... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

सुदर्शन वशिष्ठ से बातचीत


 

  1. आपकी कहानियाँ समाज प्रधान न हो कर व्यक्ति-विशेष की कहानी बताती हैं. हर इंसान अद्वितीय होता है, उसके चारों तरफ़ अनेकों कहानियाँ मंडरा रही होता हैं, उन्हीं को आप बड़ी खूबसूरती से सुनाते हैं. पाठक भी मुख्य पात्र की निजी यात्रा में मज़े से उस के साथ लग जाते हैं. पढ़ने वाले को ऐसा नहीं लगता वो अखबार की कोई खबर पढ़ रहा है, बल्कि यों लगता है कि उसने आपकी कहानी पढ़ कर एक नया दोस्त बना लिया है. इसीलिये आप मेरे पसंदीदा लेखक हैं. क्या आप बताना चाहेंगे आपकी ये लिखने कि यात्रा किस उम्र में और कैसे शुरू हुई.

 

  सु. व. - व्यक्ति से ही समाज की निर्मिति होती है। व्यक्ति समाज की हर गतिविधि का साक्षी रहता है।     उस के इर्द गिर्द ही समाज के समस्त क्रियाक्लाप घूमते हैं। समाज की इकाई में व्यक्ति की प्रमुख भूमिका है। व्यक्ति से ही समष्टि का निर्माण होता है। अतः कहानियों में भी व्यक्ति प्रमुख दिखलाई पड़ता है। एक कहानी में जीवन्त पात्र ही सशक्त माध्यम होते हैं, जो पाठक को साथ लिए चलते हैं। यदि कोई पात्र, पाठक को साथ चलता हुआ लगे तो समझिए आप अपने कहन में सफल हुए। ऐसे पात्र चलचित्र की तरह दिखलाई पड़ते हैं। तभी कालजयी कथाओं के पात्र लम्बे समय तक याद रहते हैं।
        बचपन में कहानियां घड़ता था और रात को सोते समय कोई न कोई कहानी अवश्य इमेज़िन करता। यूं लिखना बी0ए0 प्रथम वर्ष से आरम्भ किया। पहली कहानी ‘‘बिकने से पहले’’उस समय के लोकप्रिय पत्र ‘‘वीर प्रताप’’ में 8 अगस्त 1969 में छपी जब मैं शिमला में बी0ए0 द्वितीय वर्ष का छात्र था। यह अख़बार पुस्तकालय से ले कर हर हलवाई और नाई की दुकान में होता था। इसके बाद बी0एड0 की पढ़ाई करते हुए 1971-72 में लेखन ने जोर पकड़ा। सन् 1977 में प्रदेश के संस्कृति विभाग में नौकरी लगने पर कुछ समय के लिए लेखन लगभग छूट सा गया। कभी बहुत कम तो कभी ज्यादा चलता रहा। किंतु इसी दौरान कुल्लू में पोस्टिंग होते हुए जून 1980 में धर्मयुग में ‘‘सेमल के फूल’ कहानी छपने से एक पहचान मिली। इस दौरान ही धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान में रचनाएं आईं।

 

2. आपकी हर कहानी में पहाड़ों की हवा बहती महसूस होती है. मालुम चलता है आप हिमाचल की संतान हैं. पढ़ते पढ़ते कितनी बार ऐसा लगा कि हमने भी पढ़ना बंद कर शिमला की किसी पुरानी ऊँची गोथिक इमारत की मोटे काँच की खिड़की पर चेहरा चिपका कर बाहर सेब के बगीचे, ऊँचे देवदारु के पेड़, पेड़ों पर से गिरती बर्फ़ या मॉल रोड के नज़ारे देखने शुरू कर दिये. आपके परिवेश ने आप पर और आपके लेखन पर क्या प्रभाव डाला है. अपने देश  के बारे में बताएँगे जिस से पढ़ने वाला वहाँ घूमने को मजबूर हो जाए.

सु. व. - पहाड़ों में रहते हुए यहां के जन जीवन, यहां की प्रकृति और सौंदर्य से अभिभूत हो जाना स्वाभाविक है। किंतु इस प्राकृतिक सौंदर्य के बीच एक अभाव भी है, एक भयावहता भी है, उसे सामने लाना मकसद रहा है। जैसा पहाड़ के परिवेश पर यशपाल, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा ने लिखा; उन्हीं के पदचिह्नों पर चलने की एक कोशिश की है। पहाड़ की जिस भयावहता को यशपाल न ‘‘खच्चर’’ जैसी कहानी में उकेरा या जिस बारीकी को निर्मल वर्मा ने ‘‘अंधेरे में’’ में बुना या मोहन राकेश ने ‘‘मंदी’’ जैसी कहानी में चित्रित किया; कुछ उसी तरह का एहसास अपनी कहानियों में पैदा करने की एक कोशिश रही है।
     ज़ाहिर है अपना परिवेश ही लेखन में आता है। जो व्यक्ति देखता है, महसूसता है, वही तो लिखता है। ये कहानियां मेरे परिवेश ने ही दी हैं। शिमला, धर्मशाला, डलहौजी, चंबा जैसे प्राकृतिक स्थानों का उल्लेख बहुतों ने अपनी रचनाओं में किया है जिससे इन स्थानों को देखने की इच्छा तो पाठक के मन में जगती ही है। यदि सही और प्रभावी चित्र बन पाता है पाठक अपने को उसी परिवेश में महसूस करता है। किंतु इस सौंदर्य के पीछे जो दुख दर्द है, जो पीड़ा है, वह भी सामने आना जरूरी है। सौंदर्य के साथ साथ पहाड़ का जीवन बहुत कठिन और कष्टमय है।

3. क्या लिखना आपकी दिनचर्या का आवश्यक भाग है. यदि हाँ, तो आप कितना समय लिखने में बिताते हैं.

सु.व. - जब सरकारी नौकरी में था तो लिखने के लिए समय चुराना पड़ता था। रिटायरमेंट के बाद लिखना दिनचर्या का ज़रूरी अंग बन चुका है। रोज़, चाहे थोड़ा ही सही, कुछ न कुछ अवश्य लिखा जाता है। जब तक मन में कुछ उथल पुथल न मचे, लिखा भी तो नहीं जाता। न लिखते हुए कुछ समय बीत जाए तो ख़ाली ख़ाली लगने लगता है। ऐसा भी होता है कि छः छः महीने तक कोई कहानी नहीं लिखी जाती। ऐसे में लेख, व्यंग्य आदि हलके फुलक रचनाकर्म में समय बीतता है।

4. क्या महान लेखक अन्य लेखकों की कृतियाँ पढ़ते हैं. एक अच्छे लेखक के लिये औरों का लिखा साहित्य पढ़ना कितना ज़रूरी है. (आपके फ़ेवरिट लेखक ...) 

 सु.व. - एक लेखक, ख़ासकर नये लेखक के लिए महान् लेखकों की कृतियां पढ़ना बहुत जरूरी है। लेकिन मैं समझता हूं कुछ लिखते हुए औरों को पढ़ना अवोएड करना चाहिए अन्यथा किसी न किसी रूप में उस लेखक की छाप लेखन पर चाहे अनचाहे ही पड़ जाती है। लेखन में कुछ प्रौढ़ता आने के बाद औरों को पढ़ना केवल ‘‘आज के लेखकीय  ट्रेंड’’ को जानने के लिए ही होना चाहिए ताकि आप समय के साथ चल सकें। पढ़ने के लिए भी उतना ही समय चाहिए, जितना लिखने के लिए। और फिर बहुत सी रचनाएं ऐसी भी है जो एक बार पढ़ने से ग्रहण नहीं हो पाती या बार बार पढ़ने से नये नये अर्थ देती हैं। सेमी क्लासिक गीतों की तरह कुछ रचनाएं पहले पाठ में साधारण सी लगती हैं किंतु दोबारा पढ़ने पर ज्यादा अच्छी लगती हैं।
मेरे प्रिय कथाकरों में मोहन राकेश रहे हैं। आरम्भ से ही उन्होंने मुझे बहुत प्रभावित किया। इनके साथ कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, धर्मवीर भारती।

 

5. किन बातों से आपको कहानी लिखने की प्रेरणा मिलती है.

 

सु.व. - लिखने की प्रेरणा अपने से, अपने जीवन से, अपने आसपास के वातावरण से मिलती है। समाज में निरंतर कुछ न कुछ ऊट पटांग घटता रहता है। कोई घटना निरंतर हांॅट करती है जिसे लिखने पर विवश होना पड़ता है। यह घटना अपने साथ भी हो सकती है और किसी अन्य नजदीकी या तीसरे व्यक्ति के साथ भी।

6. कुछ लेखकों के लिये ये ज़रूरी होता है कि वे अपनी कहानियों में समाज का दर्पण पेश करें और हो सके तो किसी तरह का वार्तालाप शुरू करें. कुछ लेखक बस अपनी कहानी सुनाने के लिये लिखना चाहते हैं. अच्छा लेखक चाहे किसी भी श्रेणी में लिखना पसंद करता हो, अपनी लिखी कहानी में जादु डाल देता है. आप खुद को किस श्रेणी में डालते हैं. (क्यों, और क्यों नहीं. अगर आप कोई तीसरी, चौथी ...श्रेणी डालना चाहते हैं, तो प्लीज़, यू आर वैलकम)

 

 सु.व. - एक समय आता है जब लिखना एक मजबूरी हो जाती है मगर यह मात्र अपने लिए नहीं होता। जो लेखन समाज के लिए न हो, उसका कोई प्रयोजन नहीं है। लेखक समाज से ही लेता है और उसे समाज को ही वापिस लौटाता है। भारतीय साहित्य में आज तक कोई भी रचना केवल सुनाने या मन बहलाने के लिए नहीं लिखी गई। रचना के पीछे कोई न कोई मकसद छिपा रहता है। ये अपने पास छिपा कर रखने की चीज़ नहीं है। इसे समाज के साथ साझा करना पड़ता है बल्कि उसे सौंपना पड़ता है। अतः समाज का यह प्रलाप या वार्तालाप समाज को ही सुनाना होता है। छपने के बाद रचना अपनी नहीं रह जाती, वह पूरे समाज की बन जाती है।
   हां, हर लेखक की कोशिश रहती है वह अपनी रचना को ज्यादा से ज्यादा सशक्त, अधिक से अधिक सम्प्रेषणीय बनाए। कोई रचना बन पाती है, कोई नहीं। बहुत बार लेखक अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने में सफल होता है, बहुत बार नहीं भी होता। कई बार लेखक जो कहना चाहता है, जो उसका अभीष्ट होता है, वह पाठकों तक वैसा नहीं पहुंचता या पाठक उसे वैसा ग्रहण नहीं कर पाते। वे उसका अपने ढंग से, अपनी सोच के अनुसार अर्थ निकालते हैं। तथापि समाज को उसका चेहरा दिखाना कथाकार का ध्येय रहता है।

7. आप सांस्कृतिक गतिविधियों में भी काफ़ी दिलचस्पी रखते हैं. उस बारे में कुछ विस्तार में बताएँगे.

उत्तर :

 सु.व. -  क्योंकि मैं संस्कृति विभाग में सेवारत रहा अतः सांस्कृतिक गतिविधियों में रूचि लेना मेरा कर्त्तव्य था। इस नाते सांस्कृतिक गतिविधियों में और विशेषकर प्रदेश की अनूठी संस्कृति में मेरी रूचि बढ़ी। अपनी संस्कृति को जानने की कोशिश की। संस्कृति विभाग और अकादमी में नौकरी के दौरान कोई सत्तर पुस्तकों के संपादन से मैं सीधा जुड़ा रहा।  सम्भवतः यही कारण था कि प्रदेश की संस्कृति पर  यात्रा एवं शोध के रूप में मेरी तीस के लगभग पुस्तकें आईं। ‘‘हिमालय गाथा’’ श्रृंखला के छः खण्ड लिख पाया जो किताबघर प्रकाशन दिल्ली से छपे। ‘देव परंपरा’, ’पर्व उत्सव’, -समाज संस्कृति’,‘लोक वार्ता’, ‘जनजाति संस्कृति’,, ‘इतिहास’ नाम से इन पुस्तकों का बहुत स्वागत हुआ। कई पुस्तकों के तीन तीन संस्करण छपे।

24 सितम्बर 1949 को पालमुपर (हिमाचल) में जन्मे सुदर्शन वशिष्ठ ने 125 से अधिक पुस्तकों का संपादन/लेखन किया है। मूलतः कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित। अब तक दस कथा संकलन प्रकाशित। चुनींदा कहानियों के पांच संकलन और पांच संकलनों का संपादन।
  चार काव्य संकलन, दो उपन्यास, एक व्यंग्य संग्रह के अतिरिक्त संस्कृति पर विशेष काम। हिमाचल की संस्कृति पर विशेष लेखन में ‘‘हिमालय गाथा’’ नाम से छः खण्डों में पुस्तक श्रृंखला के अतिरिक्त संस्कृति व यात्रा पर बीस पुस्तकें।
पांच ई-बुक्स प्रकाशित: कथा कहती कहानियां (कहानी संग्रह), औरतें (काव्य संकलन), डायरी के पन्ने (नाटक), साहित्य में आतंकवाद (व्यंग्य), हिमाचल की लोक कथाएं।    
जम्मू अकादमी, हिमाचल अकादमी, साहित्य कला परिषद् (दिल्ली प्रशासन) तथा व्यंग्य यात्रा सहित कई स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा साहित्य सेवा के लिए पुरस्कृत। हाल ही में हिमाचल अकादमी से ‘‘जो देख रहा हूं’’ काव्य संकलन पुरस्कृत। हिन्दी साहित्य के लिए हिमाचल अकादमी के सर्वोच्च सम्मान ‘‘शिखर सम्मान’’ से 2017 में सम्मानित।
कई रचनाओं का भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद। कथा साहित्य तथा समग्र लेखन पर हिमाचल तथा बाहर के विश्वविद्यालयों से दस एम0फिल0 व पीएच0डी0।
पूर्व उपाध्यक्ष/सचिव हिमाचल अकादमी तथा उप निदेशक संस्कृति विभाग। पूर्व सदस्य साहित्य अकादेमी, दुष्यंत कुमार पांडुलिपि संग्रहालय भोपाल।
वर्तमान सदस्यः राज्य संग्रहालय सोसाइटी शिमला, आकाशवाणी  सलाहकार समिति, विद्याश्री न्यास भोपाल।
पूर्व फैलो    : राष्ट्रीय इतिहास अनुसंधान परिषद्।
सीनियर फैलो: संस्कृति मन्त्रालय भारत सरकार।

सम्प्रति: ‘‘अभिनंदन’’ कृष्ण निवास लोअर पंथा घाटी शिमला-171009. (094180-85595, 0177- 2620858)
ई-मेल: vashishthasudarshan@yahoo.com

बैकग्राऊंड चित्र आभार : श्री सुदर्शन वशिष्ठ