... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

शुभ दीपावली!!!

ज्योति-पर्व दीवाली

 

सांझ ढली दीप जले आया है ज्योति-पर्व/

 

दियना जलाओ री, आओ सखि आओ री//

 

 

 

स्वर्ग और नर्क की दुहरी दण्डनीति हिन्दू जन-मानस को कर्म के पथ पर हमेशा ही अंकुश लिए साधती रही है. जिजीविषा भोग-लिप्सा का ईंधन बनकर हमारी बुद्धि

को ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए सदियों से उद्दीप्त करती रही है. इन सबके बीच या तो अपराधबोध से बचने के लिए हमने बीच में ज्ञान को घसीट लिया है, अथ्वा मोक्ष को

जीवन की चरम-परिणति मानकर ज्ञान को उसका सर्वोत्तम साधन बना डाला है. इसी ज्ञान का प्रतीक है ज्योति और ज्योति का आधार है दीप. दीपों की कतार ही दीपावली है और इसी दीपावली को सामान्य जन दीवाली कहता है. दीवाली ज्योति का त्यौहार है. यह एक पर्व है जिसे हम मनाते हैं अपने उल्लास की अभिव्यक्ति के लिए.

 

कहते हैं कि जब हिन्दू जनाधार को वर्ण के चार खेमों - ब्राह्मण, क्षत्रिय. वैश्य और शूद्र - में कैद किया गया तो श्रावणी (गुरू-पूर्णिमा) ब्राह्मणों के हाथ लगी, विजयादशमी क्षत्रियों के और दीपावली वैश्यों के. एक होली ही बाकी बची जिसे शूद्रों के लिए सुरिक्षत कर दिया गया.

होली भी उल्लास-पर्व है. आम की डालियों से कुहुकती कोयल की टीस का पर्व, मंजरी-परिणय और टिकोरों के आगमन का पर्व तथा पतझर पर वसन्त की विजय का पर्व. यह तीन वर्णों को भी क्यों नहीं दिया गया इसका समाधान कठिन है.

श्रावणती अज्ञान पर ज्ञान की विजय का ही पर्व है न ?

विजयादशमी तो अन्याय पर न्याय की विजय का पर्व है ही.

दीवाली भी अंधेरों पर उजालों की विजय का पर्व है.

हमारी मानसिकता त्यौहारों को विजय-पर्व के रूप में ही क्यों देखती है? क्या उल्लास की अभिव्यक्ति में विजयघोष का होना जरूरी है?

दीवाली की रात नर्क की रात कही जाती है. नर्क यानी नर्कासुर. यह नर्क नाम का असुर असम के प्राग्ज्योतिषपुर का राजा था. इसने ६० हजार नारियों को

बन्दी बनाया था. विष्णु ने इन नारियों को नर्कासुर के चंगुल से बचाया. नर्कासुर का भाग्य देखिए - मरा भी किन हाथों से. दीवाली नर्कासुर के वध का विजय-पर्व है.

बचपन में मां को देखा था - दीवाली की गई रात, भोर में, घर के कोने-कोने से, हंसिए से सूप पीट-पीट कर, दारिद्य भगाते और कहते - ईस्सर घुसे दलद्दर निकसे. ईश्वर यानी विष्णु. दलद्दर यानी दारिद्य अथवा गरीबी. पहले का हिन्दू जनमानस पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क और सबसे बढ़कर मोक्ष, को ही कर्मपथ का पाथेय मानता था. जीवन के सुखों की प्राप्ति के लिए उसे बार-बार गुहार नहीं लगानी पड़ती थी. यह तो नारायण का कार्यक्षेत्र था - उनका कहना भी तो है- योगक्षेमं वहाम्यहम्, अर्थात्, तुम्हारे कल्याण का बोझ तो मैं स्वयं उठाऊंगा. अरे जब वे स्वयं ही हमारे योग-क्षेम के लिए तत्पर हैं तो फिर हम सूप क्यों पीटें और गला फाड़-फाड़ कर क्यों चिल्लाएं? क्या इससे हमारे घर में घुसा दारिद्य निकल जाएगा? संभ्वतः नहीं, पर लोकमानस दीवाली को ईस्सर प्रवेश और दारिद्य के निष्कासन का पर्व मानता है. इतना जरूर है कि इस दिन कूड़े का मलवा निकाला जाता है और घरों के कोने-कोने से धूल बटोरकर फेंकी जाती है. कूड़ा निकालना आवश्यक है क्योंकि इसके ही ढेर से तो नर्कासुर का जन्म हुआ था.

 

कहनेवाले तो यह भी कहते हैं कि यह 'ईस्सर' = नारायणत कोई और नहीं है. यह तो सीधे तौर पर धन की देवी लक्ष्मी ही है. दीवाली लक्ष्मी की बड़ी बहन ज्येष्ठा की

निकासी का भी पर्व है. लक्ष्मी ऐश्वर्य का प्रतीक है और स्वभाव से चंचला है. न जाने पुरुष-पुरातन की वधू इतनी चंचला क्यों है? लक्ष्मी है न, टांग तोड़कर किसी एक गैल बसेरा तो कर नहीं सकती. वह भी हमेशा हमेशा के लिए. खैर, लक्ष्मी की बड़ी बहन नाम भर की ज्येष्ठा है. आम जनता उसे दरिद्रता के नाम से जानती है. प्रकाश से उसे एलर्जी है. अंधेरे ढूंढती घूमती है छिपने के लिए - खासतौर पर दीवाली के दिन. और लोग हैं जो इस बात पर कमर कसकर डटे हैं कि जो भी हो अपने घर में उसे छिपने के लिए जगह नहीं देंगे. इसीलिए तो कोने-कोने को चमकाया जाता है और कोशिश की जाती है कि इतने दिए जलाए जायं कि अंधेरों की सांस टूट जाय. ज्येष्ठा अंधेरों में ही तो सिर छिपाने की जगह ढूंढती है. लोकमानस ज्येष्ठा की निकासी को ध्रु्व-सत्य बनाने के लिए ही लक्ष्मी का आवाहन करता है. एक म्यान में दो तल्वारें नहीं रह सकतीं. दोनों बहनें भी एक घर में नहीं रह सकतीं. पर ज्येष्ठा तो हर घर से संकल्प लेकर भगाई जाती है. बेचारी को सिर छिपाने के लिए जगह तो चाहिए ही. लाचारी में छोटी बहनवाले घर के किसी अंधेरे कोने में पड़ी रहेगी. लोग इसी लिए घर का कोना-कोना छानते हैं उसे भगाने के लिए. कुछ ऐसे कोने हैं जहां अंधेरों की संभावना बराबर बनी रहती है. ऐसे कोनों पर ही लक्ष्मी का आवाहन किया जाता है. प्रतीक बनता है दीपावली का दीप. राजशेखर अपनी काव्य-मीमांसा में इन दीपों की ज्योति बनी लक्ष्मी को सभी ज्योतियों की ज्योति (स्वेषां ज्योतिषां ज्योतिः) के रूप में देखते हैं. लक्ष्मी प्रतीक बनती है समृद्धि-लालसा की. दीपक की ज्योति दारिद्य के अन्धकार का भेदक बन जाता है भले ही साल के इस एक दिन ही. जनमानस भावातिरेक में इस दीप-ज्योति को ही लक्ष्मी मानकर गुहार लगाता है - सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपज्योतिर्नमो ऽस्तु ते, अर्थात्, हे सभी भास्वर शक्तियों की दीप में स्थित ज्योति तुम्हें नमस्कार है. यही दीपक ज्योति जुआिरयों के लिए जुए में मिलनेवाले लाभ का भी प्रतीक बन जाती है - सा लक्ष्मीर्वरदा मम - ऐसी ही लक्ष्मी मेरे लिए वर देनेवाली बने.

 

दीवाली लक्ष्मी के आवाहन-स्वागत का पर्व है. यह एक ओर ज्येष्ठा के निष्कासन का पर्व है तो वहीं उसकी छोटी बहन लक्ष्मी की मुक्ति का भी पर्व है. किस्सा यों है कि एक था असुरों का राजा बलि. विरोचन का पुत्र और प्रह्लाद का नाती. तपस्वी इतना बड़ा था कि देवराज इन्द्र बेचारे डर कर विष्णु की शरण गए. बोले - भग्वान, यह बलि तो इतना शक्तिशाली हो गया है कि तीनों लोकों का राज्य हड़प कर त्रिविक्रम बनने की तैयारी कर रहा है. कुछ करो प्रभु, पहले ही उस आततायी ने देवी लक्ष्मी को कैद कर रखा है और अब मेरे देवराज का सिंहासन खतरे में पड़ता जा रहा है. बलि का मख यानी यज्ञ समाप्ति की ओर बढ़ रहा था. भग्वान विष्णु वामनावतार लेकर यज्ञभूमि में अवतिरत हुए. वामन ने झोली फैलायी. बलि ब्राह्मण को यज्ञभूमि से निराश कैसे लौटाता. चूक कर बैठा - तीन डग भूमि दे देने की. वाह रे वामन ! धरती से आकाश तक का सारा क्षेत्र दो डग में ही चरणतसात् कर बैठा. अब तीसरे पैर को रखने की जगह ही कहां थी. पर पैर को तो कहीं न कहीं बैठना ही था. वामन ने तीसरे पैर को ले जाकर सीधे बलिराज के सिर पर टिका दिया. बेचारा बलि वामनी पैर के आधे बोझ के नीचे ही पाताल तक धंसता चला गया. विष्णु-प्रिया लक्ष्मी का उद्धार तो होना ही था और वह हो भी गया. देवराज को कुछ दिनों के लिए ही सही आसुरी संकट से छुटकारा मिल गया. बलिमख की पूर्वसंध्या ही दीवाली है और यही दक्षिण-भारत के सुप्रिसद्ध पर्व ओणम् के साथ इसके संबन्धों की कड़ी भी.

 

गुजरात, मध्यप्रदेश और राजस्थान से सम्बद्ध अपेक्षाकृत बाद के संस्कृत साहित्य में दीवाली का वर्णन अधिकांशतः उल्लासपर्व के रूप में ही मिलता है. घरों की सफाई और दियों से उनकी सजावट तो आम बात है. भोत और सुरा-पान के प्रसंग भी बहुत मिलते हैं. सबसे अधिक चर्चा इस प्रसंग में मिलती है जुए की. जीमूत-बाहन का 'काव्यविवेक' दीवाली की रात्रि को सुख-रात्रि के नाम से पुकारता है. वैसे सुखरात्रि की संज्ञा को सबसे अधिक महत्व देकर उभारने का यश जाता है मालवराज भोज के 'राजमार्तण्ड' को. मेरतुंग की 'प्रबन्धचिन्तामणि' और हेमचन्द्र की 'देशी-नाममाला' तथा सोतदेव सूरि के 'यशस्तिलक' चम्पू - सबमें इस रात्रि को सुखरात्रि के रूप में ही चित्रित किया गया है. जीमूतवाहन का 'काव्यविवेक' तो दीवाली के दिन को एक और ही ऊंचे धरातल पर प्रतिष्ठित करता है. वैसे हिन्दू कर्मकाण्डों की अचार संहिता में दीवाली पर व्रत रखिने की परंपरा नहीं है. जीमूतवाहन दीवाली को त्यौहार ही नहीं मानता उसे व्रत भी मानता है. अलबेरूनी ने तो कमाल ही कर दिया है. वह तो यह कहता है कि वासुदेव की पत्नी लक्ष्मी ने ही पाताल में विरोचन के लड़के बलि को कैद कर रखा है और वही - बस इसी एक रात्रि को - उसे जहां जी चाहे घूमने की आजादी देती है. मराठा देवियां दीवाली की सुबह को बलिराज के दुर्भाग्य का प्रतीक मानती हैं. उनकी मान्यता है कि इसी दिन बेचारे बलि का राज्य छीन लिया गया. आज के दिन वे एक ओर तो प्रार्थना करती हैं कि भूतल से समस्त बुराइयों का अन्त हो जाय. पर वहीं दूसरे हाथ वे यह भी प्रार्थना करती हैं कि हे भग्वान ! बलिराज का राज्य वापस कर दो. लक्ष्मी बलिराज को एक दिन की आजादी देकर राजा क्यों बनाती हैं ? यह राज्य उसे कार्तिक महीने के प्रथम चन्द्र दिवस पर जब सूर्य तुला में प्रवेश करता है तभी क्यों दिया जाता है ?

यह अभी तक रहस्य ही बना हुआ है. कहा यह भी जाता है कि इसी समय तुला का सूर्य दक्षिणायन में प्रवेश करता है. जैसे जैसे सूर्य उत्तरायण से दूर होता जाता है रातें लम्बी होती जाती हैं. रातों के साथ-साथ अंधेरों की उम्र भी लम्बी होती जाती है. दीवाली के दीप सूर्य के सकुशल उत्तरायण लौटने और बढ़ते अन्धकारों से जूझने के प्रतीक बन जाते हैं.

 

भारतीय जन इस दीवाली को ज्योति-पर्व, ज्ञान-पर्व, न्याय का अन्याय पर विजय-पर्व, समृद्धि-पर्व, द्यूत-पर्व और सबसे अधिक उल्लास-पर्व के रूप में मनाता है.

घरों को साफ़ करने के साथ मन की स्वच्छता की बात जोड़ता है. मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः - मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण उनका मन ही है. यही मन समृद्धि की लालसा लिए दीवाली को बोध का पर्व बनाता है. पर यह बात संस्कृत यु्ग की है. मध्य काल तक पहुंचते-पहुंचते मन और हृदय की दूरियां काफी हद तक सिमट गईं. मन की इस नई परिभाषा ने हृदय को प्रधान बना दिया. परिणाम जो होना था वही हुआ - समृद्धि और भोग की लिप्सा चिन्तन की ज्योति पर हावी हो गई. दीवाली लालसा का पर्व बन गया. इससे यह नहीं समझना चाहिए कि दीवाली की ज्योति ज्ञान और लालसा के दो दीपों में कैद कर दी गई. बंगाल में तो इसका एक नया ही रूप सामने आया. आश्विन महीने की तीसवीं रात पितरों की रात मानी जाती है. यहीं से पितरों की छह महीने तक काबिज रहनेवाली अन्धी रात भी आरंभ होती है. लोग पितरों को अपने घरों की राह सुझाने के लिए दीपों का सहारा लेते हैं. खंभों के रूप मे गाड़े गए बांसों की नोक पर आकाश-दीप सजाए जाते हैं. नदी की सतह पर बहाव की गति को दियों की कतार से बांधने की असफल कोशिश भी की जाती है.

 

लोक-मानस ने दीवाली के साथ और भी बहुत कुछ जोड़ा. बलि-यज्ञ के पर्व की बात मैं बता चुका हूं. अब एक दूसरा प्रसंग सुनिए भ्रातृद्वितीया अथवा भइया-दूज का. भाई-बहन के पवित्र-सम्बन्ध को दीवाली के उल्लास-पर्व के साथ एक नए उत्सव के रूप में जोड़ दिया गया. इस दिन बहनें भाइयों की कल्याण-कामना करती हैं और उन्हें मिठिाइयां खिलाती हैं. इसी कार्तिक की द्वितीया को यम-द्वितीया भी कहते हैं. दी्वाली के साथ यम अर्थात मृत्युदेव और यमी का सम्बन्ध जुड़ता है. संसार के धरातल पर यमिद्वितीया भी भाई-बहन का पर्व बन जाता है. ऐसी मान्यता है कि भाई-बहन दोनों यम-द्वितीया के दिन एक साथ यमुना-स्नान करते हैं. इस तरह वह दोनों के लिए कल्याण-पर्व बन जाता है. बहन भाई के लिए भोजन बनाती है, उसे अपने हाथों से खिलाती है. भाई को और बहन के पति को इस पुण्य-स्नान से लम्बी उम्र मिलती है. अग्नि और स्कन्द-पुराण दोनों में ही इस पर्व के वर्णन मिलते हैं.

 

पर यम-द्वितीया एक और नया प्रतीक बनकर भी सामने आती है. भाई और बहनोई की लम्बी उम्र का प्रतीक-पर्व यमराज के साथ-साथ उनके कोषाध्यक्ष चित्रिगुप्त

की पूजा बन कर व्यापारिक समृद्धि का संकेतक होत जाता है. राजमुद्रा की पूजा राजाओं की अपनी समृद्धि का प्रतीक बन जाता है. वैसे यह सामान्य जन का ही प्रतीक है क्योंकि यदि जनता समृद्धि न पा सकी तो राजा की समृद्धि कैसे हो पाएगी. आखिर राजा की समृद्धि का स्रोत जनता से मिलनेवाला टैक्स ही तो है. चित्रिगुप्त के वंशज भी - जिन्हें हम आमतौर पर कायस्थों के रूप में जानते हैं - इसी दिन अपने मसिपात्रों (दावातों) और कलमों की पूजा करते हैं. भ्रातृद्वितीया की पूजा का संकल्प बाद में बहनों ने इतना विस्तृत बना दिया कि उसमें यम-यमी की प्रसन्नता, व्यवसाय और दूसरे क्षेत्रों में समृद्धि, मसिपात्रों की पूजा, भाई की लम्बी उम्र, अपनी सौभाग्य-वृद्धि सभी सिमट गए. इसी के साथ-साथ शुक्ल-प्रतिपदा द्यूत-प्रतिपदा बन कर जुए को पर्व का जामा पहना गई. जुआ खेलना दीवाली के साथ एक संस्कार के रूप में जुड़ गया.

 

कहते तो यह भी हैं कि भग्वान शिव पार्वती के साथ चौसर खेलने बैठे और जुए में अपना सब कुछ हार गए. अपनी जीत को पति की हार मानकर पार्वती दुखी हो गई

और चली गई एकान्त-वास करने गंगा के तट पर. बड़े बेटे कार्तिकेय को जब पिता की हार का पता चला तो उसने मां के पास जाकर पिता का सब कुछ वापस जीतने का संकल्प किया. वह जीत भी गया पर छोटे बेटे गणेश को मां की हार रास नहीं आई. उन्होंने बड़े भइया को ललकारा और हुआ वही जिसका सबको डर था. छोटे बेटे ने मां की हार को जीत में बदल दिया. मां फिर दुखी हो गई. भग्वान ने गणेश को भेजा मां को मनाकर वापस लाने के लिए. बीच में नारद मिल गए और उन्होंने यह समाचार भग्वान विष्णु को दिया. विष्णु ने शिव के पांसे का रूप धारण किया और शिव-पार्वती का द्यूत युद्ध एक बार फिर शुरू हुआ. पार्वती को जब यह आभास हुआ कि पांसे के रूप में विष्णु थे तो उन्होंने शाप देने की ठानी. भग्वान शिव ने बीच-बचाव किया और पार्वती का शाप वरदान बन गया. इसी लिए कार्तिक महीने के पहले दिन जो भी जुआ खेलता है उसे समृद्धि मिलती है.

 

ऊपर के विवरण से यह स्पष्ट होता है कि दीपावली का आरंभ शुद्ध ज्ञान पर्व के रूप में ही हुआ था. आगे चलकर यह विजय और उल्लास के पर्व में परिणत हो गया.

इस पर्व के साथ जुए का जुड़ना तो एक प्रासंगिक बात भर है. ऐसा प्रतीत होता है कि दीवाली सबसे पहले कृषि पर्व के रूप में ही मनाया जाता था. पिछली फसल के अन्न का सुरिक्षत रूप में घर आ जाने का पर्व और आनेवाली फसल के लिए नए उत्साह से बोए जाने का पर्व. धनतेरस पर बर्तनों की खरीद और अन्नकूट पर तैयार किए जानेवाले व्यंजनों की सूची इस बात का सबूत बनते हैं कि लोग पिछली फसल के लाभ से कितने खुश होते थे. संसार के दूसरे देशों में भी इस तरह के पर्व बड़े उत्साह से मनाए जाते हैं. उपनिषद् काल तक आते-आते दीवाली ज्ञान-पर्व बन गया. पुराण काल ने दीवाली के साथ बहुतेरे पौराणिक प्रसंगों को जोड़ा. जुए का प्रसंग संभ्वतः महाभारत काल का है. नारायण के विग्रह बने कृष्ण और राम की विजय कथाओ को भी दीपावली के साथ जोड़ा जाना अस्वाभाविक नहीं लगता. जब इन्द्र ने क्रोध में आकर समूचे व्रज-प्रदेश को मूसलाधार बारिश में डुबो देने का आदेश अपनी मेघ-मण्डली को दिया तो कृष्ण ने ही अपनी छिगुनी पर गोबर्धन उठाकर गोपों की रक्षा की. मेघों से पटे आकाश के नीचे घने अन्धकार का अनन्त राज्य तो तहस-नहस होना ही था. अन्धकार से मुक्ति का यही पर्व प्रकाश-पर्व बन गया. राम-रावण युद्ध में राम की विजय को मनाने का श्रेय तो विजय-दशमी ने हथिया लिया. शायद लोगों को, विशेषतः अयोध्या के दुखी प्रजा-जनों को, रावण की पराजय से उतना सुख नहीं मिला जितना उन्हें राम की वापसी से मिला. इसी वापसी का उल्लास दीपावली के दियों की उजास में उजागर हुआ. बाद में राम के राज्याभिषेक ने दीपावली को उल्लास पर्व के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया. यही उल्लास-पर्व शताब्दियों बाद आखिरी गुप्त-सम्राट विक्रमादित्य के राज्यारोहण से जुटा और अन्ततः विक्रम वर्ष के पहले दिन के आनन्दोतत्स्व के रूप में प्रतिष्ठित हो गया. आज की दीवाली व्यापारियों के नए साल की शुरूआत बन कर रह गया है. आम आदमी लक्ष्मी-गणेश की पूजा तो करता है पर मिठाइयों, पटाखों, जुआ और शराब को अधिक तरजीह देने लगा है.

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इस निबन्ध को लिखने में मैंने Hindu Holidays And Ceremonials (B.A.Gupte. Calcutta (1919): Thacker, Spink & Co) तथा Festivals of India
(Brijendra Nath Sharma. New Delhi (1878): Abhinav Publications) से विशेष सहायता ली है. इन पुस्तकों में दीपावली पर लिखिने वाले लेखकों के प्रति मैं विशेष आभार व्यक्त करता हूं. यह निबंध बीसयों साल पहले हिन्दी समिति की पत्रिका में छप चुका है. यहां साभार पनः प्रस्तुत किया जा रहा है.

 

प्रौफ़ेसर रमानाथ शर्मा

एमेिरटस प्रोफेसर,

हवाई विश्वविद्यालय,होनोलुलु (यू. एस. ए.)<rama@hawaii.edu>

 

रमानाथशर्मार्व का जन्म पूर्वी उत्तर-प्रदेशर् के बलिया जिले के छाता गांव में हुआ.  संस्कत विद्वानों का परिवार, पिता पण्डित रघुनाथ शर्मा पर्द्मश्री से अलंकृत भर्तृहरि के वाक्यपदीय पर प्रसिद्ध टीकाकार थे. रमानाथ शर्मा की बी. ए. तक की शिक्षा वाराणसी में हुई. इसके बाद इलाहबाद युनिवर्सटी से एम. ए. (हिन्दी साहित्य), और क. मु. हिन्दी तथा भाषाविज्ञान विद्यापीठ, आगरा से एक और एम. ए. (1962) डिग्री भाषाविज्ञान में प्राप्ति की. फिर इलाहाबाद युनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग में पांच वर्षों तक भाषा विज्ञान के असिस्टेण्ट प्रोफेसर के

 

रूप में अध्यापन. सन् 1966 में रमानाथ शर्मा को राचेस्टर युनिवर्सिटी से भाषा-विज्ञान में शोध करने के लिए विदेश जाने का अवसर मिला. सन् 1970 तक शोध समाप्ति कर वे वहीं असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में भाषा-विज्ञान पढ़ाने लगे. 1976 से वे होनोलुलु आकर ह्वाई विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाने लगे. 1984 में प्रोफेसर बने, 3 वर्ष तक विभागाध्यक्ष रहे और पांच वर्षों तक (1978 से 1983) दक्षिण एशिया अध्ययन केन्द के भी संचालक रहे. 2012 तक अध्यापन करने के बाद उन्होंने अवकाश प्राप्ति
किया. अब वे वहीं एमेरिटस प्रोफेसर हैं, और सितम्बर-दिसंबर के बीच प्रतिवर्ष वाराणसी में रहते हैं.
प्रोफेसर शर्मा अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के संस्कृत विद्वान हैं, विशेषतः पाणिनीय व्याकरण के आधुनिक सन्दर्भों के संगणकीय विश्लेषण, तथा तकनीकी प्रस्तुति के लिए. पाणिनीय अष्टाध्यायी पर लिखा उनका भाष्य ६ खण्डों में २० वर्षों के परिश्रम से तैयार हो पाया. अगले १५ वर्षों में काशिका-वृत्ति का ऐसा ही भाष्य प्रस्तुत किया गया. काशिका-वृत्ति का यह ही श्रम से काशसे व्याकरण पर उनकी 12 से अधिक पुस्तकें हैं, और 20 से अधिक शोध-पत्र हैं. सारा का सारा साहित्य अंगरेजी में है. भारतीय संस्कृति, धर्म एवं दर्शन पर अनेक निबंध हैं. धर्म, कर्म तथा योग विषय पर एक पुस्तक संस्करण शीघ्र प्रकाश्य. प्रोफेसर शर्मा ने हिन्दी में बहुत सी कविताएं, शोध पत्र, तथा ललित निबंध लिखे. कई प्रसिद्ध लेखिकों के निकट सम्पर्क में रहे. कविताएं भी बहुत लिखीं, अभी भी बहुत कुछ लिख रहे हैं. बहुत सा हिन्दी लेखन अभी भी प्रकाशन की प्रतीक्षा में है, विशेषतः कविताएं और दो उपन्यास.

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