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कैदी

  • मिर्ज़ा हफ़ीज़ बेग
  • 1 फ़र॰
  • 25 मिनट पठन

अपडेट करने की तारीख: 5 दिन पहले



कैदी : जब जेल दीवारों में नहीं, दिमाग़ में होती है

(सम्पादक के 2 शब्द)

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ “अनुशासन” एक पवित्र शब्द बन चुका है।इतना पवित्र कि उसके सामने सवाल पूछना भी अपराध जैसा लगता है। मिर्ज़ा हफ़ीज़ का नाटक ‘कैदी’ इसी पवित्रता को कटघरे में खड़ा करता है।

यह नाटक किसी एक जेल की कहानी नहीं है। यह उस मानसिक संरचना की कथा है जहाँ गलत को दंड देकर हम अपने सही होने का भ्रम पाल लेते हैं।

‘कैदी’ में तीन मुख्य स्वर हैं

  • एक बूढ़ा कैदी, जो सोचता है

  • एक युवा कैदी, जो सवाल करता है

  • और एक जेलर, जो अनुशासन निभाते-निभाते इंसान होना भूल चुका है

लेकिन यह नाटक इन तीनों के टकराव से बड़ा है।असल टकराव वहाँ है जहाँ व्यवस्था और संवेदना आमने-सामने खड़ी होती हैं।

जेल यहाँ सिर्फ़ सलाखों का ढाँचा नहीं है। जेल वह व्यवस्था है जो यह तय करती है कि किसे सुधार की ज़रूरत है और किसे सत्ता संभालने का अधिकार।

नाटक का सबसे असहज क्षण वह नहीं जब कैदी मार खाता है, बल्कि वह है जब जेलर को एहसास होता है कि वर्दी ने उसे भी कैद कर रखा है।

अनुशासन बनाम मानवता - यह द्वंद्व नया नहीं है। लेकिन कैदी  इसे नारे में नहीं बदलता। यह इसे अनुभव बनाता है।

यह नाटक यह दावा नहीं करताकि जेलें तुरंत खत्म हो जानी चाहिए। यह उससे ज़्यादा खतरनाक सवाल करता है -

अगर जेलें सचमुच सुधार की जगह होतीं,तो क्या अपराध पीढ़ी दर पीढ़ी चलते?

नाटक के अंत में एक चिराग जलता है। कोई क्रांति नहीं। कोई विजयी घोष नहीं।

बस एक धीमी लौ।

और शायद यही लेखक का सबसे बड़ा साहस है - कि वह उम्मीद को भी शोर से मुक्त रखता है।

‘कैदी’ वायरल होने के लिए नहीं लिखा गया।

यह उन पाठकों के लिए हैजो अब सिर्फ़ खबर नहीं पढ़ते, उसके पीछे की चुप्पी सुनना चाहते हैं।

धन्यवाद

मीरा मालिनी

उप-सम्पादक, ई-कल्पना

अवधि: दृश्य / लगभग 60–75 मिनट

शैली: दार्शनिक नाटक, व्यंग्यात्मक टकराव, सामाजिक आलोचना

स्थान: जेल परिसर, फ्लैशबैक, सभागार और गृहस्थ वातावरण

 

मुख्य पात्र:

  • देवकांत (जेलर): एक संवेदनशील व्यक्ति जो व्यवस्था में फंसा है, लेकिन अंततः मानवता के पक्ष में खड़ा होता है

  • रघु (कैदी): अनुभवों से परिपक्व, दार्शनिक चिंतक, व्यवस्था का व्यंग्यात्मक आलोचक

  • अर्जुन (युवा कैदी): तेजस्वी, क्रांतिकारी विचारों से युक्त, व्यवस्था पर प्रश्न करने वाला

  • प्रशासकीय अधिकारीगण: व्यवस्था की कठोरता के प्रतिनिधि

  • देवकांत का बेटा (फ्लैशबैक में): संवेदनशीलता की स्मृति जो जेलर को मानवता से जोड़े रखती है

  • माला: देवकान्त की पत्नी 

  • चेतन: देवकान्त का पुत्र

 

 

 दृश्य 1 — आत्मा की सलाखें


 

स्थान: जेल की कोठरी

समय: रात का सन्नाटा — दीवारों की दरारें साँस ले रही हैं

पात्र:

  • रघु: उम्रदराज कैदी, शांत और गंभीर

  • अर्जुन: युवा कैदी, तेजस्वी और व्यंग्यात्मक

  • जेलर: नाम देवकान्त। कठोर और अहंकारी

 

प्रकाश:हल्की टिमटिमाती रोशनी — एक बल्ब जिसकी रोशनी रघु के चेहरे को अधूरा छूती है

ध्वनि:पानी की टपकती बूंदें और दूर खाँसता हुआ कैदी

 

रघु (मोनोलॉग में) (धीमे स्वर, जैसे दीवार से बात कर रहे हों) ये दीवारें सिर्फ पत्थर नहीं, हर ईंट मेरी एक साँस है। जेल का असली दरवाज़ा वो नहीं जो बंद होता है...वो है जो खुला रहता है, मगर बाहर की दुनिया में लौटने की इजाज़त नहीं देता।यहाँ दिन गुनाह से नहीं, पछतावे से बनते हैं।और रातें... रातें खुद को भूल जाने का अभ्यास हैं।


एक आवाज़ (जेलर देवकांत): खुद को भूल जाओ रघु और सो जाओ और दूसरों को भी सोने दो। 


रघु: नींद आपको भी तो नहीं आती जेलर साहब। आज फिर आ गए नाइट में राउंड पर।


(जेलर का दो गार्ड के साथ प्रवेश। वे सलाखों की दूसरी तरफ हैं।)


जेलर: तुम लोगों की वजह से। तुम लोग सुधर जाओ तो मुझे क्यों तकलीफ उठानी पड़े।


रघु (व्यंग्य से): कैसे सुधर जाएंगे साहब। यह जेल है, कोई सुधरने की जगह नहीं। यहाँ तो अपराधी रहते हैं। अपराध की बातें करते हैं। जो वे जानते हैं वही एक दूसरे को सिखाते हैं। आपको पता नहीं क्या, सुधरने के लिए सुधरे हुए लोगों की संगत चाहिए होती है।

 

जेलर: जिस दिन काल कोठरी में डाल दिए गए न, सुधर भी जाओगे। अपनी उमर का लिहाज करो। भूलो मत तुम देवकांत की जेल में हो।


रघु: जेल देवकांत की हो या दानवकांत की हमारे लिए तो सब बराबर है। यह कोठरी हो या काल कोठरी सब बराबर है। आप अभी घर जाएंगे, दो पैग लगाएंगे और अपनी बीवी के गर्म जिस्म से लिपटकर सो जाएंगे। आपको फर्क पड़ता है... सुबह उठकर अपने बच्चों को प्यार करेंगे। आपको फर्क पड़ता है कि आप किस कोठरी में है। जिसके जीवन में कुछ न हो उसे तो मौत से भी डर नहीं लगता...


(जेलर रघु का गला पकड़ लेता है। उसे खा जाने वाली निगाहों से देखता है फिर कुछ सोचकर छोड़ देता और चला जाता है।) 

(एक पल सन्नाटा। तभी बैरक के किसी कोने से आवाज़ आती है)


अर्जुन : आज बच गए वरना दिमाग ठीक हो जाता।


रघु: जिसकी आत्मा ही घायल हो उसे तुम ज़ख्मों से डराते हो? जिसके आगे दूर-दूर तक काला स्याह अंधेरा है उसे काल कोठरी का डर क्या?


अर्जुन (जोर से):वाह! दर्शन की दुकान तो बढ़िया सजी है!लेकिन भाई साहब, जब बिल सिस्टम बनाता है तो भावनाओं से नहीं, लॉजिक से बनाता है।इतना भावुक होना पुराना फैशन है।


रघु (धीमे से मुस्कराते हुए):पुराना फैशन ही वो आइना है जिसमें नए चहरे डरते हैं झाँकने से।


अर्जुन: मुझे ऐसे दर्शन से एलर्जी है — जो जंजीरों को गहना बनाकर पहनता है!आपने क्या पाया इतने बरसों में? सलाखें गिनना?


रघु: मैंने अगर कुछ पाया है तो वो गिनती की नहीं, खोने की कीमत है।जिन भावनाओं को तुम कमजोर समझते हो, वहीं इंसान को इंसान बनाती हैं।


अर्जुन:सिस्टम बदलता है प्रोटोकॉल से, आपकी भावनाओं से नहीं।जबतक हम 'डिजिटल दंड' की भाषा नहीं बोलेंगे, सुधार सिर्फ किताबों में रहेगा।


रघु: तुम्हें तो न्याय पर भी भरोसा नहीं। 


अर्जुन : तुम्हें है क्या? इस दौर में जहां मीडिया ही किसी को गुनाहगार या किसी को बेगुनाह ठहरा चुका होता है, वहां गरीब या साधनहीन लोग कैसे विश्वास करें?... आपके भाग्य का फैसला करने वाले न्यायालय भी तो मानव संचालित हैं। क्या उनपर दबाव नहीं होता है जन-मानस का? मीडिया रिपोर्ट्स का? राजनैतिक दलों के नेताओं का?


रघु: फिर भी कानून की किताबें उन्हें रास्ता तो दिखती हैं…


अर्जुन : हाँ, लेकिन किताबों की अपनी सीमा है और मीडिया पर लगाम नहीं है।


रघु (गंभीर स्वर में)सुधार किताबों से नहीं होता... बदलाव उस क्षण से आता है जब कोई कैदी अपने अंदर की जेल तोड़ने का साहस करता है।

 

(एक पल का मौन — फिर एक भारी दरवाज़ा खुलता है। प्रकाश थोड़ा बढ़ता है।)


देवकांत (जेलर) प्रवेश करते हैं। कठोर चेहरा, तेज़ आँखें, साथ में दो सिपाही हाथों में बेड़ियाँ उठाए हुए।) : यहाँ विचार नहीं — अनुशासन की अनुमति है। तुम दोनों सुधारक नहीं, कैदी हो। और सुधार यहाँ नियमों से होता है, मन से नहीं।


रघु (देखकर व्यंग्य से मुसकुराता है।): आ गए जेलर साहब? आपको भी न चैन नहीं। मैंने कहा था घर जाकर...


( धड़ाक से जेलर का एक घूंसा रघु के चेहरे पर पड़ता है। रघु गिर पड़ता है।)


जेलर (दहाडकर): डाल दो साले को बेड़ियाँ। जुलूस निकालो साले का और फेंक दो काल कोठरी में।


अर्जुन (दूसरी ओर से चिल्लाकर): जाने दीजिए साहब। पागल है, बूढ़ा है।


जेलर: बूढ़ा है... बूढ़ा है तो साला क्या मेरे सिर पर मूतेगा?


अर्जुन: दया कर दीजिए साहब! मर जाएगा साला, दया कर दीजिए...


जेलर: दया से अनुशासन स्थापित नहीं होता। मुझे सिर्फ अनुशासन चाहिए, अनुशासन...


(अचानक जेलर चौंकता है। जेलर की यही आवाज़ नेपथ्य से गूंज उठती है।)


दया से अनुशासन स्थापित नहीं होता। मुझे सिर्फ अनुशासन चाहिए, अनुशासन...

(साथ में एक और आवाज़...)

दया कीजिए पापा दया कीजिए...

(जवाब में फिर वही आवाज़)

दया से अनुशासन स्थापित नहीं होता। मुझे सिर्फ अनुशासन चाहिए, अनुशासन...


( जेलर घबराकर कान बंद कर लेता है। सिर पकड़ लेता है। सभी उसे हैरानी से देखते हैं।)


जेलर: चेतन... चेतन... (चिल्लाते हुए बाहर भाग जाता है। दोनों गार्ड भी उसके पीछे भागते हैं। रघु हैरानी से देखता रह जाता है।)


--दृश्य समाप्त--


दृश्य 2 - अतीत की परतें


स्थान- जेलर का घर। बिस्तर स्टेज के मध्य में ।  


प्रकाश: हल्का नीला प्रकाश या सफेद माध्यम प्रकाश बिस्तर और उसके आसपास फैला है बाकी क्षेत्र अंधेरा सा है।


ध्वनि: सीलिंग फैन के धीमी रफ्तार में चलने की आवाज़ के साथ बीमार जेलर की भारी साँसों की एकाध आवाज़।

 

 

(जेलर बिस्तर पर पड़ा हुआ है। जेलर की पत्नी माला जेलर के माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रख रही है। )


माला (अपने आप से, आवाज़ में परेशानी और चिड़चिड़ाहट दोनों है): बुखार है कि उतारने का नाम ही नहीं ले रहा। मना किया था रात में निरीक्षण पर जाने के लिए। लेकिन मानेंगे थोड़ी। जाने काम का कैसा जुनून सवार है? अब आकर बुखार में बेहोश पड़े हैं...


(अचानक जेलर चीखकर बिस्तर से उठकर भागने लगता है।)


जेलर: चेतन... चेतन...


(माला, उसे पकड़कर बलात बिस्तर पर लिटाने की कोशिश करती है।)


माला: नहीं है चेतन! अब कभी नहीं आएगा वह। क्यों अपने आप को हलाकान कर रहे हो?


(माला रोने लगती है।)


जेलर (बड़बड़ाते हुए): नहीं आएगा चेतन... अब कभी नहीं आएगा चेतन... अनुशासन... अनुशासन...(रोने लगता है।)

माला! माला! मुझे क्या हो गया है माला? माला मैं इनसान हूँ या नहीं?... बताओ माला, मैं इनसान भी हूँ या नहीं?

( माला कुछ नहीं कहती। वह रोती हुई चली जाती है।)

माला वापस आओ... वापस आओ। माला मैं ऐसा तो नहीं था... मैं ऐसा तो नहीं था। तुम तो मुझे कॉलेज के दिनों से जानती हो न माला? बताओ... बताओ न माला...


माला ( सिर्फ आवाज़, सिसकती हुई): मैंने जिस देवकांत को प्यार किया था वह तुम नहीं हो। मेरा देवकांत तो लोगों को बदलना चाहता था। सिर्फ दिलों के बदलने में विश्वास करता था। वह तो दुनिया बदलना चाहता था। सिर्फ समझाइश से न कि अनुशासन से...


देवकान्त: माला तुम भी?


माला (गुस्से में सामने आती है) : हाँ, मैं भी। मैं कभी कुछ नहीं कहती लेकिन तुम मेरे सामने कभी चेतन का नाम मत लिया करो। मेरी आत्मा कलपती है।


देवकान्त: आत्मा तो मेरी भी छटपटाती है।


माला: तो छटपटाओ। यही तुम्हारी तकदीर में लिखा है।


देवकान्त (माला को दोनों हाथों में थामकर ): माला! काम से काम तुम तो इतनी निर्दयी न बनो।


माला: क्यों न बनूँ? आज तुम्हारे कारण मेरा बेटा मेरे पास नहीं है।

देवकान्त: वह मेरा भी बेटा है।


माला: नहीं। तुम उसके पिता नहीं हो सकते। तुम तो किसी के पिता नहीं हो। तुम तो सिर्फ जेलर हो जेलर। तुम्हारे दिल में प्यार नहीं सिर्फ अनुशासन है अनुशासन। बल्कि जब से तुमने वर्दी पहनी है तुम्हारे अंदर की सारी संवेदनाएं मर गई है। तुम्हें एक बच्चे की मासूमियत नहीं दिखी सिर्फ अनुशासनहीनता ही दिखी।

देवकान्त: माला, मैं उसका दुश्मन नहीं था।


माला: तुम तो अपने आप के भी दुश्मन हो। तुमने अपने आप के साथ क्या किया? तुमने तो खुद के अंदर के उस देवकान्त को भी मार दिया जिससे मैं प्यार करती थी।


देवकान्त( तड़पकर): मैं अब भी तुमसे...


माला: चुप हो जाओ। झूठ मत बोलो। ...तुम आज कुछ मत कहो। सो जाओ तुम्हें बुखार है।


देवकान्त: यह बुखार नहीं है…


माला(बात काटकर): शी sss… मत बोलो। मैं विनती करती हूँ। तुम्हारी तबीयत वैसे ही खराब है। बेकार में झगड़ा बढ़ाने से क्या फायदा?

(देवकान्त को जबरदस्ती बिस्तर पर लिटाकर दवाई देती है) इसे खा लो। बुखार उतार जाएगा। मैं ठंडे पानी की पट्टी रख रही हूँ।


देवकान्त(टैबलेट खाकर पानी पीते हुए): इससे बुखार नहीं उतरेगा।


माला: सो जाओ।

(देवकान्त के माथे पर पट्टियाँ रखने लगती है। खामोशी। पंखे के घूमने की आवाज़। )


देवकान्त (एक समय के अंतराल बाद): माला?


माला: हूँ?


देवकान्त: तुमसे बात करता है?


माला (उठकर दूर चली जाती है। चेहरा दूसरी तरफ फेर लेती है, मानो कुछ छिपा रही है।): क्यों अपने आप को जला रहे हो? वह नहीं आएगा।


देवकान्त: यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है।


माला: तुम्हारा सवाल असल में यही है। तुम संभावना तलाशना चाहते हो उसकी वापसी की तो सुन लो वह नहीं आएगा। उसने मेहनत मजदूरी की। भीख मांगकर भी खाया। सड़कों पर सोया लेकिन वापस नहीं लौटा। उसका कसूर क्या था? तुम्हारा बेटा था। तुम्हारे जैसा विचारवान, ऊर्जावान। लेकिन वह एक जेलर नहीं था। कलाकार था। कल्पनाशील, संवेदनशील, रचनात्मक। ऐसे लोग कहाँ अनुशासित रह सकते हैं? उनकी कल्पना, उनकी संवेदना, उनकी रचनात्मकता उन्हें चैन नहीं लेने देती। एक कलाकार से आप कैसे अनुशासन की उम्मीद रख सकते हो? वह तो सोते-सोते जाग जाता था। वह खाना छोड़कर अपने काम में जुट जाता था। वह भूख प्यास भूल जाता था। उसके अंदर आग थी। वह भी शायद इस दुनिया को बदलना चाहता था...

(कमरे से बाहर जाती है। लौटती है तो उसके हाथ में कुछ पेंटिंग्स और एक डायरी है।)

तुम उसके पिता थे। तुमने कभी उसके पास बैठकर, हतप्रभ होकर उसके विचार सुने? उसकी आँखों में झांका? उससे छुपकर उसकी डायरी पढ़ने की कोशिश की? उसके बनाए चित्रों के रंगों की गहराई को समझा?

(बाकी पेंटिंग से अलग कर एक पेंटिंग दिखाती है।)

यह देखिए उसका खुद का पोर्ट्रेट। इसमें वह सलाखों के पीछे खड़ा है, एक चिराग की तरह जलता हुआ। तुम जानते हो इसका मतलब? वह अपने आप को तुम्हारा बेटा नहीं, तुम्हारा कैदी समझने लगा था।

(देवकान्त माला के हाथ से तस्वीर झपटकर अपने सीने से लगा लेता है। रोने लगता है।)

चेतन... चेतन... लौट आ...


माला: खूब रो लो क्योंकि उसकी जुदाई में आँसू बहाना ही हमारा नसीब है। क्योंकि अब वह कभी वापस नहीं आएगा।  


देवकान्त: वह वापस आएगा माला। वह वापस आएगा।


माला: पिंजरे से छूटा परिंदा और जेल से छूटा कैदी कभी वापस आना नहीं चाहते...

( देवकांत सिर पकड़कर धड़ाम से बिस्तर पर बैठ जाता है। तस्वीर सीने से लगाए रोता है। )

--दृश्य समाप्त--


 दृश्य 3 — क्षमा और स्वीकार

 

स्थान: जेलर का केबिन — देर रात

प्रकाश: टेबल लैम्प की मद्धम रोशनी, कमरे में सन्नाटा

ध्वनि: दूर से एक परिंदा पुकारता है — जैसे समय ठहरा हो

पात्र:

  • देवकांत (जेलर)

  • रघु


(देवकांत केबिन में अकेला बैठा है, मेज़ पर रघु की फाइल खुली है। पास ही अर्जुन की दीवार पर लिखी पंक्ति का प्रिंटआउट रखा है। एक क्षण बाद वह इंटरकॉम उठाता है।)


देवकांत:"रघु को केबिन में लाओ… अकेले।"


(एक गार्ड रघु को थामे हुए अंदर आता है — रघु का चेहरा भावशून्य लेकिन आँखें जिज्ञासु।)


देवकान्त (गार्ड से ): ठीक है, तुम जाओ।


(गार्ड को जैसे समझ नहीं आया। वह झिझकता खड़ा रहता है। देवकान्त उसकी तरफ देखता है।)


देवकान्त ( गार्ड से ): नहीं, कोई प्रॉबलम नहीं तुम जाओ। हाँ, और जब तक मैं न बुलाऊँ कोई अंदर नहीं आना।


(गार्ड अनमने मन से जाता है।)


देवकांत (धीमे स्वर में):बैठो रघु… आज कोई आदेश नहीं है, कोई गुस्सा नहीं… बस एक सवाल है।


रघु (थोड़ा सावधानी से):कैदी के लिए सवाल भी सज़ा की तरह होते हैं, साहब।


देवकांत (हँसी में कड़वाहट):और जेलर के लिए जवाब... अक्सर चुप्पी होते हैं।


(एक क्षण मौन।)


देवकांत:तुमने उस रात जो कहा था… कि जिसके जीवन में कुछ न हो उसे मौत से भी डर नहीं लगता —वो बात मेरे सीने में फँस गई है जैसे कोई पुरानी गोली जो कभी निकाली नहीं गई।


रघु (धीरे से):कभी-कभी इंसान की सबसे गहरी चोट वह होती है जो उसे किसी ने नहीं दी — वह जो उसने अपने आप को दी है।


देवकांत (काँपती आवाज़ में):मैंने चेतन को खोया… अपना बेटा… अपनी सोच… खुद को।वर्दी पहन ली और सोचा शायद भीतर का शोर थम जाएगा।लेकिन तुम लोग — तुम्हारे सवाल, तुम्हारे ज़ख्म — सब मेरे भीतर की दीवारों से टकराने लगे हैं।


(रघु कुछ नहीं कहता — केवल देवकांत की आँखों में देखता है।)


देवकांत (धीरे से):मैं तुमसे माफ़ी नहीं माँग रहा रघु… मैं खुद से माफ़ी माँग रहा हूँ।अगर तुम चाहो तो सुन सकते हो — नहीं चाहो तो जा सकते हो।


रघु (धीरे से मुस्कराते हुए):माफ़ी वह चीज़ है जिसे शब्दों में नहीं, बदलाव में देखा जाता है।अगर आप सच में इंसान हैं… तो अपने भीतर का कैदी मुक्त करिए।


(देवकांत उठता है, अर्जुन की दीवार पर लिखी पंक्ति को देखता है — “विचारों की क्रांति सलाखों में नहीं रुकती।” वह धीरे से उसे उठाकर मेज़ के बीच रखता है।)


देवकान्त: तुम्हें यकीन नहीं होगा रघु लेकिन मैं भी तुम्हारी तरह एक कैदी ही हूँ।


रघु: मैं जानता हूँ साहब। आप और वह गार्ड जो अभी मुझे यहाँ लेकर आया। जो बाहर पहरे पर खड़े हैं, जो वाच टॉवर पर हैं, सब कैदी हैं। आप लोगों की ज़िंदगी में और है क्या जेल और कैदियों के सिवाय?


देवकान्त: हाँ, हम सब अपनी अपनी सीमाओं में कैद हैं; लेकिन एक फर्क है...


रघु (बात काटते हुए ): हाँ, आप घर जा सकते हैं, हम नहीं जा सकते।


देवकान्त: हाँ, लेकिन इसके अलावा... यह कैद हमारी खुद का चुना हुआ विकल्प है।


रघु: पेट के लिए?


देवकान्त: हाँ, ऐसा कह सकते हो। मैं भी पहले ऐसा ही समझता था। लेकिन यह इसके अलावा भी कुछ और है। अहंकार... अपनी श्रेष्ठता साबित करने की चाह। शायद सत्ता की चाह। हर मनुष्य अपनी चेतना या अचेतना में दूसरों पर श्रेष्ठता हासिल करने का, दूसरों पर शासन करने का भाव रखता है। लेकिन मनुष्य शासित होने के लिए नहीं बना है। वह कोई पालतू कुत्ता या पालतू शेर नहीं है। उसे ईश्वर ने अपना प्रतिनिधि बनाकर धरती पर उतारा है।

वह व्यवस्था बनाए रखने के लिए धरती पर आया है न कि एक दूसरे पर शासन करने या शासित होने के लिए। हम शासन करते या शासित होते हैं तो अपने ही मालिक अपने परमेश्वर का अपमान करते हैं; क्योंकि वही हमारा शासक है, वही स्वामी है।

एक समय था जब मैं कॉलेज में था। मैं कहा करता था कि हमारे समाज को शासन प्रशासन की ज़रूरत नहीं है अगर हम सब एक दूसरे का खयाल रखें, एक दूसरे की सीमाओं को और एक दूसरे की जरूरतों को समझें। हमें सिर्फ समझदारी की ज़रूरत है। सिर्फ सामाजिक चेतना की, न कि पुलिस और प्रशासन की... हम खुद सक्षम हैं अपने मामले निपटाने में...

मेरे अंदर आग थी। सब सोचते थे कि मैं एक दिन दुनिया को बदल दूंगा। लेकिन मैंने खुद को ही बदल लिया और अपने सिवा किसी को नहीं बदला...


(रघु आगे बढ़ाकर सहानुभूति जताते हुए जेलर के कंधे पर हाथ रखता है। जेलर उसके हाथ पर अपना हाथ रखता है।)


(एक मौन सहमति ।)


(प्रकाश धीरे-धीरे बुझने लगता है)

--दृश्य समाप्त--


 


दृश्य 4. तूफान और चिराग (रघु और अर्जुन का वार्तालाप)

 

(जगह जेल में रघु की बैरक। गार्ड रघु को लाकर उसकी बैरक में ढकेल देता है।)


अर्जुन (व्यंग्य पूर्वक): क्या बात है अपने पैरों पर चलकर आ रहे हो? चार कंधे नहीं मिले या सालों के हाथ टूट गए?


रघु: अर्जुन... मैं जीना चाहता हूँ।


अर्जुन(आश्चर्य से): क्या कहा?


रघु: हाँ अर्जुन, सही सुना तुमने। मैं कुछ दिन जीना चाहता हूँ।


अर्जुन: और तुम्हारे वह गालिब चाचा का क्या होगा जो दिन रात कहते रहते-

कोई उम्मीद बर नहीं आती

कोई सूरत नज़र नहीं आती...


रघु: अंधेरी रात के सफर में कहीं दूर अगर रौशनी की एक हल्की सी किरण भी नज़र आ जाए तो मुसाफिर ठहरने की नहीं सोचता। भले तेज़ आंधियाँ हो, उस चिराग के बुझ जाने का खतरा हो... जब तक चिराग टिमटिमाता रहता है; मुसाफिर ठहरता नहीं है।


अर्जुन(व्यंग्य से): यह कौन सा चिराग दिखा दिया जेलर ने? वह तो तुम्हें काल कोठरी में ढकेलने वाला था।


रघु: पता नहीं अर्जुन, जो कुछ आज मैंने देखा उस पर यकीन नहीं होता। लेकिन मन के किसी कोने से आवाज़ आती है- यकीन कर ले।


अर्जुन( बेज़ार होकर): ऐसा क्या देख आए जो पहेलियाँ बुझा रहे हो?


रघु: पता नहीं वह धोखा था... या कि दुनिया सचमुच बदल रही है अर्जुन?


अर्जुन: दुनिया तो हर पल बदलती रहती है। बदलना तो प्रकृति का नियम है; लेकिन धोखा भी शाश्वत सत्य है।


रघु: लेकिन धोखा अगर जीने की उम्मीद जगाता हो?


अर्जुन: तो धोखा खा लेना चाहिए।


रघु: ठीक है फिर मैं उस टिमटिमाते चिराग की ओर सफर जारी रखना चाहता हूँ।


अर्जुन: वह कौन सा चिराग है, मुझे भी तो दिखाओ। शायद हमारी ज़िंदगी में भी रौशनी आ जाए।


रघु: वह चिराग तो मैं तुम्हें दिखा दूँ लेकिन सावधान! बहुत बड़ा तूफान आने वाला है। चिराग बुझ भी सकता है।


अर्जुन: यह भी तो हो सकता है कोई उस चिराग को फिर से रौशन कर दे और सफर जारी रहे?


--दृश्य समाप्त--

दृश्य 5. प्रस्ताव और विवाद

 

(जेल के कॉन्फ्रेंस हाल का दृश्य। एक डेस्कटॉप और एक प्रोजेक्टर। प्रोजेक्टर ऑन है। एक मेज के इर्द-गिर्द कुछ अधिकारी बैठे हैं। जेलर देवकान्त खड़ा, प्रेजेंटेशन दे रहा है। प्रोजेक्टर बंद करके अधिकारीगण की ओर देखता है। )

 

देवकान्त: तो सर यही था मेरा प्रपोज़ल।

(थोड़ी देर सन्नाटा रहता है फिर एक सीनियर अधिकारी उठता है। )


अधिकारी 1.: तो यह था आपका प्रपोज़ल?


देवकान्त (आशंका और उत्सुकता के मिले जुले स्वर में): जी सर।


अधिकारी 1.: और आप समझते हैं हम इसे आगे बढ़ाएंगे? यह सो कॉल्ड मूल्य शाला और जाने क्या...


देवकान्त: सर यह एक बड़ा सुधार होगा और सारी दुनिया हमारा अनुसरण करेगी।


(अधिकारी 1 कुछ कहना चाहता है अधिकारी 2 उसे इशारे से रोकता है और खुद देवकान्त से बात करता है। )


अधिकारी 2: आप कहना क्या चाहते हैं ऑफिसर? आप कुछ सुधार वगैरह की बात कर रहे थे?


देवकान्त: हाँ सर! मेरा यह मानना है कि...


अधिकारी 2 (देवकान्त की बात काटते हुए ): आपका मानना है कि अब आप जेलर नहीं कोई क्रांतिकारी हैं? आप यहाँ के जेलर हैं और यहाँ अनुशासन बनाए रखना आपकी ड्यूटी है। कैसे रखना है यह आपकी मर्ज़ी है।


देवकान्त: एक सवाल है सर। अनुशासन पर ही इतना ज़ोर क्यों?


अधिकारी 2: क्योंकि यही सीखने की इन्हें जरूरत है। इन्हें अनुशासन आता तो वे यहाँ आते क्या?


देवकान्त: माफ करें सर वे अनुशासन हीनता के लिए यहाँ नहीं हैं। मानव मूल्यों के ज्ञान के अभाव में वे यहाँ हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें किसी न किसी बदकिस्मती की वजह से मानव मूल्य और सामाजिक मूल्यों की शिक्षा नहीं मिल सकी इसलिए उनसे अपराध हुए। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनकी यह समस्या नहीं थी लेकिन उनकी परिस्थितियों ने उनके लिए दूसरा विकल्प ही नहीं छोड़ा था। दरअसल उनसे जुड़े लोगों के पास इन मूल्यों का ज्ञान नहीं था... इनफैक्ट मैं तो कहूँगा सर कि हमारे बीच भी इन मूल्यों के ज्ञान की कमी है लेकिन हम खुशकिस्मत हैं कि हम यहाँ हैं और वे वहाँ...


अधिकारी 1  (गुस्से में लाल पीला होते हुए खड़ा होता है ): तुम यह कहना चाहते हो कि हम अपराधी हैं? या यह कहना चाहते हो कि वे हमसे बेहतर हैं?


देवकान्त: नहीं सर। यह दोनों बातें, मेरी बात का मतलब नहीं हैं। मैं तो यह कहना चाह रहा हूँ कि इन मूल्यों की समझ की ज़रूरत हर जगह है; इस जेल की चहारदीवारी के अंदर भी और बाहर भी।


अधिकारी 3: तो फिर यह समाज सुधार का काम आप इस चहारदीवारी के बाहर करो न। यहाँ वही काम करो जिसके लिए तुम्हें रक्खा गया है।


देवकान्त: सर, बाहर तो बहुत से लोग इस काम को कर लेंगे लेकिन अंदर? यहाँ तो हमें ही इस काम का जिम्मा लेना होगा न?


अधिकारी 3: मैं नहीं जानता ऑफिसर आपके दिमाग में क्या चल रहा है लेकिन अगर आप कानून के दायरे में रहकर कोई अच्छा काम करना चाहते हैं तो मुझे एतराज नहीं है।  


अधिकारी 1: लेकिन मुझे एतराज है।


अधिकारी 2: और मुझे भी। सर आपने यह पढ़ा है?(एक रजिस्टर नुमा फाईल उठाकर दिखाता है।) इसमें सिर्फ अराजकता वादी सिद्धांत है। यह कहते हैं कि दुनिया में जेलों की ज़रूरत नहीं है। इन्हें लगता है कि दुनिया में जेलें सिर्फ ह्यूमन राइट्स का वायलेशन है।


अधिकारी 3: ऑफीसर देवकान्त, इज़ इट ट्रू ?


देवकान्त: मैं समझाता हूँ सर...


अधिकारी 3: इज इट ट्रू ऑर फाल्स?


देवकान्त( धीमे स्वर में सिर झुकाकर।): ट्रू सर।


अधिकारी 3: इट इज वेरी डेंजर। ऑफीसर देवकान्त, मैं आपको अपने मन से करने के लिए किसी भी नए काम की परमीशन नहीं दे सकता। आप यहाँ वही करेंगे जो आपको कहा जाए। वही करेंगे जिसके लिए आपको रखा गया है। फाइनल हो गया।


देवकान्त: जैसा आप चाहेंगे वैसा ही होगा सर।


अधिकारी 3: इट’स गुड! अब चलें?(अधिकारी 1 और 2 की तरफ देखकर कहता है। तीनों जाते हैं। देवकान्त ठगा सा खड़ा है।)


देवकान्त (अचानक): वन मिनट सर। (तीनों रुकते हैं। पीछे मुड़कर देखते हैं) आपका हुक्म सर आँखों पर सर। लेकिन मुझपर जो इल्ज़ाम लगा है उसपर सफाई देना मेरा अधिकार है।


(तीनों रुककर देवकान्त की तरफ देखते हैं।)


देवकान्त: यह सच है सर मैंने कहा है कि दुनिया में जेलों की ज़रूरत नहीं है। जरा सोचिए सर, सब लोगों में अगर सामाजिक चेतना हो, जीवन मूल्यों का, मानव मूल्यों का ज्ञान होगा तो लोग एक दूसरे की सीमाओं का सम्मान करेंगे, एक दूसरे के विचारों का सम्मान करेंगे। एक दूसरे का हक नहीं मारेंगे। एक दूसरे से सहयोग करेंगे और अपने मामले आपस में बात करके तय करेंगे तो पुलिस और जेलों की ज़रूरत ही क्या रह जाएगी। वैसे भी तो यह सब हमारे समाज हमारी व्यवस्था और अर्थ व्यवस्था पर बोझ ही है क्योंकि हम इस व्यवस्था की स्थापना की शताब्दियों बाद भी अपराधमुक्त समाज की स्थापना नहीं कर सके। कैसे हासिल करेंगे आप यह लक्ष्य जबकि यहाँ छोटी-मोटी गलती करके लोग आते हैं और अपराधियों की संगत में अपराध सीखकर जाते हैं। गुनाहगार, बेगुनाह, सजायाफ्ता, अंडर ट्रायल लोगों से जेलें भारी पड़ी हैं। अपनी क्षमता से कई-कई गुना बोझ उठा रही हैं जेलें और अदालतों पर फैसलों का बोझ बढ़ता ही जा रहा है। और इस सबके मेंटेनेंस के बोझ से देश के करदाता पर बोझ बढ़ता जा रहा है... कुल मिलाकर यह व्यवस्था चरमरा रही है...


अधिकारी 3: और जो तुम यह इल्ज़ाम लगा रहे हो कि हमारी जेलें ह्यूमन राइट्स का वायलेशन...


देवकान्त: सॉरी सर, मैंने हमारी जेलें नहीं दुनिया की हर जेल कहा। सर हमारे रचयिता ने तो मानव मात्र को स्वतंत्र पैदा किया है। इनसान समाज में अपनी भूमिका निभाने आया है न कि दुनिया और समाज से अलग-थलग रहने के लिए। फिर अगर एक व्यक्ति अपराध करता है तो उसे उसके परिवार से अलग करके हम सारे परिवार को किस बात की सजा देते हैं। किसी बच्चे को बाप से किसी को माँ से और किसी बुजुर्ग को उसके बुढ़ापे की लाठी से अलग करके हम किस बात की सज़ा देते हैं। समाज से अलग करके हम सिर्फ एक परिवार ही नहीं बल्कि देश का भी नुकसान करते हैं क्योंकि हर मानव उस देश का एसेट होता है। मानव संसाधन होता है।


अधिकारी 2: देखा सर? ये चाहते हैं कि हम समाज में अपराधियों को खुला घूमने दें...


देवकान्त: क्यों खुला घूमने दें? और कौन से अपराधी? मैं तो अपराधमुक्त समाज की स्थापना के  लक्ष्य की बात कर रहा हूँ...


(अधिकारी गण उसकी उपेक्षा करके जाने लगते हैं। वह पीछे से आवाज़ देता हुआ उनके पास जाता है। )


आप ऐसे आसानी से जा सकते हैं क्योंकि आपने वे नज़ारे नहीं देखे हैं न? वे नन्हें अनाथ बच्चे जिनकी माँ नहीं है और बाप जेल में है... जिनका बाप नहीं और माँ जेल में है। जब उनकी मुलाकात होती है और एक दूसरे को गले लगाने के लिए एक दूसरे को छूने के लिए छटपटाते देखा है आपने? उन्हें कांच की दीवारों से चिपकाकर और लोहे की सलाखों से लिपटकर रोते देखा है आपने? झुकी हुई कमर और बुझी हुई आँखें लेकर भीख मांगने वाले बूढ़े माँ बाप को अपने बुढ़ापे के सहारे को जेल में मुलाकात करते हुए देखा है आपने?... कलेजा कट जाता है सर! मन करता है अपनी आहों से लोहे की सलाखों को गला दूँ। या लात मारकर हर दीवार गिरा दूँ। या शर्म से डूब मरूं...


(वे उपेक्षा करके जाने लगते हैं। देवकान्त अपने आप से)


दिल पत्थर हो गया है। वर्दी के अंदर इंसान मर गया है। संवेदनाएं खत्म हो चुकी हैं। अब वर्दी के अंदर इनसान नहीं सिर्फ सिस्टम का एक मोहरा रह गया है। क्या यह अपराध नहीं है?


(पर्दा गिरता है।)


---दृश्य समाप्त---


दृश्य 6 — अंत और शुरुआत


स्थान: रघु और अर्जुन की बैरक  

प्रकाश: जेल की हल्की पीली रोशनी,

दीवार पर पेंट से लिखी पंक्ति — विचारों की क्रांति सलाखों में नहीं रुकती।

ध्वनि: बैकग्राउंड में धीमी आवाज़ — एक सज़ा का घोषणा-पत्र पढ़ा जा रहा है, फिर कोठरी की कुंडी खुलने की ध्वनि


(देवकांत कैदी के लिबास में प्रवेश करता है — चेहरे पर गहरी राहत, आँखों में हल्की मुस्कान।)


बैकग्राउंड में उद्घोषणा के स्वर- देवकान्त आप को एक महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए, राज्य के खिलाफ युद्ध और षड्यन्त्र और इसके लिए अपने पद के दुरुपयोग के आरोप लगे और इन्हें जांच में भी सही पाया गया है। इसलिए आपको अपने पद से तुरंत प्रभाव से हटाकर हिरासत में लिया जाता है।

रघु, अर्जुन और दूसरे कैदी सलाखों के पास खड़े होकर देवकान्त का कैदी के लिबास में आना देख रहे हैं। चेहरों पर उत्सुकता और मायूसी साथ-साथ है। )


रघु: अर्जुन, मेरा डर सही निकाला। मैंने कहा था कि बहुत बड़ा तूफान आने वाला है। चिराग बुझ भी सकता है। ( देवकान्त से ) मुझे इसी बात का डर था जेलर साहब! 


देवकांत (शांत स्वर में):"अब मैं जेलर नहीं हूँ... एक कैदी हूँ तुम्हारी तरह।


अर्जुन: मुझे अफसोस है जेलर साहब कि हमारे लिए...


देवकांत (शांत स्वर में):लेकिन मुझे अफसोस नहीं है। अब तक मैं अपनी वर्दी, अपनी नौकरी और अपनी सुविधाओं की कैद में था और आज मैं आजाद हुआ हूँ। आज पहली बार अपनी आत्मा को  सारे बोझ और दबावों से मुक्त पाकर राहत महसूस कर रहा हूँ।


( रघु, अर्जुन और अन्य कैदी तालियाँ बजाते हैं। )


सभी कैदी (उत्साह में):"जेलर साहब ज़िन्दाबाद!""सोच की ज़ंजीरों से आज़ादी ज़िन्दाबाद!"


देवकान्त:अब हम यहाँ अपनी मूल्यों की शाला शुरू कर सकते हैं —जहाँ सज़ा नहीं, समझ पैदा होगी… जहाँ नियम नहीं, विवेक बोलेगा।


(कैदी एक स्वर में हामी भरते हैं — हाँ, हाँ, बिल्कुल, बिल्कुल)


देवकांत (गंभीर स्वर में):लेकिन सुनो। हमें रोकने की कोशिश जरूर होगी। लेकिन हमें इस क्रांति की लौ को बुझाने नहीं देना है। और सब को याद रखना है कि हम सिर्फ अपने लिए या किसी एक देश की  मुक्ति लिए संघर्ष नहीं कर रहे हैं बल्कि सारी मानव जाति की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अगर मुझे अलग फेंक दिया जाए...तो इस शाला की कमान पहले रघु सम्हाले, इन्हें भी हटाया गया तो फिर अर्जुन और फिर आप सभी को बारी-बारी से सम्हालनी होगी।अगर हमें अलग-अलग जेलों में शिफ्ट कर दिया जाए — तो हम में से हर कोई जहाँ जाएगा वहाँ इस चिराग को जलाएगा।यह विचार हमारी थाती है — इसे किसी कीमत पर बुझने नहीं देंगे। एक दिन सारी दुनिया हमारे संघर्ष में शामिल होगी।


सभी कैदी:हां साहब! हम इसे आगे बढ़ाएँगे!


देवकान्त: दुनिया में हर एक को आजाद रहने का, अपनी तरह से जीने का अधिकार होना चाहिए। इसमें किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। और अब जबकि हमने सारी दुनिया को जेल और सजा के चक्रव्यूह से बाहर निकालने का बीड़ा उठाया है तो दोस्तों हमें भी एक बात याद रखनी होगी कि आजादी की भी एक कीमत होती है और वह कीमत है दूसरों की आजादी का सम्मान। इसके बिना हम यह लक्ष्य हासिल नहीं कर सकते।


(एक पल सन्नाटा। तभी एक नवयुवक जेलर का प्रवेश — वर्दी में, युवा उत्साह और चेहरे पर वही रौब जो कभी देवकान्त के चेहरे पर नजर आता था।)


नवयुवक जेलर (हल्की मुस्कान के साथ):तो… मूल्यों की शाला शुरू हो गई है?


(सभी चौंककर घबरा जाते हैं। चुप हो जाते हैं। दीवार पर लिखी इबारत को खास व्यंग्यात्मक लहजे में पढ़ता है-)


नवयुवक जेलर (आगे बढ़कर):विचारों की क्रांति सलाखों से नहीं रुकती। ( थोड़ा ठहरकर बारी-बारी सबके चेहरे पर नज़र डालता है।)अब आप लोग मेरी जेल में हैं। ( देवकान्त की तरफ देखकर सैल्यूट करता है। )और सर, मुझे आपके बारे में विशेष निर्देश मिले हैं — और आप पर नज़र रखने और विशेष सावधानियाँ बरतने की हिदायत दी गई है।

 

देवकांत ( उसे सशंकित नज़र से देखते हुए सैल्यूट का उत्तर देते हुए):अब मैं जेलर नहीं हूँ...


नवयुवक जेलर:जानता हूँ। आपकी फाईल पढ़ी है। लेकिन मुझे लगता है सर कि हम दोनों एक जैसे हैं...

( अचानक वह चुप होकर देवकान्त के चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश करता है। देवकान्त उसकी बात से सशंकित हो उसे घूरता है।) लेकिन एक फर्क है...


देवकांत (सशंकित भाव से):क्या?

वयुवक जेलर:जब आप जेलर बने थे… तब आपको गाइड करने वाला कोई सीनियर नहीं था।लेकिन मेरे पास आप हैं। मैं... (इधर उधर देखकर ) आपके साथ हूँ लेकिन आप मेरी सीमाएं अच्छी तरह जानते हैं सर। मैं बस इतना कर सकता हूँ कि आँखें मूँद लूँ ...


(जाने के लिए मुड़ता है फिर अचानक जैसे कुछ याद आया हो... )

अरे हाँ सर, आपकी एक मुलाकात है।


देवकान्त: माला?


नया जेलर: अरे अब ले आओ भाई...


(एक सिपाही के साथ एक नौजवान का प्रवेश।)


देवकान्त : चेतन...?


(दौड़कर सलाखों से बाहर हाथ निकालता है। लड़ाका भी दौड़कर सलाखों से लिपट जाता है। नए जेलर के इशारे पर सिपाही बैरक का दरवाजा खोल देता है। बाप बेटे लिपटकर रोते हैं। बाकी लोग खुशी से ताली बजाते हैं। ) 


( नया जेलर तेजी से मुड़कर बाहर जाता है। सब उसे हैरानी से देखते हैं। वह अचानक रुकता है। मुड़कर कैदियों की तरफ देखता है फिर मुंह पर उंगली रखकर रहस्यमयी ढंग से कहता है-)

शी sss, ध्यान रहे दीवारों के भी कान होते हैं...

( इबारत लिखी दीवार की तरफ इशारा कर चला जाता है। )

(एक गहरी मौन। अर्जुन धीरे से लंबी साँस लेकर कहता है)


अर्जुन:मैंने कहा था, हो सकता है कोई और उस चिराग को दुबारा रौशन कर दे।

(प्रकाश धीरे-धीरे मंद होता है -- बैकग्राउंड में दीवार पर वही वाक्य चमकने लगता है —)

"विचारों की क्रांति सलाखों में नहीं रुकती।"



पर्दा गिरता है।


लेखक - मिर्ज़ा हफ़ीज़ बेग

अपने बारे मे. . .

अपने बारे मे मै क्या लिखूं? मैं कभी समझ नही पाता हूँ, और शायद इसी लिए मै कहानियाँ लिखता हूँ ; और इन्हीं मे अपने आप को तलाशता हूं । मै इनसे अलग हूं भी नही, फिर अलग से क्या कहूँ. . . . यह उन दिनों की बातें हैं, जब दिन सुनहरे हुआ करते और आसमान नीला । बिल्कुल साफ शफ्फाक । मै एक विशिष्ट शहर भिलाई का रहने वाला हूं; और भिलाई के ऊपर उन दिनो आसमान बिलकुल खुला खुला सा हुआ करता, और इसके दक्षिण में क्षितिज पर एक तसवीर थी बहुत सारी चिमनियों और कुछ विचित्र आकृतियों की । वे रहस्यमयी चिमनियां , अकसर बहुत सारा गाढ़ा गाढ़ा धुआँ उगलती । कभी दूध सा उजला सफेद, कभी गेरुआ लाल जिसके बारे मे मुझे लगता कि उस सफेद धुयें मे ही ईट पीसकर मिला देते होंगे और कभी काला धुआँ, जो मै सोचता कि ज़रूर, चिमनी के नीचे डामर(कोलतार) जलाया जारहा होगा जैसे सङक पर बिछाने के लिए जलाते हैं । "वो क्या है?" मै पूछता । "वो कारखाना है ।" दादा दादी बताया करते "तेरे अब्बा वहीं काम करते हैं ।" मेरे अब्बा एक विशिष्ट इनसान थे, वे अथक संघर्षशील, मृदुभाषी और मुस्कुराकर बात करने वाले थे । उन जैसा दूसरा इनसान मैने दूसरा नही देखा । वे जहाँ जाते लोग उनसे प्यार करने लगते । उनके व्यक्तित्व मे जादू था । जादू तो उन रातों का भी कम न था, जब अंधेरे के दामन पर जगह पुराने दौर के बिजली के लैम्प पोस्ट के नीचे धुंधली पीली रौशनी के धब्बे पङ जाते । जब कोई चीज उन धब्बों से होकर गुज़रती तो नज़र आने लगती और बाहर होती तो गायब होजाती । एक और जादू आवाज़ का होता । रात की खामोशी पर कुछ रहस्यमयी आवाज़ें तैरती . . . . जैसे - ए विविध भारती है. . . या हवा महल. . . . और बिनाका गीतमाला की सिग्नेचर ट्यून या अमीन सयानी की खनकती शानदार आवाज़ । ये आवाज़ें रेडियो से निकलती और हर खास ओ आम के ज़हन पर तारी हो जाती । मेरे खयाल से उन बङे बङे डिब्बों (रेडियो) मे छोटे छोटे लोग कैद थे जो बिजली का करंट लगने पर बोलने और गाने लगते । और उन्हें देखने के लिये मै रेडियो मे झांकता और डाट खाता कि- करंट लग जायेगा । अब्बा जब रेडियो को पीछे से खोलकर सफाई या और कोई काम करते तो मै उसमे अपना सिर घुसाकर जानने की कोशिश करता कि वे छोटे छोटे लोग किस जगह होंगे , एकाध बार मै रहस्योदघाटन के बिलकुल करीब पहुँच भी गया लेकिन हर बार अब्बा डाटकर भगा देते । क्या अब्बा को यह राज़ मालूम था ? मै अब तक नही जान पाया । किसी रात जब हम बाहर सोते तो आसमान पर अनगिनत तारों को मै गिनने की कोशिश करता । ठीक है वे अनगिनत हैं , फिर भी इनकी कोई तादाद तो होगी । मै उन्हे गिनकर दुनिया को उनकी तादाद बता दूंगा, फिर कोई नही कहेगा कि आसमान मे अनगिनत तारे होते हैं । अफसोस !! हर बार मुझे नींद आ जाती और मै यह काम अब तक पूरा नही कर पाया और अब तो शहर के आसमान पर गिनती के तारे होते हैँ, जिन्हें ढूँढ ढूँढ कर गिनना पङता है ; लेकिन लोग अब भी यही कहते हैं कि आसमान में अनगिनत तारे हैं । खैर! रातें जब सर्दी की होतीं, हम दादा दादी के साथ अपनी बाङी मे छोटी सी आग जलाकर आग तापते आस पङोस के और बच्चे भी आ जाते और दादा दादी की कहानियों का दौर शुरू हो जाता । दादी के पास उमर अय्यार की जम्बिल के नाम से कहानियों का खजाना था और उमर अय्यार मेरा पसंदीदा कैरेक्टर था । कई बार वो मोहम्मद हनीफ की कहानियां भी सुनाती । दादा की कहानियाँ मुख्तलिफ होती और वे मुझे अब भी याद हैं, उन्हें मैने अपने बच्चों को उनके बचपन मे सुनाई । हम बी एस पी के क्वार्टर में रहते जहां हमारे क्वार्टर के पीछे ही गणेशोत्सव होता । जिसमे नाटक, आरकेस्ट्रा जैसे कई आयोजन होते । बस यहीं से नाटक का शौक पैदा हुआ और इसके लिए मैने एक नाटक(एकांकी-प्रहसन) लिखा 'कर्ज़' इसका मंचन हुआ तब मै कक्षा छठवीं मे था । इसके बाद ज़िंदगी मे कई अकस्मिक मोड़ आये जिन्हे बताने के लिये बहुत वक्त और बहुत जगह की दरकार है । तो मुख्तसर मे यही कि नवमी कक्षा मे मै एक साप्ताहिक मे संवाददाता बन गया । दसवीं मे था तब पहली कहानी ‘क ख ग घ …’ प्रकाशित हुई जो जलेस की बैठक मे खूब चर्चा मे आई । तभी रेडिओ से एक कहानी प्रसारित हुई जिसके लिये पहली बार मानदेय प्राप्त हुआ । लेकिन लेखक बनने और दुनिया भर मे घुमते रहने के मेरे सपने ने मेरे घर मे मुझे भारी संकट मे डाल दिया । मेरे अब्बा से मेरे रिश्ते बिगड़ गये, वे चाहते थे कि मै अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर लगाऊं, खूब तालीम हासिल करूं और उसके बाद बी एस पी मे नौकरी करूं । वे मुझसे बहुत ज़्यादह उम्मीद रखते थे और अपने टूटे हुये ख्वाबों को मेरी ज़िंदगी मे साकार होते देखना चाहते थे, तो वे कुछ गलत नही चाहते थे, क्योंकि बेटे की कहानी तो बाप की कहानी का ही विस्तार होती है । लेकिन मेरे अपने अब्बा से रिश्ते बिगड़ गये और यह हाल तब तक रहा जब उस दिन सुबह – सुबह मेरी अम्मी बद हवास सी मुझे जगा रही थी । नींद से जागते ही पता चला मेरे सर से आसमान छिन गया है; सुनते ही मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई । तीन बहन और तीन भाईयों मे सबसे बड़ा बेटा था मै । अब्बा, जो हमेशा मेरी फ़िक्र मे रहते थे और मै यह बात अच्छी तरह जानते हुये भी कभी उनसे कहता नही, उस रात ट्रक एक्सिडेंट मे दुनियां से रुख्सत हुये तो हम दोनो के बीच बातचीत तक बंद थी । मै अपने दिल की बात उन्हे बताना चाहता था लेकिन …… वह हादसा मेरी ज़िंदगी का बड़ा सबक बन गया । अफ़सोस ! ज़िंदगी सबक तो देती है लेकिन उसपर अमल करने के लिये दूसरा मौका नही देती ।

अब मेरे सामने दूसरा विकल्प नहीं था, नौकरी के सिवाय । फ़िर वह वक्त भी आया जब लेखन और नौकरी के बीच एक को चुनना था और निश्चित रूप से मैने चुना नौकरी को । मैने अपना लिखा सारा साहित्य रद्दी मे बेच दिया, अपनी सारी पसंदीदा किताबों का संग्रह भी । मैने अपने अंदर के लेखक की हत्या की और अपने अंदर ही कहीं गहराइयों मे दफ़न कर दिया । मै मुतमईन था कि उस लेखक से पीछा छूटा लेकिन करीबन चौथाई सदी बाद किसीने मुझसे मेरे ही नाम के एक पुराने लेखक का ज़िक्र किया और मै चुप रहा । किस मुंह से कहता कि वह मै ही था । वह दिन बड़ी तड़प के साथ गुज़रा और रात को जनम हुआ एक कहानी का ‘एक लेखक की मौत’ । दरअसल वह एक लेखक के पुनर्जनम की कहानी थी ।

वह लेखक जो आज आपसे रू-ब-रू है …

लेखक से सम्पर्क - zifahazrim@gmail.com

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