कैदी - किश्त 1
- मिर्ज़ा हफ़ीज़ बेग
- 2 दिन पहले
- 5 मिनट पठन
कैदी : जब जेल दीवारों में नहीं, दिमाग़ में होती है
(सम्पादक के 2 शब्द)
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ “अनुशासन” एक पवित्र शब्द बन चुका है।इतना पवित्र कि उसके सामने सवाल पूछना भी अपराध जैसा लगता है। मिर्ज़ा हफ़ीज़ का नाटक ‘कैदी’ इसी पवित्रता को कटघरे में खड़ा करता है।
यह नाटक किसी एक जेल की कहानी नहीं है। यह उस मानसिक संरचना की कथा है जहाँ गलत को दंड देकर हम अपने सही होने का भ्रम पाल लेते हैं।
‘कैदी’ में तीन मुख्य स्वर हैं
एक बूढ़ा कैदी, जो सोचता है
एक युवा कैदी, जो सवाल करता है
और एक जेलर, जो अनुशासन निभाते-निभाते इंसान होना भूल चुका है
लेकिन यह नाटक इन तीनों के टकराव से बड़ा है।असल टकराव वहाँ है जहाँ व्यवस्था और संवेदना आमने-सामने खड़ी होती हैं।
जेल यहाँ सिर्फ़ सलाखों का ढाँचा नहीं है। जेल वह व्यवस्था है जो यह तय करती है कि किसे सुधार की ज़रूरत है और किसे सत्ता संभालने का अधिकार।
नाटक का सबसे असहज क्षण वह नहीं जब कैदी मार खाता है, बल्कि वह है जब जेलर को एहसास होता है कि वर्दी ने उसे भी कैद कर रखा है।
अनुशासन बनाम मानवता - यह द्वंद्व नया नहीं है। लेकिन कैदी इसे नारे में नहीं बदलता। यह इसे अनुभव बनाता है।
यह नाटक यह दावा नहीं करताकि जेलें तुरंत खत्म हो जानी चाहिए। यह उससे ज़्यादा खतरनाक सवाल करता है -
अगर जेलें सचमुच सुधार की जगह होतीं,तो क्या अपराध पीढ़ी दर पीढ़ी चलते?
नाटक के अंत में एक चिराग जलता है। कोई क्रांति नहीं। कोई विजयी घोष नहीं।
बस एक धीमी लौ।
और शायद यही लेखक का सबसे बड़ा साहस है - कि वह उम्मीद को भी शोर से मुक्त रखता है।
‘कैदी’ वायरल होने के लिए नहीं लिखा गया।
यह उन पाठकों के लिए हैजो अब सिर्फ़ खबर नहीं पढ़ते, उसके पीछे की चुप्पी सुनना चाहते हैं।
धन्यवाद
मीरा मालिनी
उप-सम्पादक, ई-कल्पना

अवधि: दृश्य / लगभग 60–75 मिनट
शैली: दार्शनिक नाटक, व्यंग्यात्मक टकराव, सामाजिक आलोचना
स्थान: जेल परिसर, फ्लैशबैक, सभागार और गृहस्थ वातावरण
मुख्य पात्र:
देवकांत (जेलर): एक संवेदनशील व्यक्ति जो व्यवस्था में फंसा है, लेकिन अंततः मानवता के पक्ष में खड़ा होता है
रघु (कैदी): अनुभवों से परिपक्व, दार्शनिक चिंतक, व्यवस्था का व्यंग्यात्मक आलोचक
अर्जुन (युवा कैदी): तेजस्वी, क्रांतिकारी विचारों से युक्त, व्यवस्था पर प्रश्न करने वाला
प्रशासकीय अधिकारीगण: व्यवस्था की कठोरता के प्रतिनिधि
देवकांत का बेटा (फ्लैशबैक में): संवेदनशीलता की स्मृति जो जेलर को मानवता से जोड़े रखती है
माला: देवकान्त की पत्नी
चेतन: देवकान्त का पुत्र
दृश्य 1 — आत्मा की सलाखें
स्थान: जेल की कोठरी
समय: रात का सन्नाटा — दीवारों की दरारें साँस ले रही हैं
पात्र:
रघु: उम्रदराज कैदी, शांत और गंभीर
अर्जुन: युवा कैदी, तेजस्वी और व्यंग्यात्मक
जेलर: नाम देवकान्त। कठोर और अहंकारी
प्रकाश:हल्की टिमटिमाती रोशनी — एक बल्ब जिसकी रोशनी रघु के चेहरे को अधूरा छूती है
ध्वनि:पानी की टपकती बूंदें और दूर खाँसता हुआ कैदी
रघु (मोनोलॉग में) (धीमे स्वर, जैसे दीवार से बात कर रहे हों) ये दीवारें सिर्फ पत्थर नहीं, हर ईंट मेरी एक साँस है। जेल का असली दरवाज़ा वो नहीं जो बंद होता है...वो है जो खुला रहता है, मगर बाहर की दुनिया में लौटने की इजाज़त नहीं देता।यहाँ दिन गुनाह से नहीं, पछतावे से बनते हैं।और रातें... रातें खुद को भूल जाने का अभ्यास हैं।
एक आवाज़ (जेलर देवकांत): खुद को भूल जाओ रघु और सो जाओ और दूसरों को भी सोने दो।
रघु: नींद आपको भी तो नहीं आती जेलर साहब। आज फिर आ गए नाइट में राउंड पर।
(जेलर का दो गार्ड के साथ प्रवेश। वे सलाखों की दूसरी तरफ हैं।)
जेलर: तुम लोगों की वजह से। तुम लोग सुधर जाओ तो मुझे क्यों तकलीफ उठानी पड़े।
रघु (व्यंग्य से): कैसे सुधर जाएंगे साहब। यह जेल है, कोई सुधरने की जगह नहीं। यहाँ तो अपराधी रहते हैं। अपराध की बातें करते हैं। जो वे जानते हैं वही एक दूसरे को सिखाते हैं। आपको पता नहीं क्या, सुधरने के लिए सुधरे हुए लोगों की संगत चाहिए होती है।
जेलर: जिस दिन काल कोठरी में डाल दिए गए न, सुधर भी जाओगे। अपनी उमर का लिहाज करो। भूलो मत तुम देवकांत की जेल में हो।
रघु: जेल देवकांत की हो या दानवकांत की हमारे लिए तो सब बराबर है। यह कोठरी हो या काल कोठरी सब बराबर है। आप अभी घर जाएंगे, दो पैग लगाएंगे और अपनी बीवी के गर्म जिस्म से लिपटकर सो जाएंगे। आपको फर्क पड़ता है... सुबह उठकर अपने बच्चों को प्यार करेंगे। आपको फर्क पड़ता है कि आप किस कोठरी में है। जिसके जीवन में कुछ न हो उसे तो मौत से भी डर नहीं लगता...
(जेलर रघु का गला पकड़ लेता है। उसे खा जाने वाली निगाहों से देखता है फिर कुछ सोचकर छोड़ देता और चला जाता है।)
(एक पल सन्नाटा। तभी बैरक के किसी कोने से आवाज़ आती है)
अर्जुन : आज बच गए वरना दिमाग ठीक हो जाता।
रघु: जिसकी आत्मा ही घायल हो उसे तुम ज़ख्मों से डराते हो? जिसके आगे दूर-दूर तक काला स्याह अंधेरा है उसे काल कोठरी का डर क्या?
अर्जुन (जोर से):वाह! दर्शन की दुकान तो बढ़िया सजी है!लेकिन भाई साहब, जब बिल सिस्टम बनाता है तो भावनाओं से नहीं, लॉजिक से बनाता है।इतना भावुक होना पुराना फैशन है।
रघु (धीमे से मुस्कराते हुए):पुराना फैशन ही वो आइना है जिसमें नए चहरे डरते हैं झाँकने से।
अर्जुन: मुझे ऐसे दर्शन से एलर्जी है — जो जंजीरों को गहना बनाकर पहनता है!आपने क्या पाया इतने बरसों में? सलाखें गिनना?
रघु: मैंने अगर कुछ पाया है तो वो गिनती की नहीं, खोने की कीमत है।जिन भावनाओं को तुम कमजोर समझते हो, वहीं इंसान को इंसान बनाती हैं।
अर्जुन:सिस्टम बदलता है प्रोटोकॉल से, आपकी भावनाओं से नहीं।जबतक हम 'डिजिटल दंड' की भाषा नहीं बोलेंगे, सुधार सिर्फ किताबों में रहेगा।
रघु: तुम्हें तो न्याय पर भी भरोसा नहीं।
अर्जुन : तुम्हें है क्या? इस दौर में जहां मीडिया ही किसी को गुनाहगार या किसी को बेगुनाह ठहरा चुका होता है, वहां गरीब या साधनहीन लोग कैसे विश्वास करें?... आपके भाग्य का फैसला करने वाले न्यायालय भी तो मानव संचालित हैं। क्या उनपर दबाव नहीं होता है जन-मानस का? मीडिया रिपोर्ट्स का? राजनैतिक दलों के नेताओं का?
रघु: फिर भी कानून की किताबें उन्हें रास्ता तो दिखती हैं…
अर्जुन : हाँ, लेकिन किताबों की अपनी सीमा है और मीडिया पर लगाम नहीं है।
रघु (गंभीर स्वर में)सुधार किताबों से नहीं होता... बदलाव उस क्षण से आता है जब कोई कैदी अपने अंदर की जेल तोड़ने का साहस करता है।
(एक पल का मौन — फिर एक भारी दरवाज़ा खुलता है। प्रकाश थोड़ा बढ़ता है।)
देवकांत (जेलर) प्रवेश करते हैं। कठोर चेहरा, तेज़ आँखें, साथ में दो सिपाही हाथों में बेड़ियाँ उठाए हुए।) : यहाँ विचार नहीं — अनुशासन की अनुमति है। तुम दोनों सुधारक नहीं, कैदी हो। और सुधार यहाँ नियमों से होता है, मन से नहीं।
रघु (देखकर व्यंग्य से मुसकुराता है।): आ गए जेलर साहब? आपको भी न चैन नहीं। मैंने कहा था घर जाकर...
( धड़ाक से जेलर का एक घूंसा रघु के चेहरे पर पड़ता है। रघु गिर पड़ता है।)
जेलर (दहाडकर): डाल दो साले को बेड़ियाँ। जुलूस निकालो साले का और फेंक दो काल कोठरी में।
अर्जुन (दूसरी ओर से चिल्लाकर): जाने दीजिए साहब। पागल है, बूढ़ा है।
जेलर: बूढ़ा है... बूढ़ा है तो साला क्या मेरे सिर पर मूतेगा?
अर्जुन: दया कर दीजिए साहब! मर जाएगा साला, दया कर दीजिए...
जेलर: दया से अनुशासन स्थापित नहीं होता। मुझे सिर्फ अनुशासन चाहिए, अनुशासन...
(अचानक जेलर चौंकता है। जेलर की यही आवाज़ नेपथ्य से गूंज उठती है।)
दया से अनुशासन स्थापित नहीं होता। मुझे सिर्फ अनुशासन चाहिए, अनुशासन...
(साथ में एक और आवाज़...)
दया कीजिए पापा दया कीजिए...
(जवाब में फिर वही आवाज़)
दया से अनुशासन स्थापित नहीं होता। मुझे सिर्फ अनुशासन चाहिए, अनुशासन...
( जेलर घबराकर कान बंद कर लेता है। सिर पकड़ लेता है। सभी उसे हैरानी से देखते हैं।)
जेलर: चेतन... चेतन... (चिल्लाते हुए बाहर भाग जाता है। दोनों गार्ड भी उसके पीछे भागते हैं। रघु हैरानी से देखता रह जाता है।)
--दृश्य समाप्त--
यह नाटक धारावाहिक रूप में प्रकाशित किया जा रहा है।
अगले भाग में— जेल की कोठरी से उठते सवाल और दो पीढ़ियों का टकराव।


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