... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

"मुझे इतना ही काफी है" : कविता

 

फ़साने से तुझे अचरज, जो होता है तो होने दे

हक़ीक़त लब पे आ जाये , मुझे इतना ही काफी है ।

मोहब्बत सच्ची - क्या - झूठी, मोहब्बत तो मोहब्बत है

मोहब्बत तुझको हो जाये , मुझे इतना ही काफी है ।

वो बारिश कल हुयी थी जो , हमारे प्यार पे प्यारे

असर उसका नज़र आये , मुझे इतना ही काफी है ।

मिले कब ? कब हुए तुमसे जुदा हमदम ?

खबर ये मुझको हो जाये , मुझे इतना ही काफ़ी है ।

तुम्हारे साथ गुजरे पल , हमेशा याद आते हैं

तुम्हे भी याद आ जाएँ , मुझे इतना ही काफी है ।

सफर था चन्द लम्हों का, गुजरना था; सो गुजरा है

बचा जीवन गुजर जाये , मुझे इतना ही काफी है ।

ये दुनिया तोहमतें मुझपर , लगाती है लगाने दे

नज़र तुझको न लग जाये , मुझे इतना ही काफी है ।

तुझे पाना , नहीं पाना , ये सब किस्मत की बाते हैं

तुम्हारे दिल में बस पाऊँ , मुझे इतना ही काफी है ।

 

-नितिन चौरसिया

मेरा नाम नितिन चौरसिया है और मैं चित्रकूट जनपद जो कि उत्तर प्रदेश में है का निवासी हूँ ।

स्नातक स्तर की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से करने के उपरान्त उत्तर प्रदेश प्राविधिक विश्वविद्यालय से प्रबंधन स्नातक हूँ । शिक्षणऔर लेखन में मेरी विशेष रूचि है । वर्तमान समय में लखनऊ विश्वविद्यालय में शोध छात्र के रूप में अध्ययनरत हूँ ।

 

फ़ोन -09453152897

ई-मेल - niks2011d@gmail.com

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload

Archive
Please reload

Search By Tags
Please reload

Follow Us
  • Facebook Basic Square
  • Twitter Basic Square
  • Google+ Basic Square