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खुटखुटिया

  • देवी प्रसाद गौड़
  • 31 जुल॰
  • 8 मिनट पठन
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सृष्टि पर मनुष्य  जन्म की दुर्लभता, वैदिक मतानुसार सर्व विदित अकाट्य सत्य है। लोक में भी भारतवर्ष, भारत में भी पुण्य पुनीता ब्रज वसुंधरा पर जन्म लेना सौभाग्य का द्योतक है। इसका आशय यह कदापि नहीं कि देश के अन्य भागों में जन्म लेना सौभाग्य की बात नहीं, संपूर्ण आर्य खंड ही अपने आप में तीर्थ है।

                      देश का कोंना- कोंना तीर्थों के नाम से जाना जाता है,फिर भी ब्रज भूमि प्राचीन काल से ही साधकों की साधना स्थली रही है। संपूर्ण देश से आये भिन्न सांप्रदायिक मतों के मतावलंबी साधक पुण्य आत्माओं का कुंभ सा प्रतीत होता है। साधकों की इसी श्रृंखला में, मैंने बचपन में जाना खुटखुटिया बाबा को शायद ब्रजरज से जन्मों का संस्कार इन्हें युवावस्था में ही हाथ पकड़ कर बंगाल से ब्रज धाम ले आया, किंतु मुझे तो इनकी वृद्धावस्था के दर्शन का ही सौभाग्य प्राप्त हुआ। 

                खुटखुटिया बाबा बहुलावन के तट पर (बहुलावन ब्रज  तीर्थ  सरोवर) एक कुटिया   में रहते थे।खुटखुटिया का  शारीरिक गठन असामान्य तो नहीं कहा जा सकता, किंतु फिर भी सामान्य से कुछ भिन्न सा ही प्रतीत होता था।कद पाँच फुट से भी कम, बदन इकहरा,  बहुत ही दुबला-पतला सा, पतली- पतली टांँगें सामान्यतः लोग जिन्हें सिगरेट की संज्ञा दे देते हैं।चेहरा छोटा , खोपड़ी गंजी,आकार में कुछ हल्का सा टोपी नुमा दिव्य ललाट, जिसका आकार खोपड़ी के साथ मिलकर एक हो गया हो, जैसे भीषण बारिस  दो खेतों के बीच की मेंड़ को बहा  ले गई हो। आंँखें मोटीऔर आगे की तरफ उभरी हुईं,लगता था काले रंँग की दो चिड़िया किसी पेड़ की डाल से एक साथ उड़ने के लिए उद्यत हों।         

                    दाहिनी आंँख के पलक पर एक छोटी सी गांँठ जिससे पलक भारी रहता था,जो न चाहते हुए भी आंँख को नीचे तक ढके रहता है, भों के ऊपर कोई-कोई महीन लंबा बाल, जो बड़े गौर से देखने पर ही दिखाई देता था।कान छिदे हुए,नाक चेहरे के अनुपात में सामान्य, मूंछों की जगह साफ चिकनी कभी-कभी ऐसे पुरुषों की पहचान लोग  निमूँछिया कह कर भी करते हैं। 

                उम्र सत्तर से ऊपर,किंतु दांँत सब सही सलामत, साफ सुथरे सफेद चमकते हैं।दाढ़ी का तो प्रश्न ही नहीं उठता गालों में गड्ढे गर्दन सामान्य, गले में मोटी-मोटे मानिकाओं की तुलसी की माला वक्ष निर्वस्त्र, हड्डियों की चलती-फिरती नुमाइश वस्त्र के नाम पर सिर्फ एक अचला।सर्दियों में बंदर छाप टोपा और लिपटी हुई एक चादर,पैरों में टायर की चप्पल, चाल में तेजी, दाहिने हाथ में लकुटी, बाँये कंधे पर लटकता हुआ थैला, जिसमें कुछ इंजेक्शन और दवाएं भरी हैं। 

                 खुटखुटिया बाबा शायद बंगाल में किसी प्रकार के चिकित्सा सेवा व्यवसाय से जुड़े रहे होंगे। जब बरसात के बाद गाँव में घर-घर बुखार के मरीज हुआ करते थे,उस समय खुटखटिया बाबा की दैवीय सेवा के संस्मरण,मेरे स्मृति पटल पर आज भी जीवंत हैं। 

 घर में मरीज है,विविध सूत्रों से ज्ञात करना, दरवाजा खटखटाते हुए, बोल-चाल कुछ बंगला भाषा की शैली से प्रभावित,"मांँ मैंने सुनी भैया को बुखार आई।"

    "हाँ-हाँ बाबा आजा, मैं तेरी ही बाट देखि रही।"

हाथ में लगी लकुटी किसी कोंने में रखते हुए कंधे पर टंगा थैला उतारते हैं।अधरों पर मंद-मंद मुस्कान बिखेरते  हुए,मरीज से नज़रे मिलाकर दाहिने हाथ से नब्ज़ पकढ़ कर "कैसी है?बुखार आ गई, सब ठीक हो जाएगी। चिंता की कोई बात नहीं, अभी बुखार है।" 

                थैला से कुछ गोलियां निकाल कर पुड़िया बनाते हुए,"दो दिन तक तीन बार खानी, एक इंजैक्सन भी देना पड़ेंगे।" "इंजेक्शन लगाने के बाद दवाओंं का डिब्बा थैले में रखकर जल्दी-जल्दी थैला उठाते हुए ,कोने में रखी हुई लकुटी को उठाए, अरे चलो बाबा चलो गांँव में अनेक मरीज,मरीज की मांँ बोली, 

"बाबा हमारे बगल बारौ चंदन हू बीमार है।" 

"हाँ मैया, मुझे खबर मिली चंदन, रग्गो, शीतल सब बीमार मलेरिया

जोर से आई"

"बाबा कितने पैसा भये? "

          दाहिना हाथ हिलाते हुए, "ना बाबा ना पैसा किछू ना हौबै"

एक कागज पर कुछ लिखते हुए, ये दबा जो खर्चा हुई, दुकान से 

लाकर देउ, उससे किसी और मरीज का भला हो जाइगी। कल मैं

तुम्हारे घर से लेलेंगे।"कहते हुए तेजी से निकलते हैं, खुटखुटिया जो दवा जिस मरीज को देते थे,वह उसे मेडीकल  से मंगाकर वापस लेते थे।मरीज मेडिकल स्टोर से खरीद कर बाबा के पास पहुंँचा देता था ताकि उससे दूसरे मरीज का भला हो सके। 

                डॉक्टर ताराचंद सुमन, खुटखुटिया  को देखकर मन ही मन किलसने लगते हैं।करें भी क्या  ? बीमारी  के सीजन में भी सारे दिन मक्खी मारते हुए घर वापस चले जाते हैं। शाम को उन्हें उदास देखकर  पत्नी ने पूछा,"आज कैसे परेशान हो?"

 "परेशान ना रहूंँ तो क्या करूंँ? यह खुदकुटिया घर-घर जाकर लोगों का मुफ्त इलाज कर रहा है, फिर मेरे चूल्हे की किसको चिंता है आज जले या चार दिन बाद। "

               जैसे ही खुटखुटिया मरीज देखकर बाहर निकले, बाबा की तलाश में भटकते हुए,आस-पास  गांँव के दो-तीन लोगों ने आखिर उन्हें खोज ही लिया, "अरे, बाबा नेंक हमारी सुनों, मघेरे में

भौतु बीमारी फैलि रही है। हम तुम्हें बुलाइबे आये हैं, हमारे संग चलौ।"खुटखुटिया बड़ी गौर से देख पहचानते हुए, बड़ी जोर से हँसे। 

दाहिने हाथ का झाला देते हुए, "आजाओ-आजाओ, सुंदर, संतो, 

तुम कैसें खोजी मोइ ?"

"अरे बाबा हम भौतु देर ते परेशान हैं, जैसे-तैसे पतौ लग्यौ है। 

बाबा मेरौ छोटौ भैया  नंदलाल भौतु बीमारी है।"

               खुटखुटिया ने सुंदर के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "चिंता मत करो बुखार है। सब ठीक होगी।" आज गांँव की बहुत मरीज है, मैं कल सवेरे तुम्हारे गांँव आऊंगा कहते- कहते-कहते  आगे बढ़ने लगे,"-इतना समय ही कहाँ हैं ? 

यहाँ जाना,वहाँ जाना, कहाँ जाना ? खुद ही खुद से बात करते हुए

रुक गये। कपोल के पास माथे पर ठक-ठक उंगली मारते हुए, हाँ

गिरधारी की बेटी आई। 

           बैंत का काम कर रही लकुटिया को ठक-ठक बजाते लपक कर चले गिरधारी की ओर। गिरधारी- गिरधारी, आवाज लगाते हुए दरवाजे की कुंदी खटखटाते हैं। थोड़ी देर बाद बेटी आई । 

बाबा ने लकुटी को दांये से बांये हाथ में लेकर, दाहिने हाथ की हथेली

को फैलाते हुए, आँखों ही आँखों में गिरधारी की तवियत का हाल पूछा बोली,"बाबा कल शाम कूंँ बिनकी हालत ज्यादा खराब हैगई

तौ सबेरे बिजंदर के ताँगे में बैठि कें मथुरा चले गये।"

लकुटी को ठोड़ी के  नीचे लगाकर अच्छा! अफसोस की

मुद्रा में, "मुझे क्यों नहीं बोली"

"मैं गयी थी बाबा, तुम मिले नहीं "

"हाँ कल मरीज ज्यादा थी, कोई बात नहीं शहर की डाक्ठर अच्छी 

है, जाने से ठीक होोगी"

                  सुबह से शाम तक मरीजों के घर घूमते- घूमते चेहरे पर थकान जो दिखने लगी है। अब चाल में भी तेजी नहीं रही। उम्र जो है कुछ आप ही आप कहते रहते हैं,"अरे चलो ,अभी बहुत काम है। ढरकते-ढरकते  कुटिया के निकट पहुंँचते है। दरवाजे पर खड़ी एक काले रंँग की गाय को देखकर, बाबा का रोम-रोम सिहरने लगता है, गले से लिपटते हुए, "श्यामा तू आ गई,मुझे खबर थी तू जरूर आयेगी झोली में रखी रोटी कल से तुमको खोज रही है।"तेजी से कुटिया का दरवाजा खोलते हैं, हाथ में एक रोटी लिए उल्टे पांँव लौटे, रोटी गाय की तरफ बढ़ाते हुए, "ले माँ  तू कल फिर आना। नजरें घुमाये गाय की तरफ देखते-देखते कुटिया के दरवाजे को धक्का मारते हैं। हाथ में लंगोटी और अचला लिये वापस आये सीधे बहुलावन के घाट पर गोता लगाते हुए दिखाई देते हैं।बदन पोंछ कर लंगोटी बदल ली। 

                     घाट पर बने शिव मंदिर को शीश झुकाते हुए, अपनी कुटिया के सामने बने बरांडे -जगमोहन में प्रवेश करते हैं, खुटखुटिया बाबा की समाधि मुद्रा दर्शनीय है। कंबल के आसन पर विराजे रीड सीधी,वक्ष तना हुआ, हाथ में रुद्राक्ष की माला, अर्थनग्न बदन पर मच्छरों की घनी आबादी लगरही है, साधक ने कोई काली चादर ओढ़ रखी है। स्थिर मन,तन मूर्तिवत,दर्शक सहज ही नत नत मस्तक हो जाता है। 

            लगभग दो घंटे की साधना के बाद कुछ बदली हुई वेशभूषा में महात्मा बाहर आये।अब अर्धनग्न शरीर पर एक हल्की सी चादर थी,बांये कंधे पर दवाओं की थैली की जगह पर मधुकरी के लिए एक झोली थी। मधुकरी यानी भोजन प्रसादी के लिए कुछ रोटी के टुकड़ों की  भिक्षा।मुखारविंद से धीमे-धीरे महामंत्र की ध्वनि वातावरण को शांति का दान करती हुई,"हरे कृष्णा हरे- कृष्णा कृष्ण-कृष्णा हरे- हरे दरवाजे की निकट जाकर जोर से, "राधे राधे मैया"

              "आई बाबा", मुदित मन से महामंत्र के बोल के साथ

रोटी के लिए झोली फैलाते हुए, " मैया घोर में सब ठीक है ना, कोई

बुखार-फुखार तो नहीं ? "

            अगले दिन की स्वास्थ्य सेवा के  लिए भिक्षा के समय पर ही सूचना एकत्रित कर लेते हैं। केवल एक समय पाँच घर ही

मधुकरी भिक्षा के लिए जाते है,अगले दिन दूसरे पाँच घरों में जाते हैं। 

इस तरह एक घर की बारी काफी लम्बे समय बाद आती है। आगले घर से एक सज्जन खाँसते हुए बाहर आये, "राधे-राधे बाबा"

"राधे-राधे भैया"

"बाबा जुकाम भौतु परेशान करि रह्यौ है"

                "जुकाम  की औकात भैया, जो पुरेशान करेगी, सबेरे कुटिया पै अइयो दवा देखते ही जुकाम भागि जाइगी।" हरे कृष्ण...। 

अगले घर की ओर "मैया जय श्री राधे।" अंतिम रोटी लेकर खुट खुट

लौटने लगे। 

            अगला पड़ोसी बोला, "बाबा मधुकरी की सेवा का हमें भी अवसर दिया करो"बाबा पीछे मुड़े, उस श्रद्धालु की ओर कदम बढा़ये और मुस्कुराते हुए बोले, "भैया शीतल,मेरा पांँच रोटी से ही काम चल जाता है एक रोटी गाय को, शीतल से नजर मिलाते हुए बड़े मीठे स्वर में बोले श्यामा दिन में एक चक्कर रोज लगाती है। दो रोटी भूरा और कालू को, वे दोनों मेरी कुटिया छोड़ कहीं नहीं जांइ। दो रोटी, मैं खाइगी। हिसाब बराबर हो गई, फिर काहे को

चक्कर काटना।" महामंत्र करते-करते कुटिया पर पहुँचते हैं। 

                बड़ी भोर से प्रात: काल चार बजे बहुलावल का तट झांज, मंजीरा, पखावज के साथ श्री हरि संकीर्तन से गूंज उठता है, फिर शुरू होता है प्रातः फेरी का सिलसिला बाबा घुटनों तक का अचला, चादर लपेट बंदर छाप टोपा लगाये पखावज पर  थाप मारते हुए कुुटिया से निकलते हैं।  गर्दन में कुछ झांज-मजीरा पड़े हैं।  पीछे-पीछे भक्त लोग जुड़ते  चले जाते हैं, वे बाबा की  गर्दन से मजीरा उतार कर खुद बजाने लग जाते हैं। धीरे-धीरे काफिला काफी लंबा हो जाता है।बीच-बीच में कभी मजीरा तो कभी पखावज के साथ ध्यान मग्न मुद्रा से खुट खुट  नृत्य की मुद्रा में प्रवेश कर जाते हैं। भक्त लोग गोलाकार घेरे में, खुटखुटिया बीच में थिरकते हुए पैर

और पखावज से ध्वनि उत्पन्न करने वाले हाथ, स्वचलित यंत्र से

प्रतीत हो रहे हैं। 

            आँखों से बहते हुए आँसू,पखावज को गीला कर रहे हैं। 

कुछ भक्त तो स्वयं को खुटखुटिया की भाव मुद्रा में खोकर आनंद सिंधु में डुबकी  लगाते हुए दिखाई  देते हैं। घंटों बरसता है, यह नाम का रस। लगता है,प्रभात फेरी आज अपनी यात्रा ही तय नहीं कर पायेगी, लेकिन फिर मंथर गति से  रेंगने लगती है।  कुछ लोग उपस्थित होकर तो,कुछ घरों में कानों से पीते हैं इस रसानंद  को। 

                चेतना युक्त एक व्यक्ति ही स्वयं में चैतन्य सरोवर होता है,जिसमें असंख्यों  लोग डुबकी लगाकर तृप्त होते रहते हैं।जिसका अक्षय स्रोत है ,सेवा और साधना का अद्भुत संगम जिसमें व्याप्त रस मानव समाज को रसाक्त करता है। जैसे बरषने वाले मेघ बहु क्षेत्रीय बंजर भूमि को हरा-भरा बना देते हैं। यह हरियाली केवल और केवल सुख का मूल है, जो मानव मूल्यों के लिए उर्वरक है। कोटिशः  नमन है, ऐसे सेवायत साधकों को, जिनकी प्रत्येक साँस समुदाय विशेष में मंगल महोत्सव करती हुई राष्ट्र कल्याण का कारक बनती है।

लेखक परिचय - श्री देवी प्रसाद गौर

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नाम: देवीप्रसाद गौड़


पिता का नाम: स्व.रामप्रसाद


जन्म तिथि: 7अगस्त 1953


जन्म स्थान: गाँव बाटी(बहुलावन)जनपद मथुरा।


शिक्षा: स्नातक एवं अध्यापक प्रशिक्षण परीक्षा।


गतिविधियाँ: अनेक कविसम्मेलन मंच, दूरदर्शन के विभिन्न चेंनलों से काव्य पाठ आकाशवाणी के मथुरा वृंदावन केन्द्र से तीन दशकों से सतत एकल काव्य पाठ एवं काव्य गोष्ठियों का निरंतर प्रसारण। पूर्व सह सम्पादक: राजभाषिका मासिक मथुरा रिफाइनरी एवं न्यूज जर्नल मथुरा रिफाइनरी, मथुरा।


सम्मान: लगभग एक दर्जन संस्थाओं द्वारा साहित्यिक सम्मान।


प्रकाशित कृतियाँ: 1अक्रूर खंड काव्य 2तीखी अनुभूतियाँ 3 मदशाला 4 माधौ 5 जीवन बाजी तास की 6 स्मृतियों के अटल चित्र


सम्प्रति: 1975 से 1981 तक अध्यापन कार्य


                            1982 से 2013 तक इंडियन आँयल


                             मथुरा रिफाइनरी मथुरा में सेवायत


                             अगस्त 2013 मे लेखा अधिकारी से सेवानिवृत।


पता: बी-50 मोती कुंज एक्सटेंशन


                                   मथुरा 281001


मोबाइल: 9627719477



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03 अग॰
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ख़ुटखुटिया बाबा को शत शत नमन। लेखक को साधुवाद, जिन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को हमारे साथ साझा किया और हमें ऐसे महान संतो के बारे में बताया.........🙏

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