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लेखक जानार्दन से बातचीत

जनवरी 2, 2017

ई-कल्पना -  जनार्दन जी, इस साक्षात्कार को स्वीकारने के लिये आपको बहुत धन्यवाद. आपने लिखना कब शुरू किया. अक्सर कहानीकार को विशेष प्रेरणाएँ लिखने को विचलित करती रहती हैं. क्या आपकी भी ऐसी कोई प्रेरणाएँ हैं. बताएँगे.

जा.गो. - एम.ए. करने के दौरान लिखना प्रारंभ हुआ। काशी हिंदू विश्वविद्यालय का छात्र था। बनारस में बहुत कुछ अच्छा है, जिन्हें जानने की उत्सुकता होती थी। अक्सर सोचता था, महादेव की नगरी होने के पीछे का कारण क्या है। बुद्ध ने ज्ञान देने की प्रक्रिया यहीं से शुरू क्यों की। कबीर, रैदास और नजीर बनारसी की बानियों ने काफी असर किया। उमरावजान के मजार पर जा कर अलग तरह का अनुभव हुआ। लक्ष्मीबाई के जन्मास्थान की दुर्दशा देख मन खिन्न हो गया। अर्थात बनारस की अच्छाईयों और बुराईयों, दोनों उद्वेलित करती थीं क्योंकि दोनों के पीछे विशेष प्रकार की अवधारणाएं काम करती थीं, जिन्हें जानने की इच्छा होती थी। इन सबके अतिरिक्त आदिवासी समुदाय में पैदा होने के कारण इन सभी गतिविधियों को अलग ही कोण से देख पाता था, जिन्हें कहने के क्रम में लेखन की शुरुआत हुई।

 

ई-कल्पना - दलित और स्त्री साहित्य अपने विमर्श और चिंतन के कारण ही अपनी पहचान पाता है. आप ने आदिवासी साहित्य, सिनेमा-संस्कृति के अलावा इन वर्गीकरणों का अध्ययन किया है, इन विधाओं में लिखते भी हैं. ई-कल्पना में दलित-जान्र में ये आपकी दूसरी कहानी है. पहली, "सच और सपनों के बीच" … आपके अनुसार दलित-साहित्य क्या है?

जा.गो. – दलित साहित्य को लेकर कोई संदेह नही है। यह फुले-अंबेडकरी विचारधारा पर आधारित भोगे हुए सत्य को अभिव्यक्त करने वाला साहित्य है। दलित साहित्य ने भारतीय साहित्य को लोकतांत्रिक बनाने का कार्य किया है। दलित, आदिवासी, स्त्री और पासमंदा लेखन से समग्र भारतीय लेखन का स्वरूप सामने आ रहा है।

ई-कल्पना - क्योंकि दलिताधारित कहानियाँ दलित वर्ग की सामाजिक-आर्थिक असमानता को चित्रित करती हैं, ज़ाहिर है अक्सर संगीन और पीड़ाजनक होती हैं. लेकिन साहित्यकार सामाजिक कठिनाईयों की युक्तियाँ निकाले, ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती. कहानीकार तो बस शीशा रख कर सच सामने लाता है. इंसान के जीवन के सच में हर तरह के रंग घुले होते हैं, हरे-भरे खुश रंग और नीरस से दुखी रंग. ये कहानीकार की मर्ज़ी है वो कौन से रंग में कहानी रचना चाहता है. क्या दलित कहानियों में खुश-रंगों की कोई भी जगह नहीं है?

जा.गो. – है बिल्कुल है। पर अभी भी दलित समाज जीवन की तमाम मुश्किलों से दो चार हो रहा है। जैसे - जैसे जिंदगी के मसले - मामले कम होते जाएंगे, हल होते जाएंग, वैसे - वैसे दलित समाज में भी बदलाव आएगा साथ ही लेखन में भी बदलाव आएगा। चूंकि बदलाव सार्थक दिशा में नहीं हो पा रहा है। इसिलए इस समाज को जितना आगे होना चाहिए था उतना नही हो पाया। नहीं हो पाना ही दुख में परिवर्तित होकर साहित्य में परिलक्षित हो रहा है। आप गौर करें तो देखेंगी कि  मुख्यधारा का समाज हजारों साल से लिख रहा है। स्वयं हिंदी में इस प्रकार का लेखन भारतेंदु युग से प्रारंभ हुआ। उसके मुकाबले दलित साहित्य बहुत नया है। अभी इसे कई मुकाम तय करने हैं, जिसमें समय लगेगा।

 

जानार्दन जीवनवृति

  

नाम- जनार्दन

पिता-स्व.श्री शिवदास

माता-स्व.श्रीमती रन्नो देवी

जन्म-आदिवासी गोंड समुदाय में 14 अक्टुबर 1976को, ग्राम-कौड़ियां खुर्द, जिला- मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश में।

शिक्षा- B.SC, M.SC, M.A.,M.PHIL, PGEMFP एवं  सिनेमा पर हैदराबाद केन्द्रीय वि.वि.से शोधरत।

अध्ययन क्षेत्र-आदिवासी साहित्य, सिनेमा-संस्कृति,दलित एवं स्त्री साहित्य एवं अनुवाद कार्य।

लेखन- आदिवासी सत्ता, इंडिया न्यूज, दलित अस्मिता, पूर्वग्रह, इस्पातिका एवं मीडिया विमर्श जैसी पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां प्रकाशित। आदिवासी साहित्य,संस्कृति एवं भाषा पर पुस्तक प्रकाशनाधीन।

सम्प्रति- भारतीय प्रौद्यौगिकी संस्थान मुम्बई में, कनिष्ठ तकनीकी अधीक्षक।

सम्पर्क- हिन्दी कक्ष, तीसरी मंजिल, मुख्य भवन, भा.प्रौ.सं.मुंबई,400076, महाराष्ट्र।

ई-मेल-jnrdngnd@gmail.com

मो.न.-9969054221