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  • संध्या रायचौधरी

अम्मां

इंट्रो ::

अम्मां को शायद अपने अंत का पूर्वानुमान हो गया था. वे आश्चर्यजनक रूप से ठीक होने लगीं थी. मृत्यु से दो दिन पहले उन्होंने दीदी को बैंक में रखी राशि के चेक काटकर दिया और एक स्टाम्प पेपर पर खेत का उत्तराधिकारी दीदी को इस विश्वास से बना दिया कि उनके न रहने पर अनिषा को वे गोद ली बेटी की तरह उसके बचे हुए दायित्व निभाएंगी. दीदी के पूर्ण आश्वासन के बदौलत ही शायद अंतिम समय में अम्मां के चेहरे पर अपूर्व संतुष्टि और शांति थी---

दफ्तर से वसंत आए तो हमेशा की तरह नियत समय पर, लेकिन आज वो कुछ निढाल से लगे. पता नहीं क्यों दो दिन से मन कुछ अजीब सा हो रहा था, दिल कुछ आशंका से धड़क सा रहा था. वसंत एकदम चुप से थे. हमेशा की तरह न तो मोजे उछाल कर फेंके, न आते ही गरमागरम चाय के लिए आवाज लगाई. हमेशा की तरह मैंने ढाई कप चाय बनाई, कुछ बिस्किट्स रखे और चाय का कप पकड़ाकर उठने लगी तो , एकाएक वसंत ने हाथ पकड़कर कहा, आरती जरा दो मिनट बैठो, मेरी बात ध्यान से सुनना और होशोहवास पर काबू रखकर ईश्वर को धन्यवाद करना कि जो हुआ अच्छा हुआ.

धन्यवाद.. यदि वसंत की तरक्की हुई तो फिर वे ऐसे क्यों शांत से हैं, और होशोहवास..जरूर कोई बुरी खबर है. कहीं अम्मां..... आगे कुछ सोचने की हिम्मत ही नहीं हुई.

बिना लागलपेट, बिना भूमिका बांधे वसंत एकदम बोले - अभी चार बजे कानपुर से दीदी का फोन आया था अम्मां नहीं रहीं. एक ही क्षण में वसंत का चेहरा अजीब सा लगने लगा. अम्मां नहीं रहीं..अम्मा नहीं रहीं..शब्द कहीं दूर से आते जान पड़े. रुलाई जो फूटी तो डेढ़ घंटा अविरल आंसू बहते रहे. वसंत ने थोड़ी बहुत कोशिश जरूर की कि मैं संभल जाऊं. पता नहीं क्यों वसंत तो स्वाभाविक रूप से सहानुभूति दिखा रहे थे लेकिन मुझे यह सब दिखावा लग रहा था.

अम्मा जीत गई, हम हार गए.

कैसा लग रहा होगा अंतिम समय में अम्मां का चेहरा? हमेशा झक सफेद-गुलाबीपन लिए चेहरा. लेकिन मैं क्यूं इतना विलाप कर रही हूं. पिछले तीन साल से और शायद छह महीने से तो जब-जब भगवान के सामने हाथ जोड़े तो बस एक ही गुहार ईश्वर से लगाई, अम्मा.. को अपने पास बुला लो भगवान. क्या कोई अपनी मां के लिए ऐसी दुआ मांग सकता है, हां..लेकिन मैंने वो पाप किया और जानबूझकर किया. रोज-रोज ईश्वर से उन्हें अपने पास बुला लेने की जिद यानी कि अम्मां....की जीती-जागती मौत. क्या करती नहीं देख पाती थी अम्मां....का वो रुदन, उनकी तड़प, असहाय सी जब वो अपनी मासूम आंखों से मेरी ओर देखती थीं तो कलेजा कांप जाता था. कितनी बार वो कातर स्वर में कहतीं, आरती बेटा, ऐसी गोली ला दे जिसे खाते ही मैं मर जाऊं... मेरे पापों का बदला कितना लंबा चलेगा? मैं और अलका दीदी उन्हें झिड़क सा देते, दीदी कहतीं क्या बेकार की बातें करती हो अम्मा... अब जितने दिन जीना लिखा है तो उसे मानकर चलो. दीदी फिर भी कहतीं, अम्मां , ठीक हो जाओगी इतनी परेशान क्यों होती हो. फिर अम्मां तकिए में मुंह छिपा कर सिसकने लगतीं, मैं और दीदी भी अनमने ढंग से कमरे से बाहर आ जाते.

जब ईश्वर ने मेरी सुन ली तो मुझे तो उनका धन्यवाद देना चाहिए, लेकिन आज मन का कोना कह उठा, काश.. अम्मां और जी लेतीं. मुझे आंसू नहीं बहाना चाहिए, लेकिन हिचकी जब तब निकल ही उठती थी.

वसंत ने उसी रात चलने की तैयारी कर ली थी. तत्काल में रिजर्वेशन भी मिल गया था, अन्यथा वसंत ने दबी जुबान से कहना चाहा था, आरती मान लो यदि आज का रिजर्वेशन नहीं मिला तो..क्या हम कल सबसे पहली वाली बस पकड़ सकते हैं? किंतु जैसे मुझे मौका मिल गया. बिफरकर यह कहने पर कि अम्मां को तो तुम एक घंटा भी अपने घर पर रखने को तैयार नहीं हुए, अब उनके न रहने पर तुम्हें किस बात का भय है. अब तो खुश हो जाओ कि अम्मां के अंतिम क्रिया-कर्म के दायित्व से मुक्त हो गए. उसके बाद वसंत एकदम चुप हो गए.

अस्थिर मन से उसी शहर में रहने वाली अपनी ननद के पास बच्चों को छोड़ हम निकल आए. ट्रेन में बैठते ही वसंत तो आधा घंटा में खर्राटे लने लेगे. लेकिन मेरी आंखों के आगे अम्मा के कई चेहरे एक के बाद उभरने लगे. अम्मा और बाबा एक-दूसरे से एकदम भिन्न थे. अम्मां की हर बात, हर आदत में नफासत भरी औपचरिकता होती थी. जबकि बाबा एकदम लापरवाह, हर परिस्थिति में समझौता कर लेते, रोटी चाहे ठंडी हो या सुबह की, दाल में बघार न भी लगा हो तो भी वे बिना मुंह बनाए खा लेते, वही अम्मां जब भी खाने बैठती तो उन्हें एकदम तवे से उतरी फूली हुई रोटी ही चाहिए होती थी. वे या तो सबसे पहले खाना खाती थीं, या सबसे बाद में. हम लोग कई भुनभुनाते हुए उनके लिए रोटी सेंकते लेकिन जब तक अम्मां खाना अच्छे से खाती रहीं हमने उन्हें गरम रोटी ही खिलाई.

अम्मां को सदैव यही मलाल रहा कि उनके चारों बच्चे अलका दीदी, मैं अंकित भइया और अनिषा अपने बाबा पर गए हैं. बरसों हो गए उन्हें ये कहते हुए कि जब भी बाहर से आओ तो पहले कपड़े बदला करो फिर कुछ खाया करो. लेकिन हर बार बाहर से आने के बाद हम उनकी सीख भूल जाते थे.

बार-बार अम्मां की बातें याद आ रहीं थीं और तकिया आंसुओं से भिगो रहा था.

अम्मां की किसी चीज को हाथ लगाने की हममें से किसी को भी इजाजत नहीं थी. उनकी तौलिया, मंजन, कंघा, चादर, तकिया सबकुछ बेहद सलीकेदार, चमचमाता झक रहता था. जब भी वे नहाने जातीं अलमारी से अपना साबुन लेकर जातीं. कभी भूल से उनका तौलिया हम ले लेते तो झट धुलने दे देती थीं. बाबा अकसर चिढ़ जाते, ये क्या शारदा- तुम्हारे अपने पैदा किए हैं ये बच्चे. तुम इनके साथ ये कैसे परायों जैसा काम करती हो. लेकिन अम्मां पर कुछ असर नहीं होता . मुंह बनाकर रह जातीं. और तो और कई बार उन्हें बाबा के कपड़े छूने में भी संकोच होता. हम तीनों बहनें जब कुछ समझदारी की बातें समझने लगे तो कभी-कभार गुस्से में मुंह से निकल जाता अम्मां, कभी किसी चीज की आदत नहीं डालना चाहिए. जब जैसा मिले उसी मे एडजस्ट करना चाहिए. अम्मां गुस्सा हो जातीं अच्छा, तो अब तुम लोग मुझे सिखाओगी कि समझौता कैसे करते हैं. हम लोग कहते ये जो तुम हर चीज में बस अपना-अपना करती हो न पता नहीं आगे कैसा समय आ जाए कहां, किसके साथ रहना पड़ जाए तब क्या करोगी? मां ठसके से कहतीं..ठीक है..ठीक है जबका जब देखेंगे. तब कौन जानता था कि एक दिन बेचारी अम्मां चारपाई में सिकुड़ी पड़ी रहेंगी, मुड़े-तुड़े चादर और मैले तकिए के साथ दिन गुजारना होंगे. टप से एक आंसू फिर गिर पड़ा.

टे्रेन तीव्र गति से भागी जा रही थी. कहीं अम्मां को हमारा शाप तो नहीं लग गया. लेकिन अम्मां के लिए इतनी भी तो कड़ुवाहट नहीं थी.अम्मां की तबियत थोड़ी-थोड़ी खराब रहने लगी थी. शुरू में जब उनके पैरों और हाथों की उंगलियों में दर्द उठने लगा तो इसे मौसम का प्रभाव समझ अपनी समझ से वे स्ट्रांग दवाइयां लेती रहीं. लेकिन तबिअत में ज्यादा सुधार न हुआ तो डॉक्टरों के यहां चक्कर लगने शुरू हो गए. डॉक्टर भी मर्ज को समझ नहीं पा रहे थे और हड्डियों ने जबाव देना शुरू कर दिया था. शुरू में तो बाबा भी बहुत परेशान रहते थे. दफ्तर से अक्सर जल्दी आ जाते थे. अम्मां का जब-तब उठता दर्द बाबा और हम सभी को बहुत परेशान करने लगा था. पैरों, हाथों और कंधे की हड्डियों में सिकुडऩ ज्यादा बढ़ गई तो उन्हें मुंबई के एक बड़े डॉक्टर को दिखाने ले गए, पता लगा कि उनकी हड्डियों में पानी भर गया है. इसके बाद न जाने कितने डॉक्टर, वैद्य, हकीम, झाड़-फूंक, तेल आदि का प्रयोग किया जाने लगा. जिसने जो कहा हम लोग इस आशा में करने लगे कि शायद अम्मां ठीक हो जाएं. लेकिन अम्मां को इनका नाम मात्र को असर होता. धीरे-धीरे उनकी एक-एक करके चीजों पर विराम लगने लगा. उन्हें खाने के बाद रोटी पर मलाई और शक्कर चुपड़कर खाने का शौक था उस पर पूरी तरह रोक लग गई. उनका प्रिय फल सीताफल था, डॉक्टरों ने कहा सीताफल ठंडा करता है, वो बंद कर दिया गया. जो सब्जी उन्हें अच्छी लगती थी वो उनके शरीर को या तो बादी करती थी या गैस बढ़ा देती थी, इसलिए चुनिंदा सब्जियां ही उनकी थाली में रखी जातीं. अम्मां का कुम्हालाया चेहरा देखकर हमें भी वो चीजें अच्छी नहीं लगती थीं जिन्हे अम्मां को खाने की मनाही थी. उनके हर शौक दम तोडऩे लगे. उनका बाजार जाना, पिक्चर देखना बंद हो गया. हफ्ते में एक दिन तो वे बैंक का चक्कर लगा ही लेती थीं. वो काम अब हम लोगों के जिम्मे आ गए थे. लेकिन उनकी एक चीज पर हम सबको बहुत आश्चर्य होता था अम्मां का अधिकतर समय बिस्तर पर ही बीतने के बाद भी न जाने कैसे वे हम लोगों की हर चीज ताड़ लेती थीं. शायद भगवान ने उनके कान और नाक अलग मशीन में डालकर बनाए थे.शक्कर का भरा डिब्बा टांड से नीचे क्यों आ गया? तेल के पीपे में से इतनी जल्दी फिर तेल क्यों निकाला? साबुन की बट्टी 12 दिन में ही कैसे खत्म हो गर्इ.

उनकी इसी बीमारी के रहते हम तीनों बहिनों की शादियां और बच्चे हो गए. अंकित भइया जरूर शादी के लिए हां नहीं कर रहे थे, उन्हें कोई लड़की पसंद ही नहीं आ रही थी. पापा के पूरे खानदान में अंकित भइया ही थे जिन्होंने लंदन से मेडिकल सर्जरी की डिग्री ली थी. अम्मा-बाबा की तरह हम लोगों को भी अपने ससुराल में भइया के बारे में बात करते हुए थोड़ा घमंड हो जाता था कि कैसे भइया ने पीएमटी में टॉप किया था, कैसे उनकी मेडिकल की पढ़ाई का आधा खर्च सरकार ने दिया था, कैसे उनके नोट्स की फोटोकॉपी लेने के लिए उनके दोस्तों में होड़ लगी रहती थी. और जब एक दिन भइया ने अपने डीन की लड़की से रजिस्टर्ड मैरिज कर ली तो अम्मा-बाबा के अंदर कुछ चटख सा गया. बाबा तो फिर भी सामान्य ही रहे लेकिन अम्मां बुरी तरह टूट गईं. उन्होंने अपने इकलौते बेटे की शादी के लिए बड़े अरमान संजोए थे. बनारसी साडिय़ों की दुकानें तय थीं, ज्वैलर्स के यहां मंगलसूत्र और गले के सैट की डिजाइन पसंद की जा चुकी थी. बेटे की शादी में देने के लिए रिश्तेदारों का सामान भी तय था. लेकिन परवीन के आने का बाद लगा ही नहीं कि घर में दुल्हन आ गई है. मां ने बहुत कोशिश का लेकिन वे उसे मातृतुल्य स्नेह दे ही न सकीं. क्या पता शायद अंदर ही अंदर लगा यह सदमा उन्हें जल्दी ही मौत के मुंह में ले गया.

अचानक वसंत ने करवट बदली, आरती थोड़ा सो लो वरना कानपुर पहुंचकर तुम्हारी तबियत खराब हो गई तो दीदी और अनिषा भी परेशान हो जाएंगी. इस बार वसंत की सहानुभूति बनावटी नहीं लगी. शायद इस समय वसंत की आवाज मेरे कान सुनना ही नहीं चाह रहे थे. एकाएक वसंत को लेकर मन में कटुता उभर आई, कैसे अम्मां को अपने पास रखने के लिए साफ मना कर दिया था जब अलका दीदी ने उन्हे सिर्फ 7-8 दिनों के लिए अम्मा को अपने पास रखने के लिए कहा था क्योंकि उसी समय जीजाजी की पोस्टिंग कानपुर हुई थी और दीदी को घर जमाने के लिए थोड़ा समय चाहिए था. वसंत ने कह दिया था-दीदी, आपको तो पता है वंदना और विभूति की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है, मैं अपने मां-बाबूजी को भी नहीं रख पाया था. उसके बाद वसंत और मुझमें जो वाकयुद्ध हुआ वह शालीनता की सीमा से कोसों दूर निकल गया था. वसंत के यह कहने पर कि या तो तुम मेरे साथ रहो या फिर अम्मां को बुला लो. स्वाभाविक था मां के साथ तो मुझे रहना ही नहीं था. किंतु उस दिन से वसंत से एक अनचाही दूरी बन ही गई.

एक क्षण के लिए भी अम्मां दिल से हट नहीं रहीं थीं. अनिषा का विवाह नहीं हुआ था. बाबा को लगा था कि भइया के डॉक्टर बनने से शायद अनिषा को भी कोई डॉक्टर लड़का मिल जाएगा. लेकिन बाबा को आए एकाएक दिल के दौर ने सब कुछ उलट कर रख दिया. बाबा ने एक छोटा सा खेत अम्मां के नाम कर रखा था. भइया अकसर अम्मां से उलझ पड़ते कि वो खेत और ये पुराना घर बेचकर किसी पॉश कॉलोनी में बड़ा घर बनवा लेते हैं, लेकिन अम्मां इसके लिए कभी तैयार नहीं हुईं. अम्मां और अंकित भइया के बीच झगड़ा आए दिन होने लगा था. अनिषा कई बार स्थिति संभालने की कोशिश करती लेकिन परवीन तटस्थ ही बनी रहती. और एक दिन जब भइया गुस्से से लाल-पीले दांत किटकिटाते अम्मां और अनिषा की तरफ लपके उसी क्षण अम्मां ने वहां न रहने का फैसला कर लिया . दूसरे ही दिन अम्मां और अनिषा, अलका दीदी के यहां चली आईं. उन्हें विश्वास था कि प्रकाश जीजाजी को उनका आना बुरा नहीं लगेगा. सचमुच में जीजाजी ने उनका मन से स्वागत किया और उनका यह कहना कि अब आपको यहीं रहना है कहीं नहीं जाना तो अम्मां के चेहरे की रौनक बढ़ गई. जीजाजी न सिर्फ पद में बल्कि रिश्ते निभाने में वसंत से हमेशा बीस ही रहे हैं. जीजाजी को अपने घर में कभी भी रिश्ते की गर्माहट नहीं मिली, उनके माता-पिता भी उच्च पदों पर रहे लेकिन बच्चों की परवरिश भी कठोर अनुशासन में हुई इसलिए उनके नहीं रहने के बाद भी जीजाजी को कभी उनका दुख नहीं हुआ. शायद स्नेह की असुरक्षा से ग्रसित वे अम्मां और अनिषा का आगमन सहजता से निभा गए. अलका दीदी का संबल भी अम्मां के लिए किसी प्राकृतिक दवाई से कम न था.

बेटी का घर बेटी का ही होता है. अम्मां को कभी-कभी ग्लानि लगती. वहां उन्हें शारीरिक स्वस्थता तो मिल रही थी लेकिन मन में गांठें आपना आकार ले रही थीं. अम्मां दबी जुबान से वापस जाने को कहतीं लेकिन दीदी के जोर से कहने पर चुप हो जातीं. लेकिन एक दिन जब रात में दीदी उठीं तो उन्हें अम्मां का रोना सुनाई दिया. घुटी-घुटी आवाज में वे अंकित भइया को याद कर रही थीं. सुबह दीदी-जीजाजी ने उन्हें बहुत समझाया कि अब अंकित के पास जाने से कोई फायदा नहीं है लेकिन अम्मां के शब्द होठों तक आने से पहले भर जाते. जीजाजी ने दीदी से कहा अम्मां को भेजे देते हैं अब उनका यहां मन बिलकुल नहीं लगता है जाने दो पता नहीं उनकी जिंदगी कब तक है. अनिषा ने जाने से साफ मना कर दिया. जीजाजी ने कहा अनिषा हमारी दूसरी बेटी है अब हमें ही उसकी जिम्मेदारी निभानी है.

अम्मां के जाने के बाद एक-डेढ़ महीने तक लगा कि अंकित भइया, परवीन और अम्मां के बीच सब कुछ ठीक चल रहा है, लेकिन क्रमश: अम्मां की आवाज क्षीण सी लगने लगी. एक-दो दिन में दीदी अम्मां को फोन लगा ही लेती थीं लेकिन धीरे-धीरे अम्मां की आवाज डूबने सी लगी. कभी-कभी तो जैसे वो कांपती सी आवाज में बोलती थीं और कभी डरी आवाज में जैसे कुछ कहना चाहतीं है लेकिन किसी के आने की आवाज सुनकर फोन रख देतीं. भइया तो सिवाय हां-हूं .ठीक है के आगे कुछ बोलते ही नहीं थे और परवीन वो तो घर में होतो बात की जा सकती थी. हमेशा ही यही सुनने को मिलता वो बाहर गई है रात तक लौटेगी.

एक दिन दोपहर फोन की घंटी बजी दूसरी ओर अम्मां थी, बेटा मुझे यहां से ले जाओ अंकित मुझे मार डालेगा, आज तो उसने मेरी गर्दन ही दबा दी... सुनते ही दीदी के हाथ-पांव फूल गए. तुरंत फोन कर जीजाजी को बताया. जीजाजी ने आश्वासन दिया-घबराओ नहीं कुछ करता हूं. उसी समय गाड़ी तैयार करवाकर दो आदमियों को अम्मां को लाने जबलपुर भेज दिया. मां को देखते ही दीदी और अनिषा के चेहरे का रंग उड़ गया. दूध के समान रक्तहीन सफेद चेहरा शरीर पर चर्बी का जैसे नामो निशान नहीं. होंठ बस फडफ़ड़ा रहे थे. उन्हें लाने वाले आदमियों ने बताया घर में मां अकेली दुर्गंध में पढ़ी थीं. भइया-परवीन का कोई पता नहीं था. पड़ोसियों ने कहा बहुत अच्छा हुआ जो इन्हें ले जा रहे हो . डॉक्टर ने बताया अम्मां का हीमोगलोबिन काफी गिर गया था. 15 दिन वे अस्पताल में रहीं उनकी तबियत थोड़ी-थोड़ी सुधरी. उन्हें घर ले आए . एक आया 24 घंटों उनके साथ रहती उन्हें नहलाने से लेकर खाना खिलाने का काम करती. अम्मां को देखने इसी बीच 2-3 दिन के लिए कानपुर गईं. हर बार भगवान से दुआ मांगी कि उन्हें जितनी जल्दी हो मुक्ति दे दो. वसंत कहते कैसी अर्नगल बातें करती हो उनके ठीक होने की बजाय उनके अंत की दुआ मांगती हो. कैसे बताती कि उनके आंचल के चारों कोने में से एक कोना सुख से भरने के लिए खाली रह गया है. और वो कोना अब कभी नहीं भर पाएगा.

अम्मां को शायद अपने अंत का पूर्वाभ्यास हो गया था. वे आश्चर्यजनक रूप से ठीक होने लगीं थी. उनके चेहरे की आभा अच्छी लगने लगी थी. उनका खाना-पीना भी ठीक हो गया था. मृत्यु से दो दिन पहले उन्होंने दीदी को बैंक में रखी राशि का चेक काटकर दिया और एक स्टाम्प पेपर पर खेत का उम्मीदवार दीदी को इस विश्वास से बना दिया कि उनके न रहने पर अनिषा को वे गोद ली बेटी की तरह उसके बचे हुए दायित्व निभाएंगी. दीदी के पूर्ण आश्वासन के बदौलत ही शायद अंतिम समय में अम्मां के चेहरे पर अपूर्व संतुष्टि और शांति थी.

कानपुर स्टेशन से दीदी के घर पहुंचने में आधा घंटा लग गया. दीदी के घर के बाहर पुलिस की कई गाडिय़ां खड़ी थीं. कई पुलिस जवान कतार में खड़े थे. पुलिस बैंड मातमी धुन बजा रहा था. अम्मां को फूलों से सजे ट्रक में लिटा दिया गया था. एक के बाद आकर पुलिस आफिसर उन्हें सैल्यूट करते हुए फूल अर्पित कर रहे थे. मैं दीदी के सीने लग कातर स्वर में रो पड़ी. अनिषा ने कहा चलो आरती अम्मां को अंतिम प्रणाम कर लो.फूलों के बीच लेटी अम्मां किसी सफेद गुडिय़ा की तरह लग रही थीं. हम तीनों का रुदन रुक ही नहीं रहा था. सिर से टोपी उतार अंतिम सैल्यूट कर पुलिस जवान अम्मां का ट्रक लेकर आगे बढ़ गए. प्रकाश जीजाजी के डीआइजी होने के कारण अम्मां की अंतिम यात्रा इतनी गरिमामय हो गई थी. वरना अंकित भइया के पास मां का अंतिम संस्कार किसी वृद्धाश्रम में होता. अनिषा की हिचकी उठती तो हम दोनों की आंखों से भी आंसू की धार बह निकलती.

मैं, अनिषा, दीदी हम तीनों सन्नाटे की भयावहता में शायद एक ही बात सोच रहे थे कि कल तक अम्मां इस घर में थीं आज उनकी फोटो पर पड़ी माला बार-बार इस अहसास को दोहरा रही है कि अम्मां चली गईं हैं. अचानक सन्नाटे को चीरती फोन की घंटी बजी. दीदी ने फोन उठाया-हैलो..मैं अंकित बोल रहा हूं.

हां..बोलो दीदी का संक्षिप्त उत्तर

क्या हो गया था अम्मां को, अभी घंटा भर पहले ही पता लगा है

क्या..आपको नहीं पता था कि अम्मा को क्या हो गया था, दीदी सुबक पड़ीं.

क्या अंतिम क्रिया निपट गई..

रुकने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था..दीदी का स्वर थोड़ा तेज और तल्ख हो गया था.

मैं आऊं क्या..मुझे क्या आना पड़ेगा? भइया ने पूछा.

आपकी इच्छा, वैसे सारे काम तो हो गए हैं, तटस्थ आवाज में दीदी के आंसू बहते जा रहे थे.

देखो, कोशिश करता हूं यदि जम जाएगा तो कल ही निकल आऊंगा. अकेला ही आऊंगा. और फोन कट गया.

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संध्या रायचौधरी - परिचय

कालेज के दिनों में व्यवस्थाओं पर चोट करते हुए पत्र संपादक के नाम पत्र लिखती थी, जो बाद में धीरे धीरे लेख की शक्ल बनते गए। इंदौर विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट करने के बाद पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक उपाधि ली। इंदौर के प्रतिष्ठित अखबार नई दुनिया एवं दैनिक भास्कर में कई वर्षों तक कार्य किया।

उन दिनों रिपोर्टिंग, एडिटिंग, इंटरव्यूज करते हुए तात्कालिक विषयों पर खूब कलम चलती थी। किंतु मन के भावों को तब ही चैन मिलता था जब उन्हें कहानी और कविता की शक्ल में ढाल देती थी। अपनी साहित्यिक क्षुधा शांत करती थी पत्रिकाओं में कहानी लिखकर। इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी सक्रियता है। जिस बात को दिल गवारा नहीं करता उस पर तुरंत प्रतिक्रिया देती हूं। अच्छा लगता है कि आज लोगों का मानस मन बहुत सटीक और प्रबुद्ध हो गया है। सहमति और असहमति समानांतर चलते हैं तो विचारों का प्रवाह भी विस्तार पाता है।एक कविता संग्रह और अब तक लिखे गए लेखों का एक संकलन भी किताब के रूप में तैयार हो रहा है। साहित्यिक यात्रा अनवरत जारी रहे ऐसी कामना है।

(संध्या रायचौधरी, इंदौर)

संपर्क sandhyarcroy@gmail.com

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