जाने यानी परकाया प्रवेश की कोशिश करते हैं तो फिर वह पात्र जिधर ले जाता है स्वत: चली जाती हूँ.

      गृहस्थ जीवन है, कामकाजी हूँ एक जिम्मेदार पद पर होना और साथ में सामाजिक व संस्थागत कार्यों की व्यस्थताएं होती है मेरे लिए हमारी परिवार जैसी विशेष और पवित्र संस्था प्रमुखता रखती है. इन सबके बीच जो और जितना समय बचता है वह मेरा अपना होता है, उसी में लिखती हूँ. हर व्यक्ति के जीवन से जुड़े हर क्षेत्र में समय की अपनी माँग होती है..... उनको पूरा करते हुए जितना लिख सकते हैं उतना ही उचित है क्योंकि एक तरफा नहीं हुआ जा सकता. जाने अनजाने मेरे लिखने का प्रभाव परिवार को प्रभावित भी करता है जैसे करना कुछ और होता है आप लिखने लग गए, पर सब चलता है कुछ समझौते खुशी-खुशी लेखक का परिवार स्वत: कर लेता है.

      परिवार का वातावरण हमेशा साहित्यिक रहा है. पिताजी हिन्दी के व्याख्याता थे शुद्ध उच्चारण वाली हिन्दी स्वत: संस्कारों में शामिल होती चली गई. पिताजी से कथा-कथन शैली में उच्च साहित्यिक कहानियाँ बचपन में ही सुनी शायद पिताजी से सुनी कहानियों से ही मेरे मन में कहानी की मिट्टी तैयार हुई होगी और वह मिट्टी कभी सम्वेदना का लावा बन कर तो कभी गीली होकर दिलो-दिमाग के चाक पर चढ़कर कहानी का आकार ले लेती हैं. परिवार से मिले संस्कार अमिट धरोहर होते हैं जो जीवन मूल्यों को समझने की दृष्टि देते हैं जो हमें संवेदनशील बनाते हैं.. एक रचनाकार की यही लेखकीय संवेदना उसकी रचना प्रक्रिया का धरातल होती है. यहीं रचनाओं में प्रकट होती है, भाषा में उतरती है, रचना में जो बिम्ब आते हैं वे संवेदना के आधार पर ही संभव होते है जो पात्र या परिवेश जीवन से हम उठो है संवेदना उसमें प्रकट होती है पता चलता है कि उसमें कितना ताप है या कितनी गहरायी है. जहाँ तक मेरी रचना प्रक्रिया का ताल्लुक है तो मैं कोशिश करती हूँ कि जो जीवन उठाती हूँ वह पात्र जितना ज्यादा उस जीवन के निकट हो उतना ही अच्छा. मेरी लेखनी के आधार वही साधारण लोग है जिन्हें आम आदमी कहा जाता है. मेरी कोशिश ये भी होती है कि मैने जैसे उन लोगों को देखा वो वैसे ही मेरी रचना में आएँ. चूंकि कहानी हमारे आसपास से या सामाजिक सरोकारों से आती है तो मेरे पात्र जैसे हैं वैसे हैं. नकली आवरण या छद्म रूप ना मेरे स्वभाव में है ना मेरी किसी कहानी के किसी पात्र में. मेरे किसी पात्र ने ना तो अनावश्यक मर्यादा तोड़ी है ना ही मर्यादा का आर्दश दिखावे के लिए औढ़ा हैं. चूंकि मैं सामाजिक हूँ अत: उससे बाहर कोई असामाजिक तत्व नहीं खोजती. मेरी कहानी के पात्र इसी समाज से निकले होती हैं. अत: मेरी कहानियों में अपने पात्रों की गरिमा का हमेशा ख्याल बना रहता है. बावजूद इसके मैने ना तो आदर्श कथाएँ, ना ही प्रेरक कथाएँ रची बल्कि जीवन मेरा मानना है कि कहानी मर्म है जीवन का. अत: साहित्य में जीवन का सत्य होना चाहिए क्योंकि वर्णित सुख-दु:ख पाठक आत्म सात कर लेता है इसलिए लेखन सहज-सरल और प्रवाहमान हो. कोशिश करती हूँ ज्यादा क्लिष्ट अलंकारी भाषा नहीं बल्कि सुन्दर भावों की प्रस्तुती करूँ, जो लोगों को तमाम समस्याओं से जूझने का हौसला दे सकें. एक और महत्वपूर्ण बात जिसका ध्यान रखने की कोशिश भी रहती है. मेरा मानना है कि व्यक्ति आज जीवन के सघर्षों में उलझा हुआ है वह तमाम तरह की उलझनों से परेशान हैं, इसलिए साहित्य को यथार्थ होते हुए भी सकारात्मक और आशावादी हो. सकारात्मकता एक ऊर्जा का पयार्य है.

      अक्सर रात में लिखती हूँ. सारा दिन दफ्तर व घर की व्यवस्थाओं के साथ संतुलन बनाने में खर्च होता है. अत: रात का समय लेखन के लिए उपयुक्त होता है लेखन एकाग्रता की माँग करता है. रोजमर्रा की उपापोह, खटरपटर, टेलीफोन या कुकर की सीटी भी ध्यान भंग करती है. फिर समय भी नहीं होता है, दिन में. पहले जब बच्चे छोटे थे तब अपनी पढ़ाई कर रहे होते थे तब उनके साथ जागने की आदत पढ़ गई थी. तब से लेखन रात में करती हूँ. अब बच्चे बाहर है अक्सर फोन का इंतजार करती हूँ. इन्टरनेट पर बच्चों से चैट होती है तो लेखन के पहले मुझे अपने परिवार, अपने बच्चों की कुशल मंगल राहत देती है. मेरा मानना है कि अच्छा साहित्य मन की गहराईयों से निकलता है और दिलों को स्पर्श करता है वह मात्र क्षणिक उत्तेजना नहीं बल्कि अन्तरमन की आन्तरिकता लिए होता है. सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और परिवेश गत बदलाव हर साहित्य में स्वत:समाहित होते है. अत: लेखक में अपने समय की समस्याओं तथा संकटों की पहचान की क्षमता होनी चाहिए क्योंकि उनकी सकारात्मक एवं रचनात्मक अवधारणाएं ही समाज को नई दिशा, नए आयाम देती है अत:साहित्य का संकल्प समाज के हित में होना चाहिए.

      मेरी लेखनी के आधार भी यही समाज के साधारण लोग हैं. लेखनी का दायरा अपने आसपास के लोगों से शुरू होकर बाहर की दुनिया तक गया इसलिए मेरी कहानी के पात्र काल्पनिक कभी भी नहीं रहे वे इसी सामाजिक परिवेश से उपजे कथा बीजों से बने हैं. मेरा मानना है कि साधारण लोगों के जीवन के सरोकारों से ही असाधारण कहानी बनती है. मेरा विचार है कि मेरी लेखनी की सार्थकता तभी है जब साधारण लगने वालों में को विलक्षणता कोई असाधारण बात ढूंढ लाए. लेखन के मेरे पात्र स्वयं मुझे लिखने के लिए बाध्य करते है. इनमें ज्यादातर पात्र स्त्रियाँ हैं, विडम्बना ही है समाज और परिवार की धूरी (केन्द्र) होते हुए भी वही सबसे ज्यादा उपेक्षा, तिरस्कार और शोषण की शिकार होती. भोपाल गैस त्रासदी में विधवा हुई स्त्रियों के लिए बनी विधवा कालोनी की वे विधवाएं हो जो मेरी पुस्तक "सवाल आज भी जिन्दा है' की मुन्नी बी हो, साजिश हो, रशिदा बेगम हो चाहे चम्पादेवी। वृद्धावस्था पर केन्द्रित अकेले होते लोग की बुढ़ी काकी, भाग्यवती, अंतराल की लाजो, हो चाहे उत्तराधिकार की कौशल्या इन सभी ने लिखने के लिए बाध्य किया. ऐसे शोषित पात्रों की स्थिति मुझे मेरे संवेदनातंत्र को विचलित कर देती है तब स्त्रियों के प्रति संवेदनहीनता, अनदेखियों और शोषण की लम्बी कहानियों का एक शर्मनाक पड़ाव मेरे सामने होता है जो मानवीय पक्ष और शोषण के विरुद्ध सवालों को उठाने के लिए लिखवाता है. अक्सर मैं अपने पात्रों से कहीं ना कहीं मिली होती हूँ. मैंने अपने साहित्य में अश्लीलता को डालकर प्रचार-प्रसार का हथकण्डा कभी नहीं अपनाया. अश्लीलता साहित्य को चर्चित कर सकती है पर सार्थक नहीं. लिखते हुए हमेशा ध्यान रखती हूँ कि साहित्य-शील-अश्लील का ध्यान रखकर मर्यादित सत्य के स्वरूप में ही लिखा जाना चाहिए. विज्ञान की विद्यार्थी हूँ इसका फायदा मुझे मिलता है कोई भी बात गप्पबाजी नहीं होती. वैज्ञानिक दृष्टिकोण घटनाओं का विश्लेषण करने में मदद करता है.

      मैं लेखक होने के साथ-साथ पत्रकारिता से भी जुड़ी हुई हूँ. इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया दोनों में काम किया है. मैं कहानी के साथ-समाज, मानवाधिकार, कानून जैसे विषयों पर भी लेखन करती हूँ. विषयानुरूप विधा का चयन करती हूँ - क्योंकि वह मेरे लिए अपनी बात कहने का रास्ता आसान करता है. मुझे लगता है मेरी कहानी या साहित्य की मूल चिन्ता में हमेशा अपने समय का मनुष्य हो - उसे उसी की भाषा में, समस्याओं के साथ चित्रित करूँ - कहानी को कैसे कहा जाए कितना कहा जाए यह कहानी के पात्र पर छोड़ देती हूँ वह कहाँ तक ले जाता है. जरूरी नहीं कि हमारी कहानी समस्या का समाधान भी दे या समाज को कोई संदेश दे। कहानी जहाँ खत्म होती है समाधान व संदेश के वैचारिक बिन्दु वहीं से प्रवाहित होना शुरू होते हैं.

      इसलिए लिखते वक्त प्रयास समाधन में नहीं कहानी के दृश्य के शब्दांकन में होता है ताकि कहानी उपदेश या भाषण नहीं लगे उसका कहानीपन बचा रहे.

डा.स्वाति तिवारी

ईएन 1/9, चार इमली

भोपाल