ऐंडिस पर्वतमाला के दामन में पतला फ़ीता सा पड़ा हुआ, शेष दुनिया से मुँह मोड़े, प्रशांत महासागर को निरंतर निहारता एक देश है जहाँ के लोग लगता है किसी स्वप्न-लोक में फंसे हैं. चिली!

सुंदर, सुघड़ शहर, शहर में बड़े पार्क, पार्कों में देर रात तक नागरिक हाथ में हाथ डाले, किताब पढ़ते या आपस में वार्तालाप करते फिरते हैं, मौसम कोई भी हो, यहाँ बसंत-सा हमेशा रहता है.

 

कलाकारों और लेखकों का यहाँ बोलबाला है. शहर शहर नहीं, ओपन-एयर म्यूज़ियम लगता है. कलाकारों को जहाँ अनुमति मिल जाती है, दीवार को तस्वीर में बदल देते हैं. कमरों में घुसते हैं, कविताएँ स्वागत करती हैं, कभी दहलीज़ पर, कभी खिड़की की दाईं तरफ़, कभी शीशे के ऊपर, इधर-उधर, जहाँ कहीं परिस्थिति तकाज़ा करे या सही संदर्भ बैठ जाए, कविता की पंक्तियाँ गुदी मिलती हैं ...   कुल 170 लाख के इस देश के दो साहित्यकार नोबल प्राईज़ से पुरस्कृत हो चुके हैं. रोज़ाना सैकड़ों प्रशंसक और पर्यटक इनके घरों को  ऐसे देखने के अभिलाशी होते हैं जैसे कि ये किसी के घर नहीं, मंदिर हों.

यहाँ के इंजीनियर भी अपने काम में माहिर हैं. भूचाल-ग्रस्त इस देश में ऐसे भूचाल अक्सर आते हैं, जो और कहीं आएँ तो भीषण विनाश छोड़ जाएँ, मगर यहाँ पर यह प्राकृतिक प्रकोप जान और सम्पत्ति को छू तक नहीं पाता.

अभिघात तो इनके इतिहास में भी अनेक हैं, मगर यहाँ के लोग खुले-आम अपना इतिहास स्वीकारते हैं, ग़लतियाँ समझते हैं, एक साथ रहना जानते हैं, देश पर बीती पर कहानियाँ लिख डालते हैं.

 

सच, शांति घुली है यहाँ की हवा में! और वो शांति चेहरों का सुकून बन कर दिखलाई देती है. ये बात इंसानों में ही नहीं, शहर में आवारा घूमते-फिरते लगभग 25 लाख कुत्तों में भी दिखाई देती है. इन कुत्तों में अधिकांश लावारिस हैं, मगर कई घरेलू भी हैं जो शाम ढले घर लौट आते हैं. लगभग सब कुत्तें तंदरुस्त दिखते हैं, रास्ते में जगह जगह इनके पीने के लिये साफ़ पानी की व्यवस्था रहती है, मैंने कई जगह साईडवॉक पर इनके लिये बिस्तर बिछे देखे, कई कुत्ते स्वैटर पहने हुए दिखे. इन्हें अन्य नागरिकों की तरह सड़क पार करना तो आता ही है, साथ में मैंने खुद अपनी आँखों से एक कुत्ते को और पैसंजरों के साथ बस का इंतज़ार करते हुए देखा. बस आई. पैसंजर बस में चढ़े, कुत्ता भी चढ़ गया. किसी ने उसे नहीं दुतकारा. ये बात मैं पढ़ चुकी थी, अब देख भी ली. ये भी पढ़ा था कि जब कभी नौजवान किसी मोर्चे पर निकलते हैं, तो चिली के कुत्ते कंधे से कंधा मिला कर उनके साथ निकल पड़ते हैं. नौबत आने पर पुलिस वाला पर भी हमला कर सकते हैं. वैसे साधारण तौर पर ये नागरिकों को नहीं काटते. इंसान और कुत्ते के बीच दोस्ती की वो पुरानी डोर यहाँ बरकरार है.

हम तो बस दस दिन के लिये यहाँ आए थे, लौटते हुए लगा किसी उपन्यास से निकल कर जा रहे हैं. और जब जाते जाते हमारे परिचितों से रहा नहीं गया, वो पूछ बैठे, है न हमारा देश सबसे महान?

 

आज के संसार में सबसे महान केवल एक ही हो सकता है जिसके सामने चाहते, न चाहते हुए भी हर किसी को झुकना होता है. मन में यह ख्याल उठा. लेकिन मित्र जवाब का इंतज़ार कर रहे थे. शरीफ़ इंसानों के लिये है आपका देश, अच्छे से भी अच्छा, बहुत अच्छा ... बस इतना कह पाई.

मैंने सुना है कि यहाँ के पैंग्विनों की एक ख़ास आदत है. मादा पैंग्विन हर साल कुल एक अंड़ा देती है. उसी को बड़े सम्हाल कर बर्फ़ पर खड़े नर पैंग्विन के पैरों पर रख देती है, अंड़ा सुपुर्द कर सागर में चली जाती है और फिर तीन महीने तक आहार के लिये वहीं रहती है. पिता, अन्य पिताओं के संग, उन तीन महीने तक वहीं बर्फ़ पर भूखा खड़ा अपने अंडे को सेता है, उसे गर्म और सुरक्षित रखता है. तीन महीने बाद जब माँ लौट कर आती है, तब चूज़ा पैदा होता है, तब पिता खाने की खोज में जाता है. ये अजीब और सुंदर सिलसिला जून के महीने में शुरू होता है और हम तो वहाँ अक्टूबर में गए थे. देख नहीं पाए. बस यही देखने, सोचा है, इस अद्वितीय देश फिर आऊँगी.

 

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