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""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

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उद्भ्रांत से बातचीत

अप्रैल 4, 2016

ई-कल्पना - आप मूलतः आगरा के हैं, नवलगढ़, राजस्थान में जन्में, कानपुर में आपने शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की. अब, काफ़ी समय से दिल्ली में बसे हैं, आप खुद को कहाँ का मानते हैं.

उ. - सच कहूँ तो मैं अब स्वयं को किसी एक जगह का नहीं सम्पूर्ण भारत का मानता हूँ क्योंकि बाद के वर्षों में मैंने भारत के विभिन्न स्थलों का भ्रमण कर इस देश को समझने की कोशिश की और सभी जगहों से कुछ न कुछ आत्मीयता मिली.
यह तो हुई एक बात. अब आपके प्रश्न पर विशेष रूप से ग़ौर करता हूँ तो पाता हूँ कि तीनों शहरों के प्रति गहन कृतघ्यता का भाव मुझमें समाहित है क्योंकि मेरे अस्तित्व के मूल में तीनों मौजूद है. आगरा में पुरखों का गाँव है, पिता की जन्मस्थली है तो वहां तो मेरी जड़ें हैं. नवलगढ़ न होता तो मैं ही न होता! और कानपुर ने गरीबों और शोषितों के प्रति मेरे भीतर उनके दर्द को समझने की शक्ति दी. इसलिए किसी एक का नहीं, तीनों शहरों के प्रति मेरा समूचा वजूद सदैव आभारी रहता है.

हाँ, 21 वर्षों से दिल्ली में रहने के बावजूद दिल्ली से मन का जुड़ाव अभी तक नहीं हुआ!

ई-कल्पना - आप एक प्रतिष्ठित ग़ज़लकार, समकालीन कविता के कवि और कहानीकार हैं. आपकी अनेकों - 90 से ऊपर – कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं. आज भी कहानियाँ लिखते हैं. पहले कहीं आप कह चुके हैं कि ज़्यादा वे लिखते हैं जिनमें ज़्यादा आग होती है. आपके लेखन के इंजन का ड्राईविंग फ़ोर्स क्या है. आपको प्रेरणा किन बातों से मिलती है.

उ. - समाज--जिसमें मैं और मेरा परिवार भी शामिल है--और प्रकृति में हो रही उथल-पुथल से मेरा रचनाकार उद्वेलित होता है और अनेक तरह के वैचारिक द्वंद्वों से गुजरकर सृजन की ओर उन्मुख होता है.

ई-कल्पना - क्या लिखना आपकी दिनचर्या का भाग है. (यदि हाँ) दिन में आप कितना समय लिखने में बिताते हैं.

उ. -  'लिखना' सिर्फ़ लिखना नहीं होता, उसमें पढ़ना और सोचना भी शामिल है. हाँ,यह मेरी दिनचर्या का हिस्सा है और 8-10 घंटे का समय तो इसमें लगता ही है. चूंकि सौभाग्य से अब मैं अच्छी पेंशन पाने वाला रिटायर्ड व्यक्ति हूँ, इसलिए ऐसा सम्भव कर पाता हूँ.

ई-कल्पना - ऐक्टिविज़्म अच्छी बात है. किसी भी सभ्य जगह इंसान को अपने समाज की समस्याओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिये. लेकिन कई बार ऐसा भी लगता है कि यही ऐक्टिविज़्म अक्सर नौजवानों को अपनी बेरोज़गारी से जूझने में आड़े आ सकती है. जो समय उन्हें पक्का रोज़गार ढूँढने में लगाना चाहिये वो ऐक्टिविस्टिक लहरों में बह कर व्यर्थ जाता है. अक्सर विश्वविद्यालय के छात्रों में लगातार ऐक्टिविज़्म विश्वविद्लयों के स्तर पर भी बुरा प्रभाव डालता है. आप ने कभी इस बारे सोचा है. कुछ कहना चाहेंगे.

उ. - एक्टिविज्म समय को नष्ट करता है, मैं ऐसा नहीं मानता. वह रोजगार न होने या पर्याप्त संख्या में न होने के कारणों की पड़ताल के लिए प्रेरित करता है और व्यवस्था पर उचित दबाव डालता है. अगर परिस्थितियाँ ठीक हैं तो, मैं नहीं समझता कि छात्र तब भी एक्टिविज्म की ओर बढ़ेंगे. एक्टिविज्म में कोई खराबी नहीं, बशर्ते उससे लेखक की रचनात्मक ऊर्जा में क्षरण उत्पन्न न हो।

ई-कल्पना - लोगों में अच्छा साहित्य पढ़ने की आदत डालने के लिये क्या करना चाहिये.

उ. - लोग अच्छा साहित्य पढ़ने की ओर प्रेरित हों, इसके लिए पुस्तक मेलों के अतिरिक्त आप जैसे सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है. बच्चों को प्रारम्भ से ही अच्छी पुस्तकें माता-पिता दें और यथासंभव फेसबुक आदि से दूर रखें, यह ज़रूरी लगता है.

ई-कल्पना -  1970s में आपने साहित्यिक मैगज़ीन युवा शुरू की थी. अपने उस अनुभव के बारे में बताइये.

उ. - 'युवा' प्रगतिशील चिंतन की साहित्यिक पत्रिका थी जिसे उस दौर के 'लघुपत्रिका आंदोलन' में महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता था. 2 ही अंक निकले लेकिन पत्रिका को लोग आज भी स्मरण करते हैं--उसकी महत्वपूर्ण सामग्री के कारण.

ई-कल्पना -  अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान के क्षेत्र में टॉप-अवार्ड योग्य वैज्ञानिकों को दिये जाते हैं लेकिन ये बात भी सामान्य तौर पर जानी-मानी है कि उन सम्मानों का हर प्रतिष्ठित वैज्ञानिक खुद को हकदार समझता है, उन्हें पाने के लिये जम कर लॉबी करता है, पर्याप्त जोड़तोड़ करने को तैयार रहता है. कोई वजह नहीं है कि यही सीन भारत में भी अन्य क्षेत्रों - जैसे साहित्य, फ़िल्म इत्यादि - में न हो. इसीलिये, हाल में घटित पुरस्कार-वापसी शिक्षित वर्ग के अनेक सदस्यों के लिये आश्चर्यजनक थी. क्या आप हाल के अवार्ड वापसी के बारे में कुछ कहना चाहेंगे.

उ. - अवार्ड में राजनीति के रोल के बारे में लिख ही चुका हूँ. -- आपका कहना सही है कि पुरस्कारों में लॉबिंग की ही भूमिका होती है।मैंने कभी नहीं की, इसीलिये जो साहित्य अकादेमी पुरस्कार 25 वर्ष पूर्व मिल जाना चाहिए था,नहीं मिला! ज्ञानपीठ,सरस्वती,व्यास आदि बड़े पुरस्कारों --सबकी यही स्थिति है। जिस वर्ष कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ मिला था तब जिन नामों पर विचार किया गया उनमें मेरा भी नाम था--निर्णायक समिति के 2 सदस्यों ने यह बात मुझे कई वर्ष बाद बताई थी! मैं समझता हूँ कि त्रेता,अभिनव पांडव, राधामाधव, अनाध्यसूक्त,   ब्लैकहोल ,अस्ति और हँसो बतर्ज़ रघुवीर सहाय -- इनमें से हर कृति कोई भी पुरस्कार पाने के योग्य थी।यही स्थिति किसी भी क्षेत्र में दिए जाने वाले सर्वाधिक प्रतिष्ठाप्राप्त विदेशी पुरस्कारों की भी है।
       जहाँ तक असहिष्णुता के सवाल पर लेखको द्वारा पुरस्कार-वापसी-अभियान की बात है,मैं समझता हूँ कुल मिलाकर उसका प्रभाव अच्छा रहा।"
वापसी से देश में ज़रूरी प्रतिरोध का माहौल बना था यद्यपि वैसी और अधिक भयंकर घटनाएं भी पूर्व में हुई थीं लेकिन तब ऐसा माहौल नहीं बना था!

udbhrant@gmail.com