... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

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ऑडियो कहानियाँ ... ट्रेलर ... विडियो-साक्षात्कार ...

सब यहाँ ...

अफ़सानों पर समय का वश नहीं होता ...

ऑडियो-कहानी

नीलम कुलश्रेष्ठ की

"उस महल की सरगोशियाँ"

December 7, 2018

ऑडियो-कहानी

हर्ष सेठ की "लोग"

December 17, 2018

ऑडियो-कहानी

पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू' की कहानी "पापा का इंतज़ार"

January 5, 2019

ऑडियो-कहानी

महेश चन्द्र द्विवेदी की

"निर्दयी प्रकृति"

November 15, 2018

ठग?

कौन थे ये ठग? 

"ठग" - एक उपन्यास

मुक्ता सिंह-ज़ौक्की का नया उपन्यास, "ठग"  उन्नीसवीं शताब्दी भारतीय पृष्ठपट को चीरती हुई एक रोमांस और रोमांच कथा है. यह एक प्रेम-कहानी है, जिसमें धोखा है, हार भी है. आज के दौर में जिसे ग़लत कहा जाएगा, इसमें वो है.

"ठग" भारतवर्ष में रेलगाड़ियों के आने के पूर्व के उन दिनों की कहानी है जब यात्री आपसी सुरक्षा के लिये बड़े कारवां में यात्रा करते थे. फ़िरंगिया दक्खन से हिंदुस्तान वापस लौटते हुए एक व्यापारी दल के युवा नेता के रूप में यात्रा कर रहा था, असल में ठग दल का नेता था. यात्रियों को मारने का उसे दिव्य आदेश था. उधर अपनी छोटी सी पलटन को साथ लिये, आज़ादी के लिये हिंदुस्तान की किसी बड़ी सेना में शामिल होने पर आमदा चंदा बाई पूना की एक क्षत्रिया थी, देश-प्रेमी थी.

भाग्य से या जान बूझ कर, फ़िरंगिया और चंदा बाई के रास्ते अनेकों बार मिले. चंदा बाई फ़िरंगिया से प्रेम करने लगी और आखिरकार दोनों यात्रा-दल एक साथ रास्ता तय करने लगे.

धीरे धीरे इरादों के खुलासे होने लगे. छिपे रूप सामने आने लगे. दोनों की साज़िशें एक दूसरे पर हावी होने लगीं.

कभी प्रेमी, कभी धोखेबाज़, एक स्वांग रच रहा था, दूसरा सच्चा प्रेमी था. प्यार का ये खेल दोनों को ही महंगा पड़ा.

ट्रेलर

साक्षात्कार

जीना इसी का नाम है...

क़ैस जौनपुरी का साक्षात्कार

अपने बारे में क्या कहूँ! बस, 1985 में जौनपुर में पैदा हुआ. बचपन में गुब्बारे बेचता था. मेहनत-मज़दूरी करते हुए बड़ा हुआ. हाईस्कूल में था तब इंग्लिश के टीचर जनाब शुएब साहब ने इंजीनियरिंग की फ़ीस भर दी और मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने बहराइच चला गया. फिर  दिल्ली में नौकरी शुरू की और 2009 में एक इंजीनियर की हैसियत से लंडन गया. फ़िल्मों में लिखने का शौक़ था इसलिए लंडन की नौकरी छोड़के 2010 में बम्बई आ गया. यहाँ नौकरी के साथ-साथ लिखना जारी है. कहानियाँ-कविताएँ छपती रहती हैं. 2012 में एक नाटक लिखा ‘स्वामी विवेकानन्द’ जिसका पहला शो भाईदास हॉल, विले-पार्ले में हुआ. जल्दी ही कुछ नए नाटक भी आने वाले हैं. रेडियो सिटी पे तीन शो हो चुके हैं. कुछ फ़िल्मों पे भी काम चल रहा है. इंजीनियरिंग की नौकरी पसन्द नहीं आती है. कोशिश है कि जल्द से जल्द अपना पूरा समय लेखन को दे सकूँ.

साक्षात्कार

"मैं नहीं मरूँगा. मेरे भीतर का संसार मरेगा ..." लेखक प्रवीण त्रिपाठी 'पैशन' से बातचीत

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'हम न मरिहै, मरिहै संसारा' अर्थात मैं नहीं मरूँगा, मेरे भीतर का संसार मरेगा. संसार में हूँ, मुझमें संसार है, लेकिन मैं संसार नहीं हूँ. परिचय इन शब्दों से देते हैं, #‎माइक‬ नाम से लिखते हैं, पैशन उपनाम भी इस्तेमाल करते हैं,  लेखक, प्रवीण त्रिपाठी के साथ बातचीत ...

ऑडियो-कहानी

मीना गोदरे की "रिवाज़" (प्रकाशित 18 अक्टूबर 2018)

ट्रेलर

चार प्रबल लेखिकाएँ

कहानी-अंश

देवी नागरानी के संकलन "जंग जारी है" से कहानी "गुलशन कौर" का अंश ...