• संतोष श्रीवास्तव

पद्मश्री


टीवी पर राष्ट्रपति मृणालिनी रॉय को पद्मश्री की उपाधि से नवाज रहे हैं। बड़ा सा मोमेंटो, शॉल, कैमरे क्लिक हो रहे हैं। आलोक के कैमरे ने भी मृणालिनी और राष्ट्रपति की महत्वपूर्ण छवियों को कैद कर लिया है।

यादें हैं कि बेशुमार ... वसंत और पतझड़ से गुजरते बिखरे-बिखरे से सालों साल ...

बचपन ... कत्थक नृत्य गुरु सुपर्ण आचार्य से प्रशिक्षण ले रही है देविका। पढ़ाई के साथ-साथ नृत्य का कड़ा अभ्यास जरूरी है प्रतिदिन। माँ ने उसे और उसकी बड़ी बहन शर्मिला को तैराकी के लिए भेजना शुरू किया। संगीत भी दोनों साथ-साथ सीखतीं। शर्मिला को गायिका बनना है और देविका को नृत्यांगना। दोनों साइकिल से स्कूल जातीं। तैराकी और साइकिलिंग शरीर को लचीला बनाते हैं। कत्थक के तोड़े और चक्कर के लिए पैरों पर बैलेंस सधता है। मुद्राओं के लिए कलाई और उंगलियां खुलती हैं। तब मोहक मुद्राएं बनती हैं। माँ पापा को अपनी कलाकार बेटियों पर गर्व है। बेटा नहीं है तो क्या हुआ, बेटियां उनका नाम रोशन करेंगी। देविका का नृत्य अभ्यास अपने चरम पर था अब वक्त आ गया था नृत्य प्रदर्शन का। आचार्य ने उसे मालविकाग्निमित्रम् की एकल प्रस्तुति के लिए तैयार कराया। उसकी लगन और मेहनत से माँ गदगद थीं। वे उसके फूल से चेहरे की खूबसूरती से घबराकर कान के पीछे काजल का डिठौना लगा देतीं।

" ईश्वर तुझे बुरी नजर से बचाए।"

देविका ने तो जैसे पालने से उतरते ही घुंघरू बांध लिए थे। उसके सपने ने उसे मंजिल बता दी थी। रास्ता लंबा और दुर्गम है लेकिन जब तक दम में दम है उसे चलना है। पीछे लौटना बुज़दिली है।

देविका के नृत्य प्रदर्शन की धूम मच गई। शहर के सबसे महंगे और प्रतिष्ठित षणमुखानंद सभागार के स्टेज पर नृत्य करना वह भी लगातार तीन घंटे का एकल प्रदर्शन। एक-एक भाव मुद्रा को देविका ने डूबकर किया। नृत्य की समाप्ति के पश्चात कुछ पलों के लिए तो हॉल में सन्नाटा ही छा गया था। लोग तालियां बजाना भूल गए थे और जब तालियां बजनी शुरू हुईं तो बजती ही चली गईं। समाचार चैनल वाले सुपर्ण आचार्य,देविका और मां के बाइट्स लेने को उतावले थे। देविका प्रशंसकों से घिरी थी। शर्मिला और पापा मानो सुरक्षा के घेरे में उसे रखने की कश्मकश में थे। देविका के चेहरे पर पसीने की बूंदें खिले कमल पर ओस की बूंदों के समान झिलमिला रही थीं। जैसे तैसे ग्रीन रूम पहुंची देविका। तभी सहायक ने आकर सूचना दी -

"मैम, आपसे कोई साहब मिलना चाहते हैं।यह कार्ड है उनका।"

कार्ड पर आलोक भटनागर संस्थापक, निदेशक नालन्दा नृत्यालय वरसोवा मुम्बई।

इस नृत्यालय का नाम सुना है उसने। वर्षों पुराना है नालन्दा नृत्यालय। सुपर्ण आचार्य पहले वहां शिक्षक थे। अभी प्राइवेट सिखाते हैं। चेंज करके बाहर निकली तो एक भव्य व्यक्तित्व वाले व्यक्ति को इंतजार करते पाया। शर्मिला, माँ, पापा उसे देखते ही पास आ गए थे।

"देविका ये आलोक भट्नागर हैं नृत्य का विश्वकोश।"

"अरे नहीं-नहीं, बस जुनून कह लीजिए। हम तो आज भी सीख रहे हैं। जिंदगी की हर ठोकर कुछ न कुछ सिखाती है। देविका जी आप बेहतरीन डांसर हैं।"

माँ की आंखें चमक उठीं।

"वर्षों की तपस्या है इसकी। कड़ी मेहनत और साधना।"

"चलिए कहीं कॉफी पीते हैं।" आलोक ने प्रस्ताव रखा तो पापा ने मीठी इंकारी दी।

"आज नहीं अब तो घर जाकर आराम करेगी देविका। हम सब भी। इस नृत्य नाटिका के लिए दिन-रात जुटी रहती थी यह।"

"पापा कला के अभ्यास में थकान नहीं होती। बल्कि मैं तो प्रेजेंटेशन के बाद रिलैक्स महसूस कर रही हूं। कॉफी की तलब मुझे भी है।" कहते हुए देविका ने हॉल की सीढ़ियां उतरते सुपर्ण आचार्य को देखा तो तेजी से जाकर उनके पैर छुए। उन्होंने गदगद होकर उसके सिर पर हाथ रखा - "मेरी बच्ची, लेकिन नृत्य की मंजिल अभी दूर है। चलते रहना है तुम्हे।"

सभी रेस्त्रां आ गए। कॉफी के प्यालों ने सुकून दिया। गर्म घूंट की गर्माहट में आलोक ने नालन्दा नृत्यालय में देविका द्वारा प्रशिक्षण दिए जाने की अपनी मंशा को कुछ इस तरह पेश किया कि कोई इंकार ही नहीं कर सका। सुपर्ण आचार्य खुश होकर बोले-

"यह तो बहुत अच्छा प्रस्ताव है इससे देविका का अभ्यास भी अनवरत बना रहेगा।"

नालन्दा नृत्यालय ने नृत्य के लिए नए द्वार खोल दिए।देविका जिस ग्रुप की प्रशिक्षक थी उसमें 10 से 25 वर्ष तक की लड़कियां थीं। आलोक के मन में अपने विद्यार्थियों को लेकर बहुत उत्साह था। वे राष्ट्रीय स्तर पर उनके शो करवाते और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शो कराने की योजना में जी-जान से जुटे रहते।देविका को लेकर भी उनके मन में बहुत सारी योजनाएं हैं। बरसों से उनके मन में था कि नालन्दा नृत्यालय से किसी को पद्मश्री मिले। इसके लिए वे अच्छे-अच्छे प्रशिक्षक तलाशते। अपने शिष्यों से कड़ी मेहनत करा के उनकी कला को निखारते। नृत्यालय में अपनी हमउम्र शिक्षिका मृणालिनी राय से देविका का परिचय हुआ जो दोस्ती में बदला और आगे चलकर एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा में। मृणालिनी अमीर घराने की थी और अंतरराष्ट्रीय शो के लिए स्वयं धन लगा सकती थी। जबकि देविका स्पॉन्सरशिप के बल पर ही यह कार्य कर सकती थी। मृणालिनी के लंदन और कनाडा में शो हो चुके थे और अब जापान में शो करने की योजना बना रही थी। मृणालिनी राय देविका की हम उम्र होते हुए भी काफी पहले से नृत्य के क्षेत्र में प्रतिष्ठित और लोकप्रिय थी। देविका को भी उन्हीं ऊंचाइयों को छूना है। राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय शो करना है। अखबारों की सुर्खियां बनना है। प्रशंसकों की चहेती बनना है और टीवी चैनलों में प्रमुखता से आना है। उसे लग रहा है जैसे इस स्वप्न का द्वार आलोक भटनागर के बहाने खुल रहा है।

दो दिन से लगातार तेज बारिश के बाद आज मौसम खुला था। धूप निकली थी और सड़कों पर चहल-पहल बढ़ गई थी। अब देविका ने साइकिल चलाना छोड़ दिया था।उसने नालन्दा नृत्यालय के लिए टैक्सी ली।सिग्नल पर उसे आलोक की कार दिखी। आलोक ने मोबाइल पर मैसेज भेजा।

"आगे बाएं तरफ रुक कर टैक्सी छोड़ दो, मैं वहीं मिलूंगा।"

सिग्नल खुलते ही उसने सड़क के बाईं तरफ टैक्सी रुकवाई और आलोक की कार में आ बैठी - "ना हक आपने तकलीफ की। मैं आ तो रही थी टैक्सी से।"

"वर्सोवा तक के 30 मिनट के सफर में आप को लेकर जो मैंने योजना बनाई है उस पर चर्चा तो की जा सकती है।" आलोक ने बेतकल्लुफी से कहा।

"जी बिल्कुल।" देविका को सहज होने में समय लगा।

“स्पॉन्सरशिप मिल गई है और दिसंबर में क्रिस्मस के आसपास की तारीखें भी मिल गई हैं।'"

"मृणालिनी जी के शो लिए?"

"कम ऑन देविका, स्पॉन्सरशिप की तुम्हें जरूरत है या मृणालिनी को? थाईलैंड बैंकॉक में तुम्हारे तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय शो होंगे। हिंदू माइथोलॉजी के दीवाने हैं वहां के लोग।हम उर्वशी नृत्य नाटिका तैयार करेंगे। कुछ लड़कियों को तुम अपने ग्रुप से चुन लेना। स्क्रिप्ट मैं तुम्हें तीन-चार दिन में देता हूं। अभ्यास तुम जल्दी ही शुरू कर दो। दिनकर जी की उर्वशी काव्य ग्रंथ है पूरा। हमें अच्छे गायक और उसकी मंडली का भी चयन करना होगा।"

देविका मन ही मन खुशियों के हिंडोले में झूलने लगी। उसका स्वप्न इस तरह साकार होगा सोचा न था।

"एजेंट को बुलवा लिया है। पासपोर्ट के लिए अप्लाई कर देगा वह। वह आज मिलेगा तुमसे 4 बजे के आसपास।"

इतनी जल्दी-जल्दी इतने करीने से योजना को क्रियान्वित होते देख वह आलोक की क्रियाशीलता पर मुग्ध हो गई। दिनभर देविका उर्वशी के मंचन की कल्पना में ही खोई रही। यह बड़ी चुनौती थी जिसे उसे कर दिखाना था। यह उसकी इतने वर्षों की कला साधना की परीक्षा थी।

माँ तो देविका के खिले चेहरे और चमकती आंखों को देख बता ही नहीं पा रही थी कि शर्मिला को जो पिछले हफ्ते लड़के वाले देखने आए थे उन्हें शर्मिला पसंद आ गई है और नवंबर में शादी की तारीख निकली है।

"तुझे पता है देविका, शुभम की म्यूजिक कंपनी है। मेरे गायन को शुभम के रूप में मुकाम मिल गया है।"

शर्मिला की खुशी की इंतिहा न थी। रात को खाने के दौरान उसने धीमे से कहा -"माँ, शर्मिला की शादी को लेकर मैं बहुत एक्साइटेड हूँ। पर माँ तारीख आगे नहीं बढ़ सकती?"

"क्यों ?"

उसने थाईलैंड जाने की और उर्वशी के मंचन की पूरी योजना माँ को बताते हुए कहा - "माँ, नवंबर में तो मुझे खाने तक का होश नहीं रहेगा।"

"तुम शो की तारीखें बढ़वा लो देविका।"

"नहीं शर्मिला, शो के लिए आलोक भटनागर द्वारा रुपया लगाया जा चुका है। मुश्किल लग रहा है। मैंने तुम्हारी शादी के लिए न जाने क्या-क्या सोच रखा था।"

शर्मिला उदास हो गई, देविका झट उसके गले से लिपट गई

"तू उदास मत हो यार, नहीं तो मैं नहीं जाऊंगी थाईलैंड। कुछ रास्ता निकालते हैं न।"

दोनों बहनें बहन कम मित्रवत अधिक थीं। दोनों में बस पौने दो साल का ही अंतर था। इस शादी में भी शर्मिला ने अपनी पसंद के पहले देविका की पसंद पूछी थी। माँ को अपनी दोनों लाडली बेटियों के प्रेम पर गर्व था।

शादी की तारीख 28 नवंबर निकली और थाईलैंड जाने की 15 दिसंबर। देविका का रात दिन का नृत्य अभ्यास और इधर शादी की तैयारी ... मेहंदी, नृत्य, संगीत संध्या की योजना। शर्मिला के साथ शादी की खरीदारी ... देविका ने खुद को झोंक दिया दोनों जिम्मेदारियों को निभाने में।

जब उर्वशी के तीन दिवसीय सफल नृत्य मंचन के बाद वह मुंबई लौटी तो शर्मिला शुभम के साथ हनीमून के लिए साउथ अफ्रीका में थी। अफ्रीका के जंगलों में उसने जंगल सफारी के दौरान शेर को हिरण का शिकार करते देखा। उस रोमांचक पल का बयान करना कठिन है।

इधर एक रोमांचक पल देविका की भी प्रतीक्षा कर रहा था। जब आलोक भटनागर ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, देविका बस इतना जानती थी कि आलोक तलाकशुदा है।

माँ ने सुना तो उनका मन आंदोलित हो उठा। कहां देविका और कहां उम्र में उससे 10 वर्ष बड़े तलाकशुदा आलोक। माना दोनों का प्रोफेशन एक है तो उससे क्या!

देविका को भी आलोक को जवाब देने में समय लगा। सिर्फ शर्मिला थी जो आलोक के पक्ष में थी।

" क्या हुआ यार तलाकशुदा है, उम्र में बड़े हैं, मुझे आदमी काफी सुलझा हुआ लगा। तुम्हारी कला को बढ़ावा देने एक सहायक के रूप में आलोक पर्फेक्ट है।"

शर्मिला की रजामंदी के बाद देविका आलोक से मरीन ड्राइव पर मिली। डूबते सूरज की नारंगी आभा समंदर को अनुराग से भर रही थी। शाम होते ही तट पर लोगों की चहल कदमी शुरू हो जाती है। वे टहलते हुए उत्ताल लहरों के संग संग खुद भी उद्वेलित होते रहे।

"मेरा विवाह सफल नहीं रहा। उसका किसी और से अफेयर था। ऐसे में रिश्ते को निभाना कठिन हो जाता है। तुम्हें देखकर मन से आवाज उठी। तुम मेरे ही लिए हो। हम दोनों एक दूसरे के लिए हैं।" आलोक ने ठहरकर देविका की दोनों हथेलियां पकड़ लीं। समुद्र की लहरों ने उनके पैरों को भिगो दिया।

"आओ समुद्र की विशालता के आगे एक दूसरे को स्वीकार कर लें।"

सांझ धीरे-धीरे विदा ले रही थी। देविका अभी तक खामोश थी। सांझ और रात्रि की मिलन बेला में आलोक के शब्दों ने उसे आलोड़ित कर दिया। बस इतना कह पाई, “आपका साथ मुझे मंजूर है।"

बहुत समय लगा माँ पापा की स्वीकृति मिलने में। साउथ अफ्रीका से शर्मिला लौट आई थी। आलोक को धूमधाम नहीं चाहिए थी। अगले महीने उन्होंने कोर्ट मैरिज कर ली। लेकिन माँ पापा के आग्रह पर रिसेप्शन बहुत भव्य हुआ। देविका की शादी की पूरी कसर रिसेप्शन में उन लोगों ने पूरी कर दी। शर्मिला को लेकर शॉपिंग के लिए भी गई और रिसेप्शन के एक दिन पहले आलोक और देविका को आमने-सामने बिठाकर मेहंदी लगाई गई और रात भर नाच गाने हुए। मृणालिनी राय ने कत्थक के तोड़े प्रस्तुत करने के बाद आलोक से कहा -"अब आपकी उड़ान शुरू हो गई है। आपको पंख मिल गए।"

मृणालिनी राय का कहा सच साबित हुआ। आलोक और देविका ने हिंदू माइथोलॉजी के विषयों को आधार बना खूब मेहनत की और जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड, सिंगापुर, मलेशिया, हांगकांग और ऑस्ट्रेलिया में सफलतम शो की श्रंखला ही गूंथ दी। भारत में उड़ीसा का कोणार्क मंदिर,मुंबई की एलिफेंटा केव्स और खजुराहो महोत्सव में नृत्य पेश कर तो जैसे जग ही जीत लिया देविका ने। कामयाबी, शोहरत और समृद्धि उसके कदम चूम रही थी। ढाई साल कपूर की तरह ऐसे उड़े कि पता ही नहीं चला। पता तो तब चला जब देविका ने शरमाते हुए अपने माँ बनने की सूचना दी। सुनकर आलोक ने उसे गोद में उठा लिया।

"तुमने मेरी तमन्ना पूरी की। तुमने मेरी हर तमन्ना पूरी की। तुम्हें पाकर मैं धन्य हुआ।"

इधर देविका मां बनने की अनुभूतियों से गुजर रही थी, उधर उसके नृत्य की मांग बढ़ रही थी। लेकिन आलोक कोई रिस्क लेना नहीं चाहते थे। लिहाजा मृणालिनी राय को आगे की नृत्य भूमिकाओं के लिए लिया गया। आलोक मृणालिनी राय को लेकर विदेश जाने लगे और देविका जचकी के लिए माँ के पास आ गई। शर्मिला शुभम अपनी म्यूजिक कंपनी के लिए एक बड़े ऑफर के तहत फाइनली पेरिस चले गए थे। शायद वहीं बस जाएं।

चिर प्रतीक्षित घड़ियों ने हिला कर रख दिया। लेबर रूम में देविका को, माँ और आलोक को जो नर्सिंग होम के बाहर खुशखबरी की प्रतीक्षा में पूरी रात बैठे रहे थे। देविका ने जिस कन्या शिशु को जन्म दिया वह डाउन सिंड्रोम (मंदबुद्धि )की शिकार थी।

जन्म से पहले आलोक ने कहा था "अगर बेटा हुआ तो नाम रखेंगे शांतनु और बेटी तो संपूर्णा। संपूर्णा आलोक और देविका भटनागर की विरासत नृत्य को चोटियों पर पहुंचाएगी।"

लेकिन वह संपूर्णा कहाँ थी? अपूर्ण, अविकसित जैसे पाला पड़ने से ठिठुर गया फल। अस्पताल से घर तक की दूरी मीलों लम्बा सफर लगा। पूरा माहौल सहमा-सहमा सा ... खुशियों पर भी पाला पड़ गया था लेकिन मातृत्व के सुख में डूबी देविका इस वक्त तो संपूर्णा को देखकर ही निहाल हुई जा रही थी और आलोक उसके अंधकारमय भविष्य को लेकर चिंतित थे।

शर्मिला मां और पापा देविका के नजदीक दुखों की आहट सुन पा रहे थे। संपूर्णा का चेहरा भी अप्राकृतिक सा था। खूब उभरा हुआ माथा। चपटी नाक। छोटी छोटी आंखें शून्य सी। न उनमें जिज्ञासा थी, न खुशी या दुख की पनीरी परत।

माँ ने कहा था - "देविका, तू अपना भविष्य देख बेटी, कितना ब्राइट फ्यूचर तेरे सामने है। संपूर्णा किसी तरह पल ही जाएगी। कुछ समय मेरे पास रहेगी। फिर देखभाल को आया रख लेना।"

ठीक ही तो कह रही हैं मां। वह अंतराष्ट्रीय स्तर की कलाकार है। इस समय उसकी उठान चरम पर है। अगर अभी गैप हुआ तो लोगों को भूलते क्या देर लगती है। अभ्यास के बिना नृत्य में विराम लग जाएगा। संपूर्णा को मां के पास तो नहीं पर आया के भरोसे रखने का जरूर मन बना लिया उसने।

संपूर्णा अभी छोटी थी। खिलौनों से खेलती और घुटनों के बल चलती थी। उसे मम्मा भी पुकारने लगी थी। देविका जैसे ही नृत्यालय से लौटती संपूर्णा न जाने कौन सी लटपटी भाषा में आया की शिकायत करती। आया ने हाथ खड़े कर दिए थे - "आपकी बेटी मुझसे नहीं सम्हल रही है। नहलाती हूँ तो मेरा हाथ दांतों से काटती है। खाना खिलाती हूँ तो सारा खाना उगल देती है, मुझे माफ करें।

देविका ने दो-तीन आया और रखी पर सबकी वही शिकायत। संपूर्णा 6 साल की हो गई पर उसका मानसिक विकास अवरुद्ध था। वह दो साल की बच्ची जैसा ही व्यवहार करती। देविका उसे कलेजे से लगा कर फूट फूट कर रोती। उसकी मासूम आंखें देविका को सवाल करती नजर आतीं। शायद अपने जन्म के अधूरेपन पर,शायद एक ही ठौर पर ठहरी जिंदगी पर। आलोक ने डॉक्टरों अस्पतालों में रुपया पानी की तरह बहाया पर नतीजा कुछ नहीं निकला। देविका ने मन बना लिया नृत्य को तिलांजलि देने का। वह पूरा समय संपूर्णा को देगी। अपनी प्यारी बेटी के नजदीक उसे हर पल रहना है। मातृत्व का यही तकाजा है।

शर्मिला उसे समझाती रही - "नृत्य किसी भी तरह जारी रख देविका। मैंने तेरी नृत्य नाटिकाओं को अपनी आवाज और संगीत देने का पूरा प्लान कर लिया है।"

अब कैसे समझाएं शर्मिला को। उसके पैर जकड़ गए हैं उसकी नियति से। घुघरूओं ने उसका बहिष्कार कर दिया है। वह अनवरत बहती नदी की जलधारा है।जिस पर अब केवल वक्त की काई का ही जमाव है।

वह हर संभव प्रयास में रत है कि किसी तरह संपूर्णा ठीक हो जाए। वह उसे लेकर स्कूल जाने लगी। जितनी देर संपूर्णा कक्षा में रहती वह स्कूल के बगीचे में बेंच पर बैठी रहती।कुछ महीनों बाद प्रिंसिपल ने संपूर्णा के स्कूल आने पर रोक लगा दी।

"यह पूरे टाइम चीखती है और कक्षा के विद्यार्थियों पर किताब फेकती है। अब घर पर ही देविका उसे चित्र बनाना सिखाने लगी। कभी-कभी उसे नृत्य करके दिखाती - "देखो संपूर्णा, तुम भी नाचो ऐसे। "

एवज में संपूर्णा ताली बजाकर खिलखिला कर हंसती। देविका ने मंदबुद्धि बच्चों से संबंधित किताबें पढ़नी शुरू कीं। वह नहीं चाहती संपूर्णा किसी के बलबूते जिए। वह उसे आत्मनिर्भर बनाना चाहती है। इसलिए उसे खुद ही नहाने के लिए कहती,खुद ही खाना खाने को कहती पर संपूर्णा कुछ समझ ही नहीं पाती। उसके सारे दैनिक कार्य देविका को ही करने पड़ते। वह उसे व्यायाम कराती, बगीचे में घुमाने ले जाती ...

नियमित जांच के दौरान डॉक्टर ने कहा - "समझ में नहीं आ रहा कि संपूर्णा क्यों नहीं कुछ सीख रही है। इस बीमारी से पीड़ित बच्चों का विकास बहुत धीमा होता है पर होता जरूर है। लेकिन इस केस में तो मेडिकल भी फेल होता नजर आ रहा है।"

उस रात न आलोक सो पाए न देविका। देविका को ले कर इतिहास रच देने का सपना चूर-चूर होता नजर आया आलोक को। न वे देविका की वेदना सोच पाए न संपूर्णा के जीवन की त्रासदी। सोचा तो बस खुद का, खुद के लिए।

अब कुशल नृत्यांगना कल्पना बजाज को लेकर आलोक अंतरराष्ट्रीय शो करने लगे। हर चौथे पांचवें महीने विदेश यात्रा, दोनों हाथों से धन बटोरने की फुर्ती। जहां देविका को होना था वहां कल्पना बजाज थी। देविका छीजती रही। साल दर साल गुजरते रहे।उसकी कला जैसे बीहड़ों में गुम हो गई।संपूर्णा को पाकर उसने दोबारा मां बनना नहीं चाहा। आलोक भी उससे दूर होते गए। दोनों के बीच की नज़दीकियां दूरियों में बदल गईं। आलोक की दुनिया में अब कल्पना बजाज थी और अंतरराष्ट्रीय शो ... ढेरों दौलत।

संपूर्णा 18 साल की हो गई। शरीर विकसित हुआ पर दिमाग वही दो साल की बच्ची का। कभी-कभी अलमारी जमाते हुए घुंघरूओं हाथ पहुंच जाते हैं तो देविका अविरल असुरों से नहा उठती है। मानो मीलों पहले रेगिस्तान में कहीं से जलधारा उमड़ आई है।जलधारा में सूर्य की किरणें सतरंगी ख्वाब बुनती हैं फिर आहिस्ता आहिस्ता जलधारा सूखने लगती है और पपड़ाया हुआ एहसास रेगिस्तान को सौंप अदृश्य हो जाती है।


आलोक दिल्ली गए हैं। आज राष्ट्रपति भवन में मृणालिनी रॉय को पद्मश्री से नवाजा जाएगा। मुंबई के सभी अख़बारों ने मृणालिनी की फोटो सहित खबर प्रमुखता से प्रकाशित की है।

जहां देविका को होना था वहां एक बड़ा शून्य है। देविका के पैर थम गए हैं। घुंघरू बिखर गए हैं।

संपूर्णा जोर जोर से चीख रही है। और दोनों हाथ आसमान की ओर उठाकर कूद रही है।

देविका को लगा जैसे संपूर्णा खिलखिलाती, ताली बजाती कह रही है - मम्मा, मम्मा देखो मैं तुम्हारी पद्मश्री।"


 

लेखक संतोष श्रीवास्तव - परिचय


कहानी,उपन्यास,कविता,स्त्री विमर्श,संस्मरण की अब तक अठारह किताबे प्रकाशित।

चार अंतरराष्ट्रीय ( मॉरीशस,कम्बोडिया ताशकन्द,बैंकॉक )तथा 20 राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार मिल चुके है।

जेजेटी विश्वविद्यालय राजस्थान से पीएचडी की मानद उपाधि। "मुझे जन्म दो माँ" स्त्री के विभिन्न पहलुओं पर आधारित पुस्तक रिफरेंस बुक के रुप में विभिन्न विश्वविद्यालयों में सम्मिलित।

संतोष जी की 6 पुस्तकों पर मुम्बई विश्वविद्यालय,एस एन डी टी महिला महाविद्यालय तथा डॉ आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा से एम फिल हो चुका है ।

राज ऋषि भर्तहरि मत्स्य विश्वविद्यालय अलवर राजस्थान से कहानी और उपन्यास दोनों पर संयुक्त रूप से पीएचडी

लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

से मेरी आत्मकथा "मेरे घर आना जिंदगी" के कथ्य एवं शिल्प का विवेचनात्मक अध्ययन : विशेष संदर्भ- 1990 ई. से अब तक की महिला साहित्यकारों की आत्म कथाएं

यवतमाल से संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय से कहानियों में नारी चेतना विषय पर पीएचडी हो रही है।

कहानी " एक मुट्ठी आकाश "SRM विश्वविद्यालय चैन्नई में बी.ए. के कोर्स में तथा लघुकथाएं महाराष्ट्र राज्य के 11वीं की बालभारती में

संतोष की कहानियों ,लघुकथाओं, और उपन्यासों के अंग्रेजी, मराठी, सिंधी, पंजाबी, गुजराती, तेलुगू, मलयालम ,बांग्ला, ओड़िया, नेपाली, उर्दू ,छत्तीसगढ़ी भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं।

राही सहयोग संस्थान रैंकिंग 2018,2019 तथा 2020 में वर्तमान में विश्व के टॉप 100 हिंदी लेखक लेखिकाओं में नाम शामिल।

द संडे इंडियन द्वारा प्रसारित 21वीं सदी की 111 हिंदी लेखिकाओं में नाम शामिल।

भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा विश्व भर के प्रकाशन संस्थानों को शोध एवं तकनीकी प्रयोग( इलेक्ट्रॉनिक्स )हेतु देश की उच्चस्तरीय पुस्तकों के अंतर्गत "मालवगढ़ की मालविका " उपन्यास का चयन

केंद्रीय अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार मित्रता संघ की मनोनीत सदस्य । जिसके अंतर्गत 26 देशो की प्रतिनिधि के तौर पर हिंदी के प्रचार,प्रसार के लिए यात्रा ।

सम्प्रति स्वतंत्र पत्रकारिता।

संपर्क 505 सुरेन्द्र रेज़िडेंसी दाना पानी रेस्टारेंट के सामने बावड़ियां कलां भोपाल 462039 (मध्य प्रदेश) मो .09769023188 Email Kalamkar.santosh@gmail.com


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