यादों के गवाह

 

एक चारपाई 
पर पड़े बिस्तर को 
इस तरह सहेज कर रखा है किसी ने 
जैसे बना दिया हो
कमरे में ही स्मारक कोई |

बिछी चादर 
पर पड़ी सिलवटें
सुना रहीं थी दास्ताँ 

 


किसी गुजरी 
सुनहरी चांदनी रात की |

दो आँखें 
ऐसी कातर नज़रों से 
एकटक निहार रही हैं
तकिये पर लगी 
लार की कुछ बूंदों के निशान !

जैसे 
अमृत की बूंदे 
गिर गयी हों छलक कर 
रेत में
और प्यासा रह गया हो 
कोई नश्वर देवता...

 

© नितिन चौरसिया 

 

 

मेरा नाम नितिन चौरसिया है और मैं चित्रकूट जनपद जो कि उत्तर प्रदेश में है का निवासी हूँ ।

स्नातक स्तर की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से करने के उपरान्त उत्तर प्रदेश प्राविधिक विश्वविद्यालय से प्रबंधन स्नातक हूँ । शिक्षणऔर लेखन में मेरी विशेष रूचि है । वर्तमान समय में लखनऊ विश्वविद्यालय में शोध छात्र के रूप में अध्ययनरत हूँ ।

 

फ़ोन -09453152897

ई-मेल - niks2011d@gmail.com

 

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