... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

स्वतंत्रता दिवस के एक दिन बाद - शहादत (संस्मरण)

कौन कहता है सिर्फ जंगे-मैदाँ की सरहदों पर वतन की हिफाज़त में जान देने वाले शहीद होते हैं. उनकी माएँ, बहनें व् पत्नियां जो घर बैठे आँखों के सूनेपन में भी आशाओं के झिलमिलाते दीप  जलाकर उनके लिए दुआएं मांगती हैं, हर रात के अंधियारे में मरती है, हर सुबह के उजाले में साँस लेती है, क्या वे वीरांगनाएँ उन उन वीरों से कम है जो देश की खातिर अपना घर परिवार, सुख निछावर करते हुए देश की रक्षा करने चले जाते है, सीने पर वार झेलते हैं?  क्या वे वीरांगनाएं जिनका देश के वीरों के साथ चोली दामन का साथ है , उन वीरों के लिए रातें जागकर देश और देशवासियों के लिए प्रार्थना करती हैं, उनका योगदान भूला जा सकता है?  

     जब उनके मुखारबिंद से उनके जिए हुए पलों की दास्तान सुनती हूँ तो महसूस होता है उनमें ख़ुशी -ग़म की मिली -जुली भावनाएं धड़कती है।  हर सोच का शीश  नतमस्तक हो जाता है-ऐसी ही एक वीरांगना से मैं मिली हूँ -वह है हमारी स्नेहिल भाव रखने वाली श्रीमती शशि पाधा, जो अपने पति मेजर जनरल केशव पाधा जी साथ कार्गिल युद्ध के सफ़र की हमसफ़र रही है.

            उनकी ज़ुबानी कही गयी गाथाएं सुनकर  मन की गहराइयां सन्नाटों में धंस जाती हैं, धड़कनें रोमांचित हो जातीं  है, कल्पनाएँ अभिभूत हो जाती है , और जीवन के सच का  साक्षात्कार होता है !

ज़िन्दगी एक आह होती है

मौत जिसकी पनाह होती है!

      हमने इन खुली आँखों से मर कर न मरने वाले शहीदों को सलीबों पे चढ़ते देखा है. अभी २००८ दिवाली के पर्व के आस- पास आतंक की उस चुभती हुई रोशनी ने आँखों से रोशनी छीन ली.  हाहाकार  मचा,  गर्द उड़ी, नारे लगाये गए, पर फिर क्या हुआ?  कुछ भी नहीं! जो नौजवान "ताज"  की मर्यादा और उसकी घायल अवस्था को बचाने में जुट गए, सीने पर गोलियां झेलते रहे, साँसों की पूंजी लुटाते रहे, एक बार भी पीछे मुड़कर अपना स्वार्थ नहीं देखा,   भारत माँ को दिया गया वचन तन-मन से, निष्ठा के साथ निभाया। अपने लहू से ममता का क़र्ज़ चुकाया। क्या उनकी शहादत का क़र्ज़ हम चुका पायेंगे?  

     शहादत की राह और मंज़िल एक होती है और उसपर चलने वाला हर नौजवान न तो हिन्दू होता है न मुसलमान, सिर्फ भारत माँ का बेटा होता है।  जात-पात, रंग-रूप, प्रांतीय सहरदों को रौंदते हुए ये नौजवान हदों की सरहदों पर सीना ताने आगे, और आगे बढ़ते  हुए पाते है, उनके कदमों के तले बिछी ज़मीन उनके माथे को सजाना चाहती है, उनके माथे पर लहू का टीका सजा कर अपने सौभाग्य को चमकाना चाहती है।

     सरहदों पर जब ऐसे नौजवान जागते हैं तब जाकर आम जनता सो पाती है, जब ये जां-बाज़ सीने पे गोलियां झेलते है, तब कहीं जाकर घर के ठंडे चूल्हे फिर से पेट की आग बुझा पाते हैं।  क्या ऐसे वीरों का हर साल यादों में दीप जलाकर हम उनके ऋण से मुक्त हो पाएंगे? क्या श्रद्धांजली के नाम पर फूल मालाएँ या नारे लगाए जाने से उनकी आत्मा को शांति मिलेगी? नहीं? कतई नहीं? उनके नक्शे-पा की पाक मिट्टी पावों की धूल नहीं, माथे का चन्दन है, जिसकी महक हम अपनी साँसों में महसूस कर सकते हैं। आंसुओं के पुष्प चढ़ाकर भी हम अपना फर्ज़ कहाँ पूरा होता है?

ये भाई-भाई के नारे बंद हो जाएँ और अपने जात, प्रांत, भाषा हर वर्ग की सीमाओं को मिटाकर जब ये भाई हमक़दम होकर साथ-साथ चलने लगेंगे, तब ही शायद यादों के दिये और जियादा रौशन होंगे, यही उनको समर्पित की गई एक भावभीनी, पाक श्रद्धांजली होगी! जयहिंद

 

 देवी नागरानी

 

 

 

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