... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

इक आग का दरिया है

 

बिस्तर पर लेटे-लेटे बुरी तरह कुड़मुड़ा रहा हूँ. घंटों से चेष्टा कर रहा हूँ कि नींद आ जाए पर कम्बख़्त आती नहीं. मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती! यह कैसा अजाना रोग लग गया? घड़ी की टिक-टिक बराबर कानों में पड़ रही है. समय क्या होगा? बारह! रेडियम डायल की सुइयाँ चमक रही हैं.

उठ कर स्विच आॅन करता हूँ. एक दूधिया प्रकाश कमरे में तैर जाता है. ऐसी ही रोशनी दिल में क्यों नहीं होती? परीक्षाएं सिर पर आ गईं हैं और तैयारी कुछ हुई नहीं है. चलो अब पढ़ाई करी जाय.

पुस्तक खोल कर बैठ जाता हूँ मगर उसमें क्या लिखा है, समझ नहीं आता. शब्द बार-बार दिमाग़ की पकड़ से फिसलते हैं, फिर धीरे-धीरे एक लड़की की शक़्ल में बँध कर प्रविष्ट होने लगते हैं.

फिर लड़की! यह मुझे चैन नहीं लेने देगी. शायद उसे खुद भी नहीं पता होगा कि किसी के दिमाग़ में वह इतनी बड़ी उलझन बन कर बैठी हुई है.

आज जब वह रो रही थी तो जी अंदर ही अंदर भीग उठा था. उसने तो रोकर अपना बोझ हल्का कर लिया पर मेरे मन पर उदासी की ऐसी परत छोड़ गई जो यों ही नहीं जा सकेगी. ऐसा ही तब हुआ था जब विदाई वाले दिन उसकी आँखों में आँसू डबडबा रहे थे. उस दिन रात भर नींद नहीं आई थी. क्या आज फिर पुनरावृत्ति होगी? लड़की! तू मेरे पीछे क्यों पड़ी है? जो हालत मेरी हो रही है अगर मलिक की होती तो आश्चर्य न होता, क्योंकि वह तो तेरे ऊपर मरता है, पर मेरा-तेरा क्या रिश्ता? हम महज़ काॅलेजफ़ेलो ही तो हैं. क्लासफे़लो भी कह सकते हैं क्योंकि एक पेपर आॅप्शनल है और उस पीरियड में तू अपने कुछ सहपाठियों के साथ हम फ़ाइनल ईयर के छात्रों की कक्षा में ही बैठती है. अगले सत्र में तो तू फ़ाइनल में पहुँचेगी ही. और मैं?

तू इतनी भावुक क्यों है? मुझे देख, मैं तो क़तई नहीं हूँ! वैसे इस प्रश्न और इस फ़ैसले का समय अभी आया नहीं लगता. पहले मैं कुछ जांच-परख कर लूँ. तेरे बारे में तो पक्का पता है कि तू इस समय बिस्तर पर आनंद की नींद सो रही होगी. रो भी रही होगी अगर, जिसकी गुंजाइश नहीं लगती, तो सपने में ही. ऊपरी तौर पर. दिखावे के लिए. और देख, मैं जाग रहा हूँ और घंटों से आज के घटनाक्रम पर विचार कर रहा हूँ.

चूँकि कल काॅलेज में नहीं दिखाई दी थी इसलिए लगता था कि आज भी तू नज़र नहीं आएगी. कल्पना कर कि जब आज तुझे काॅलेज में जया के साथ देखा तो मुझे कैसी खुशी हुई होगी.

तेरा ध्यान कहीं और था क्योंकि जब तूने नमस्कार किया तो वह मेरे नमस्कार का प्रत्युत्तर नहीं था, अपनी ओर से किया गया अभिवादन था. तू क्या सोच रही थी उस समय?

फिर तू अपने वे फ़ोटो दिखाने लगी जो तेरे भैया ने खींचे थे, वे भी जो स्वयं तूने और लोगों के खींचे थे. तेरा वह फ़ोटो मुझे बहुत अच्छा लगा जिसमें तू साड़ी पहने बैठी थी. मैं पंद्रह-बीस मिनट तक वे सारे फ़ोटोग्राफ़्स देखता रहा, पर दृष्टि बार.बार उसी चित्र पर अटक जाती थी. एक बात बताऊँ? अब तुझसे छुपाना भी क्या! मेरे मन में आज पहली बार आया कि तेरा कोई फ़ोटो मेरे पास भी होता! नहीं, ‘कोई’ नहीं, सिर्फ़ वही. मगर संस्कार ऐसे नहीं हैं कि यह हिमाक़त कर जाता!

लगता है अच्छा ही हुआ क्योंकि जब जया ने वह फ़ोटो लेना चाहा तो तूने उसे भी टका.सा जवाब दे दिया था. जया के सामने मेरी क्या बिसात! फिर सोचता हूँ कि इसके लिए तू दोषी नहीं. घरों से मिला पारिवारिक संस्कार-विशेषकर लड़कियों को लेकर जिस तरह की आशंकाओं से हमारे माँ-बाप घिरे रहते हैं और जाने.अनजाने बंदिशें लगाते हैं, वही सब-इसके पीछे प्रतीत होता है. उन्हें भी कैसे दोष दिया जाए? मध्य वर्ग-बेहतर होगा कहना निम्न मध्यवर्ग-के माँ-बापों के लिए-जिनकी संतान जवानी की दहलीज़ पार कर रही हो - फूँक-फूँक कर क़दम रखना लाजि़मी है. ज़माना ख़राब है. अल्ट्रामाॅडर्न घरों की बात नहीं करता जो क्लबों के सदस्य हैं, जिनके बच्चे शोफ़र ड्रिवैन कार में काॅलेज आते-जाते हैं. उनकी बात नहीं. लेकिन ज़माना ऊँच-नीच वाला है और बेटी तो पराया धन होती है न! हाथ पीले कर उसे उसके घर में सुरक्षित पहुँचा देने का दायित्व भी तो माँ.बाप के ही जि़म्मे है. यह दायित्व मामूली नहीं. बच्ची! तू उन पर नाराज़ न हो.

यहाँ तक तो कोई बात नहीं. इसके बाद हम बातें करते हुए लाइब्रेरी पहुँचे. वहाँ जब अपने.अपने फ़ाइनल ऐक्ज़ाम्स से सम्बंधित आवश्यक प्रश्नों की चर्चा कर रहे थे तो उधर से गुज़रते विजय की छींटाकशी नागवार लगी. उसने छात्र नेताओं के नाम पर कलंक कहकर तेरी खिल्ली उड़ाने की कोशिश की थी. तमक कर उसके पीछे जाने को हुआ तो तूने संकेत से रोक दिया. बिना किसी तरह का चेहरे पर तनाव लाये.

यह चकित करने वाली बात थी. उस लड़के की तो शक़्ल से भी नफ़रत हो गई और आने वाले दिनों के लिए मैंने उससे स्वयं को काट लिया. ताज्जुब तो मलिक और उसकी मंडली पर हो रहा था जिसने काॅलेज का सबसे पुराना विद्यार्थी होने और तेरे प्रति जाने.पहचाने लगाव के बावजूद विजय को ऐसी छींटाकशी के लिए कुछ नहीं कहा. सम्भव है उसने भी वही सोचा हो, मगर उलझने की हिम्मत न जुटा पाया हो.

पर मैं तेरे साहस की दाद दूँगा कि एक ओर तो तूने मुझे रोका लेकिन साथ ही उसे करारा जवाब देते हुए बोली कि यह तो पूरे काॅलेज को दिख रहा है कि छात्र राजनीति को इस समय कौन कलंकित कर रहा है! विजय की बेहूदगी के गाल पर तेरे जवाब का ऐसा झन्नाटेदार तमाचा पड़ा कि फिर वह रुका नहीं और भागता नज़र आया.

साहस तो तुझमें है, इसमें दो राय नहीं हो सकतीं. एक अजीब अक्खड़पन, भावुकता से लिप्त अजीब मस्ती और सहज भोलापन. इन सबके समायोजन से जो व्यक्तित्व बनता है, लड़की! वह तेरा है.

सत्र के प्रारंभ में जब तुझे देखा था तो ऐसा कुछ नहीं लगा था. तब तू बहुत गुमसुम, उदास और अपने.आप में सिमटी रहने वाली लड़की दिखी थी. क्या ग्रामीण परिवेश से बड़े शहर के सहशिक्षा वाले काॅलेज के नितांत बदले माहौल ने यह प्रभाव डाला था?

मिस्टर राज अपने.आपको क्लास का हीरो समझने की भूल कर बैठे थे-शायद अपनी कार, शानो.शौक़त और चपलता के बल पर. कई बार जब उन्होंने तुझसे बात करने की चेष्टा की और तूने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया तो पहले लगा कि तू ऐसी लड़की है जो किसी कांप्लेक्स के कारण भीतर.भीतर लड़कों से चिढ़ती है. जल्दी ही पता लग गया कि मैं ग़लत था.

याद नहीं कि मेरे.तेरे बीच इतनी प्रगाढ़ता कैसे घुल गई कि जहाँ एक ओर बहुत दिनों तक हमारा एक-दूसरे से कोई संवाद नहीं था, वहीं दूसरी ओर मेहनत से बनाये गए आॅप्शनल पेपर वाले तेरे नोट्स मुझे पढ़ने को मिलने लगे. क्लास रूम में भी बातें होने लगीं. उन दिनों मलिक ने मुझे एक बार बताया था कि वह प्रीवियस इयर की एक लड़की पर मरने लगा है और वह तू है. मगर उसकी तुझसे बतियाने की हिम्मत नहीं होती थी. मलिक जिगरी दोस्त था. उसकी वह हिचक खुल गई तो मुझे खुशी हुई. मैं धीरे.धीरे तेरी ओर से खिंचने लगा. तुझसे बातें करता तो उदासीन भाव से. तुझे ज़रूर बुरा लगता होगा, मगर क्या करता? मैं भी तो मज़बूर था. जैसाकि दुनियाँ का दस्तूर है, मैं भी अपने स्वार्थ को सामने रख रहा था. मुझे किसी तरह का आघात लगे, उस स्थिति से मैं स्वयं को बचाना चाहता था. मगर तूने मेरी इस योजना को ध्वस्त कर दिया.

तेरी विशेषताएं उस समय मुखर होनी शुरू हुईं, जब काॅलेज स्तर पर एक सांस्कृतिक मंच के गठन की बात उठी और हम दोनों को ही उसका पदाधिकारी बनाया गया.

एक सच्चाई बड़ी देर से वस्त्र पहने बैठी है. इस निर्लज्जता के लिए क्षमा कि मैं इसे विवस्त्र करने जा रहा हूँ.

जिस समय तुझे विशिष्ट पदाधिकारी चुना गया उस समय किसी को भी तेरी इन योग्यताओं की जानकारी नहीं थी. तुझे शामिल करने के दूसरे कारण थे. सोचा गया था कि केवल लड़कों के रहने से तो मंच का स्वरूप एकांगी होगा. उसे व्यापकता देने के लिए किसी लड़की को भी शामिल करना ज़रूरी था. अगर वह सुंदर, आकर्षक हो तो सोने में सुहागा! उसी स्थिति में हमें काॅलेज की अन्य छात्राओं का भी सहयोग मिल सकता था.

मुश्किल यह थी कि कोई लड़की आगे आने को तैयार नहीं थी. तुझसे बात की गई तो शुरू में तूने भी हिचकिचाहट दिखाई, मगर बाद में मान गई. इस तरह सच पूछ तो तेरा नाम एक मज़बूरी के तहत चुना गया था. सुंदर स्मार्ट लड़कियां सोशल कल्चरल ऐक्टिविटीज़ में ज़रा कम देखने में आती हैं. हमें पता नहीं था कि तू हमारे सोच को इस तरह ग़लत साबित करेगी कि हमें बाद में अफ़सोस होगा.

मीटिंग बुलाई गई थी ऐक्ज़ीक्यूटिव बाॅडी की. स्थान नियत किया गया लाइब्रेरी के ऊपर का हाॅल. प्रोफ़ेसर राय प्रेरक के रूप में सक्रिय थे. उन्हीं के प्रयासों से हमें उक्त स्थान का प्रयोग करने की अनुमति मिली थी.

निश्चित समय पर सिवाय तेरे सभी पहुँच गए थे. मैं तुझे खोजने निकला तो तू जया के साथ किसी अन्य दिशा की ओर दूर जाती नज़र आई. शीघ्रता से नज़दीक पहुँचा और मीटिंग प्रारंभ होने के बारे में कहा तो तू चैंकी. तुझे ख़्याल नहीं रहा था कि आज संस्था की मीटिंग है. माफ़ी माँगते हुए जब तूने साथ चलने का उपक्रम किया तो जया रुक गई. दोनों की गहरी मित्रता थी, सो मैंने उसे भी साथ ले लिया. ऐसा न करता तो बाद में जया का कोपभाजन बनता. हाँ, तुझे मीटिंग में इस क़दर लापरवाह देख मेरी पूर्व धारणा पुष्ट होती लगी कि तुझे पदाधिकारी बनाकर हमने भूल की है. अब इसमें मेरी क्या ग़लती थी? आने वाले क्षणों ने मुझसे पहले से ही कोई दुआ-बंदगी तो कर नहीं रखी थी! मैं उन्हें कैसे जान पाता?

यह क्रिश्चियन काॅलेज है. दूसरे शब्दों में इसे अंग्रेज़ीदाँ काॅलेज कहा जाए तो बेहतर. यहाँ के शिक्षक हों या छात्र-अंगे्रजि़यत में डूबे रहना अपनी शान समझते हैं. शायद इसी का असर था कि जब हमारी संस्था के नामकरण की बात आई तो झटके से एक महोदय उठ खड़े हुए और उन्होंने सुझाया - द टेलेंट!

नाम रख लेने से ही क्या टेलेंट दौड़ती आएगी? मुझे ठीक नहीं लगा. पर यह सोचकर कि मेरी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह जाएगी, मैं चुप रह गया-अब जिसे अपनी बुज़दिली कहूँगा. एक ऐसे नौजवान की, जो पूर्व में विश्वविद्यालय के परीक्षा फ़ाॅर्म अंग्रेज़ी की जगह हिन्दी में छपें-इस मुद्दे को लेकर वी.सी. तक से लड़ गया था और माँग न मानने पर परीक्षा का बहिष्कार करने की भी धमकी दे डाली थी! यह बुज़दिली क्या इस अल्ट्रामाॅडर्न काॅलेज के परिवेश से अचानक हुए साक्षात्कार ने उपहार में दी थी?

निकट था कि हमारी प्रस्तावित संस्था का उक्त नाम सर्वसम्मति से पास हो जाता कि अचानक एक तीखी आवाज़ आई - हमारी संस्था का नाम अंग्रेज़ी में नहीं हो सकता! यह साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था है, इसका नाम भी हिंदी में ही होगा.

चौंककर सबने रंग में भंग डालने वाली आवाज़ की ओर देखा. हैरत की बात कि ऐसा करने वालों में एक मैं भी था! ओह! यह तेरी आवाज़ थी! मेरी पूर्व.निर्धारित धारणा को ध्वस्त करती! मुझे प्रसन्नता की अनुभूति होनी चाहिए थी कि संस्था का हिन्दी नाम रखने की मेरी वास्तविक और दिली ख़्वाहिश को समर्थन देने वाली एक आवाज़ सुनने को मिली थी, मगर सच कहूँ - भीतर अफ़सोस का बवंडर उठता महसूस हुआ. तेरे व्यक्तित्व को ठीक.ठीक आंकने वाली मेरी सोच को धक्का जो लगा था. यही वह क्षण था जिसके स्पर्श मात्र से मेरे दिमाग़ में निर्मित तेरी एक निश्चित छवि खंडित होनी शुरू हुई.

कभी उस छवि को खंडित होना मैं असंभव मानता था और आज देखता हूँ कि उसकी जगह अब एक सर्वथा भिन्न और आकर्षक छवि रूपाकार लेती जा रही है - शायद ले चुकी है. कितनी अजीब बात है!

प्रोफ़ेसर राय ने इस पहलक़दमी का स्वागत किया और कहा कि जब तू संस्था का नाम हिन्दी में रक्खे जाने की सिफ़ारिश कर रही है तो इसका नाम भी तुझे सुझाना चाहिए. तब तूने एक दिन का समय माँगने की चतुराई दिखाई और नामकरण वाले विषय को स्थगित करते हुए बैठक की शेष कार्यवाही आगे बढ़ गई.

दूसरे दिन काॅलेज देर से पहुँचा. पहुँचते ही हाथ में एक मज़मून थमा दिया गया जिसमें लिखा था कि हमारी संस्था का नाम नवोदित सांस्कृतिक संघ होगा. मुझे छोड़कर सभी पदाधिकारियों के हस्ताक्षर हो चुके थे. क्या यह छात्र संघ की तर्ज़ पर रक्खा गया था? मैंने सोचा फिर हस्ताक्षर करने से इन्कार करते हुए कहा कि इस नाम से एक विलुप्त हो चुके राजनीतिक संगठन की बू आती है. मुझे बताया गया कि यह नाम तूने दिया है. यह बताने के पीछे भाव यह था कि जिससे तुम्हारी रोज की बातचीत है उसी ने यह नायाब नाम दिया है और तुम्हीं इसका विरोध कर रहे हो! कुछ ताज्जुब हुआ और हँसी आई. चौबीस घंटों के शोध के बाद तेरे दिमाग़ ने ऐसा फि़रकापरस्त नाम खोजा था. लेकिन मेरा निर्णय यथावत रहा. मैंने कहा कि इसे बदला जा सकता है. विजय और मलिक समवेत स्वर में बोले कि हम सब इसे स्वीकृति दे चुके हैं और अब नाम के पचड़े में नहीं पड़ेंगे. मेरे फिर भी न मानने पर कहा गया कि ठीक है इस बारे में तुझसे बात करूँ. अगर तू मान जाती है तो नाम बदल दिया जाएगा.

तब मैंने अविलम्ब बात करने का फै़सला किया. तू लाइब्रेरी में जया के साथ दिखाई दी तो मैंने छूटते ही पूछा कि यह ऊटपटांग नाम रखने की किसने सलाह दी? तूने कहा कि इसमें ऐसी क्या बुराई है? एक उभरती हुई संस्था के लिए यही नाम उचित है. उस समय तो तेरी बुद्धि के दिवालियेपन पर मुझे हैरानी हुई थी जो इस जानकारी के साथ काफ़़ूर हुई कि तेरे दादा अपने समय की भारतीय जनसंघ पार्टी के स्थानीय मंत्री रह चुके हैं. पारिवारिक वातावरण का कुछ तो प्रभाव पड़ता ही है आने वाली नस्लों पर. इसमें तेरा क्या कु़सूर!

जब मैंने जोर देकर इसका विरोध किया तो तूने कहा अच्छा तो आप ही कोई नाम बताइये? क़तई भरोसा नहीं था कि वह अपने रुख़ में बदलाव करेगी इसलिए यह सुनकर प्रसन्नता हुई. बी.ए. के पाठ्यक्रम में यशपाल का उपन्यास दिव्या पढ़ा था. कहा कि हमारी साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था का नाम दिव्या रहे तो कैसा रहेगा? तू सोचने लगी. बोली - नाम तो अच्छा है, मगर दूसरे छात्रों ने विरोध किया तो हम कुछ न कर पाएंगे. तय किया गया कि प्रोफ़ेसर राय से सलाह ली जाए. उनके पास पहुँचे. प्रोफ़ेसर राय ने नये नाम पर सकारात्मक रुख़ दिखाते हुए सहमति की मुहर तुरंत लगाई. हम उत्साह से भर गए और संस्था के शेष सभी पदाधिकारियों को बता दिया गया. तेरे बाद प्रोफ़ेसर राय की भी स्वीकृति के वीटो से सभी ख़ामोश थे. इस तरह सर्वसम्मति से संस्था का नाम दिव्या पारित हो गया.

संस्था के गठन में नाम का ही झंझट बाक़ी था. वह निबट गया तो बात आई कि इसका उद्घाटन कराया जाय. सभी चाहते थे कि यह हो ताकि काॅलेज के शेष छात्रों को भी हमारी गतिविधियों का पता लग सके. लेकिन उद्घाटन का कार्यक्रम या कोई भी कार्यक्रम करने के लिए पैसों की ज़रूरत थी. हमारी संस्था छात्रसंघ नहीं थी जिसके लिए काॅलेज के प्रबंधक छात्रों के प्रवेश के समय ही व्यवस्था रखते हैं. वैसे शासन के नये आदेश के अनुसार छात्रसंघों की सदस्यता ऐच्छिक कर दी गई थी और छात्र चाहे तो उसका शुल्क देने से इन्कार कर सकता था. लेकिन व्यवहार में किसी न किसी मद में अन्य शुल्क कहकर तत्सम्बंधी शुल्क भी लिया जाता था और छात्रसंघ के वार्षिक समारोह खूब धूमधाम से होते थे. बाक़ी समय तो इन छात्रसंघों के ज़्यादातर कार्यकलाप हड़ताल आदि कराना ही होते थे! ख़ैर, हम लोगों को इस सब में रुचि नहीं थी. हमारी संस्था का उद्देश्य भी साहित्यिक.सांस्कृतिक गतिविधियों को संचालित करना और अपने बीच की सृजनात्मक प्रतिभाओं को बाहर लाने का प्रयास करना था.

तो सारी समस्या थी पैसों की. उसे छात्रों से ही उगाहना था, जो टेढ़ी खीर थी. दलेर सिंह मेंहदी का कार्यक्रम रक्खा जाता तो पैसों की बरसात होने लगती! मगर वैसे कार्यक्रम छात्रसंघ के ही तत्वावधान में होते थे या हो सकते थे और हम उनसे अलग सुरुचिपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रम करने का लक्ष्य रखते थे. जो भी हो, जब ओखली में सिर दिया जा चुका था तो मूसलों से डरा नहीं जा सकता था. आनन.फ़ानन में रसीद बुक्स छपा ली गईं और बीस.बीस लीव्स में स्टैपिल कराकर संस्था के सभी पदाधिकारियों सहित दो-चार अन्य विश्वस्त छात्रों को उन्हें बाँट दिया गया. मैं उस समय काॅलेज में नहीं था. कोई घंटे भर बाद पहुँचा तो पता लगा कि चंदे वाली तेरी रसीद बुक तो आधी ख़त्म हो चुकी है!

जहाँ तक मेरी बात थी, चंदे के मामले में हमेशा अनाड़ी सिद्ध हुआ हूँ. किसी से पैसा मांगने में-चाहे वह कोई अच्छा कार्य ही क्यों न हो-बड़ी झिझक महसूस होती थी. लेकिन तुझे इस तेज़ी से कार्य करता देख मैंने भीतर उठती शर्म को दबाया और किसी कोने में छुपे उत्साह के भाव को सन्नद्ध किया. इसका सुपरिणाम भी निकला, यद्यपि उसकी मात्रा तेरे कार्य के समक्ष बहुत कम थी. जितने दिनों में मैंने एक रसीद बुक समाप्त की, उतने ही समय में तूने तीन रसीद बुक काटकर अच्छी राशि जमा कर ली थी. मुझे लगा कि लड़कियों के लिए चंदा एकत्र करना मुश्किल नहीं होता. ज़रा-सा मुस्कुरा दीं और लड़के धड़ाम! मगर यह धारणा कितनी ग़लत थी और लड़कियों के लिए चंदा माँगना कितना अपमानजनक हो सकता है, इसका पता मुझे रमेश वाली घटना से लगा.

 

जया, निशा और सरोज जैसी अपनी कुछ सहेलियों के साथ तुझे लाइब्रेरी से आते देखा तो रुकने के लिए संकेत किया. चर्चा करना चाहता था कि इतनी राशि हम लोगों के पास आ गई है और क्या अब हम उद्घाटन कार्यक्रम के बारे में विचार की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं?

नज़दीक पहुँचा ही था कि कार्यालय की ओर से रमेश को अपने दो लफंगे दोस्तों के साथ तेरे नज़दीक से गुज़रते पाया. मैं उसकी सिफ़त से वाकिफ़ था. वह काॅलेज के उन चंद लड़कों में था जो लड़कियां छेड़ने में अपनी शान समझते हैं. तू इस लड़के से सर्वथा अपरिचित थी. इसके बैकग्राउण्ड को कैसे जान पाती? तूने सहज भाव से रसीद बुक उसकी ओर बढ़ा दी. उसने आँखें चमकाते हुए मुस्कराकर पूछा कि यह क्या है? तूने उससे संस्था के लिए चंदा देने का आग्रह किया. उसने रसीद बुक माँगी और जब मिल गई तो उसे बिना देखे जेब में रख लिया!

मैं अवाक्. तेरे लिए तो ऐसा व्यवहार सर्वथा अप्रत्याशित था. मगर तूने स्वयं को अधिक देर हतप्रभ नहीं रहने दिया. जैसे पलक झपकते ही तू सारा कि़स्सा समझ गई. अगले क्षण तूने उससे रसीद बुक वापस करने को कहा. जवाब में वह बोला कि मैंने तेरे जैसी बहुत.सी लड़कियाँ देखी हैं.

बस, इतना भर तेरे लिए काफ़ी था. आखि़र तो तेरी नसों में झलकारी बाई का ही रक्त दौड़ रहा था न! तेरा चेहरा लाल हो गया और नथुने गुस्से से फड़कने लगे. अगले पल तूने सैंडिल उतार ली. यह सब कुछ इतनी तेज़ी से हुआ कि मैं जो रमेश की लुच्चई पर आगे बढ़कर निबटने की सोच रहा था, सोचता ही रह गया. मैंने और जया ने तत्काल न रोका होता तो तूने उस पाजी के सिर पर सैंडिलों की बरसात ही कर दी थी.

रमेश और उसके आवारा दोस्तों ने ऐसे नज़ारे की सपनों में भी कल्पना नहीं की होगी. उनके तो होश ही फ़ाख़्ता हो गए. मैंने आगे बढ़कर रमेश की जेब से रसीद बुक निकाल कर तुझे सौंपी और रमेश से माफ़ी माँगने को कहा. रमेश जैसा लफंगा माफ़ी तो क्या माँगता लेकिन पिटे हुए चेहरे के साथ अपने दोस्तों के साथ वहाँ से चलता बना. दूर से ही उसे प्रोफ़ेसर राय, प्रोफ़ेसर सक्सेना के साथ आते दिखाई दे गए थे.

इधर तेरी सहेलियां इस घटना से उत्पन्न तनाव को ख़त्म करने के उद्देश्य से मुझसे कैंटीन में चाय पिलाने की फ़रमाइश करने लगीं. हम कैंटीन में पहुँचे और एक टेबुल हथिया ली. चाय जब आई तो अचानक तू खिलखिलाकर हँसने लगी. सहेलियाँ चैंक कर देखने लगीं और मैं सोचने लगा कि आखि़र अभी हुई घटना में ऐसी बेतहाशा हँसी की कौन.सी बात छुपी थी?

 

कई दिनों के अथक परिश्रम के बाद भी जो राशि एकत्र हुई थी उससे उद्घाटन ही संभव था. अन्य प्रस्तावित कार्यक्रमों के लिए वह यथेष्ठ नहीं थी. कारण यह था कि जब भी किसी छात्र से चंदे के लिए दरियाफ़्त की जाती तो वह ऐसा जताता जैसे उसे संस्था के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है. बात सही भी थी. काॅलेज के ज़्यादातर छात्र इस बात से अनभिज्ञ थे कि किसी ऐसी सांस्कृतिक संस्था का गठन हो चुका है जो काॅलेज स्तर पर कार्यक्रमों का आयोजन करेगी.

निराकरण एक ही तरह हो सकता था कि संस्था का उद्घाटन शानदार ढँग से किया जाय-किसी वी.आई.पी. गैस्ट द्वारा, प्रिंसिपल और फ़ैकल्टी के सभी लेक्चरार उपस्थित रहें और तब संस्था के उद्देश्यों, भावी क्रियाकलापों के सम्बंध में जानकारी देते हुए छात्रों से यथासंभव सहयोग देने की अपील की जाए. छात्रों के वांछित सहयोग की गुंजाइश तभी बन सकती थी.

जैसे ही यह बात विचार में आई, उसे क्रियान्वित करने का निश्चय कर लिया गया. सबसे पहले प्रिंसिपल मिस्टर खन्ना को काॅन्फ़ीडेंस में लेना ज़रूरी था. सभी पदाधिकारी-उनमें तू भी शामिल थी-उनके आॅफि़स पहुँचे. मिस्टर खन्ना ने आने का कारण जानना चाहा. मैंने संस्था की रूपरेखा स्पष्ट की, मगर उन्होंने हमारी बातों में रुचि नहीं दिखाई.

तब पहली बार तूने जु़बान खोली - यदि हमेशा की तरह इस बार भी काॅलेज यूनियन की चुनाव प्रक्रिया समय पर हो जाती तो हमें आपको कष्ट देने की ज़रूरत ही नहीं थी! यूनियन को एकमुश्त अच्छी रक़म मिलती थी. यहाँ हमें काॅलेज से एक पैसे का सहयोग नहीं मिल रहा. आवश्यक धनराशि का प्रबंध हमें छात्रों से चंदा लेकर ही करना है और जब तक संस्था का प्रभावी उद्घाटन समारोह नहीं होगा और छात्र उसमें उपस्थित होकर हमारे उद्देश्यों से परिचित नहीं होंगे, हमें उनसे अपेक्षित सहयोग कैसे मिलेगा? अच्छे उद्देश्य के लिए प्रोत्साहित करने की जगह आप हमें निरुत्साहित कर रहे हैं.

तेरा चेहरा तमतमा गया. तुझे इस तरह धाराप्रवाह बोलते देख सब चकित थे. मिस्टर खन्ना सख़्त प्रिंसीपल थे और सामान्यतया उनके पास जाने से छात्र हिचकिचाते थे. लगा कि अब कोई विशेष घटना हो सकती है-कम से कम मिस्टर खन्ना की ओर से कड़ी डाँट तो मिलेगी ही, गुस्से से भरी कड़क आवाज़ में हमें बाहर जाने को कह दिया जाएगा.

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. हाँ, एक विचित्र बात-मेरी अपेक्षा के विपरीत-ज़रूर हुई. मिस्टर खन्ना के सख़्त चेहरे पर पहली बार सौम्यता के भाव दिखे. उन्होंने मुस्कुराते हुए तेरी ओर देखा और कहा - जाइये, और समारोह की तैयारी शुरू कीजिये. मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश के शिक्षा उपमंत्री-जो अपने ही नगर के हैं-को बुलाने की जि़म्मेदारी मैं लेता हूँ. हम इस कार्यक्रम में छात्रों से इस संस्था में सक्रिय रूप से जुड़ने का आह्वान करेंगे ताकि काॅलेज का यह सत्र सांस्कृतिक गतिविधियों से शून्य न रह जाए.

प्रिंसीपल की यह अप्रत्याशित घोषणा सुन छात्रों के चेहरे प्रसन्नता से खिल गए. तेरे चेहरे की चमक कुछ अलग नज़र आ रही थी. सबने प्रसन्न हो बाहर जाने की मुद्रा अपनाई, मगर तू खड़ी रही. प्रिंसीपल ने प्रश्नवाचक निगाहों से देखा तो तू बोली - सर! हम आभारी हैं कि हमारी बात पर स्वीकृति की मोहर लगाकर आपने उत्साहवर्द्धन किया है, मगर मैं चाहूँगी कि प्रदेश के शिक्षा उपमंत्री को न बुलाकर किसी अन्य माननीय अतिथि को बुलाया जाए, क्योंकि पिछले विधानसभा सत्र में उन्होंने शिक्षण संस्थाओं में लड़कियों के लिए ड्रेस कोड वाले प्रस्ताव का समर्थन किया था. यह छात्राओं के मूलभूत स्वतंत्रता-अधिकार का हनन था और इससे उनकी संकीर्ण मानसिकता का पता चलता है. काॅलेज में उनके आने से नकारात्मक संदेश जायेगा. कौन जाने वे अपने उद्बोधन में हमें चोट पहुँचाने वाली ऐसी ही कुछ दूसरी बातें नहीं कह बैठेगें?

तेरी बातें सुनकर मैं चकित रह गया. अन्य छात्रों के बाहर जाते क़दम ठिठक गये. हम में से किसी ने इस तरह नहीं सोचा था. तेरे तर्क में दम था. प्रिंसीपल अनुभवी और अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि के लिए जाने जाते थे. उन्होंने सहमति में सिर हिलाया. बोले - बात तो तुम्हारी ठीक लगती है. फिर तुम्हीं लोग कुछ बेहतर नाम सुझाओ.

सर! आपने तो हमारे दृष्टिकोण को समझ ही लिया है. आप सभी प्रमुख हस्तियों को जानते हैं और इसे भी कि उनमें से किसे अप्रोच किया जा सकता है?

प्रिंसीपल खन्ना कुछ सोचने लगे.

तब तूने कहा - सर! मौजूदा समय में जहाँ एक ओर स्त्रियों की जन्मदर कम होती जा रही है, वहीं दूसरी ओर स्त्रियाँ हर क्षेत्र में शीर्ष पर दिखाई दे रही हैं-राजनीति, शासन, खेल, चिकित्सा, समाज सेवा, पत्रकारिता. नाम गिनाने की ज़रूरत नहीं. तो किसी ऐसी ही महिला को हमारी मुख्य अतिथि क्यों न बनाया जाए?

अच्छा विचार है! प्रिंसीपल ने कहा - किरन बेदी, तीस्ता सीतलवाड़, अरूणा राय...

मेधा पाटकर ... तू बोली.

हाँ ये सभी अपने-अपने क्षेत्रों की दिग्गज हस्तियाँ हैं. इनमें से किसी की भी स्वीकृति मिली तो उससे इस काॅलेज का भी गौरव बढ़ेगा.’ प्रिंसीपल बोले, मुझे खुशी है कि हमारे संस्थान में इतने जागरूक छात्र भी हैं. मैं कोशिश कर इन्हीं में से किसी को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने की कोशिश करूँगा.

प्रिंसीपल के कक्ष से लौटते हुए हमें एक बड़ी विजय मिलने की अनुभूति हो रही थी. हम यह भी समझ चुके थे कि प्रिंसीपल में आये बदलाव के पीछे अपनी बात को युक्तिसंगत और तर्कपूर्ण ढँग से रखने की तेरी साहसिक पहल ही थी.

घंटे भर बाद जब हम संस्था के भावी स्वरूप पर विचार के लिए एक जगह बैठे तो समारोह की तिथि निश्चित हो गई और नोटिस बोर्ड पर हाथ से लिखा नोटिस भी चस्पाँ कर दिया गया. किंतु तभी सवाल उठा कि मुख्य अतिथि का स्वागत कौन करेगा? विजय और मदन ने मेरा नाम प्रस्तावित किया मगर मेरी इसमें रुचि नहीं थी. तभी मलिक की आवाज़ आई कि यह जि़म्मेदारी तू उठा सकती है. मैंने समर्थन किया. देखते.देखते सभी इस प्रस्ताव के पक्ष में आ गए-केवल एक को छोड़कर. वह एक-और कोई नहीं-तू स्वयं थी. किन्तु बाक़ी लोगों के पक्ष में होने के कारण तेरे लिए निकल भागना संभव नहीं था.

जब जि़म्मेदारी स्वीकार ली तो तुझे जैसे बेचैनी हो गई उसे ठीक से निभाने की. तूने बताया था कि इससे पूर्व मंच से बोलने का तेरा कोई अभ्यास नहीं रहा है और अब तू इसके लिए तैयारी करेगी.

अगले दिन पता लगा कि तूने सारी रात जागकर अपने स्वागत.भाषण की तैयारी की थी. तूने जब यह बताया तो यह भी कहा कि तुझे भीतर ही भीतर डर लग रहा है. पहली बार मंच पर बोलने में सभी को हिचकिचाहट होती है-वह भी हज़ारों लोगों के सामने! मैंने कहा कि भाषण देने का गुरुमंत्र यह है कि भाषण देने वाला स्वयं को सबसे बुद्धिमान और सुनने वाले को सबसे बेवकूफ़ समझे और बिना रुके बोलता जाए! दूसरी और ज़रूरी बात यह कि सामने बैठे किसी भी छात्र से आँखें न मिलाए. उपस्थित छात्रों को एक बड़े बिम्ब की तरह मन में लाए और बोलती जाए. यदि किसी छात्र की तरफ़ नज़र गई और वह व्यंग्य में मुस्करा दिया तो तू सारी तैयारी भूल जाएगी और सबके सामने बड़ी किरकिरी होगी! तू बोली कि आप तो मुझे और डरा रहे हैं. मैंने कहा - लड़की! तुझे मंच पर बोलने का मंत्र सिखा रहा हूँ!

 

कार्यक्रम वाले दिन प्रातः से ही काॅलेज में चहल-पहल शुरू हो गई थी. माॅर्निंग शिफ़्ट ख़त्म होते ही छात्र झुंड के झुंड बनाकर कान्फ्रेंस हाॅल में प्रविष्ट होने लगे. देखते ही देखते हाॅल खचाखच भर गया. इसके पीछे एक बड़ा कारण मुख्य अतिथि के रूप में मेधा पाटकर का आगमन था. हम सब उन्हें लेकर प्रिंसीपल महोदय के साथ हाॅल में दाखिल हुए. ठीक साढ़े दस बजे कार्यक्रम प्रारंभ हुआ. मंच संचालन का जि़म्मा मेरा था. अतिथियों का स्वागत करने के बाद संस्था के उद्देश्यों और भावी क्रियाकलापों पर रोशनी डालने के लिए मैंने तुझे आमंत्रित किया.

तुझे मंच की ओर आते देख लड़कों में खलबली मची. कुछ ने कानाफूसी शुरू की और कुछ यहाँ-वहाँ ताकझाँक करने लगे. तूने आत्मविश्वास के साथ माइक पकड़ा और अपनी बात कहनी शुरू की. तेरी वक्तृता प्रभावशाली थी. मंच पर बोलना साधारण कला नहीं है. बड़े.बड़े विद्वान चारों खाने चित्त हो जाते हैं. तू पहली बार में ही इतना अच्छा बोल सकती है, इसका अंदाज़ा मुझे नहीं था.

कह नहीं सकता कि यह मेरी सलाह का नतीज़ा था या तू पहले से ही इस गुण से लैस थी और मुझ से झूठ बोल रही थी कि तेरा सार्वजनिक रूप से बोलने का यह पहला मौक़ा होगा और इस कारण तुझे डर महसूस हो रहा है! श्रोता.समूह प्रभावित दिख रहा था. जो छात्र तुझे देखकर व्यंग्य में मुस्करा रहे थे, अब गंभीर थे और उनके चेहरों पर तन्मयता छा गई थी. जैसे ही तूने बोलना ख़त्म किया पूरा हाॅल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँजने लगा था.

कार्यक्रम सफलतापूर्वक समाप्त हुआ था. मेधा पाटकर ने हमारी इस पहल का स्वागत किया था और काॅलेज में सुरुचिपूर्ण सांस्कृतिक वातावरण बनाने के प्रयासों की सराहना की थी. मगर छात्रों को समाजोन्मुख कार्यकलापों में रुचि लेने का भी आह्वान किया था. उन्होंने कहा कि आपके नगर में भारत की सबसे पवित्र मानी जाने वाली नदी गंगा बहती है. क्या आपको पता है कि आज उसकी क्या दशा हो रही है? हर रोज सैकड़ों टन उच्छिष्ट उसमें प्रवाहित होकर उसकी गुणात्मकता को क्षीण कर रहा है. नदी हमारी प्राणधारा है. आप युवा हैं, शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, मगर अपनी नदियों का सम्मान करना सीखें और समाज के दूसरे वर्गों को भी इस जज़्बे से लैस करें तो आपकी शिक्षा सार्थक होगी और यह समाज आपके अवदान को हमेशा याद करेगा. छात्रों पर मेधा पाटकर के उद्बोधन का अच्छा असर पड़ा था.

मैं हाॅल से निकलकर बाहर आ गया. एकांत चाहता था. मन करता था कि एकांत में पहुँचकर सिंहनाद करूँ कि सारा वातावरण अनुगुंजित हो जाए. तेरी सफलता ने मुझमें अजीब.सी उत्तेजना भर दी थी. काॅलेज कैम्पस में ही पीछे एक गाॅर्डन था. मैं वहाँ पहुँचा और देर तक आत्मविस्मृत अवस्था में एक बैंच पर बैठा रहा. ध्यान टूटा जब किसी ने आवाज़ दी. घूम कर देखा तो यह तू थी.

 

हमारी संस्था दिव्या ने काॅलेज में धाक जमा दी थी. तरह-तरह के साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रम करके. छात्रों का सहयोग भी अप्रत्याशित उत्साह से भरा रहता था. इन कार्यक्रमों को करते हुए ख़्याल ही नहीं रहा कि वार्षिक परीक्षा निकट आ गई है! प्रोफे़सर राय ने एक दिन क्लास में एक सवाल पूछा और उसका जवाब तुरंत नहीं सूझा तो पता लगा कि हम अपनी पढ़ाई की कैसी उपेक्षा कर रहे थे. अब हमारी मंडली नोट्स बनाने में जुट गई. पुस्तकालय कक्ष पहले से अधिक समय के लिए आबाद रहने लगा.

सत्र समाप्ति के कुछ ही दिन रह गए तो प्रीवियस ईयर के छात्रों ने फ़ाइनल के हम छात्रों के लिए विदाई समारोह आयोजित करने का प्रस्ताव किया. यह परंपरा बहुत दिनों से चली आ रही थी. यद्यपि इस पूरे साल में अधिकांश सीनियर छात्रों ने प्रीवियस के छात्रों के प्रति सद्भाव नहीं रक्खा था, जब.तब व्यंग्यात्मक फि़करे कसते रहते थे सो उन्हें लगा कि कहीं इस विदाई के बहाने वे उनसे अपनी बेइज़्ज़ती का बदला न लें? फिर भी प्रस्ताव प्रीवियस के छात्रों की ओर से आया था इसलिए उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता था.

 

नियत दिन, नियत समय-अपराह्न तीन बजे जब हम काॅलेज के लाॅन में पहुँचे तो देखा कि प्रीवियस के छात्रों ने अपनी उदारता और सद्भाव का प्रदर्शन करते हुए भव्य प्रबंध किया था. शानदार बैनर, मंच पर गुलदस्ते और प्रोफ़ेशनल फ़ोटोग्राफ़र इसका बयान कर रहे थे.

सबसे पहले ग्रुप फ़ोटो लिया गया. स्मृतियों को स्थायी बनाने के लिए. यह कार्यक्रम प्रायः अंत में ही रक्खा जाता है मगर यहाँ फ़ोटोग्राफ़र महोदय पहले ही आ गए थे. उन्हें थोड़ी ही देर बाद कहीं अन्यत्र भी जाना था. अस्तु, यह निर्णय ठीक ही लिया गया कि इस काम को पहले ही निबटा लिया जाए. सभी छात्र समय से पहुँच गए थे. ऐसा न होता तो समस्या आ सकती थी. संचालन करते हुए मलिक ने मुझे एक गीत सुनाने के लिए आमंत्रित किया. मेरी आनाकानी का कोई असर नहीं हुआ. तब मैंने इंदीवर का गीत सुनाया. यह गीत मुझे बहुत प्रिय था-

ओह रे ताल मिले नदी के जल में,

नदी मिले सागर में,

सागर मिले कौन से जल में,

कोई जाने ना!

कई छात्रों ने अपने संस्मरण सुनाए. अब प्रीवियस के छात्रों की ओर से किसी को बोलना था. मलिक तुझे बुला रहा था. मैंने मन में उसके चातुर्य की प्रशंसा की.

सभी जानते थे कि भीतर ही भीतर वह तुझे पसंद करता है. अच्छी तो तू मुझे भी लगती थी और क्लास के अन्य कई छात्रों को भी, लेकिन मलिक तुझमें ख़ास दिलचस्पी लेता मालूम होता था. मलिक मुझसे दो वर्ष बड़ा था. मेरे पड़ोस के ही मोहल्ले का रहने वाला था और इस नाते गहरा दोस्त हो चुका था. इस काॅलेज में आने से पहले उसके कई अहसान मेरे ऊपर थे. वह इसी काॅलेज का बोनाफ़ाइड छात्र था क्योंकि हिस्ट्री में पोस्टग्रेजुएशन करने के बाद उसने डबल एम.ए. में एडमीशन लिया था. मेरे एडमीशन में भी उसकी सक्रिय भूमिका रही थी. शायद यही वह कारण था कि मैं तुझसे उस समय भी जानबूझकर दूरी बनाये रखता था जब मुझसे बात करते समय तेरे भीतर की सारंगी की आवाज़ मेरे आत्म को छू रही होती थी. मलिक एक तरह से तुझ पर अपना अधिकार समझने लगा था जो प्रकटतः एकतरफ़ा ही था; मगर मैं नहीं चाहता था कि उसे ऐसा महसूस हो कि मैं उसके अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण की कोशिश कर रहा हूँ.

तूने जब बोलना शुरू किया तो तेरा एक.एक शब्द कानों के रास्ते से हमारे दिलों में उतर कर जैसे हलचल मचा रहा था. हम भावुकता से लबरेज़ थे. प्रीवियस के छात्रों की दरियादिली, उनकी सौम्यता और शिष्ट आचरण हमारे बीच के कुछ उद्दंड छात्रों के व्यवहार के लिए जैसे हमें ही आईना दिखा रहे थे. तेरे भाषण में जब अपनी ग़लतियों के लिए-जो हुईं ही नहीं-माफ़ी मांगी जाने जैसी बात आई तो औरों की तो नहीं कहता, मेरी आँखों में पानी की बूँद नाचने लगी. तू मुझे देख रही थी. क्या उसी का यह प्रभाव था कि मेरी आँखों में नाचती वह बूँद कई रूपों में तेरी आँखों में झिलमिलाती लगी, जिसे शायद छुपाने के उद्देश्य से तूने घूमकर टेबुल पर रखे गिलास को उठाकर पानी के दो घूंट लिये. मगर सच्चाई तो प्रत्यक्ष थी. वह क्या बात थी कि तेरी आँखों से एक बूँद वर्षा होती मुझे दिखी. बचने की लाख कोशिशों के बावजूद.

कार्यक्रम की समाप्ति के बाद शानदार जलपान का प्रबंध था. तिवारी रेस्टोरेंट की राजकचैड़ी, दीक्षित के समोसे, ठग्गू के लड्डू और बंगाली बाबू की रसमलाई. चाय.काॅफी न पीने वालों के लिए कोल्ड ड्रिंक. सब कुछ शानदार.

प्रीवियस और फ़ाइनल के सभी छात्र हँस.हँसकर बातें करते हुए इस हाई टी का आनंद ले रहे थे. तू अपनी सहेलियों से घिरी थी जब मलिक तेरे पास गया और अपनी प्लेट से एक रसमलाई तुझे देनी चाही. तूने मना किया. उसने इसरार किया तो तूने कहा कि मुझे रसमलाई अच्छी नहीं लगती. प्लीज़, आप मुझे क्षमा करें. मलिक खिसियाने मुँह के साथ वापस हमारे ग्रुप में आ मिला. मैंने लक्ष्य किया कि तेरा चेहरा गम्भीर था. उस पर विषाद की रेखाएं भी थीं. बाक़ी छात्रों की तरह हँसी.खुशी के भाव नहीं.

सभी छात्रों ने अपनी-अपनी आॅटोग्राफ़ बुक सबके पास सर्कुलेट की थी. तेरी आॅटोग्राफ़ बुक में मैंने बच्चन की पंक्ति लिखी थी -तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों का निमंत्रण.

मेरी आॅटोग्राफ़ बुक जब मेरे पास वापस आई तो देखा कि तूने लिखा है - सागर कौन से जल में जाकर मिलेगा इस रहस्य की खोज मेरे जीवन का लक्ष्य होगी. शुभकामनाओं सहित.

मैंने तेरी ओर देखा, मगर तू जया से बात करने में मशगूल थी.

प्रायः सभी ने फिर मिलने और मिलते रहने के झूठे वादों के साथ एक-दूसरे से विदा ली, लेकिन मैंने साइकिल उठाई और दोस्तों को विश किये बिना घर की ओर भागा.

 

अगले दिन से फ़ाइनल ऐक्ज़ाम शुरू होने वाले थे. पहला पेपर लिंग्विस्टिक्स का था जिसमें मेरी ज़्यादा गति नहीं थी. सिविल लाइंस में प्रोफ़ेसर सक्सेना रहते थे. लिंग्विस्टिक्स उनका विषय था. विद्वान थे और अपना विषय अधिकारपूर्वक पढ़ाते थे. मगर विषय में जब आपकी रुचि न हो तो कितना भी बड़ा विद्वान पढ़ाए, विषय समझ में आने से रहा! सोचा, प्रोफ़ेसर सक्सेना से मिलता चलूँ. शायद कुछ टिप्स मिल जाएं.

सक्सेना साहब घर पर ही थे. मेरी बात सुन कर हँसे. बोले -बरख़ुरदार! लिंग्विस्टिक्स ऐसा विषय है जिसमें शुरू से ही ध्यान लगाना चाहिए. यह कोई कविता-कहानी नहीं है जिसे एक बार पढ़ लिया और याद हो गया. सारे साल तो सांस्कृतिक कार्यक्रम करते रहे. अब कल से पेपर शुरू हो रहे हैं तब आपकी नींद खुली है! जाइये, भगवान का नाम लीजिये कि ऐसे सवाल आएं जिन्हें आपके जैसा होनहार छात्र हल कर सके और आपको अगले साल अपने प्रिय जूनियर्स का सहपाठी बनने का सौभाग्य न मिले!

सक्सेना साहब से ऐसी उम्मीद नहीं थी. हालाँकि यह उनकी स्टाइल थी मगर मँझधार में डगमग करती नौका के लिए तो डुबा देने को आतुर तूफ़ान का रूपक ले रही थी! उनके व्यंग्य के मारक तीरों से घायल मैं उठ खड़ा हुआ और नमस्कार कर किनारे रखी साइकिल उठाकर चलने की मुद्रा बनाई तो बोले - ऐसा करो कि मार्केट से सौल्वड पेपर्स वाली गाइड ले आओ. चैक मार्केट से मिल जाएगी. अभी समय है. दूकानें बंद नहीं हुई होंगी. उसमें उन सवालों को छाँटना जो पिछले दस सालों में तीन बार आये हों. फिर पिछले साल के सवालों को छोड़कर बाक़ी के सवालों में से दस सवाल अच्छी तरह देख लेना. एक दिन में तो यही हो सकता है! भगवान ने चाहा तो भवसागर के पार पहुँच जाओगे!

आखि़र रहम खाकर सक्सेना साहब ने टिप्स दे ही दिया था. लपक कर पाँव छुए और विजयी भव जैसे आशीर्वचन को सुनने का लोभ त्याग साइकिल में बुलैट के प्राण फूँकते हुए चैक जा पहुँचा. मार्केट बंद होने को था. आखि़र एक दूकान से वांछित किताब मिल गई और मैं उसे खरीद कर जब घर पहुँचा तो रात के नौ बज रहे थे. माँ चिंतित थी - कल से इम्तहान हैं और तू मटरगश्ती कर रहा है. सुबह का निकला अब लौट रहा है. जवाब तो मेरे पास था नहीं. चुपचाप हाथ.मुँह धोकर खाना खाने बैठा.

भोजन के बाद अपने कमरे में गया. सक्सेना साहब की हिदायत के अनुसार दस सवाल छाँटे फिर उनमें भी प्राथमिकताएं निर्धारित कीं. सोचा समय कम है. पांच सवाल भी अच्छी तरह तैयार कर लूँ तो काम चल जाएगा. चार तो मिल ही जाएंगे! तीन ही फँसे तो भी इस पेपर में तो निकल ही जाऊँगा. बाकी पेपर्स से पर्सेन्टेज़ ठीक करने की कोशिश की जाएगी.

किताब खोली. पहला सवाल निकाला. उसके उत्तर पर आँखें जमाईं तो किताब के पन्ने पर तू नाचने लगी. आँखों से एक बूँद जल की वर्षा करते हुए. मैं हैरत में था. जल की बूँद सचमुच तेरी आँख से ही टपकी थी और अब किताब के बीचोंबीच क्रमशः बड़े होते ठोस और गीले वृत्त की शक़्ल ले रही थी! यह कैसे संभव है? मैं सोचने लगा.

 

यह जो सायरन बज रहा है न? यह सुबह के ठीक पाँच बजे बजता है. अब ज़रा फ्रेश भी हो लूँ. ठीक एक घंटे बाद घर से निकल जाना चाहिए. पेपर सात बजे से है. काॅलेज पहुँचने में पौन घंटा तो लगेगा ही. यानी परीक्षा शुरू होने से पन्द्रह मिनट पहले ही ऐक्ज़ामिनेशन हाॅल में पहुँच सकूँगा. आज तो सचमुच भगवान ही मालिक है.

लड़की! तुझसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ कि अब तू मुझे बख़्श दे. दिलो.दिमाग़ पर छा जाने की चेष्टा न कर. मलिक मेरा बहुत अच्छा दोस्त है और तुझे सचमुच दिलो.जान से चाहता है. तू जानती नहीं, तुझसे मिलने से पूर्व मैं भावनाओं के कठिन चक्रव्यूह में घेर कर मारा जा चुका हूँ और अब अपनी ही लाश को ढोता फिर रहा हूँ. मैं एक ऐसी यात्रा का पथिक था जिसकी शुरुआत फूलों से महकती बगिया से हुई फिर आग का दरिया पार करने के बाद अंत सर्पों की घाटी में.

बाथरूम की ओर क़दम बढ़ा रहा हूँ. तभी कानों में जैसे किसी की फुसफुसाहटें कविता की पंक्ति की तरह सुनाई दे रही हैं - खु़शबू की नदिया; नहीं आग का दरिया!... खु़शबू की नदिया नहीं-आग का दरिया!! और साथ में एक चेतावनी भी -सावधान! यह उसी यात्रा की एक और शुरुआत है!

 

 

उद्भ्रांत की अधिकांश शिक्षा-दीक्षा कानपुर में हुई.

प्रमुख ग़ज़लगो, समकालीन कविता के कवि, आलोचक, अनुवादक और प्रबन्धकाव्य रचयिता के रूप में भी प्रसिद्ध हैं. कथाकार के रूप में इनकी विशिष्ट पहचान है. 90 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं.

1990 के दशक में दूरदर्शन के सहायक केन्द्र निदेशक के पद से कार्य प्रारम्भ करते हुए मई 2010 में दूरदर्शन के उप महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए. कुछ समय के लिये आकाशवाणी महानिदेशालय में भी वरिष्ठ निदेशक रहे. 

विभिन्न विश्वविद्यालयों के अनेक शोध छात्रों ने उद्भ्रांत के विविध रचनाकर्म पर आधा दर्जन एम.फिल. एवं पी.एच.-डी. की उपाधियां प्राप्त की हैं.

उद्भ्रांत के विभिन्न सम्मान

हिन्दी अकादेमी दवारा सम्मानित, दिल्ली के ‘साहित्यिक कृति सम्मान’, उ.प्र. हिन्दी संस्थान का निराला पुरस्कार, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ पुरस्कार, महाराष्ट्र का प्रतिष्ठित ‘प्रियदर्शनी सम्मान’ और मध्य प्रदेश सरकार की ‘साहित्य अकादेमी’ द्वारा ‘अखिल भारतीय भवानी प्रसाद मिश्र’ पुरस्कार

बाल-साहित्य अखिल भारतीय बाल-साहित्य परिषद, लखनऊ का ‘बाल-साहित्य श्री’ और वर्ष 2000 में ‘भारतीय बाल कल्याण परिषद, कानपुर’ की ओर से वहाँ के मेयर द्वारा नागरिक अभिनंदन के साथ ‘रतन लाल शर्मा स्मृति पुरस्कार’

udbhrant@gmail.com
 

 

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