बातचीत संतोष श्रीवास्तव से

ई-कल्पना जुलाई 4, 2016

ई-कल्पना- आपने लिखना कब शुरू किया? लिखने की प्रेरणा किन बातों से मिलती है?

 

सं.श्री.- जब मैं 16 साल की थी मेरी हमउम्र लड़कियां इश्क के चर्चे करती ,सिल्क, शिफान ,गरारे, शरारे मेहंदी में डूबी रहती, फिल्मी गाने गुनगुनाती ,तकिए के गिलाफ पर बेल बूटे काढती ,दुल्हन बनने के ख्वाब देखती। मैं कभी अपने को इस सब में नहीं पाती। मेरे अंदर एक ख़ौलता दरिया था जिसका उबाल मुझे चैन नहीं लेने देता। कई सवाल कचोटते ..... ऐसे हंसो, ऐसे मत हंसो ,ऐसे उठा बैठा करो, ऐसे नहीं ,घर के मर्दों से मुँहजोरी मत करो ,चुपचाप सुन लिया करो की सारी संहिताएं लड़कियों के लिए ही क्यों? लड़को के लिए क्यों नहीं ? कच्ची उम्र के उन खतरनाक दिनों में ही मेरे अंदर झूठी मान्यताओं, थोथी परंपराओं और अंधविश्वासों के खिलाफ खड़े होने की ज़िद्द पनपी। इन्ही दिनों ने मुझे सिखाया की महत्वपूर्ण यह नहीं कि तुम उसका विरोध करो ,जो हो रहा है, जो होता आया है , पर उस कुछ का विरोध अवश्य करो जो सहजता में अवरोध पैदा करे। और मैं उस कुछ के खिलाफ खड़ी हुई ।आग में घी का काम किया दर्शनशास्त्र के लेखक और एडवोकेट मेरे पिता के फौजदारी के मुकदमों की कहानियों ने जिन्हें वे डिनर के दौरान हमें बताते थे। मानवता को हिला देने वाली वे घटनाएं जहन में ऐसे उतरी कि आज तक मैं उस आंच से नहीं उबर पाई हूं। मेरे बड़े भाई स्वर्गीय विजय वर्मा पत्रकार और साहित्यकार थे। (48 वर्ष की अल्प आयु में उनका निधन हो गया ।उनकी स्मृति में हम हर साल विजय वर्मा कथा सम्मान देते हैं) घर में पत्रकारों लेखकों का आना जाना था ।घर का माहौल पूरा साहित्यमय ,अध्ययनमय था। 16 वर्ष की उम्र में मेरी पहली कहानी "शंख और सीपियां ""धर्मयुग" में छपी बस तबसे मेरी कलम ना तो रुकी और ना मैंने पीछे मुड़ कर देखा।

 

ई-कल्पना- हमारे पास सबमिशन में महिला लेखकों द्वारा कई ऐसी कहानियाँ आई हैं जिन में काफ़ी रोष होता है. असल जीवन में मैंने ये रोष कई औरतों में देखा है, माँओं में जिन्होंने अपनी बेटी-बेटों को अच्छी शिक्षा दे कर, फिर अपने जीवन के किसी फ़ेज़ में महसूस किया है. चौंका देने वाला रोष. क्या आपको भी ऐसा लगता है? अगर हाँ, तो आपके अनुसार मध्यवर्गीय औरतों के प्रति समाज कहाँ चूक गया?


सं.श्री.- स्त्रियों में रोष का होना कई वजहों से है।
जब मैंने कलम थामी थी तो मेरे मन में औरत को लेकर कई सवाल अनसुलझे थे। क्यों परिवार की मान मर्यादा शिष्टता की सीमा-रेखा लड़कियों को ही दिखाई जाती हैं, लड़कों को नहीं। क्यों पिता, भाई ,पति, बेटे की सुरक्षा के घेरे में वह जिंदगी गुजारे ।क्यों सारे व्रत उपवास नियम धरम औरतों के जिम्मे। क्यों इन रिश्तों के कल्याण के लिए ही सारे व्रत, पूजा, अनुष्ठान ।क्यों नहीं औरतों के लिए ? मेरे अंदर विरोध भरता गया था और मैंने ठान लिया था कि मौका पाते ही पितृसत्ता के खिलाफ हल्ला बोलूंगी ।भोपाल से निकलने वाली पत्रिका समरलोक में 10 वर्षों तक मेरा नियमित स्तंभ अंगना छपता था। स्त्री विमर्श के इन लेखों को आंकड़ों सहित मैंने" मुझे जन्म दो माँ" किताब लिखी जो सामयिक प्रकाशन दिल्ली से छपी। इस पुस्तक पर 2 एम् फिल हो चुके हैं।डीम्ड यूनिवर्सिटी राजस्थान में शोध के लिए संदर्भ ग्रंथ के रूप मेंभी ये मान्य है ।इस पुस्तक पर राजस्थान विश्वविद्यालय से पीएचडी की मानद उपाधि भी मिली ।समाज में तादाद मध्यवर्ग की ज्यादा है। इसलिए वह ज्यादा चर्चा में रहता है ।जबकि स्थिति कमोबेश हर वर्ग की औरतों के साथ एक जैसी है। घरेलू हिंसा ,दहेज प्रताड़ना ,पिता की जायदाद में लड़की का अधिका नहीं( कानून बना पर वह केवल कागजी इबारत बनकर रह गया) विधवा, परित्यक्ता के रूप में शापित जीवन जीना ।समाज कितना भी बदल जाए लेकिन सदियों से चले आ रहे पितृसत्ता के कठोर नियमो ने औरत के पक्ष की चूलें हिलाकर रख दी है ।मुट्ठीभर औरतों की आजादी आजादी नहीं कहलाती ।वरना निर्भया कांड होता? वरना रूपकुंवर पति की चिता के साथ जिंदा जलाई जाती ?वरना गोधरा कांड में 35 वर्षीय विधवा औरत को नंगा कर उसके बदन को नोचते खसोटते भेड़ियों का वीडियो निकाला जाता ? वरना सूखा पड़ने पर इंद्र देवता को प्रसन्न करने के लिए झारखंड में औरत को नंगा कर गांव में घुमाया जाता? मेरी दादी बताती थी की उन्हें बसंत आने का पता तब चलता था जब सरसों, तिल को धोने के दौरान मोरी के आसपास छिटके दाने पौधे बन जाते थे और उन पर फूल खिल आते थे।

 

ई-कल्पना- समय के साथ सामाजिक प्रगति होना सही है. अक्सर लोग प्रगति और नैतिक पतन में कन्फ़्यूज़ हो जाते है. या फिर प्रगति के नाम पर विकृत बर्ताव को बढ़ावा देते हैं. प्रगति और विकार की बहस में फंस कर हम वहीं के वहीं रह जाते है. उदाहरण के तौर पर आज की युवा जैनरेशन उन्ही सवालों से जूझ रही है जिन से हम कॉलिज में जूझते थे – ईवटीज़िंग से ले कर औरतों के ख़िलाफ़ ज़्यादा संगीन गुनाह. समय के साथ विचारधाराएँ बदली हैं और लोगों की जीवन से आकांक्षाएँ भी बढ़ी हैं, लेकिन सामाजिक कठिनाईयाँ वहीं हैं. कैसे निकलेंगे सामाजिक कठिनाईयों से?


सं.श्री.- प्रश्न पेचीदा है आपका। देखा जाए तो प्रगति और नैतिक पतन में आपस में कोई जोड़ है ही नहीं। प्रगति हमेशा स्वस्थ दिशा प्रशस्त करती है जबकि नैतिक पतन राह में गड्ढा खोदता है। घर परिवार को तिलांजली दे चांद को छू लेने को प्रगति नहीं कहेंगे। प्रगति कभी भी विकृत बर्ताव को बढ़ावा नहीं देती। युवा पीढ़ी में लड़के-लड़की में आपसी मित्रता, साथ मिलकर कुछ कर दिखाने की कोशिश से ही देश की प्रगति होती है। यह कोशिश अगर विकृति में बदल जाती है ,सीमाएं तोड़ डालती है ,मर्यादाओं को नजरअंदाज करती है और लिव इन रिलेशन, फ्री सेक्स, रेव पार्टी, शराब ,चरस ,गांजा आदि को आधुनिक जीवन शैली मानती है तो देश तो रसातल में जाएगा ही ।हम समझते हैं कि वक्त बदला है पर वक्त बदलता नहीं गुजर जाता है। इन समस्याओं से निपटने का हल ना तो कोई सही तरीके से तलाश पाया है और ना यह चंद लफ्जों में कह डालने की बात है ।मेरे नजरिए से युवा वर्ग का संस्कारी होना बहुत जरूरी है। और ये संस्कार उसे जन्म घुट्टी में पिला देने होंगे। संस्कारी होने का ककहरा पढ़ाने में मां से बडी तो कोई पाठशाला ही नहीं ।जब घर से संस्कारी युवा समाज में पदार्पण करेगा तो नैतिक पतन की गुंजाइश ही कहां रह जाती है।

 

ई-कल्पना- आधुनिक हिन्दी लेखकों का स्तर बहुत ऊँचा है, ये ई-कल्पना में हम प्रत्यक्ष रूप से देख रहे हैं. फिर देश का हिन्दी राईटिंग लैंडस्केप सक्रिय क्यों नहीं है?


सं.श्री.- सही कहा आपने ।आधुनिक हिंदी लेखकों का स्तर बहुत ऊंचा है। अस्सी के दशक तक का लेखन भाषा ,भाव ,शैली और कहन में भावुकता से ओतप्रोत था ।चांद ,तारे बारिश ,नदी ,बादल ,पुरवइया के संग प्यार पनपता था और वक्त की आंधी में खत्म हो जाता था ।लेकिन आज का युवा लेखन केवल आज को जीता है। कल किसने देखा है। वैसे भी उसकी जान हथेली पर रहती है। उसका भविष्य आतंक की छांव तले पनप रहा है। बंदूक की नोक, रेल की पटरी, बम धमाके और सड़क हादसों के बीच सहमा खड़ा है उसका भविष्य। इसलिए वह यथार्थ के ज्यादा करीब है।
मैं नहीं मानती कि देश का हिंदी राइटिंग लैंडस्केप सक्रिय नहीं है बल्कि उसमें पहले से कहीं अधिक इजाफा हुआ है। हर साल पिछले साल की तुलना में दोगुनी किताबें छप रही है ।यह विश्व पुस्तक मेले के आंकड़ों से स्पष्ट है। पहले से बहुत अधिक साहित्यिक पत्रिकाएं निकल रही हैं ।इतनी अधिक कि उतनी सब की सब पढ़ लेना संभव नहीं है ।लेखकों की तादाद बेतहाशा बढ़ी है। कई पत्रिकाओं की बाढ़ आई है। जर्रे से निकलकर लेखन आसमां तक फैल गया है। इसमें ई पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेखक की पहचान ई पत्रिकाओं के जरिए विश्वव्यापी हो गई है। बस एक ही बात मन को सालती है कि लेखक को अपनी रोटी जुटाने के लिए अलग प्रोफेशन चुनना पड़ता है क्योंकि लेखन रोटी नहीं देता ।नतीजा उसका ऊर्जा मय फ्रेश समय नौकरी की भेंट चढ़ जाता है और बासी, थका समय लेखन के लिए बचता है जबकि विदेशों में लेखक अपनी किताबों से ही करोड़पति हो जाते हैं।

 

ई-कल्पना- देश में अच्छे लेखकों की कमी नहीं है, कमी है तो विचारों के अवलोकन और विश्लेशण करने के लिये समय की, जो शायद 2016 में और कठिन हो गया है. “टू मच इन्फ़ौरमेशन!” नए लेखकों को आप कुछ टिप्स देंगी?


सं.श्री.- टू मच इंफॉर्मेशन ने जिंदगी जटिल तो कर दी है ।यही वजह है कि सही ढंग से विचारों का अवलोकन और विश्लेषण नहीं हो पा रहा है। सोशल मीडिया ,ट्विटर, ब्लॉग,फेसबुक , तरह-तरह के फेसबुक के पेज और वाट्सएप ग्रुप पर नित विमर्श की सामग्री अपलोड की जाती है। पर दूर-दूर तक कोई विमर्श नहीं। बस शुक्रिया, बधाई ,वाह वाह के कमेंट और लेखक संतुष्ट ।अच्छी या बुरी हर चीज की अति खतरनाक होती है। जानकारियों ने सीधी सादी जिंदगी को तनाव और कुंठा में परिवर्तित कर दिया है। व्यक्ति की सोच ने अपनी क्षमता के दायरे तोड़ दिए हैं। असंतुष्टि ने नई-नई दिमागी बीमारियों को जन्म दिया है। नए लेखकों से कहना चाहूंगी कि लेखन के साथ अध्ययन बहुत ज्यादा जरूरी है। गालिब ने कहा था एक लाख शेर पढ़ो तब एक ग़ज़ल लिखो। निश्चय ही जितनी अधिक किताबें पढ़ेंगे उतना अधिक लेखन में निखार आएगा।

संतोष श्रीवास्तव - परिचय

जन्म....23 नवँबर जबलपुर

शिक्षा...एम.ए(हिन्दी,इतिहास) बी.एड.पत्रकारिता मेँ बी.ए

प्रकाशित पुस्तके....बहके बसँत तुम,बहते ग्लेशियर,प्रेम सम्बन्धोँ की कहानियाँ आसमानी आँखों का मौसम (कथा सँग्रह) मालवगढ की मालविका.दबे पाँव प्यार,टेम्स की सरगम,हवा मे बँद मुट्ठियाँ,(उपन्यास) मुझे जन्म दो माँ(स्त्री विमर्श) फागुन का मन(ललित निबँध सँग्रह) नही अब और नही तथा बाबुल हम तोरे अँगना की चिडिया  (सँपादित सँग्रह) नीले पानियोँ की शायराना हरारत(यात्रा सँस्मरण)

विभिन्न भाषाओ मेँ रचनाएँ अनूदित,पुस्तको पर एम फिल तथा शाह्जहाँपुर की छात्रा द्वारा पी.एच.डी,रचनाओ पर फिल्माँकन,कई पत्र पत्रिकाओ मेँ स्तम्भ लेखन व सामाजिक,मीडिया,महिला एवँ साहित्यिक सँस्थाओ से सँबध्द, प्रतिवर्ष हेमंत फाउँडेशन की ओर से हेमंत स्मृति कविता सम्मान एवं विजय वर्मा कथा सम्मान का आयोजन,महिला सँस्था विश्व मैत्री मँच की संस्थापक,अध्यक्ष

पुरस्कार.... अठारह राष्ट्रीय एवं दो अँतरराष्ट्रीय साहित्य एवँ पत्रकारिता पुरस्कार जिनमे महाराष्ट्र के गवर्नर के हाथो राजभवन मेँ लाइफ टाइम अचीव्हमेंट अवार्ड तथा म.प्र. राष्ट्र भाषा प्रचार समिति द्वारा मध्य प्रदेश के गवर्नर के हाथों नारी लेखन पुरस्कार विशेष उल्लेखनीय है। एस.आर.एम.विश्वविद्यालय्में बी.ए.के कोर्स में कहानी “एक मुट्ठी आकाश” सम्मिलित। मुझे जन्म दो माँ पुस्तक पर राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी की मानद उपाधि।  महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी का राज्यस्तरीय हिन्दी सेवा सम्मान।भारत सरकार अंतरराष्टीय पत्रकार मित्रता सँघ की ओर से 20 देशो की प्रतिनिधी के रूप मेँ यात्रा।
संप्रति लेखन,पत्रकारिता

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