... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

लेखक परिचय

तबस्सुम फ़ातिमा

मैं कहाँ हूँ ? कहीं हूँ भी या नहीं?

मैं अक्सर सोचती हूँ /

सोचते सोचते थक जाती हूँ और कोई जवाब नहीं मिलता /

निरुत्तर होना ही मेरा लेखन बन जाता है /

यहां जवाब कभी नहीं रहे 

स्त्री के प्रश्न भी सूखे झरनों की तरह होते हैं 

जहां पानी की जगह उदासी टपकती है 

सवालों की जगह एक ना समाप्त होने वाली गुमनामी 

उसका मुक़द्दर /

मैं पिंजरा हूँ या नुमाइश?

सजावट हूँ या घर की दीवारों की तरह 

पीली पड़ती हुई चांदनी?

मैं नूर या उजाला नहीं हो सकती /

मैं एक ठंड से भरी सुबह आसमान में छायी हुई 

गहरी धुंध हूँ जिसके आर पार देखना सम्भव तो है 

लेकिन कोई भी यह प्रयास नहीं करता 

मैं अबूझ पहेली हूँ 

जिस पर समय ने 

सियाह रौशनाई से लिख दिया है - औरत /

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लेखन की सतह पर इन्ही गहरी धुंध से गुज़रती हुई 

बोनसाई होती रही हूँ। 

( मैं उसे देखने और तलाश करने की कोशिश में हर बार हार जाती हूँ। वर्ष में एक दिन ,८ मार्च वह मिलती भी है ,तो ऐसे मिलती है जैसे उसका मज़ाक़ उड़ाया जा रहा हो। आदम -हव्वा की तारीख में अब तक उसकी उप्लाभ्दियों गिनवाने के लिए पुरुष सत्तात्मक समाज के पास कुछेक गिनती के नामों के सिवा कुछ भी नहीं। वह है कहाँ ? इस पूरे ब्रह्मांड ,नक्षत्र ,विश्व या अंतरराष्ट्रीय पटल पर ? कहीं है तो दिखा दीजिये ? वह इतनी कम क्यों है कि फलक तक दृष्टि ले जाने के बावजूद भी दिखाई नही देती। 

वर्ष  के सारे दिनों पर कब्ज़ा करने के बाद एक दिन औरत  के नाम करने वाले दरअसल यही बताना चाहते हैं  कि उसका वजूद नगण्य है। नाम मात्र उपस्थिति के बावजूद उसकी तमाम उप्लाभ्दियों  पर हंसने और रोने वाले तो हैं उसे समानता का अधिकार देने वाले नहीं। औरत  ने , न  कोई अपने अधिकार की जंग शुरू की है, न यह साहस उसके पास है। वह केवल पुरुष अधिकार और संवाद का हिस्सा भर है। .वह दिखाई दे रही है ,यह उसी तरह का एक झूट है जैसे यह कहना कि वह अपने सपनों के साथ आगे बढ़ रही है। 

हम उसे हर बार सपने देखने से पहले ही मार देते हैं /

वह जीवित होते हुए भी केवल एक नाटक भर है /

जब तक जीवन शेष है ,नाटक चलता रहेगा /

लेकिन कोई उसे ढूंढ के नहीं लाएगा /

यह असफलता ही दरअसल मर्द की सफलता है )

सोचते सोचते तक जाती हूँ और कोई जवाब नहीं मिलता /

निरुत्तर होना ही मेरा लेखन बन जाता है /

------------ तबस्सुम फातिमा