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खून के रिश्ते बनाम दिल के रिश्ते: बंद मुट्ठी

2017 में प्रकाशित डॉ. हंसा दीप का उपन्यास ‘बंद मुट्ठी’ बदलते समय में रिश्तों के नए समीकरण की बात करता है।  भूमंडलीकरण की बात पुरानी है, तब की, जब तान्या के पापा पूरा विश्व घूमें थे और फिर सिंगापुर को स्थायी निवास बना लिया था, जब लुधियाना, पंजाब के खन्ना अंकल कतर में रहते थे। ‘बंद मुट्ठी’ में सिंगापुर में पली-बढ़ी भारतीय तान्या, पोलैंड के सैम से शादी कर, चीन की रिया को गोद ले, बहुसांस्कृतिक देश कैनेडा में रह रही है। यह परिवार और इसका जीवन जातीय, देशीय, भाषीय सीमा रेखाओं से आगे का है।  

            उपन्यास का आरम्भ गोद ली बेटी रिया की 16वीं वर्षगांठ की पूर्वरात्रि से होता है। बहुत पहले उन्होंने निर्णय लिया था कि रिया के 16वें जन्मदिन पर बता देंगे कि वह कोखजाई नहीं, गोद ली बेटी है। यह रिश्ता खून का नहीं, दिल का है। अब पूर्वरात्रि उन्हें कयामत की रात्रि लग रही है। नींद उड़ चुकी है। ज़रा आँख झपकती है और तान्या की चेतना सुदूर अतीत की यात्रा पर निकल जाती है, जब वह छोटी थी, माँ पापा और दो वर्ष बड़ी बहन राजी के साथ सिंगापुर रहा करती थी। अर्थात यह नायिका प्रधान उपन्यास स्मृत्याभास या संस्मरणात्मक शिल्प लिए है।

            शीर्षक कहता है कि यह ‘बंद मुट्ठी’ सैम, तान्या और रिया के हाथ लिए है। हाथ की लकीरें व्यक्ति स्वयं बनाता है। पोलैंड के सैम की लकीरें तो कह रही थी कि वह अपने पिता का व्यापार संभालेगा, किन्तु वह पहले भारत आया, दो वर्ष बाद कैनेडा गया और फिर वहीं पढ़ाई पूरी करके काम करने लगा और बस गया। अर्थात जीवट रेखाओं को झुठलाने की शक्ति रखता है। “सैम का हाथ उसकी हथेली को इस तरह सहलाता है कि लगता है, ऐसी सारी लकीरों को वह बदल रहा है, जो तान्या को परेशान करती हैं।” ( पृष्ठ-12) सैम जानता है, “ ये लकीरें हमारी मुट्ठी में बंद हैं। हर बार मुट्ठी खुलेगी तो कोई न कोई लकीर नया अर्थ देगी जीवन को। ” ( पृष्ठ- 13)  वह भी एक बंद मुट्ठी ही है, जिसमें रिया को गोद लेने का रहस्य छिपा है और आज सैम और तान्या रिया की सोहलवी वर्षगांठ पर इस मुट्ठी को खोलने जा रहे हैं।

            एक प्रश्न गूंज- अनुगूँज बनकर उपन्यास के आदि से अंत तक बिखरा पड़ा है कि हमें अपनों की खुशियाँ चाहिए या जड़ परम्पराओं का अंधानुकरण। कथा का भारतीय पिता विश्व के अत्याधुनिक देश सिंगापुर में रह रहा है। बड़ी बेटी राजी की बी. कॉम के बाद वहीं के एक खाते-पीते परिवार के युवक अवि से शादी कर देता है। छोटी बेटी तान्या को उच्चतम शिक्षा दिलवाने, प्रगति पथ पर आगे बढ़ाने, अलग पहचान बनाने, परंपरागत गृहिणी से ऊपर उठाने, आत्मनिर्भर बनाने, अपने अधूरे सपनों को साकार करने के लिए, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर नहीं, नॉर्थ अमेरिका/ केनेडा की यूनिवर्सिटी ऑफ टोरेंटों भेजता है।   

            अपनों का परायापन, आरोप- प्रत्यारोप झेलना और परायों में अपनापन खोजना- पाना नायिका का जीवन सत्य है। माता- पिता का अतिरिक्त स्नेह और प्रभुत्व तान्या के गोरे सैम से विवाह और चीनी बेटी रिया को स्वीकार नहीं पाता। अपने अहं के अतिरेक और क्रोध में वे बेटी की खुशी से खनकती आवाज़ नहीं सुन पाते। जबकि अपनापन उसे सैम, उसके माता-पिता, केनेडा की सहेलियों से मिलता है। भाषिक समस्या के बावजूद पड़ोसिन सिलविया से उसके तार जुड़े हैं। ईशा से वह मन की हर बात कर सकती है। भले ही उपन्यास के अंत तक आते- आते हंसा दीप ने माँ-बाप के क्रोध का विवश शमन और बहन राजी का स्नेह दिखा दिया है।       

            भारतीय जहां भी रहते हैं, वहीं एक मिनी भारत का सृजन कर ही लेते हैं। सिंगापुर का विदेशी माहौल भी भारतीयता से सराबोर है। यहाँ भारतीयों की बस्ती, वार- त्योहार, भाषा, धार्मिक आयोजन, रस्मों-रिवाज, भारतीयों की दुकानें- कंपनियां, भारतीयों के रेस्टोरेन्ट, भेल आलू-टिक्की, छोले भटूरे - यानी पूरा का पूरा भारतीय समाज है। ठीक ऐसा ही एक भारत केनेडा में भी बसा है। खन्ना अंकल, ईशा, ज्योत, वीर, भारतीय बाज़ार, रेस्टोरेंट सब इसी का हिस्सा हैं।   

            कैनेडा में भारतीय और अन्य छात्रों का जीवन और संघर्ष के अनेक पहलू यहाँ चित्रित हैं। नयी जगह, नये देश, नये शहर, नयी यूनिवर्सिटी में सब कुछ स्वयं ही करना है। मौसम, खाना, पहनावा, दोस्त- सब बदल जाते हैं। घर की सबसे छोटी बच्ची तान्या और दिल्ली की जस्सी, बीनू और शुचि मिलकर भारतीय खाना खाने के लिए तीन बेडरूम वाला अपार्टमेंट किराये पर ले दिल के रिश्ते जोड़ नए परिवार/ जीवन का सृजन करती हैं। पैसे- पैसे का हिसाब करना आ जाता है। सेल में खरीददारी की आदत डालती हैं। चाइना टाउन के चक्कर लगाना और वहाँ से जरूरत का सामान लेना जरूरी है। केयरिंग-शेयरिंग, सैर सपाटे, डेटिंग- शेटिंग को जीवन का हिस्सा बना होम सिकनेस से छुटकारा पाने का प्रयास करती है। एक के बाद एक टेस्ट, असाइन्मंट, प्रेजेंटेशन- व्यस्तताएं घेरे रहती हैं। पढ़ाई के लिए, अच्छे ग्रेड के लिए, खूब मेहनत और फीस के लिए खूब पैसा चाहिए।   

            यह एक महंगा देश है और भारतीय विद्यार्थियों के लिए तो और भी महंगा है। अंतर्राष्ट्रीय छात्रों की फीस दुगुनी होती है। सभी के माता-पिता सारा खर्च नहीं उठा पाते। कोई एक और फिर दूसरे बैंक से लोन लेता है, कोई क्रेडिट कार्ड से उधार लेकर काम चलाता है, कोई पार्ट टाइम जॉब करता है, कोई एक सेमेस्टर पढ़ता और एक सेंमेस्टर काम करता है, कोई एक ही सेमेस्टर में तीन की बजाय छ: क्रेडिट कोर्स लेता है। आत्मनिर्भर होने का भाव कुछ ऐसा रहता है कि पढ़ाई के साथ-साथ पार्ट- टाइम काम/ नौकरी सबकी प्राथमिकता रहती है। 

            बच्चा गोद लेने के लिए भी ढेरों आर्थिक और कानूनी मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। भारत में तो प्रवासी भारतीयों और विदेशियों के लिए सेरोगेसी निषिद्ध है। केनेडा के अपने नियम हैं। चीन से बच्चा गोद लिया जा सकता है, लेकिन कागजी कार्यवाही में ही तीन-चार वर्ष का समय लग जाता है। आवेदन पत्र, संदर्भ पत्र, रिफ्रेन्स पत्र, साक्षात्कार, निरीक्षण- परीक्षण, आय, रख- रखाव, पासपोर्ट वीज़ा, कस्टम, भाषा, सैंकड़ों जानकारियाँ चाहिए। जबकि यह देश आतंकवाद के शिकार लोगों को झट से पनाह दे देता है। एडाप्शन और उससे पहले टेस्ट ट्यूब बेबी के लिए तान्या- सैम के हजारों डॉलर लग जाते हैं। बैंक से, क्रेडिट कार्ड से लिए लोन की रकम भी काफी हो जाती है।     

            प्रेम की राह तलवार की धार पर चलने के समान है। सरदारनी जस्सी एक पाकिस्तानी मुस्लिम युवक के प्रेमजाल में है। बीनू श्री लंकाई चलवा पर और शुचि दिल्ली के एक भारतीय छात्र पर फिदा है। तान्या हिन्दी के जानकार और विद्वान पोलैंड के सैम को पसंद करती है। घर से दूर, परिवार के खिलाफ जाकर एक घर बसाना, दिल के रिश्ते जोड़ना कोई आसान काम नहीं है। तान्या परिवार के विरोध के बावजूद सैम से विवाह तो करती है, पर इसके लिए उसे खून के रिश्तों- यानी माँ- बाप- बहन के प्यार की कुर्बानी देनी पड़ती है। जस्सी पिता की मृत्यु के कारण दिल्ली जा पिता का व्यापार संभालने में प्रेमी को भुला देने के लिए विवश है। बीनू का चिलवा संवादों की कमी या अपनी किन्हीं प्रतिबद्धताओं के कारण अपने देश में जाकर शादी कर लेता है। मात्र शुचि ही है, जिसके दिल के रिश्ते को खून के रिश्ते वाले स्वीकार कराते हैं, जिसकी शादी बिना व्यवधानों के अपने प्रेमी से हो पाती है।  

            विश्वविद्यालय का परिसर भारतीय छात्रों की यूनियन भी लिए है। गायन, वादन, नर्तन, अभिनय के मनोरंजक- सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते रहते हैं। मस्ती का माहौल होमेसिकनेस को पास फटकने नहीं देता। यह भी दिल के रिश्तों का ही एक हिस्सा है। सात समुंदर पार के इस देश केनेडा के पास भी एक अभिजात संस्कृति और नियम हैं। किसी बुजुर्ग या गर्भवती महिला के आने पर लोग झट से गाड़ी की सीट खाली कर देते हैं। बस वाले दूर से ही सवारी को देख कर बस रोक देते हैं। पता पूछने पर लोग बारीकी से समझाते है, ‘शिष्टाचार के दायरे यहाँ की चौड़ी सड़कों की तरह चौड़े और विस्तृत हैं।’   

स्ंवादात्मकता भाषा को नाटकीय स्पर्श दे रही है। अँग्रेजी, पंजाबी के शब्द और वाक्य  हैं। हिन्दी फिल्मी गीत अनेक स्थलों पर मिलते हैं। बौद्धिक चिंतन सूत्र भी भाव जगत का निचोड़ लिए हैं। जैसे-

  1. परंपरागत भारतीय माहौल में अँग्रेजी बोलने वाला शायद खुद को ऊँचा समझता था, सुपिरियर महसूस करता था। ( पृष्ठ 21)  

  2. जीवन में सफल होने के लिए खुद को मज़बूत करना पड़ता है। ( पृष्ठ 31)

  3. घर में बड़े बच्चे होने का सबसे बड़ा नुकसान यही होता है कि सारी तमन्नायेँ पूरी करने के लिए उसी बच्चे को केंद्र बिन्दु बना लिया जाता है। ( पृष्ठ 44-45 )

  4. एक उम्र होने के बाद अकेले रहने का, आज़ादी को महसूस करने का, अपनी ज़िंदगी को अपनी तरह जीने का और आसमान में पंख फैलाकर रहने का मतलब होता है। (पृष्ठ 46)

  5. कुंवारी बहन की अपनी एक अलग ही पहचान होती है। ( पृष्ठ 60)

  6. किसी भी शहर में घूमना और रहना उस शहर को अपना नहीं बनाता। उसे अपना बनाने के लिए उसे महसूस करना पड़ता है। ( पृष्ठ 67)

  7. जिस दिन झगड़ना बंद होगा, शायद हम एक दूसरे से दूर होने लग जाएगे। ( पृष्ठ 80)

  8. अगर किसी बात को आप बोझ की तरह लो, तो ही तनाव होता है। ( पृष्ठ 86)

  9. खामोश ख्याल को आवाज़ दे देनी चाहिए, वरना वह आपकी खुशियों को खामोश कर देगा। ( पृष्ठ 91)

  10. जीवन का ‘जीपीए’, जहाँ जरा सा भी कदम लड़खड़ाए कि जीवन भर प्रोबेशन की व्यथा झेलनी पड़ती है। ( पृष्ठ 92)

  11. अपनों का गुस्सा कितना भी तीव्र क्यों न हो परंतु खतरे में सब कुछ बदल जाता है। (पृष्ठ 114)

  12. अपने बच्चों से बहुत प्यार करना ही पर्याप्त नहीं होता, उसको निबाहने की कला में पारंगत होना भी माँ की ममता है। (पृष्ठ 155)

  13. परेशानियों की गुत्थियाँ तो सुलझाई जा सकती हैं, पर अहं की गुत्थी, विचारों की गुत्थी को सुलझाने में पूरी ज़िंदगी भी कम पड़ जाती है। (पृष्ठ 156)

  14. भाषा का अनुचित प्रयोग दिल की कड़वाहट निकालने का सबसे हिंसक तरीका है। (पृष्ठ 169)

  15. ज़िंदादिल लोग दर हक़ीक़त रूह से उदास होते हैं। (पृष्ठ 181)

         किसी विदेशी का हिन्दी प्रेम अभिभूत करता है। सैम इस भाषा का विद्वान है। वह हिन्दी शब्दों की गहराई तक जाता है। हिन्दी गाने उसे अच्छे लगते  है। रिया के सोलहवे जन्मदिन पर स्काइप के जरिये दादा- दादी, नाना- नानी, मौसी- मौसा, जस्सी शामिल होते हैं। नर्तन- गान समारोह को उत्सव बना देते हैं।    

         यह एक नयी दुनिया है। बहुसांस्कृतिक देश और परिवार। अंत में बंद मुट्ठी खुल जाती है, सैम और तान्या रिया को सच बता देते हैं, पर मन के रिश्तों के  लिए कहीं कोई चुन्नौती नहीं।  

            आधुनिक और आधुनिकतम दो पीढ़ियाँ हैं, अहं की लड़ाई है, दोनों तरफ होने वाले वज्रपात हैं। सौभाग्य ही कहिए कि नायिका को ईशा की तरह ससुराल या पति की तरफ से कोई समस्या नहीं। वह एक अच्छी पत्नी है, बहू है, माँ है, लेकिन माँ- पिता की  अतिरिक्त आधिपत्य ग्रंथि उसे अच्छी बेटी नहीं बनने देते। हंसा दीप ने अपनों के  बेगानेपन और बेगानों के अपनेपन का चित्रण किया है। यह बदलते समय का उपन्यास है। इसने अछूते, आदिवितीय  निष्कर्ष दिये हैं। उपन्यास का हर शब्द पिता के इस कथन को झुठलाता है कि गोरा पति और खरीदा हुआ बच्चा कभी अपने नहीं हो सकते। कथ्य और संवेदना स्पष्ट करते हैं कि खून के रिश्ते आपको पीड़ा पहुंचा सकते हैं, मन के नहीं। जो ऊष्मा, जो स्थायीत्व, जो रागबोध मन के रिश्तों में है, वह कहीं नहीं। यहाँ अपने- पराये की पहचान के व्यावहारिक और नवीन पैरामीटर मिलते हैं। यह आने वाले कल का उपन्यास है। यहाँ एक नयी शुरुआत की बात है, जो हो चुकी है।   

 

 

बंद मुट्ठी

डॉ. हंसा दीप,

शिवना, सीहोर, 2017   

 

लेखिका परिचय

       डॉ. हंसा दीप

जन्म :          1958, मध्य प्रदेश ।

शिक्षा :         पीएच. डी. ।

संप्रति :         टोरेंटों विश्वविद्यालय में लेक्चरार के पद पर कार्यरत और कैनेडियन विश्वविद्यालयों में हिन्दी छात्रों के लिए अंग्रेजी-हिन्दी में पाठ्य- पुस्तकों के कई संस्कारण प्रकाशित। 

उपन्यास :       बंद मुट्ठी, कुबेर। ( बंद मुट्ठी का गुजराती अनुवाद हो चुका है।

कहानी संग्रह :    प्रवास में आसपास, चश्में अपने अपने। ( कुछ कहानियाँ मराठी में अनूदित)

समीक्षक परिचय

डाॅ. मधु संधु

जन्म स्थान  -    अमृतसर, पंजाब

शिक्षा       -   एम. ए. डी. ए. वी. कालेज अमृतसर.  पी एच. डी.(हिंदी)

पीएच. डी. का विषयः सप्तम दशक की हिंदी कहानी में महिलाओं का योगदान, गुरु नानक देव  विश्वविद्यालय की प्रथम पी. एच. डी.

नौकरी/व्यवसाय            ःगुरु नानक देव विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर

एवं अध्यक्ष रह चुकी हैं।

सम्प्रति     -  स्वतन्त्रा लेखन।

द संडे इंडियन ने गणना 21 वीं शती की 111 हिंदी लेखिकाओं में की है।

 

प्रकाशित साहित्यः    कहानी संग्रहः

1.    नियति और अन्य कहानियां, दिल्ली, शब्द संसार, 2001

2.    दीपावली/अस्पताल डाॅट काॅम, दिल्ली, अयन, 2014

कविता संग्रहः

3.    सतरंगे स्वप्नों के शिखर, दिल्ली, अयन, 2015

                     कहानी संकलनः

4.    कहानी श्रृंखला, दिल्ली, निर्मल, 2003

                     गद्य संकलन

5.    गद्य त्रायी, अमृतसर, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, 2007.

                    आलोचनात्मक एवं शोधपरक साहित्यः

6.    कहानीकार निर्मलवर्मा, दिल्ली, दिनमान, 1982   

7.    साठोत्तर महिला कहानीकार, दिल्ली, सन्मार्ग, 1984

8.    कहानी कोश, (1951-1960) दिल्ली, भारतीय ग्रन्थम, 1992

9.    महिला उपन्यासकार, दिल्ली, निर्मल, 2000

10.   .हिन्दी लेखक कोश,(सहलेखिका) अमृतसर, गुरु नानक देव वि.वि., 2003

11.   कहानी का समाजशास्त्रा, दिल्ली, निर्मल, 2005

12.   कहानी कोश, (1991-2000) दिल्ली, नेशनल, 2009

13.   हिंदी का भारतीय एवं प्रवासी महिला कथा लेखनः तुलनात्मक अध्ययन,दिल्ली, नमन, 2013.

14.   साहित्य और संवाद, अयन, दिल्ली, 2014

15.   प्रवासी हिंदी कहानी कोश ( प्रकाशनाधीन )

 

              सम्पादनः 

16.   प्राधिकृत (शोध पत्रिका) अमृतसर, गुरु नानक देव वि.वि., 2001-04

              निर्देशन

17.   पच्चास के लगभग शोध प्रबन्धों एवं शोध अणुबन्धों का निर्देशन।

 

          

अनुभूति, अनुवाद भारती, अभिव्यक्ति, आधारशिला, औरत, कथाक्रम, कथादेश, गगनांचल, गर्भ नाल, गुरमति ज्ञान, चन्द्रभागा संवाद, पंजाब सौरभ, पंजाबी संस्कृति, परिशोध, परिषद पत्रिका, प्राधिकृत, प्रवासी दुनिया, मसि कागद, युद्धरत आम आदमी, वागथर्, वितस्ता, विभोम स्वर, वेब दुनिया, रचनाकार, रचना समय, शोध भारती, संचेतना, संरचना, समकालीन भारतीय साहित्य, समीक्षा, सृजन लोक, साक्षात्कार,, साहित्यकुंज, साहित्य सुघा, सेतु, हंस, हरिगंधा,  हिन्दी अनुशीलन, आदि पत्रिकाओं में दो सौ के आसपास शोध पत्रा, आलेख, कहानियां, लघु कथाएं एवं कविताएं प्रकाशित.

 

 

 

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