कविता, शब्दों में चुप्पी ढूँढने का नाम है ...

प्रख्यात कवित्री, चित्रकार, शिक्षक, आलोचक सुकृता पॉल कुमार - प्रतियोगिता निर्णायक - से बातचीत

साक्षात्कारकर्ता - रेखा सेठी

सहयोग - प्रतिष्ठा सिंह

आभार - समय की कसक (वाणी प्रकाशन)

​रेखा सेठी: आपने अध्यापन, लेखन और शोध की लम्बी-यात्रा तय कर ली है, पीछे मुड़कर देखते हुए, आपको लगता है कि कविताएँ आपके मन के ज़्यादा नज़दीक हैं ?

सुकृता पॉल: मन तो यही कहना चाहता है कि कविता ही सबसे नज़दीक है । सजग भाव से मैंने अपने जीवन में काफी देर के बाद इस पर सोचा कि मैं कविता को क्यों ज़्यादा अहमियत देती हूँ। मैं सोचती हूँ कि चाहें आलोचनात्मक लेखन हो, पढ़ाना हो--जो मेरा पैशन है  जिसमें अपने आप को पूरा दे सकते हैं, जहाँ आपकी भावनाएँ और विचार एक हो जाते हैं, उसमें ही आप कवित्व खोज लेते हैं तो मुझे नहीं लगता की इस तरह का कोई अनुक्रम  हमें बनाना चाहिए । मगर हाँ, यह सच है कि मैं स्वयं इस अनुक्रम से काफी देर तक जूझती रही हूँ लेकिन अब मुझे लगता है कि जो भी करो उसमें पूरी तरह से डूब जाओ, वही कविता है ।

 

रेखा सेठी:  आपको अपनी पहली कविता याद है ?

सुकृता पॉल: पहली कविता मैंने बहुत बचपन में लिखी, जब मैं अफ्रीका में थी । उस समय कविता लिखते समय सारा ध्यान कविता में लय और ताल पर रहता था ।  उन दिनों हमारे लिए, कीनिया में पराग, चंदामामा, बाल भारती जैसी पत्रिकाएँ मंगाई जाती थीं ताकि हम बच्चे हिंदी सीख सकें। उन्हें पढ़ते हुए मुझे भी यह अहसास हुआ कि मैं कुछ लिखूं जो प्रकाशित हो तो मैंने एक कविता लिखी जो 'पराग' में प्रकाशित हो गयी । उस कविता से मैंने मन में अपने आप को एक कवि के तौर पर स्थापित कर लिया । उस पहली कविता में कवितापन न होते हुए भी मेरे भीतर  बहुत आत्मविश्वास भर दिया क्योंकि मेरी लिखी पहली कविता ही प्रकाशित हो गई थी । मुझे याद है उसके  छपने से घर भर में उत्साह भर गया था। 

 

रेखा सेठी: सजग रूप में आपने अपने भीतर के कवि को कब पहचाना?

सुकृता पॉल: ऐसी सजगता बहुत बाद में आई, कॉलेज के बाद जब मैं अपनी परास्नात्क की पढाई कर रही थी या उसके भी बाद में। मेरे पास लिटरेचर विषय था सो बहुत सारी कविताएँ पढ़ती थी इसके अलावा घर में साहित्य का माहौल भी था, पढ़ने के लिए हर वक़्त किताबें आस-पास मौजूद रहती थीं । जब मैं अपनी रिसर्च के लिए अमेरिकन स्टडीज रिसर्च सेंटर, हैदराबाद गई थी तब वहाँ के एक ग्रुप में एक-दूसरे की कविताएँ पढ़ना...लिखना खूब होता था। वहाँ पढ़ते हुए हमें एक प्लेटफॉर्म मिला कि आप अपनी कविता को डायरी से निकाल कर पब्लिक डोमेन में ला रहे हो। उसके बाद, जब मैं दिल्ली आयी तो केशव मालिक से मिली जो 'थॉट' नाम की एक पत्रिका छापते थे, उनको मैंने हिचकिचाते हुए अपनी कविता दी वह भी प्रकाशित हो गई। ऐसे ही उमा वासुदेव को मैंने अपनी कविता दी, उस समय वे 'सर्च' नाम की एक पत्रिका निकालती थी उन्होंने भी मेरी कविता स्वीकृत कर ली। इस तरह शुरू में मुझे कविता छपवाने के लिए कोई परेशानी नहीं हुई जबकि बाद में रिजेक्शन्स भी मिली लेकिन शुरुआत में जो प्लेटफॉर्म और आत्मविश्वास मिला उसकी नींव पहली कविता और युवावस्था में प्रकाशित कविताओं से मिल चुकी थी। उस वक़्त, लक्ष्य यह रहता था कि यदि कोई पंक्ति या बिंब या घटना जिससे आप प्रभावित हुए हों वह दिमाग में आ गई है तो उसे पकड़ कर कैसे रखूं ताकि वह गायब न हो जाए।  शायद इंसान कविता इसलिए भी लिखता है कि अंदर कुछ हुआ है । पहले तो उसका मुकाबला करने की कोशिश में, फिर उसे समझने की कोशिश में । ऐसा अक्सर होता है। इस बात की असुरक्षा मुझे आज भी बहुत महसूस होती है कि कहीं एक पद भी दिमाग में आ गया तो वह गायब न हो जाए, इसीलिए मैं उसे जल्दी से लिखने की कोशिश करती हूँ।  

 

रेखा सेठी: अपनी कविता की काव्य प्रेरणा के विषय में और कुछ बताइए...   

सुकृता पॉल: मेरे हिसाब से यह एक ऐसा प्रश्न है जो मुझे खुद से पूछना चाहिए क्योंकि कहीं यह तो ज़रूर महसूस होता है कि प्रेरणा है और यह प्रेरणा शुरू से अब तक बनी हुई  है। कई बार ऐसी कोई घटना होती है तो लगता है कि मैं उससे बहुत प्रभावित होती हूँ लेकिन उस वक़्त कविता नहीं आती । ढीठ बन जाती है । अंदर ही अंदर  उस समय प्रेरणा क्यों नहीं होती, यह मुझे नहीं पता। कई बार मैं खुद से ही पूछती हूँ कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि भावुकता जब अधिक हो जाती है तब शायद कविता हो ही नहीं सकती। उस वक़्त शायद आप कविता को जी लेते हो लेकिन लिख नहीं पाते, इसीलिए अलगाव का कोई तत्व तो चाहिए ही चाहिए। मुझे लगता है प्रेरित तो मैं काफी रहती हूँ, मुझे बहुत सारी चीज़ें प्रेरित करती हैं लेकिन वह चीज़  कविता में कब बदल जाती है, मालूम नहीं । इसके साथ कई चीज़ें जुड़ी हुई हैं जैसे प्रकृति की बात हो तो हिमालय । विदेशों के पहाड़ मुझे प्रेरित नहीं करते । मुझे लगता है इसमें अपनापन भी चाहिए। वहाँ अपनापन है या हिमालय में ही कोई जादू है, पता नहीं। कुछ प्रेरणा प्रकृति से मिलती है और कुछ दुःख-दर्द से । वह दुःख चाहे मेरा हो या किसी और का, दूसरों के दर्द को अपना लेना, जिससे वह अपना-सा हो जाए, तब शायद मुझे अपने आप को बचाने के लिए कविता लिखनी पड़ती है। शायद मैं कविता इसलिए लिखती हूँ कि अपने आप को संरक्षित कर सकूँ। यही जीवन प्रवृति है।  

 

रेखा सेठी:  आपकी कविताओं के बहुत सारे अनुवाद हुए हैं । बहुत महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने ये अनुवाद किये हैं जिनमें से एक प्रसिद्ध नाम गुलज़ार साहब का भी है । यह अनुवाद 'हार्पर कॉलिंस' से प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने कहा है कि एक तरह से यह इन कविताओं की घर वापसी है। आपको अपनी कविताओं के अनुवाद कैसे लगते हैं ?  

सुकृता पॉल: देखिये मेरा यह विश्वास है कि जो अनुवाद करता है जब तक वह उस कविता को अपनी नहीं बना लेता तब तक वह अनुवाद ठीक से नहीं कर सकता। अगर अनुवादक कविता को पूरा अपना बना लेता है तो हक़ से स्वतंत्र अनुवाद कर सकता है । एक कवि होने के नाते मेरा कोई हक़ नहीं बनता की मैं अपने अनुवादक से किसी प्रकार का झगड़ा करूँ कि यह ठीक नहीं है।  निष्पक्ष रूप से उसे देखना अलग बात है।  गुलज़ार साहब ने मेरी कविताओं का अनुवाद करते हुए 'कविता की घर वापसी' की बात कही इसलिए किताब का नाम भी यही है "पोयम्स कम  होम" । यह गुलज़ार साहब का नज़रिया है कि इन कविताओं में उन्हें हिन्दुस्तानियत नज़र आती है । उन्होंने अपनी भूमिका में भी लिखा है कि उन्होंने इन  कविताओं की  हिन्दुस्तानियत उभारी है । उनका नज़रिया अपनी जगह सही है, लेकिन मेरे नज़रिये से अंग्रेज़ियत भी इन कविताओं का अहम अंश है और हिंदुस्तानी भी। इन दोनों के संवाद से कविताओं में तीसरी सच्चाई उभरती है । मैं यह नहीं कहूँगी कि अंग्रेज़ी सिर्फ एक आवरण था क्योंकि अगर हमने उस भाषा को अपनाया न होता तो मैं अंग्रेज़ी में अपनी कवितायेँ क्यों लिखूती? किसी ने बंदूक की नोक पर तो मुझे ऐसा करने को नहीं कहा ! मेरी कविता की भाषा पर किसी तरह का दबाव नहीं था । बचपन के पहले पन्द्रह साल कीनिया में गुज़ारने से मेरी भाषा को जो गति मिली, उसमें बचपन से ही अंग्रेज़ी का साथ रहा । आधिकारिक तौर पर हमने हिंदी कभी नहीं सीखी, यहाँ भारत में आकर हिंदी सीखी और इसके अलावा अपनी दादी के ज़रिये पंजाबी संस्कृति मेरे भीतर समाई हुई थी । यह जो बहुभाषिकता है जिसमें अंग्रेज़ी, हिंदी, उर्दू और पंजाबी शामिल हैं, यह सब मिलजुल कर मेरा एक व्यक्तित्व बनता है। उस व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति में हिंदुस्तानी ज़रूर झलकेगी । हर भाषा का अपना मिजाज़  होता है। मेरी कविता का मिजाज़ बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक है। यह तो आलोचक ही निर्णय करेंगे कि उस हिंदुस्तानी में अंग्रेज़ी कितनी अनिवार्य है।   

 

रेखा सेठी:  अभी आपने कहा कि हर भाषा का अपना एक मिजाज़ होता है, आपने जब अपनी कविताओं के अनुवाद पढ़े तब आपको कैसा लगा ? क्या उन्हें नया जीवन मिला या वे नए मिजाज़ में ढलकर नया स्वरुप ग्रहण करती  हैं ?

सुकृता पॉल: देखिए अनुवाद में मनोवृति  की बात भी है और उसमें एक इंटरप्रेटेशन भी आ जाता है । खासतौर पर कविता में, क्योंकि कविता सांकेतिक होती है। उसके अर्थों में स्थिरता नहीं होती यदि आप उसका एक अर्थ  निकालें तो उसका मतलब कोई दूसरा भी हो सकता है। उसमें अनेकार्थीपन आ जाता है और कविता हमेशा अपनी  बहु-व्याख्याओ के लिए जानी जाती है । यही कविता की ख़ूबसूरती है।  मुझे अच्छा लगता है जब अनुवाद होता है जैसे आपने अनुवाद किया तो आपकी संवेदनशीलता मेरी उन कविताओं में झलकेगी। आप जिन शब्दों का इस्तेमाल करेंगी, वह आपका ही चुनाव है, मेरा नहीं । अनुवाद करते समय  भाषा भी दूसरी हो जाती है और उसका मिजाज़ भी। हो सकता है उसमें कविता का नज़रिया भी बदल जाए।  ऐसा करने का अनुवादक को पूरा हक़ है। यदि आप अपने हक़ का इस्तेमाल नहीं करते हैं तो यह भी मुझे मालूम हो जाएगा कि आप खुद को धोखा दे रहे  हैं या मुझे। इसका साफ़ मतलब है कि आप उसे अपना नहीं पाए हैं । यह आपकी और मेरी कहानी नहीं है यह कविता की बात है और इसमें कविता की अपनी अलग जिंदगी बन जाती है। एक अनुवादक के रूप में आपकी सफलता भी उसी पर निर्भर करती है कि वह कविता स्वतंत्र बन जाए । अंग्रेज़ी में एक शब्द है ‘ऑटोटेलिक ऑटोनोमी' अनुवादक के रूप में आपकी सफलता भी वही है कि वह कविता स्वतंत्र हो जाए। जैसे माँ एक बच्चे को जन्म देती है  तो उस बच्चे की एक पहचान तो यह है कि वह आपका बच्चा है, दूसरी उसकी खुद की भी तो एक पहचान है।  

 

रेखा सेठी: अभी हम आपकी उन कविताओं की बात कर रहे थे जिनके अनुवाद गुलज़ार साहब ने किये हैं । इन कविताओं के बिंब खास तरह के भारतीय परिवेश से आते हैं । जब आपकी कविताओं के अनुवाद भारतीय भाषाओँ में होते हैं तब उनकी पहचान बहुत सहजता से हो जाती है । क्या विदेशी भाषाओँ में भी आपकी कविताओं के अनुवाद हुए हैं?  

सुकृता पॉल: बिलकुल हुए हैं, इटालियन और स्वाहिली और अभी हाल ही में स्लोवाकियाई भाषा में भी हुए है।  किसी रचना का अनुवाद करते समय अनुवादक उस कविता को उस देश की संस्कृति में ढाल सकता है । हाल में जब मैंने अपनी कविताएँ स्लोवाकियाई भाषा में सुनीं ...यह बात ब्रातिस्लावा की है । मुझे यह बहुत रोचक लग रहा था कि कैसे मेरी  कविताएँ स्लोवाकियाई संगीतात्मकता में गोते लगा रहीं थीं । ये कवितायेँ काफी भावनात्मक हो गई थीं । अगर मुझे अपनी कविता का स्वर ठीक नहीं लगता तो मैं उस कविता को निर्ममता से नष्ट  कर देती हूँ। पहले मैं ऐसा नहीं कर पाती थी लेकिन अब मैं अपने लिखे में इसी तरह मौलिक सार तक पहुँचने की कोशिश करती हूँ । उसकी आतंरिक लय पर अधिक ज़ोर होता है । मैंने वहाँ पर देखा कि उस भाषा में कविता-पाठ  में ही संगीत सुनाई दे रहा है । इस तरह कविता में अनुवाद के ज़रिये एक और आयाम जुड़ गया ।

  

रेखा सेठी: प्रतिष्ठा, आपने इतालवी भाषा में सुकृता जी की कविताओं का अनुवाद किया है, वे कविताएँ आप तक कैसे पहुँचती हैं और आपको क्या लगता है कि उस भाषा के पाठकों तक वे कैसे पहुँचती हैं ? 

प्रतिष्ठा : सुकृता की कविताओं का अनुवाद करने की खास वजह यह थी कि उनकी कविताएँ किसी देश विशेष की नहीं हैं । वे केवल भौगोलिक सीमाएँ ही नहीं दूसरी सभी सीमाओं को लाँघ जाने वाली कविताएँ हैं । इसलिए मुझे उनमें खास चुनाव नहीं करना पड़ा हालाँकि दूसरे लेखकों की कवितायेँ या गद्य मुझे चुनना पड़ता है कि कौन-सी चीज़ अनुवाद  के लिए ज़्यादा उपयुक्त रहेगी, जैसे माँ-बेटी के अंदरूनी संघर्ष को लेकर कविता है या खुद को तलाशने की जद्दोजहद वाली कविताएँ हैं और प्रकृति पर जो कविताएँ हैं वे इटली में भी उतनी ही मान्य होंगी जितनी हिन्दुस्तान में । वहाँ के लोग इन कविताओं में अपने सच तक पहुँच सकते हैं । मुझे सुकृता जी की सुनामी वाली कविताएँ भी बेहद पसंद हैं । जिन लोगों ने प्राकृतिक आपदाओं के बारे में पढ़ा या महसूस किया हो वे आसानी से उन कविताओं के साथ अपने को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं । इस तरह, सुकृता जी की कविताएँ सबको छू लेती हैं।  

 

रेखा सेठी:  सुकृता जी, जैसा आपने कहा आपकी कविताओं में संवेदनशील तीव्रता है लेकिन अमूमन अंग्रेज़ी रचनाओं का मिजाज़ ऐसा होता है कि आप उसमें एक तरह का अलगाव, तटस्थता लेकर चलते हैं और उसमें निरपेक्ष भाव ज़्यादा रहता है..  

सुकृता पॉल: हाँ निश्चय ही, नहीं तो उसे नाटकीय या अतिभावुकतापूर्ण कविता कहा जाता और जहाँ तक मुझ पर प्रभाव की बात की जाए तो मेरे ऊपर सेम्युल बैकेट का प्रभाव है । वे  मानते थे कि कविता में अभिव्यक्ति कम से कम शब्दों में होनी चाहिए । उनका नाटक 'वेटिंग फ़ॉर गोदो’ जिसमें उन्होंने बेहद कम शब्दों में बहुत कुछ लिख दिया । बैकेट की भाषा शब्दों में नहीं ख़ामोशी में बसती रही । उनका कहना था कि शब्दों को इस तरह इस्तेमाल करना चाहिए कि ख़ामोशी का तस्सवुर बने । शब्दों के बीच की ख़ामोशी, पंक्तियों के बीच की चुप्पी...अल्पविराम... स्पेस एक पद से दूसरे पद के बीच...मैं ऐसा कई बार जानबूझ कर भी करती हूँ। मैं नहीं चाहती की मेरी कविताओं में बहुत सारे शब्द हों क्योंकि बहुत अधिक शब्द कागज़ पर लय की बजाए शोर उत्पन्न करते हैं । मेरा यह स्टाइल बन गया है । आप मेरी अनुवादक रही हैं आपने भी यह महसूस किया होगा। 

 

रेखा सेठी:  जी बिलकुल ठीक कहा आपने । आपकी कविताओं के अनुवाद का मेरा अनुभव भी यही रहा । उसमें सबसे बड़ी समस्या मुझे यही आती थी कि जिस कसावट के साथ आप अपनी बात करती थी शायद मेरे मिजाज़ में उतनी कसावट नहीं है। कई बार ऐसा हुआ है कि दूसरे शब्द उसमें जुड़ गये या उसकी लय थोड़ी बदल गई। अनुवाद करते हुए इन बातों को लेकर मेरे मन में हमेशा यह दुविधा बनी रही । प्रतिष्ठा, अनुवाद एक अभ्यास है तुम्हें लगता है कि क्या उससे रचना को पुनर्जीवन मिलता है ?

प्रतिष्ठा : मुझे कविता का अनुवाद करते समय यह उत्साह रहता है कि जो लोग इस भाषा को नहीं जानते, और मैं उन लोगों को जानती हूँ, वे इन कविताओं को पढ़ें । मेरे दोस्त इटालियन हैं और छात्र भी हैं, उन्हें यह पता चले कि हम यहाँ क्या काम कर रहे हैं । कविता के सारे लफ्ज़ हुबहू उन तक न भी पहुँचें मगर कविता का सार या रस बरक़रार रहना चाहिए। मेरा इटालियन पाठक यह जान सके कि मेरे कवि ने इन्हें अपने समय में संवेदनशीलता से लिखा है। इतालवी भाषा में बहुत बार सब्जेक्ट की ज़रुरत नहीं होती। सीधे क्रिया से पता चल जाता है कि किसके बारे में बात हो रही है तो हमने उन शब्दों को हटा दिया फिर भी एक कवि के रूप में सुकृता पॉल का वह स्टाइल बना रहा। इटली के लोग अपने साहित्य से भी थोड़ा निराश हैं, वे लोग फ़्रांस का साहित्य ज़्यादा पढ़ते हैं सीधे अंग्रेज़ी में भी नहीं पढ़ते उनका ज़ोर अनुवादों पर ज़्यादा रहता है तो भारतीय भाषाओँ से या हिन्दुस्तानी की संवेदनशील रचनाएँ उन तक पहुँचें तो अच्छा लगता है ।  

रेखा सेठी: प्रतिष्ठा जब आप अनुवाद कर रहीं थीं तब आपको कई बार भाषा के साथ समझौता करना पड़ा होगा वह कितना सहज था? 

प्रतिष्ठा : कवितायेँ अंग्रेज़ी में थी तो काफी फर्क था, मतलब मुझे लगता है हिंदी से अनुवाद करना आसान होता, बजाये अंग्रेज़ी के । हिंदी की वाक्य-संरचना इतालवी के ज़्यादा नज़दीक है । हाँ, एक दो जगह, मुझे समझौता करना पड़ा । कई बार सुकृता जी से फ़ोन पर पूछती भी रहती थी लेकिन रोचक यह था कि कविताओं की भाषा में संगीतात्मकता थी । जब आप उन्हें पढ़ते हैं तो उनमें बहाव की सुंदरता महसूस होती थी, उसको पकड़ने में मुझे काफी ज़्यादा दिक्कत हो रही थी क्योंकि और कुछ नहीं तो मुझे उसके वाक्य-विन्यास को बदलना पड़ता था और इटालियन में काफी संभव होता है कि आप अपनी ज़रुरत के अनुसार क्रिया के साथ खेल सकें। मैंने कई बार ऐसा किया कि मैं अनुवाद करके, अपने ग्रीक प्रकाशक को भेज  देती थी । वे अंग्रेज़ी अच्छी तरह से जनते थे तब वे कहते थे कि हम इसे अगली पंक्ति में डाल दें तो अच्छा रहेगा । मैं ऐसा ही करती थी, इस तरह हम कविता में दुबारा बहाव उत्पन्न कर देते थे ।  

 

रेखा सेठी: सुकृता जी, जैसा प्रतिष्ठा भी कह रही है आपकी बहुत-सी कविताओं में आतंरिक संगीतात्मकता है, खासतौर पर आपकी कविता 'द आर्ट ऑफ़ वेअरिंग बेंगल्स', जो कविता की रचना प्रक्रिया पर है । आप उसमें व्याख्यायित करती हैं कि कविता कैसे रूप ग्रहण करती है। मैंने देखा कि पूरी कविता में आतंरिक गीतात्मकता है लेकिन कई जगह ऐसा लगता है कि आपने उसे जबरन रोक लिया है ?   

सुकृता पॉल:  जिस कविता की आप बात कर रही हैं, वह पता नहीं कैसे लिखी गई । यह बात मुझे हैरान करती है क्योंकि ना मैं चूड़ियाँ पहनती हूँ न ही किसी को पहनते हुए देखती हूँ बल्कि उन्हें एक तरह से नज़र-अंदाज़ करती हूँ । पता नहीं कैसे अवचेतन से वह इमेज निकली। जब मैं अपने आप से पूछती हूँ तो सोचती हूँ शायद जब मैं चालीस साल पहले हैदराबाद गई थी तो चार मीनार के आस-पास  चूड़ियों का बाज़ार है, वहाँ के दृश्य मेरे लिए एक कला बन गये । कैसे चूड़ी पहनाने वालों की नज़र चूड़ियों और कलाइयों के आकार पर रहती है। चूड़ी बेचने वाला यह काम इस  सावधानी से करता है कि टूट जाने पर चूड़ी चुभ न जाए। उस वक़्त वह सारा क्रिएटिव प्रोसेस मेरे अवचेतन में रजिस्टर कर गया होगा, पता नहीं ! इतने वर्षों के बाद वह इमेज कैसे उभरी, इस कविता को लिखते हुए, मुझे बड़ा आनंद आया। बरसों बाद, भीतर बसी कोई पुरानी चीज़ बाहर निकलती है मगर भीतर तो वह ताज़ा ही रहती है । उसकी ध्वनि, उसकी खुशबू, उसका माहौल किसी और चीज़ में ढल जाता है। किसी भी कविता को आप उसके माहौल से अलग नहीं कर सकते। उस कविता के मिजाज़ में, एक गहरी हिंन्दुस्तानियत तो हैलेकिन जब यह रूपक कविता लिखने की प्रक्रिया में ढलता है तो वह किसी एक संस्कृति तक सीमित नहीं रहता । ये चूड़ियाँ, ये नाज़ुक रिश्ते और रंग, उन्हें पहनाने के ढंग से एक कविता ही तो बनती है । यह सब बड़ा मज़ेदार अनुभव था। मुझे नहीं लगता उसमें अंग्रेज़ी अप्राकृतिक लगती है । अगर वह अप्राकृतिक लगती है तब इसका मतलब कुछ गड़बड़ है। भाषा कैसे सामग्री से विवाह करती है, कैसे उस संस्कृति को अपनाती है  क्योंकि  अंततः यह हैप्पी मैरिज है ! 

 

 रेखा सेठी:  ये रूपक और बिंब आपकी कविता में इसलिए ज़्यादा आते हैं कि आपके पास एक चित्रकार की आँख भी है, जो रंग और रेखाओं से निरंतर नई-नई रचनाएँ करती रहती है।  

सुकृता पॉल: आप यह ठीक कह रही हैं । इसमें एक और मुद्दा भी है । चित्रकारी मेरे लिए सिर्फ चित्रकला नहीं है ।  उसमें काव्यात्मकता आनी ही है । मुझे लगता है मेरे कवि होने के कारण शायद, मेरी चित्रकारी में भी कवित्व झलकता है। यह सिर्फ अलग माध्यम की बात नहीं है । अगर आप मेरी पेंटिंग्स देखें तो आपको लगेगा की ये एक कवि की पेंटिंग्स हैं। मैं नहीं जानती कला-समीक्षक उन्हें कैसे देखते हैं। जिस वक़्त मैं चित्र बनाने बैठती हूँ मुझे उस वक़्त वैसी ही प्रेरणादायक अनुभूति होती है जैसी कविता लिखते समय होती है लेकिन मेरा मन उसे रंगों में चित्रित करने को करता है, उसे करने की प्रक्रिया बिलकुल अलग है। हालाँकि  मेरी हर एक प्रक्रिया में चाहें वह लेखन हो, चित्रकारी या अध्यापन  सभी में मानसिक स्थिति एक कवि की ही रहती है। 

 

 रेखा सेठी: मैंने आपके चित्रों की एक प्रदर्शनी देखी थी जो स्त्री-केन्द्रित थी, उसके कई चित्र मेरे मन में रह गए हैं, जिनमें से एक चित्र चूल्हे पर झुकी स्त्री का है, प्रकृति और स्त्री का एक समायोजन है और उसके साथ, एक बहुत ही जीवंत स्त्री की इमेज है। जिस जीवंतता की बात आपने कविताओं के संदर्भ में कही, वह उन चित्रों में भी दिखाई देती है । उन चित्रों में आपको रंग से भरी हुई स्त्रियाँ दिखाई देती हैं, मगर कविताओं में वह स्वर थोड़ा दबा हुआ दिखता है । आपने उस तरह से खास तौर से स्त्रियों पर कविताएँ नहीं लिखीं ।  यह मैं इसलिए भी पूछ रही हूँ कि मैं आजकल स्त्री रचनाकारों की कविताओं पर काम कर रही हूँ। तभी मैंने पूछा कि कभी आपने सीधे स्त्री पर कविता नहीं लिखी, ‘अम्मा' या 'बेटी' पर एक दो कविताएँ तो हैं, यहाँ हम जिस कविता संग्रह की बात कर रहे हैं उसमें एक ऐसी स्त्री की कविता भी है जो समलैंगिक होने के अनुभव का बयान करती है । एक और कविता है जो माँगने वाली स्त्री पर लिखी गयी है जिससे आप एक अजब संबंध स्थापित करने की बात कर रही हैं लेकिन जिसे हम स्त्रीवादी नज़रिया कहते हैं वह आपकी कविताओं में बिलकुल गायब है।  

सुकृता पॉल: स्त्रीवादी नज़रिया ७० और ८० में बहुत प्रभावी था । उस चेतना की काफी ज़रूरत है । मेरे भीतर वह स्त्रीवादी चेतना काफी है लेकिन यहाँ मैं यह भी कहना चाहती हूँ कि मेरी मानसिक स्थापना, 'स्त्री-पुरुष की उभयलिंगता-एंड्रोजेनी' पर आधारित है । मैं उस समय की बात कर रही हूँ जब मैंने, पी एच. डी का शोध किया । मेरा विषय इसी पर केन्द्रित था ।  आज तक मेरा यह जुनून है कि मैं इसे स्थापित करूँ । मैंने विष्णु प्रभाकर के उपन्यास अर्द्धनारीश्वर पर एक परचा पढ़ा था। मैं खुद को भी इसी रूप में देखती हूँ । विद्यार्थी जीवन से ही वर्जीनिया वूल्फ का इमेज था कि लेखक उभयलिंगी होता है और लेखक को अपने पात्रों का निर्माण करते समय वह पात्र ही बन जाना होता है। लेखक के तौर पर आपको दूसरे लिंग की तरफ नहीं जाना होता क्योंकि वह तो आपके भीतर ही आधा-स्त्री और आधा-पुरुष के रूप में है। पितृसत्ता में इस बात पर बल दिया जाता है की स्त्री और पुरुष की अलग पहचान हो, ऐसा इसलिए किया जाता है कि औरत और औरत बने...पुरुष और अधिक पुरुष । इस तरह दोनों पर खूब दबाव रहता है, स्त्री पर पुरुष से ज़्यादा । मैं, इससे दूसरी सैद्धांतिक स्थिति की खोज में रहती हूँ अपने भीतर भी और दूसरे के भीतर भी।  जिसे हम उभयलिंग कहते हैं, वह हम सबके भीतर है, वह थोड़ा-सा मुड़ सकता है किसी में पुरुषत्व थोड़ा अधिक है किसी में कम लेकिन पितृसत्तात्मक समाज ऐसा है कि उन्हें अलग कर देता है । कृष्णा सोबती को देखिये...’हम हशमत’ के चार खण्डों में, उन्होंने हशमत के नज़रिए से बहुत से पात्रों की रचना की है । मेरे लिए उभयलिंगी आदर्श स्त्रीवाद का ही विस्तार है।   

 

 रेखा सेठी: आपकी यह सारी बातचीत स्त्री-पुरुष सम्बन्धी जेंडर की रूढ़िबद्ध धारणा से परे कला और साहित्य की दुनिया में संपोषित मानवीय अस्तित्व को प्रमुखता देती है ।  क्या आप समझती हैं कि यह स्त्रीवाद की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है?  

सुकृता पॉल: स्त्रीवाद तो महत्वपूर्ण है ही क्योंकि वह भी रूढ़िबद्ध धारणा को तोड़ने का एक तरीका है । पारंपरिक समाज बहुत अधिक पितृसत्ता की तरफ झुका हुआ है। आपने अभी मेरी एक पेंटिंग का ज़िक्र किया जिसमें स्त्री और प्रकृति को एक दिखाया गया है । मैं यह सोचती हूँ कि स्त्री और पुरुषत्व के परे भी एक चीज़ जाती है जिसे रोमानी कह कर खारिज़ नहीं किया जा सकता । जैसे मैं पेड़ के साथ बातें कर सकती हूँ और सिर्फ बातें ही नहीं मेरा उसके साथ एक रिश्ता बन जाता है । मैं स्थिरता से सोचूँ तो किसी खास पेड़ के साथ मेरी समग्र बातचीत होती है जैसे समुन्दर की लहरों के साथ, चंद्रमा के साथ । मेरी एक कलाकृति है चंद्रमा की, जिसमें ऐसा लगता है कि लहरें चंद्रमा से मिलने को तड़प रही हैं और चंद्रमा लहरों को उकसा रहा हैं । मुझे आश्चर्य होता है जब लोग मुझे यह कहते हैं कि मैं स्त्रीवादी नहीं हूँ, निश्चित तौर पर  मैं स्त्रीवादी हूँ लेकिन अंतिम आदर्श मेरे लिए उभयलिंगी आदर्श है जो मेरी पेंटिंग और कविताओं में सामान रूप से आता है ।  यदि आप गहराई से देखें तो आप उसे खोज सकते हैं।  

 

 रेखा सेठी:  प्रतिष्ठा, आपने जब सुकृता जी की ये कविताएँ इटालियन लोगों के सामने पढ़ी होंगी तो उनकी क्या प्रतिक्रिया रही, आप ऐसा कोई अनुभव बताना चाहेंगी ? 

प्रतिष्ठा : हाँ, वहाँ मैंने कुछ जगह ये कविताएँ पढ़ीं और पिछले दिनों जब सुकृता इटली गयीं थीं तब भी पढ़ीं । वहाँ लोगों का एक नज़रिया यह रहता है कि ये कविताएँ हिंदुस्तान से आ रही हैं । दूसरी बात यह स्त्री स्वर है और तीसरी बात यह कि यह कवयित्री अपनी कविताएँ किसी बाज़ार को ध्यान में रखकर नहीं लिख रही हैं। वास्तव में, वहाँ के प्रकाशक ने भी यही कहा कि इनको पढ़कर साफ़ लग रहा है कि कवयित्री ने बाज़ार को ध्यान में रख कर नहीं लिखा, जो मन में आया इन्होंने वही लिखा । तभी इन कविताओं के साथ बह जाना आसान है और इनके साथ जुड़ना भी । हमारे प्रकाशक ग्रीक हैं और पिछले चालीस साल से इटली में रह रहे हैं । वे विभाजन पर लिखीं कविताओं से सहज जुड़ाव महसूस करते हैं । उन्हें पता है कि जब उनका परिवार कैंप में रहता था तब कैसा महसूस होता था । इन कविताओं की पहली पंक्ति से ही पाठक पूरी तरह इनसे जुड़ जाते हैं। सुकृता ऐसी कवयित्री हैं जो कहीं की निवासी नहीं है तभी वे सब जगह की निवासी हैं।  दूसरी बात, एक स्त्री की कविता पढ़ने के साथ ही स्त्री से जुड़े कई अनुभवों से वहाँ की स्त्रियाँ अपने को जोड़ पाती हैं। इन कविताओं की संवेदनशीलता सभी को छू लेती है । इससे थोड़ी यह तसल्ली भी होती है कि अनुवाद ठीक-ठाक हो गया है ।

 

 रेखा सेठी: सुकृता जी, प्रतिष्ठा ने एक बहुत ज़रूरी मुद्दा उठाया है, कविता के बाज़ार का । यह स्थिति केवल किसी विदेशी प्रकाशक की ही नहीं है, अपने यहाँ भी देखें तो प्रकाशक का बाज़ार पर बहुत ध्यान हो गया है। आपकी कविताएँ एक तरह से बाज़ार को निरस्त करती हैं। आपने बाज़ार की दृष्टि से कविताएँ नहीं लिखीं फिर भी वे इतनी पढ़ी गयी हैं, उन पर इतनी चर्चा हुई और उनके इतने अनुवाद हुए हैं तो यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है..  

सुकृता पॉल:  मुझे ऐसा लगता है  कि कविता और बाज़ार में एक अप्राकृतिक रिश्ता बन गया है । अगर सच्चाई देखी जाए तो बाज़ार कविता बनने के मयार तय नहीं कर सकता। मैं चालीस साल से लिख रही हूँ । मेरे लेखन में फैलाव होता गया, मैं लगातार प्रकाशित होती रही बाज़ार का उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं रहा । आप कुछ भी कह लें मार्किट में क्या है या  फैशन में क्या है, कविता इन सबको निरर्थक कर देती है, आख़िर कविता अपने आप में एक मज़बूत शक्ति है।  

 

 रेखा सेठी: इसी से जुड़ी मैं एक और बात पूछना चाहती हूँ कि आज की सच्चाई अगर बाज़ार है तो कुछ साल पहले, साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन के समय कविता की कसौटी उसकी सामाजिक भूमिका थी । आपकी कविता ऐसे किसी साँचे में फिट नहीं होती । यद्यपि  आपकी कई कविताएँ उपेक्षित वर्ग से सम्बद्ध हैं लेकिन उसके बावजूद, वे तथाकथित क्रांतिकारी प्रगतिशीलता के साँचे में ढली कविताएँ नहीं हैं ? 

सुकृता पॉल: प्रगतिशील कविताओं का अपना एक इतिहास रहा है । उससे पहले ऐसा माहौल था कि फेंटेसी और नैतिक कविताएँ आम थीं और पढ़ी भी जाती थीं । इन्हीं दिनों साहित्य में प्रगतिशील लेखन की हवा बनी । इसमें साहित्य को सामाजिक वास्तविकता से जोड़ा गया । आहिस्ता-आहिस्ता कविता आधुनिकता की ओर बढ़ी । असल में देखना यह है कि कविता में कवित्व कहाँ और कैसे आता है। एक बार नामवर जी से बात हो रही थी तो उन्होंने मेरी कविता की किसी पंक्ति को देखकर कहा कि कविता का स्रोत इसी पंक्ति में है । आलोचक की भूमिका एक टेस्टर की होनी चाहिए । कविताओं के अथाह अम्बार में से अच्छी कविता की परख करना आलोचक की ज़िम्मेदारी है । आपके प्रश्न पर वापस आते हुए यह कहना ज़रूरी है कि कोई भी कवि साहित्यिक धाराओं से प्रभावित तो होता है पर यह ज़रूरी नहीं कि उसकी पहचान धाराओं से सीमित हो जाए। मुझे लगता है सच्ची कविता पाठकों तक पहुँचती है, वह अपनी जगह ख़ुद बनाती है । आपको अपनी जगह बनाने की ज़रुरत नहीं है, आपको सिर्फ सच्ची कविता लिखने की ज़रुरत है तब जगह अपने आप बन जाएगी । 

 

 रेखा सेठी: आज, यहाँ हम जो भी बात कर रहे हैं उसमें कहीं यह तत्व उभर कर आ रहा है कि कविता का मानवीय नज़रिया पूरी सृष्टि को एक इकाई में बदल देता है...

सुकृता पॉल: बिलकुल, मेरा यह मानना है कि हम सभी सभ्यता से पीड़ित है । हमने बहुत सारे दोहरे मापदंड बना लिए हैं, जाति, जेंडर, वर्ग की दीवारें बना ली हैं । मैं अभी ख़ामोशी में संवाद की बात कर रही थी तो आपको एक वाकया सुनाती हूँ । ख़ामोशी का जो रिश्ता बना उस बारे में । हरिद्वार की सीढ़ियों पर मुझे एक व्यक्ति मिला जो बोल नहीं पाता था, बैठा रहता था । उसके साथ मेरा ऐसा संवाद और रिश्ता बना कि वह अभी भी मुझे फोन करता है । मेरे साथ ये वर्ग आदि की दीवारें बड़ी आसानी से टूट जाती हैं । मेरे साथ होने वाली ऐसी घटनाओं को बहुतों के लिए समझना मुश्किल है लेकिन वह मेरा समानांतर जीवन है। अपनी बात दूसरे तक पहुँचाने के लिए, ख़ामोशी जितनी अनिवार्य है, उतने शब्द नहीं ।

 

 रेखा सेठी: आपकी कई कवितायेँ भी ऐसी हैं जिनमें ऐसे लोगों से रिश्ते की बात कही गयी है जिनमें वह वर्ग-अनुक्रम घुलता दिखाई देता है । जैसे आपकी एक कविता है जिसमें एक वंचित स्त्री को देखकर आपका हाथ झोले से कुछ सिक्के निकालने बढ़ा लेकिन वो जैसे पंजो के बल खड़ी, गले लगाने को आतुर दिखती है, उससे वर्ग की दीवारे टूट जाती हैं और एक रिश्ता  बनता है । कविता में उसका एक स्थायी बिंब बनता है जो आपके साथ रहता है.... 

सुकृता पॉल: वह अचानक बन जाता है जैसे मैं घाट पर बैठी हूँ अचानक एक व्यक्ति मेरे पास आता है और कुछ ही मिनट में ख़ामोशी में ही बातचीत होने लगती है । उसके पास मापतौल की छोटी मशीन थी, मैंने अपना वज़न तुलवा लिया । मैंने उसी दौरान उसे कह दिया कि चलो खाना खाते हैं तो मैं उसे एक रेस्तरां में ले गयी कैसे हमारे बीच एक संवाद स्थापित हुआ। अगले दिन मुझे चले जाना था लेकिन मेरे लिए वह अनुभव एक स्थायी अनुभव बन गया । यह सब पलक झपकते ही हो जाता है । ऐसे ही किसी ख़ास पेड़ के साथ मेरा संवाद होता है । यह मैं बहुत भीतर की बात बता रही हूँ । जब मैं बीस साल पहले शिमला गई थी, एक पेड़ से मेरा रिश्ता बना था।  यह अन्धविश्वास नहीं है, कुछ तरंगे होती हैं ऐसी।  कई बार किसी जगह के साथ हो जाता है। मैं उस पेड़ के पास हमेशा जाती हूँ जब भी शिमला जाती हूँ यह सब  इतना जीवंत है कि आप जिस समग्रता की बात कह रही थीं वह समग्रता इसमें आराम  से आ जाती है । ऐसे सम्बन्ध आपको समूचे ब्रह्मांड के साथ जोड़ देते हैं । ‘सभ्य’ धारणाओं से परे, जीवन की आदिकालीन परिभाषाओं की ओरले जाते हैं ।

 

 रेखा सेठी: एक और बात जो मैंने आपकी कविताओं में पाई है कि यह जो पूरी सृष्टि है, जैसे हम भक्तिकाल की कविताएँ पढ़ते हैं उनमें आप अपने 'मैं' को समर्पित कर देते हैं, यह अहम् का  विसर्जन ही बड़ी बात है । बड़ी गज़ब की बात है कि आप आधुनिक तेवर  की कविता लिखतीं हैं फिर भी उस कविता में अपने आसपास के परिवेश से जो  रिश्ता बनता है वह इसी तरह के समर्पण का है। 

सुकृता पॉल:  रेखा, मुझे नहीं पता कि यह समर्पण है कि कुछ और लेकिन मुझे लगता है कि आपके अपने भीतर की चाह को महसूस करने के लिए, समझने के लिए, आपको आज़ादी चाहिए । मैं बार-बार कहती हूँ कि सभ्यता के विकास की जो दौलत है वह आपको विचार की घेरेबंदियों में डाल देती है। आपको नियम कायदे याद आने लगते हैं । कविता और जीवन में आपको उस जकड़न से मुक्ति चाहिए ।  

 

 रेखा सेठी: मैं आपकी कविता का अनुवाद पढ़ रही थी, "आसमानों के एक छोर से/ नीले रंग को उठा लेती हूँ /अर्पित कर देती हूँ /दूसरे छोर पर"--- इन पंक्तियों को पढ़कर ऐसा लगा कि इन चार पंक्तियों में ही आपने अपनी सृजन की पूरी प्रक्रिया डाल दी है...  

सुकृता पॉल: यह बहुत रोचक है यह बिंब उस समय बना जब मैं चाइना में ताई ची देख रही थी । मैंने अपनी चाइनीज़ दोस्त को यह बताया कि इस तकनीक में ऐसा लगता है जब वे अपने शरीर  को बाहर की तरफ खींचते हैं, एक साइड से दूसरी तरफ तो लगता है कि उनके उस अभ्यास में सारा ब्रह्मांड स्पेस का घेरा बन जाता है । अगर गौर से उसे देखा जाए तो उस बिम्ब में बड़ी दार्शनिकता है, तत्त्वमीमांसा है । मेरी चाइनीज़ दोस्त के पूछा कि मुझे यह कैसे पता लगा, क्या मैंने यह सब पढ़ा है । उसने दो-तीन चीनी दार्शनिकों के नाम लिए कि ताई ची के पीछे क्या है। मैंने कहा, यह सब पढ़ा नहीं है मगर शायद यह प्राचीन सोच  हमारी दार्शनिकता में है। सारा ब्रह्मांड एक ही है जैसे चेतना की एक गेंद! सहज ज्ञान को सोखना हो जैसे। इसीलिए मेरे ख्याल में इस किताब का नाम भी 'अनटाइटल्ड' है क्योंकि मुझे लेबल के साथ शीर्षक तंग करते हैं ।  जब कोई लेबलिंग हो जाती है तब मुझे उससे कोफ़्त होने लगती है।

 

रेखा सेठी: मुझे आपसे बातचीत करते हुए बहुत दिलचस्प लग रहा है कि कैसे कई बिंदु जो मेरे मन में थे एक-एक करके एक-साथ जुड़ते चले जा रहे हैं जैसे मैं आपसे सृष्टि की बात कर रही थी और आपने मुझे चीन का उदाहरण बताया।  आपकी कविताओं में यात्राओं से बहुत सारे अनुभव इकट्ठे किए गए हैं।  

सुकृता पॉल: हाँ, यात्रा करना मुझे अच्छा लगता है ।शायद इसलिए कि वे मुझे आतंरिक निष्क्रियता से छुटकारा दिलाती हैं । यात्राओं से जुडी कविताएँ यात्रा-वृतांत की तरह नहीं है । कोई भी बाहरी यात्रा दरअसल एक भीतरी यात्रा का प्रेरणास्रोत बनती है । यह मैं अपने विश्वास के साथ कह रही हूँ कि अगर आप वह यात्रा नहीं करते तो यह खतरा होता है कि कहीं आतंरिक यात्रा भी बंद ही न हो जाए क्योंकि आपने अपनी जड़ें जमा लीं तो उससे जड़ता भी हो जाती है । जब एक अनुभव होता है, जैसे चीन का हुआ, तो वह मुझे दूसरे मानसिक स्पेस की तरफ ले जाता है । इस तरह से यात्राओं में मानसिक स्पेस बनते हैं । इसी संग्रह की पगोड़ा कविताओं में भी वही बात है।  

 

 रेखा सेठी: हाँ पगोड़ा कविताएँ हैं, शूलीभंजन मंदिर का एक बिंब है और हवाईं मिथक पर कवितायेँ हैं...  

सुकृता पॉल: हाँ, कुछ कविताएँ होंगी । एक और बात है, जब मैं पहले के समय में यात्रायें करती थी तो वहाँ अकादमिक माहौल रहता था । पेपर पढ़ना होता था, अकादमिक चर्चाएँ होती थीं । तब भीतर की यात्रा के लिए स्पेस नहीं बन पाता था और अब यदि आप कविता उत्सवों के लिए यात्रा कर रहे हों तब आपके जीवन का वह पक्ष निकल कर आता है । ये बाहरी यात्राएँ, कल्पना का विस्तार करती हैं । ये बाहरी तो है पर यह एक मानसिक अनुभव भी है । आपने मुझे इस ओर सोचने के लिए बाध्य किया, आपका शुक्रिया ! मैंने कभी ऐसा सोचा नहीं था कि जो चीज़ कहीं और की विरासत है जैसे पगोड़ा या शूलीभंजन, वह विरासत कैसे अपनी वर्तमान चेतना में जीवंत हो जाती है ।   

 

 रेखा सेठी: मैं आपकी कविता की रचना प्रक्रिया पर वापिस लौटना चाहती हूँ यानी जो बातें हम यात्रा के संदर्भ में कर रहे हैं एक खास तरह की मुक्ति के अनुभव की बातें हैं । आपने कविता की रचना-प्रकिया पर लिखते हुए एक ख़ास बात कही है कि शब्दों के माध्यम से ही कविता को शब्द-मुक्त करना है।  

सुकृता पॉल: शब्द, बहुत बार अनुभव के ऊपर हावी हो जाते हैं परन्तु शब्दों का इस्तेमाल तो लाज़मी है । मेरे हिसाब से यह एक यात्रा है, एक विशुद्ध अनुभव की तरफ, उसमें शब्द तो गढ़ने पड़ेंगे। शब्दों को अपनी पहचान कहीं पर छोड़नी पड़ेगी और यह करने के लिए शब्द ही इस्तेमाल होंगे । एक बड़ी विडंबना है, सावधानी से उस शब्द को माप-तोल कर इधर-उधर उसके आयामों को देखना चाहिए । कई बार कोई शब्द लंबा होता है तो वह अपनी  सामग्री के साथ वहाँ फिट नहीं होगा और कई बार लंबा शब्द ही चाहिए आपको कि शब्द के भीतर जो गूँज है, वह कविता की ज़बान बने । इसलिए देखा जाए, उत्तेजित तो आपको शब्द ने ही किया, लेकिन वह शब्द खो गया और वह गूँज रह गई। अनुभव के खालिसपन को पकड़ना कविता की चुनौती है ।  

 

 रेखा सेठी: कविता और प्रकृति का एक अजब रिश्ता आपकी कविताओं में नज़र आता है। जिस विशुद्ध अनुभव की आप बात कर रहीं हैं, वह सच्चा खरा अनुभव प्रकृति से जुड़ी कविताओं में बहुत गहराई से महसूस होता है। प्रकृति कई तरह से आपकी कविताओं में आती है आपने अपनी कविता में लिखा है कि मैं उस रेखा को पकड़ना चाहती हूँ जहाँ चाँद और लहरें मिलती हैं।   

सुकृता पॉल: इसके लिए आपको दाद देनी होगी ! आपने इन पंक्तियों को पकड़ा क्योंकि इस पर बहुत कम बात हुई है। कविता एक ऐसा माध्यम है जिसके ज़रिये आप खुद को पहचानने लगते हैं । अपने से मतलब, अपने अस्तित्व से है व्यक्तित्व से नहीं। यह मुझे आपके ज़रिये  पता चला। लिखते समय तो आप उस स्तर पर रहते हैं जहाँ आपको अपनी कविताओं के बारे में सोचने का मौका आमतौर पर नहीं मिलता।  किसी दूसरे के माध्यम से मिलता है, यही उसकी खूबसूरती है। जैसे मैंने आपको बताया कि गुलज़ार साहब मेरी कविताओं में हिन्दुस्तानियत ढूँढ रहे थे क्योंकि उन्हें लगा कि इनमें यही एक मुख्य चीज़ है और जब सविता सिंह ने मेरी कविताओं का अनुवाद किया, उसने स्त्री के संदर्भ में मेरी कविताओं को चुना और आप जो अनुवाद कर रही हैं, उसमे आपने आत्मीयता और  दार्शनिक आधार को पकड़ा है लेकिन वह कोण मेरी व्यक्तित्व या मेरे लहू में है ।जैसे अब मैं आपके साथ सोच रही हूँ, मैं उसके बारे में अधिक जागरूक हो रही हूँ।  मैं उसे मानवीयता भी नहीं कहूँगी, अध्यात्म भी नहीं कहूँगी । वह मेरे भीतर ही मेरी संवेदना का हिस्सा है, शायद मेरी सक्रिय चेतना का नहीं । 

 

रेखा सेठी: आप उसे उदात्तता कह सकती हैं, सबलिमेशन।  

सुकृता पॉल: हाँ, ज़मीन पर होते हुए भी ज़मीन से थोड़ा ऊपर उठना। 'सेन्स ऑफ़ बीइंग' का यह आयाम मेरे व्यक्तित्व में काफी मज़बूत है ।  यह मेरी आदत है कि सुबह मैं सैर पर जाती हूँ तो चाहें पाँच मिनट हों या दस मिनट हों मुझे उस चीज़ से रोज़ जुड़ना है उसे क्या कहूँ मैं ? ध्यान कहूँ या वही ज़मीन से उठने वाली बात कहूँ ? उस ब्रह्माण्ड को अपने भीतर लाना है, जिसे स्पेस कांटेक्ट कहते हैं वह करना है, मैं उसमें दस मिनट जरूर बैठती हूँ। जब मैं लिखने बैठती हूँ तो वह चीज़ मुझे ऊर्जा देती है। उसे मेटाफिज़िकल भी कह सकते हैं, वह आयाम है मेरे भीतर । उसी में मैं चुप्पियाँ ढूँढने की बात जोड़ूँगी क्योंकि कई बार चुप्पी मेरे लिए इतनी मानीखेज़ हो जाती है । चाहे वह चुप्पी शब्दों ने ही उत्पन्न की हो लेकिन उसे महसूस करना बहुत ज़रुरी है मेरे लिए। शायद मैं उसी की तलाश में रहती हूँ।  

 

रेखा सेठी: अनुभव की तलाश प्राथमिक है या शब्दों की ? 

सुकृता पॉल: मैं इसमें भेद नहीं कर रही क्योंकि मेरी नज़र में शब्दों और अनुभव का एक हो जाना लाज़मी है।  

 

रेखा सेठी: भाषा से आपका कैसा रिश्ता रहता है ? जैसा आपने कहा कि आपका जीवन संस्कृति की बहुलता में बीता है।  

सुकृता पॉल: यह बहुत अच्छा सवाल है लेकिन उस बहुलता का तेवर थोड़ा बदल गया ! उसका वह अंश इकाई में आ गया, बहुभाषी ज़ुबान कोई विरोधाभास नहीं है। हमारे यहाँ बहुत-सी भाषाएँ एक ही साथ हमारे जीवन में समा जाती हैं । यह नहीं कह सकते कि एक भाषा, भीतर की दूसरी भाषा के साथ कोई विरोधाभास रखती है बल्कि इनका आपस में एक वार्तालाप चलता है और हमारी पहचान बहुभाषी बन जाती है ।

 

रेखा सेठी: भाषा में एकात्मकता आ जाती है...

सुकृता पॉल: हाँ, अगर हम ब्रह्मांड को खोजने निकले हैं, तो उसमें बहुत सारी विविधताएँ हैं। उनका आपसी रिश्ता हमें खोजना होगा । दरअसल जो बहुत भिन्न तरह के तत्व भरे हुए हैं, उनको खुद में लाना, उन्हें खोजना ही जीवन है। शायद ऐसा करने के लिए एक जीवन भी कम है इसी में उसकी खूबसूरती है । जिस दिन मैंने अपने आप को यह कह दिया कि मैं सब जान गयी हूँ उसी दिन मुझे आत्महत्या कर लेनी चाहिए...क्योंकि जब मेरी खोज खत्म हो जाए जिसे मैं चित्रों में ढूंढ रही हूँ या कविता में या अपने जीवन में तब जीने का उद्देश्य क्या? हम जीने की जिस कला की बात करते हैं उसमें तो यही सब है जैसे आपने पूछा कि आपके लिए अनुभव प्राथमिक है या शब्द ? मैं कहती हूँ कि ‘अनुभव शब्दों के द्वारा’ । उसमें चुनाव मेरा ही होगा क्योंकि अगर मैं कोई शब्द ढूँढ रही हूँ तो मैं खुद को उसमें घोल रही हूँ, पता नहीं उसको समर्पण कहेंगे या नहीं जैसे-जैसे उसमें घुलोगे, शब्द भी उसमें लोप हो जाएँगे और जो खरा होकर निकलेगा वह शुद्ध अनुभव होगा।  

 

रेखा सेठी: इसी बिंदु पर हम अपनी बातचीत समाप्त करते हैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद तथा भविष्य के लिए शुभकामनायें !

कवि, शिक्षक, आलोचक, सम्पादक व अनुवादक सुकृता पॉल कुमार भारतीय अंग्रेज़ी साहित्य की प्रतिष्ठित पहचान हैं. उनकी कविता का कैनवस, परिवेश और यथार्थ के साथ मानवीय अनुभव से जुड़े बड़े सवालों, प्रकृति के विराट में एकलय होते मानवीय अस्तित्व, रिश्तों की प्रगाढ़ता,स्त्री के नैसर्गिक रूप के अद्भुत बिम्ब, बेघरों के जीवन संघर्षों के ब्योरे और भी बहुत-सी छोटी-बड़ी बातों से रचा गया है. उनके प्रमुख कविता संग्रह हैं – ‘विदआउट मर्जिंस’, ‘अपूर्ण’, ‘ड्रीम कैचर’, ‘ऑसिलेशन्स’, ‘अनटाइटल्ड’ आदि. गुलज़ार ने उनकी कविताओं के अनुवाद ‘पोएम्स कम होम’ शीर्षक से किए हैं. सविता सिंह के साथ उनकी कविताओं की द्विभाषी प्रस्तुति ‘साथ चलते हुए’ में हुई है. आलोचना के क्षेत्र में ‘नरेटिंग पार्टीशन’ तथा ‘इस्मत आपा’ विशेष उल्लेखनीय हैं. उनके द्वारा किये अनुवादों में प्रमुख हैं ‘ब्लाइंड’ (जोगिन्दर पॉल का उपन्यास नादीद) तथा ‘न्यूड’ (विशाल भारद्वाज की कविताएं)। International Writing Programme, IOWA में तीन माह की अवधि की लेखन कार्यशाला में सुकृता को कवि रूप में आमन्त्रित किया गया. उन्हें अनेक फ़ेलोलोशिप मिले हैं जिनमें शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान का तथा भारतीय संस्कृति मन्त्रालय का टैगोर फ़ेलोशिप उल्लेखनीय हैं. वे अभी हाल तक दिल्ली विश्वविद्यालय के अरुणा आसफ़ अली चेयर पर पदासीन रही हैं.

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मुख्य रचनाएं

ड्रीम कैचर, विदाउट मार्जिन्स, फोल्ड्स ऑफ़ साइलेंस, नैरेटिंग पार्टीशन, दि न्यू स्टोरी, मैन, वुमन एंड एंडरोजिनी और इस्मत, हर लाइफ, हर टाइम्स
अनुवाद : स्टोरीज ऑफ़ जोगिंदर पॉल, स्लीपवाकर्स
संपादन : मैपिंग मेमोरीज (अंग्रेजी और उर्दू कहानियों का एक संकलन), स्पीकिंग फॉर हरसेल्फ़ : एन एंथ्रोलोजी ऑफ़ एशियन वूमन्स राइटिंग्स (सह-संपादन), क्रॉसिंग ओवर (हवाई विश्वविद्यालय - अतिथि संपादक), म्यूज इंडिया (अतिथि संपादक) और मार्गरेट लॉरेंस रिव्यू 

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अनुवादक परिचय

रेखा सेठी

डॉ. रेखा सेठी, दिल्ली विश्वविद्यालय के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक होने के साथ-साथ, लेखक, आलोचक, सम्पादक तथा अनुवादक हैं. स्वातन्त्रयोत्तर हिन्दी कविता तथा कहानी उनके विशेष अध्ययन क्षेत्र हैं. मीडिया के विविध रूपों में भी उनकी सक्रिय भागीदारी और दिलचस्पी रही है. उनकी प्रकाशित पुस्तकों में प्रमुख हैं- ‘विज्ञापन: भाषा और संरचना’, ‘विज्ञापन डॉट कॉम’, ‘व्यक्ति और व्यवस्था: स्वातन्त्रयोत्तर हिन्दी कहानी का   सन्दर्भ’. ‘निबन्धों की दुनिया: प्रेमचन्द’, ‘निबन्धों की दुनिया: हरिशंकर परसाई’  तथा ‘निबन्धों की दुनिया: बालमुकुन्द गुप्त’ का सम्पादन भी उन्होंने किया। उनके लिखे लेख व पुस्तक समीक्षाएं- ‘जनसत्ता’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘पूर्वग्रह’, ‘संवेद’, ‘हंस’, ‘Book Review’, Indian Literature आदि पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं. अपनी लिखी आलोचनाओं में उन्होंने सदा रचना को प्राथमिकता दी है. रचना के मर्म तक पहुंचकर उसके संवेदनात्मक उद्देश्यों की पहचान करना उनकी आलोचना का प्राण है. आजकल वे स्त्री रचनाकारों की कविताओं के माध्यम से साहित्य एवं जेंडर के सम्बन्ध को समझने की कोशिश कर रही हैं. उनका आग्रह स्त्री-कविता को स्त्री-पक्ष और उसके पार देखने का है.

... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

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