जीना इसी का नाम है...

क़ैस जौनपुरी का साक्षात्कार

4 जुलाई 2016

1. क़ैस जी, इस इंटरव्यू के लिये समय निकालने के लिये बहुत धन्यवाद ... मैं दिल्ली में बड़ी हुई. बचपन में गर्मी के दिनों जब घर में बंद रहना पड़ता था तो हम अपना समय कुछ इस प्रकार बिताते थे, मैं, मेरी बहन और पड़ोस की हम-उम्र दोस्त ड्राईंग रूम के कालीन को स्टेज मान कर स्किट करते और हमारे स्किट के सबसे पॉपूलर पात्र जंगल में खोई हुई राजकुमारी और शिकारी, या फिर रामू नौकर और मालिक, या फिर गुब्बारे वाला और बच्चे हुआ करते थे.... जौनपुर में पैदा हुआ बचपन में गुब्बारे बेचने वाला, मेहनत-मज़दूरी करने वाला बच्चा अवकाश का वक्त कैसे व्यतीत करता था. कुछ बताएँगे.

2. आपका दिलचस्प बचपन निस्संदेह कठिन रहा होगा. कठिनाइयों के बावजूद आप उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाए, इंजीनीयरिंग की पढ़ाई कर पाए, ये एक बेहद सराहनीय और प्रेरणात्मक बात है. सबसे पहले बताएँगे, इंजीनीयर बनने का ख्याल कैसे आया?

3. कहते हैं होनहार को सफ़ल होने से कोई रोक नहीं सकता. फिर भी गरीबी और अभाव की दशा 'प्लेईंग फ़ील्ड' में एक अच्छी-खासी असमानता ले आती है, ख़ास तौर पर उच्च शिक्षा पाने के दौरान. आपके साथ भी ज़रूर कई कठिनाईयाँ आईं होंगी … आपने उनका सामना कैसे किया

4. आपमें एक कलाकार भी बैठा है, आप नौकरी के साथ-साथ लिखते भी हैं, कहानियाँ-कविताएँ छपती रहती हैं, आपके लिखे नाटक भी चर्चित हैं और मुम्बई में परफ़ॉर्म किये जा चुके हैं. रेडियो सिटी पर भी कई शो हो चुके हैं. नौकरी से ऐंटरटेनमैंट का ट्रांज़िशन कैसे हुआ?

5. लिखने में आपको प्रेरणा किन तरह की बातों से मिलती है. आपके पसंदीदा लेखक कौन हैं

6. एक छोटी सी डिक्शनरी ने मेरी ज़िन्दगी को नई राह दिखाई ...

7. "मुझे इस गाँव से बाहर निकलना है ..."

8. "मैं मंटो बोल रहा हूँ ..."

9. "गूगल क़ैस जौनपुरी को जानता है ..."

अपने बारे में क्या कहूँ! बस, 1985 में जौनपुर में पैदा हुआ. बचपन
में गुब्बारे बेचता था. मेहनत-मज़दूरी करते हुए बड़ा हुआ.
हाईस्कूल में था तब इंग्लिश के टीचर जनाब शुएब साहब ने
इंजीनियरिंग की फ़ीस भर दी और मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने
बहराइच चला गया. फिर दिल्ली में नौकरी शुरू की और 2009
में एक इंजीनियर की हैसियत से लंडन गया. फ़िल्मों में लिखने का
शौक़ था इसलिए लंडन की नौकरी छोड़के 2010 में बम्बई आ
गया. यहँ नौकरी के साथ-साथ लिखना ज़ारी है. कहानियाँ-
कविताएँ छपती रहती हैं. 2012 में एक नाटक लिखा ‘स्वामी
विवेकानन्द’ जिसका पहला शो भाईदास हॉल, विले-पार्ले में हुआ.
जल्दी ही कुछ नए नाटक भी आने वाले हैं. रेडियो सिटी पे तीन शो
हो चुके हैं. कुछ फ़िल्मों पे भी काम चल रहा है. इंजीनियरिंग की
नौकरी पसन्द नहीं आती है. कोशिश है कि जल्द से जल्द अपना
पूरा समय लेखन को दे सकूँ.

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