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"इंसानियत" : कविता

  • - नितिन चौरसिया
  • 14 जुल॰ 2017
  • 1 मिनट पठन

इंसान हो तो पहले इंसान देखो

बाद उसके मजहब औ ईमान देखो !

देश सेवा के अनेकों मार्ग हैं

अपनी काबिलियत का एक मुकाम देखो !

गर्व हो सबको तुम्हारे काम पर

अपनी खातिर ऐसा ही कुछ काम देखो !

न बड़ा - छोटा न कोई काम है

मंजिलें गुमराह होने के साथ देखो !

दो गज ज़मीन काफ़ी है इंसान को

इससे ज्यादा दूसरों के साथ देखो !

शान-ओ-शौकत जिंदगी में इतनी हो

दिल में रहो तुम ; तुम्हारे बाद , देखो !

सियासत ने लोगों को बाँटना सिखाया है

तुम, सियासत; बाँट कर खाने के बाद देखो !

गर्व से हो जाएगा चौड़ा तुम्हारा सीना

आँसुओं से भीगा चेहरा किसी का, पोंछने के बाद देखो !

दाग दामन में लगाने को कीचड़ उछालते हैं जो

उन्हें तुम बर्फ के पानी में नहाने के बाद देखो !

इंसानियत उनको भी समझ आ जायेगी एक दिन

बेवज़ह गैरों का दामन थाम के देखो !

  • नितिन चौरसिया

मेरा नाम नितिन चौरसिया है और मैं चित्रकूट जनपद जो कि उत्तर प्रदेश में है का निवासी हूँ ।

स्नातक स्तर की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से करने के उपरान्त उत्तर प्रदेश प्राविधिक विश्वविद्यालय से प्रबंधन स्नातक हूँ । शिक्षणऔर लेखन में मेरी विशेष रूचि है । वर्तमान समय में लखनऊ विश्वविद्यालय में शोध छात्र के रूप में अध्ययनरत हूँ ।

फ़ोन -09453152897

ई-मेल - niks2011d@gmail.com

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