• जितेन्द्र कुमार

महामारी के दिनों में ... एक सकारात्मक कहानी ... "मजदूर का बेटा"


धूल-भरे रास्ते उस पर जेठ की तिलमिलाती गर्मी को सहते, मजदूरों का कारवां बढ़ा जा रहा है, अपने गंतव्य की ओर। मजदूरों का ये कारवां अंत में चलते-चलते रुक जाता है, एक हरे-भरे बरगद के नीचे, जिसकी लाल-गुलाबी नवल किसलय मन को मोह रही थी। उसकी गहरे हरे पत्तों की घनी छाँव और आकर्षित करती लम्बी-लम्बी जटायें मानो कोई सिद्ध पुरुष लंबा-चौडा शरीर लिए समाधि में बैठ सबको अपनी शरण में बैठा सुख-शांति का पाठ पढ़ा रहा हो। सभी मजदूर अपना सामान एक तरफ रख वहीं बैठ जाते हैं।

राहत भरी लंबी साँस खींचता हुआ गोविन्द कहता है, “कितनी सुहावनी मनमोहक है ये छाँव और यहाँ की ताज़ा हवा, जैसे रास्ते की सारी थकान ही उतार देगी आज। कितना आनन्ददायक है यहाँ पर ठहरना। कुछ देर ठहर कर जलपान कर फिर अपना बसेरा तैयार करेंगे।”

अन्य मजदूरों ने गोविन्द की हाँ में हाँ मिलाते, एक स्वर में कहा, “हाँ गोविन्द भैया सही कहा तुमने।”

जलपान कर ठंडी छाँव का आनन्द ले सभी मजदूर नव निर्माण स्थल पर हर्षपूर्वक घूमते हुए यहाँ की हरियाली को निहारते है। आँख मूंदते हुए लंबी साँस लेते गोविन्द कहता है, “कितना सुंदर है यहाँ का नज़ारा कितनी हरियाली है यहाँ और उस पर ये शांत माहौल, मानो जीवन का आनन्द बस यहीं बस जाने में है।”

चारों और देखते हुए मजदूरों ने कहा, “चलो यहीं इस खाली पड़ी ज़मीन पर अपना बसेरा तैयार करें।”

गोविन्द एक हाथ में करनी पकड़ उस पर कच्चा मसाला लेता तो दूसरे हाथ से ईंट लगाता, अपना घर बनाते हुए कहता है, “आज अपना कच्चा बसेरा बना लें, फिर कल से हमें दूसरों की भव्य इमारत के निर्माण में जुट जाना है। जिसे बनाने में हमें 4-5 साल का समय तो लगेगा ही, आखिर भव्य जो बनना है।”

तेजी से हाथ चलाते दीवार बनाते सोच रहा है, हमारा जीवन भी कैसा है? दूसरों के सपनों को पूरा करने में ही जीवन भर मेहनत मजदूरी करते हैं, और अपने लिए दो वक्त की रोटी ही मुश्किल से जुटा पाते हैं।”

घर बनने की ख़ुशी में मुसकराते हुए, “लो ये अपना घर तो हो गया तैयार।”

अन्य मजदूर सीमेंट मसाले से सने हाथ धोते हुए मुख पर ख़ुशी लिए कहते, “हमारा भी घर बन गया। रात हो चली है चारों और अँधेरा पसरा हुआ है।”

खाना-पीना कर अब कुछ मजदूर थके-हारे अपने छोटे-से आराम गाह में सोने के लिए जाते हैं तो कुछ गर्मी से मुक्ति दिलाती शीतल रात में खुले आसमान के नीचे अपने सोने की तैयारी कर रहें है। स्वच्छ आकाश तारों से टिमटिमाता हुआ पूरा का पूरा भरा हुआ है, तारों से जैसे किसी थाल में हीरे-मोती सजा कर रखे हो मानों, ईश्वर ने सभी के आनन्द के लिए ही ऐसा किया हो। इस मनोहारी आकाश को देखते ही देखते धीरे- धीरे सभी सो जाते हैं।

सुबह सवेरे गोविन्द अपने बेटे राजू ,पत्नी पार्वती और अन्य सभी मजदूरों के साथ, हाथ में साजो सामान तसला, फावड़ा, सोल, करनी, आदि ले रोज़ निकल पड़ते हैं, निर्माण स्थल की ओर, किसी के सपनों की इमारत को भव्य रूप देने के लिये। ये सभी दिन-रात एक करते नींव खोदते ईंट, कंक्रीट भरते वहीं रम बस गए, उस वीराने में जहाँ चारों ओर जंगल और प्लॉट ही प्लॉट जो सभी छोटी-छोटी दीवारों से विभाजित खाली पड़ें है। किसी के बसने का इंतज़ार करते।

वहीं राजू अपने माता-पिता के साथ पांच वर्ष की छोटी-सी आयु में काम में हाथ बटाता, समय मिलते ही खेलने चला जाता है। वहीं खाली पड़ें रास्तों पर नज़दीक के एम आई जी फ्लेट्स में रहने वाले कुछ बच्चे भी खेलने आए हैं, अपने अवकाश के क्षणों का आनंद लेने। राजू उन बच्चों के साथ खेलते-खेलते धीरे-धीरे उनमें घुलमिल गया। श्याम से उसकी घनिष्ठ मित्रता हो जाती है। राजू रेत पर घर बनाते मुसकराता हुआ श्याम से कहता है- “मुझे रेत के ढेर में घर बनाना अच्छा लगता है।“ राजू रेत पर अपना पैर रख ऊपर से रेत ढकता, रेत को दबाता हुआ धीरे से पैर रेत से बाहर निकाल खुश होता हुआ कहता है- “देखो कितना अच्छा है ये मेरा रेत का घर।“

वह अपने भोले-भाले मुख से प्रश्न करता हुआ श्याम से कहता है-“ मेरे साथ खेलने के लिए रोज़ यहाँ आया करो। मुझे बहुत अच्छा लगेगा, हम खूब खेलेंगे, बहुत मजा आएगा।“

श्याम आश्चर्य भरे शब्दों में कहता है -

“रोज़ !

हम रोज़ स्कूल जाते हैं। केवल छुट्टी के दिन ही यहां खेलने आते है। वैसे मुझे भी तुम्हारे साथ खेलना अच्छा लगता है, रेत का घर, तुम्हारा वो लकड़ी का एक खिलौना। कितना अच्छा लगता है उससे खेलना।

आहा !”

राजू ख़ुशी से पैर उठाता और पार्क के फुटपाथ पर साइकिल चलाते लड़कों की तरफ इशारा करते हुए कहता – “ये सब जो यहां साइकिल चला कर खुश हो रहे है, क्या तुम्हारे साथ ही रहते है ?”

श्याम हंसते हुए -“ हाँ ये सभी वहीं रहते है, हमारे साथ। हम सब यहाँ सन्डे इंजॉय करने आते हैं।“

राजू ठोड़ी पर तर्जनी उँगली रख सोचते हुए बोला –“सन्डे इंजॉय, मतलब खेलने !”

राजू इन बच्चों की जीवन शैली से धीरे-धीरे प्रभावित हो रहा है। उनके स्कूल जाने की आदत भी उसके मन को प्रभावित किये बिना नहीं रही। ईंट टिन से बनी झोंपड़ी में रहने वाला राजू आलिशान घरों में रहने वाले बच्चों को स्कूल जाते देख उत्साहित होता हुआ, इसी उथल-पुथल में मन में विचार कर कहने लगा –“ क्या मैं भी स्कूल जा सकूँगा ?”

और वह एक दिन खेलते-खेलते जिज्ञासा वश श्याम से कहने लगा –“ तुम्हारा स्कूल कहाँ है ?”

श्याम आश्चर्यचकित होकर कहता है – “घर से कुछ ही दूर स्कूल है। वहाँ हम खूब मन लगाकर पढ़ते हैं।“

राजू भावविभोर हो कहता है-

“पढ़ने जाते है ?”

पढ़ने क्यों जाते है ?”

श्याम मुसकराते हुए कहता है- “मेरे पापा मुझसे कहते है कि पढ़ लिख कर तुम्हें ऑफिसर बनना है।“

राजू चहलकदमी करते-करते कहता है- “मैं भी तुम्हारे साथ स्कूल जाऊंगा।“

श्याम विस्मय में पड़ते हुए कहता है- “राजू। स्कूल जाने के लिए वहाँ एडमिशन करवाना होगा।“

राजू चिंतित भाव से – “एडमिशन मतलब।“

श्याम अपने सिर पर हाथ फेरते हुए कहता है-“ एडमिशन मतलब, कुछ कागज़ स्कूल में जमा होंगे और वहाँ तुम्हारा नाम लिख जायेगा, फिर तुम वहाँ पढ़ सकते हो।“

राजू दौड़ते-हाँफते लम्बी-लम्बी साँस लेते मन में एक बड़ा स्वप्न लिए, अपने पिता के पास जाकर कहता है-

“पापा मेरे दोस्त स्कूल जाते हैं, पढ़ने के लिए अब मेरा भी मन करता है कि-

मन में इच्छा होती मेरे,

मैं भी जाऊँगा स्कूल।

जैसे वो पढ़ते हैं, बैग लेकर,

मैं भी जाऊँगा स्कूल।

पढ़ने का मन मेरा करता ,

मैं भी जाऊँगा स्कूल।

खूब पढूँगा, खूब लिखूँगा,

मैं भी जाऊँगा स्कूल।

एक दिन आएगा जब, टीचर बन,

मैं भी जाऊँगा स्कूल।

हमारा भी घर होगा, इस मंज़िल में,

मैं भी जाऊँगा स्कूल।“

राजू की सहज प्रार्थना से द्रवित हो गोविन्द कहता है-“बेटा हम भी चाहते है कि तुम पढ़ो-लिखो, लेकिन यहाँ आसपास कोई स्कूल नहीं है, हमें जहाँ-तहाँ काम के लिए अपना बसेरा बदलना पड़ता है, जिससे दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो जाए। फिर ऐसे में तू कैसे पढ़ सकेगा ? हम मजदूरी करते है और आखिर तुझे भी तो बड़े होकर मजदूरी ही करनी है। आजकल वैसे भी पढ़-लिख कर लोग बेकार ही तो घूम रहे हैं, इससे तो अच्छा है कि तुम भी हमारी तरह मजदूरी करना ही सीखते रहो, कम से कम आज के जमाने में भूखे तो न मरोगे।“

राजू अपना-सा मुंह लेकर सिसकता हुआ अपनी माँ की गोद में जा बैठता है। मानो काली अंधेरी रात की तरह उसकी जिंदगी भी अंधेरे से भर गयी हो और आशा की एक नव-किरण का भी अंत हो गया हो।

राजू की मनोदशा से परेशान गोविन्द सुबह-सुबह ठेकेदार से मिलकर राजू के दाखिले की बात करता हुआ कहता है-

“ठेकेदार साहब।

हमारा राजू स्कूल जाने की जिद् कर रहा है, यहाँ आसपास कोई स्कूल भी नहीं है। तुम्हारी बहुत जान- पहचान है, बड़े अफसरों से, किसी स्कूल में दाखिला करवा दो राजू का।“

ठेकेदार आँखे फेरते हुए कहता है- “तुम्हारे बच्चें हैं, तुम ही जानो ! मैं तुम्हारे बच्चों का दाखिला ही करवाता रहूँगा। बहुत काम है मुझे यहाँ। जाओ अपना काम देखो।”

वह चलते-चलते झुंझलाते हुए कहता है -“तुम मजदूरों के बच्चें पढ़ेंगे तो मजदूरी कौन करेगा !”

दूर जाते बुदबुदाता हुआ – “पढ़-लिख कर मुझसे ही हिसाब मांगेंगे आर टी आई लगाकर पूछेंगे -किस जगह क्या लगाया है?

बात करते है।“

उधर श्याम अपने पिता से राजू के बारे में बात करता हुआ कहता है-

“पापा मेरा फ्रेंड राजू स्कूल जाना चाहता है, उसके पापा गरीब हैं, वे मजदूरी करते है। सारा दिन वह इधर-उधर खेलता रहता है। कल उसने मुझसे कहा कि वह स्कूल जाना चाहता है।“

श्याम का आग्रह सुन पिता का हृदय भी गरीब बालक की सहायता के लिए द्रवित हो उठा।

महेश ने श्याम के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। “मेरे बेटे को मित्र की कितनी चिंता है !

श्याम हम कल चलेंगे। कम से कम एक भला कार्य ही हो जायेगा इस बहाने।“

अगले दिन सुबह-सुबह श्याम के पिता महेश गोविन्द से मिलने जा पहुँचे और गोविन्द को समझाते हुए कहा -

“तुम्हारा बेटा राजू पढ़ना चाहता है, फिर उसे पढ़ाते क्यों नहीं हो ?

गोविन्द दुखी भाव से हाथ जोड़े कहता है –“साहब पढ़ाना तो हम भी चाहतें है। ठेकेदार से बात भी की पर कोई सहायता न मिली।“

महेश ने आश्चर्यचकित हो कहा –“कोई सहायता न मिली मतलब।

ये कुछ कागज़ ले लो और चलो मेरे साथ हम आज ही राजू का स्कूल में एडमिशन करवाते हैं।“

महेश और गोविन्द राजू को साथ ले स्कूल पहुँचते है। संयोग से वहाँ ई डब्लयू एस श्रैणी में राजू