... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

इंसान न बन सके

 

 

हम ना जाने क्यूँ  हरे-भरे, ये वृक्ष न बन सके 

मानवता में हम इनके, समकक्ष न बन सके

 

पत्थर के बदले फल देते, फकीर संत न बन सके

विष पीकर श्वासामृत देते, नीलकंठ न बन सके  

 

किसी जीवन के पतझड़ में, बसंत न बन सके

और प्यार के फूलों का, मकरंद न बन सके

 

जलती उजाले में ढलती, शमा न बन सके

और किसी मासूम भूल की, क्षमा न बन सके

 

कुंठा की बंद कोठरी में,  झरोखा न बन सके

और घुटन में हवा का, झोंका न बन सके

 

प्यासी धरती की प्यास बुझाता, बादल न बन सके

मन प्राण आत्मा सींचता, गंगाजल न बन सके

 

ममता से महका धरती का, आँचल न बन सके

प्रेम और विश्वास का, धरातल न बन सके 

 

किसी नन्हे सा  सपने का, एक मुट्ठी आसमान न बन सके

रोबोट बनकर रह गये ना जाने क्यूँ, इन्सान न बन सके

 

द्वारा: सुधीर कुमार शर्मा 

C-4/1, A.P.P.M. COLONY

RAJAHMUNDRY- 533105 [A.P.]

sudhirkrsharma1962@gmail.com

 

 

 

 

 

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload

Archive
Please reload

Search By Tags
Please reload

Follow Us
  • Facebook Basic Square
  • Twitter Basic Square
  • Google+ Basic Square