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बातचीत डॉ मनोज मोक्षेन्द्र के संग

2 मई 2016

ई-कल्पना - मनोज जी, आप कई सालों से लिख रहे हैं. 2014 में आपने मनोज मोक्षेन्द्र उपनाम अपनाया. इसकी कोई ख़ास वजह है जो आप पाठकों के साथ बाँटना चाहेंगे.

म.मो. -  मुक्ता जी, लेखन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसका बीजारोपण  लेखक के बचपन में हो ही जाता है। जहां तक मुझे याद है, मैं  आठ-नौ वर्ष की उम्र से ही बाल साहित्य लिखने लगा था। तथापि, मुझे ठीक-ठीक याद  नहीं है कि मेरी पहली रचना कौन-सी थी। साहित्य की सभी विधाओं में जन्म-जात दिलचस्पी रखते हुए, तुकांत कविताएँ ही मेरी लेखनी से प्रथमत; सृजित हुईं। जहां तक मुझमें साहित्य के प्रति रुझान के पैदा होने का संबंध है, जब पिता जौनपुर के एक कालेज में प्रधानाचार्य थे तब मैं उनके पुस्तकालय में उपलब्धप्रेमचंद, जैनेंद्र, भगवती चरण वर्मा, शरतचन्द्र, विमल मित्र, निराला आदि जैसे लेखकों के साहित्य को बड़ी शिद्दत और शौक से पढ़ गया था। यहां मुझे यह बताते हुए बेहद अचम्भा हो रहा है कि उस वक़्त मेरी उम्र रही होगी--कोई दस-ग्यारह वर्ष की। हाँ, लगभग  चार वर्ष तक मेरा कंठ नहीं फूटा था। माँ चिंतित रहती थी कि उनका बेटा गूंगा पैदा हुआ है। पर, जब मैंने बोलना शुरू किया तो मेरा पढ़ना-लिखना अत्यन्त द्रुत गति से हुआ। मेरे बचपन के शिक्षण में मेरी विदुषी और बुद्धिमती माँ का बड़ा योगदान था और उनकी गहन अध्ययनशीलता का प्रभाव मेरे ऊपर हमेशा अमिट रहा है।जहां तक किसी लेखक की अस्मिता और पहचान का सम्बन्ध है, उसकी कृतियाँ, उसकी भाषा-शैली, उसकी प्रतिभा और सृजनात्मकता ही उसके 'होने' का जीवंत दस्तावेज़ प्रस्ततु करती है। यदि हम 'ईदगाह' कहानी या 'कुकुरमुत्ता' कविता पढ़ रहे हों तो हमें यह बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि ये रचनाएँ किन रचनाकारों की हैँ। रचनाकार छोटा हो या बड़ा,उसे उसकी रचनाओँ के माध्यम से  ही पहचाना जाएगा। बहरहाल,  मेरे मूल नाम के साथ उपनाम 'मोक्षेंद्र' जोड़े जाने के पीछे कोई ख़ास  वजह नहीं है। यह तगमा चलते-चलते किसी ने दे दिया था जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार  कर लिया।

ई-कल्पना - वाराणसी! कोई इसे इतिहास तथा परम्परा से भी पुराना बता कर एक अपूर्व कथा का दर्ज़ा दे जाता है, कोई कहता है कि ये वो जगह है जहाँ पर निर्वाण और जीवन का परम सत्य रोज़ाना एक दूसरे को निर्निमेष देखते हुए दिख जाते हैं. कोई बनारसी पान की बात करता है, कोई बनारसी साड़ी की. आप खुद को बनारस का बताते हैं, आप ही हमें बताईये आपके लिये बनारस का क्या स्थान है?

म.मो. - मुक्ता जी, वाराणसी जिसे काशी और बनारस  भी कहते हैं, अपने-आप में एक पौराणिक ग्रन्थ है, जिसे सिर्फ  देखकर ही पढ़ा-समझा जा सकता है। आपत्तिजनक बदलावों के बयार में बनारस की पौराणिक, धार्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक अस्मिता आज भी बरकरार है। विभिन्न मेल-बेमेल संस्कृतियों की यह संगम-स्थली है। प्राचीन ग्रंथों में इसकी गणना सुसंस्कृत और पवित्र नगरी के रूप में सप्तपुरियों में की गई है। इस नगरी को भगवान शिव के त्रिशूल पर आलम्बित माना गया है जहां एक लोकप्रिय हिन्दू-मान्यता के अनुसार, मृत्योपरांत हर मनुष्य की आत्मा को सीधे स्वर्ग में प्रवेश करने का अधिकार है। आज भी इसको संतों की तपो-भूमि माना जाता है जहां विभिन्न सम्प्रदायों और मतों के ऋषि-महात्मा  समागम करने आते हैं। कालान्तर में इसका विकास एक औद्योगिक नगर के रूप में हुआ तथा इसे साड़ी, कालीन और लकड़ी के खिलौने आदि बनाने वाले औद्योगिक केंद्र के रूप में ख्याति मिली। गंगा के घाटों के पार्श्व में विकसित इस नगर को शब्दों में वर्णित-परिभाषित करना संभव नहीं है। सम्भवत: विश्व में काशी जैसा कोई नगर विद्यमान नहीँ है जो इतनी प्रचुरता से किसी देश की सभी संस्कृतियों को एक जगह समेटकर वहां की सम्पूर्ण सांस्कृतिक विरासत का जीवंत दस्तावेज़ बन सके। मेरा इस देश की सरकार और जनता दोनो से अनुरोध है कि  इस प्राचीन नगरी की पुरातनता को  भौंड़ी आधुनिकता से अछूता रखते हुए इसे मूल रूप मे संरक्षित रखा जाए। मैं  नहीं बता सकता कि जो कुछ काशी ने मुझे दिया है, उसका ब्योरा किन शब्दों दिया जाए। मैं काशी के प्रति कृतज्ञ हूँ।

ई-कल्पना - आपने अंग्रेज़ी लिटरेचर में उच्च शिक्षा प्राप्त की, आप अंग्रेज़ी साहित्य में पी.ऐच.डी. हैं. इसकी कोई ख़ास प्रेरणा या वजह थी?

म.मो. - मुक्ता जी, साहित्य-अनुशीलन मेरे पठन-पाठन का अविलगेय हिस्सा रहा है। भौतिक-रासायनिक विज्ञानों के प्रति मेरा उतना आकर्षण नहीं रहा। इसलिए, साहित्य का वरण, भले ही वह साहित्य किसी भी देश का हो, मैंने अपने जीवन के हर क्षेत्र में किया है। हाँ, अंग्रेज़ी साहित्य विशाल है जिसके अध्ययन से मेरे सोच की दिशा और व्यापकता निर्धारित हुई है। अंग्रेज़ी के साथ-साथ अमेरिकन लिटरेचर का भी अध्ययन किया है और अमरीका के शेक्सपियर--यूजीन ओ' नील के नाटकों पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पी-एच. डी. की। वर्ष १९९८ में मेरा चयन गवर्नमेंट पोस्ट-ग्रेजुएट कालेज में प्रोफ़ेसर के रूप हुआ था जिसे मैंने किन्हीँ व्यक्तिगत  कारणों से छोड़ दिया।

ई-कल्पना - आपने अपनी कहानी रखैल मर्द में एक ऐक्सट्रीम की स्थिति का बड़ी खूबसूरती से वर्णन किया है, कहानी में औरत परम्पराओं का पूर्णतःपरित्याग करती है, आदमी कुछ हद तक उसकी स्वच्छंदता को स्वीकार करता है, फिर समय के साथ उकता जाता है, फिर विद्रोह करता है. आपके अनुसार साल 2016 में दाम्पत्य जीवन में स्वच्छंदता की चाह और परम्पराएँ किस अनुपात में एक संतुलित जीवन के लिये आवश्यक हैं. दूसरे शब्दों में, आज के दौर में, मैं आपके सही और ग़लत आचार की ज़रा गहराई में परिभाषा समझना चाहती हूँ. आप इस कहानी का उदाहरण दे कर भी ये समझा सकते हैं.

म.मो. -  मुक्ता जी, 'रखैल मर्द' में पुरुष के समान स्त्रियों को बराबरी का दर्ज़ा देने की जायज़ होड़ में, स्त्री के बढ़ते हुए वर्चस्व के नकारात्मक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। यों  तो, मैं समाज के हर क्षेत्र में परंपराओं और सनातनी प्रवृत्तियों का आग्रही नहीं हूँ; परन्तु, मैं उन परंपराओं का सम्मान करता हूँ जो समाज को स्वस्थ रखने की दिशा में रोगहर औषधि का असरदार दमखम रहते हैं। आज हमारे समाज में विवाहेतर संबन्धों और बहुकोणीय प्रेम-संबन्धों की बाढ़-सी आ गई है। अब तो आलम यह है की न तो पुरुष, न स्त्री ही, अपने जीवन-साथी के प्रति वफादार है। हमारा बौद्धिक समाज भी तर्कों के आधार पर बहुकोणीय प्रेम [शारीरिक] सम्बन्धों को उचित ठहरा रहा है। बहरहाल, 'रखैल मर्द' में केवल स्त्री को ही निशाना बनाना मेरा उद्देश्य नहीं है; स्वयं पुरुष  सवालों और संदेह के घेरे में है। पुरुष पात्र [गजेन्द्र] अपने ऑफिस की जिस सहकर्मी--रोहिणी [दूसरी स्त्री] को लेकर अंजली [पहली स्त्री] के पास आता है और दूसरी स्त्री के साथ विवाह करने का उपक्रम करता है, उसके साथ गजेंद्र का ऑफिस में कैसा रिश्ता रहा होगा, इस पर भले ही मैंने कोई प्रकाश नहीं डाला है; पर, पाठक भलीभांति कयास लगा सकते हैं कि उनके सम्बन्ध साफ़-सुथरे नहीं रहे होंगे।क्योकि गजेंद्र कुछ ही घंटों की बातचीत के जरिए रोहिणी को विवाह के लिए राजी कर लेता है--जो  किसी प्रकार से संभव नहीं है। बेशक, उनके बीच पहले से संबंध रहा होगा। उल्लेख्य है कि कहानी के अंत में दूसरी स्त्री ही पहली स्त्री  के अहंकार को अपने वाक्-चातुर्य से पटखनी देती है।यहां, मेरा भी पुरजोर आग्रह है कि विवाह-संस्था को सम्मानपूर्वक निभाया जाना चाहिए। किन्तु, मैं  असमाधेय झगड़ों-लफड़ों में पड़े हुए विवाह सम्बन्धों के विच्छेद के लिए 'तलाक' जैसी प्रथा के पक्ष में भी  हूँ। इसमें पुरुष और स्त्री दोनों पक्षों का हित है।

ई-कल्पना - आप कई सालों से लिख रहे हैं. वर्ष 2000 में आपका पहला काव्य-संग्रह पगड़ंडियाँ प्रकाशित हुआ. तब से अब तक प्रकाशन का एक सिलसिला शुरू हुआ, आज आपकी कई (8-9) प्रकाशित रचनाएँ - काव्य-संग्रह, उपन्यास और कहानी-संग्रह – हैं. इस अंक में प्रकाशित कहानी, रखैल मर्द, जल्द ही प्रकाशित होने वाली एक कहानी-संग्रह का भाग है. इस संग्रह के बारे में कुछ बताना चाहेंगे. 

म.मो. - हाँ, यह कहानी मेरे अगले संग्रह में संकलित है। अगला संग्रह कुछ ही महीनों में पाठकों के हाथ में होगा। इस संग्रह की ख़ास बात यह है कि इसमें कुछ कहानियां नितांत पारिवारिक पृष्ठभूमि में लिखी गई हैं। इधर कुछ वर्षों से मैंने कहानियों के  कथानक को पारिवारिक जटिलताओं की ओर मोड़ा  है। लिहाज़ा, संग्रह की ज़्यादातर कहानियां पथभ्रष्ट राजनीति, ज़हरीले जातीय उन्माद, बेकारी-गरीबी, धार्मिक और सामाजिक आडम्बर, संत-समाज में व्याप्त भ्रष्टाचरण जैसे विषयों पर केंद्रित हैं। मेरा पूरा विश्वास है की पाठकगण की आकांक्षाओं पर मैं हमेशा की तरह इस बार भी खरा उतरूंगा।

ई-कल्पना - आपकी कहनियों का ड्राईविंग फ़ोर्स कहाँ से आता है.

म.मो. -  मुक्ता जी, जीवन के कड़ुवे-मीठे अनुभवों ने मेरी विचारधारा को पुष्ट बनाया है। मेरे लिए हर क्षण कोई न कोई नया अहसास लेकर आता है। काल-परीक्षित मान्यताओं में मेरी निष्ठा रही है। पर, तर्क और विज्ञान को भी मैं बेहतर जीवन की कसौटी मानता  हूँ। मैं इस बात को लेकर हमेशा चिंतित रहा हूँ कि इस धरती पर विध्वंसात्मक विषमताओं में किस तरह से सामंजस्य बैठाया जाए ताकि हर मनुष्य सुरक्षित और संतुष्ट जीवन का हक़दार  बन सके? दु;खद बात यह है कि लोगों में भावनात्मक स्पर्श क्षीण  होता जा रहा है। साहित्य-संस्कृति प्रेम, नैतिकता, परहितता आदि जैसी बातें अब कहाँ रहीं? जीवन के प्रत्येक स्तर पर थोपी जा रही असहिष्णुताओं ने जीना हराम कर दिया है। अस्तु, जब ऐसे विचारों से मैं आप्लावित होता हूँ तो मुझमें लिखने की बेचैनी बढ़ जाती है। 

उत्तर ७. मुक्ता जी, आपके सवालों ने मुझे आत्म-मंथन करने के लिए विवश किया है। भविष्य मेँ और बेहतर लिखने की प्रेरणा आपसे  मिली है। मैं आपका आभारी हूँ कि आपने मेरे भीतर मौज़ूद शख्शियत  को मेरे पाठकों  से  रू-ब-रू कराया है। शुक्रिया!

जीवन-चरित

 

लेखकीय नाम: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र  {वर्ष 2014 (अक्तूबर) से इस नाम से लिख रहा हूँ। इसके   पूर्व 'डॉ. मनोज श्रीवास्तव' के नाम से लिखता रहा हूँ।}

 

वास्तविक नाम (जो अभिलेखों में है) : डॉ. मनोज श्रीवास्तव

 

पिता: श्री एल.पी. श्रीवास्तव,

माता: (स्वर्गीया) श्रीमती विद्या श्रीवास्तव

जन्म-स्थान: वाराणसी, (उ.प्र.)

शिक्षा: जौनपुर, बलिया और वाराणसी से (कतिपय अपरिहार्य कारणों से प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रहे) १) मिडिल हाई स्कूल--जौनपुर से २) हाई स्कूल, इंटर मीडिएट और स्नातक बलिया से ३) स्नातकोत्तर और पीएच.डी. (अंग्रेज़ी साहित्य में) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से; अनुवाद में डिप्लोमा केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो से

पीएच.डी. का विषय: यूजीन ओ' नील्स प्लेज: अ स्टडी इन दि ओरिएंटल स्ट्रेन

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष 2000, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 2-अक्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष 2004, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-अपूर्णा, श्री सुरेंद्र अरोड़ा के संपादन में कहानी का संकलन, 2005; 4- युगकथा, श्री कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित संग्रह में कहानी का संकलन, 2006; चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष 2010, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष 2008, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इन्कलाब (कहानी संग्रह), वर्ष 2009, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6. 7-एकांत में भीड़ से मुठभेड़ (काव्य संग्रह--प्रतिलिपि कॉम), 2014; अदमहा (नाटकों का संग्रह--ऑनलाइन गाथा, 2014); 8--मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा (राजभाषा हिंदी पर केंद्रित), शीघ्र प्रकाश्य; 9.-दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास), शीघ्र प्रकाश्य

--अंग्रेज़ी नाटक The Ripples of Ganga, ऑनलाइन गाथा, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

--Poetry Along the Footpath अंग्रेज़ी कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य

--इन्टरनेट पर 'कविता कोश' में कविताओं और 'गद्य कोश' में कहानियों का प्रकाशन

--महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा, गुजरात की वेबसाइट 'हिंदी समय' में रचनाओं का संकलन

--सम्मान--'भगवतप्रसाद कथा सम्मान--2002' (प्रथम स्थान); 'रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान--2012'; ब्लिट्ज़ द्वारा कई बार 'बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक' घोषित; 'गगन स्वर' संस्था द्वारा 'ऋतुराज सम्मान-2014' राजभाषा संस्थान सम्मान; कर्नाटक हिंदी संस्था, बेलगाम-कर्णाटक  द्वारा 'साहित्य-भूषण सम्मान'; भारतीय वांग्मय पीठ, कोलकाता द्वारा साहित्यशिरोमणि सारस्वत सम्मान (मानद उपाधि)

"नूतन प्रतिबिंब", राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक

लोकप्रिय पत्रिका "वी-विटनेस" (वाराणसी) के विशेष परामर्शक, समूह संपादक और दिग्दर्शक

'मृगमरीचिका' नामक लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका के सहायक संपादक

हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा, व्यंग्य यात्रा, उत्तर प्रदेश, आजकल, साहित्य अमृत, हिमप्रस्थ, लमही, विपाशा, गगनांचल, शोध दिशा, दि इंडियन लिटरेचर, अभिव्यंजना, मुहिम, कथा संसार, कुरुक्षेत्र, नंदन, बाल हंस, समाज कल्याण, दि इंडियन होराइजन्स, साप्ताहिक पॉयनियर, सहित्य समीक्षा, सरिता, मुक्ता, रचना संवाद, डेमिक्रेटिक वर्ल्ड, वी-विटनेस, जाह्नवी, जागृति, रंग अभियान, सहकार संचय, मृग मरीचिका, प्राइमरी शिक्षक, साहित्य जनमंच, अनुभूति-अभिव्यक्ति, अपनी माटी, सृजनगाथा, शब्द व्यंजना, अम्स्टेल-गंगा, शब्दव्यंजना, अनहदकृति, ब्लिट्ज़, राष्ट्रीय सहारा, आज, जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, कुबेर टाइम्स आदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं आदि में प्रचुरता से  प्रकाशित

आवासीय पता:--सी-66, विद्या विहार, नई पंचवटी, जी.टी. रोड, (पवन सिनेमा के सामने), जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत. सम्प्रति: भारतीय संसद में प्रथम श्रेणी के अधिकारी के पद पर कार्यरत

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