... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

सांता क्लाज़

 

ट्रेन के उस कम्पार्टमेंट में ग़ज़ब की भीड़ थी. हालाँकि वह रिज़र्व कोच था, लेकिन प्लेटफॉर्म पर खड़ी भीड़ ने इस बात की तिलभर परवाह नहीं की और जो डिब्बा जिसके सामने आया वह उसी में जा घुसा.

वह एक गंदा-सा आदमी था, भिखारीनुमा. जगह-जगह थेगली लगी चीकट कमीज़, थेगलियों वाला ही चीकट कोट, वैसी ही चीकट पेंट. कंधे पर वैसी ही काली चीकट  और जगह थेगलियाँ लगी हुई एक छोटी बोरी थी.  उसका मुँह उसने सुतली से बाँध रखा था और दोनों हाथों की मुट्ठी में कसकर जकड़ रखा था. देखने से लगता था कि बोरी में उसने कुछ गूदड़ कपड़े-लत्ते भर रखे हैं. उम्र! ग़रीब और मज़लूम लोगों की उम्र का अन्दाज़ा केवल चेहरा-मोहरा देखकर लगाना ज़रा मुश्किल ही रहता है; क्योंकि कई कारणों से अपनी सही उम्र से वे अक्सर ज्यादा ही उम्र के नज़र आते हैं. उम्र के बारे में बस इतना ही कह देना काफी है कि वह बूढ़ा दिखाई दे रहा था.

प्लेटफॉर्म पर ट्रेन के रुकते ही, पैर तक हिलाने की मोहलत उसे नहीं मिली. चारों तरफ से सिमटकर भीड़ का फ्लो सामने आ खड़े कम्पार्टमेंट की तरफ हो गया. ऐसा तेज़ धक्का लगा कि वह बिना प्रयास और बिना इरादा ही प्लेटफॉर्म से उठकर उस रिज़र्व कोच में सरक गया. गेट के एकदम पास वाली लम्बी सीट तक जब वह पहुँचा, तब एक आदमी के बैठने लायक जगह वहाँ थी लेकिन शरीर और कपड़ों के गंदेपन की वजह से वहाँ पहले ही बैठी सवारियों ने उसे बैठने नहीं दिया. उनमें से कई एक-साथ चिल्लाईं—अरे-अरे, यहाँ नहीं…यहाँ सवारी बैठी है, टॉयलेट गई है.

चिल्लाहट के इस एकजुट हमले से अचकचाकर वह खड़ा रह गया. लेकिन अगले ही पल समझ गया कि उनकी कोई सवारी टॉयलेट नहीं गई थी; क्योंकि भीड़ में से निकलकर जो युवक बर्थ के उस खाली किनारे पर बैठ गया था उसे काफी देर तक वह प्लेटफॉर्म पर खड़ा देखता रहा था. इस बात से उसने अपने-आप को बहुत अपमानित महसूस किया. गुस्से से उसके नथुने फूल उठे लेकिन कह कुछ नहीं सका. नथुनों से गर्म साँसें छोड़ते-लेते, अपनी बोरी को कन्धे से उतारकर उसने लम्बी वाली बर्थ के सहारे फर्श पर रखा और उस पर बैठ गया. इस तरह बैठने से उसका सिर बर्थ के किनारे पर आ बैठे उस युवक के नथुनों के निकट आ गया था. बदबू का शायद तेज़ भभका उनमें जा घुसा और बुरा-सा मुँह बनाकर युवक ने अपना चेहरा पेंतालीस डिग्री दूसरी ओर को घुमा लिया. उसने नौजवान की इस हरकत को नोट किया और हुँह, बड़ा आया मुझपर नाक सिकोड़नेवाला, साफज़ादा कहीं का! के अंदाज़ में बुदबुदाते हुए हिकारत से अपने सिर को झटक दिया.

इस युवक के अलावा, खड़े हुए दूसरे लोगों का भी हाल यही था. उसके एकदम निकट खड़े लोग उसके गंदेपन को देखते हुए और बदन से वाष्पित होती दुर्गंध के चलते उससे और उसकी बोरी से एक बालिश्त हटकर ही खड़े रहने की कोशिश कर रहे थे. ट्रेन जब किसी अगले स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर रुकी तो दो-चार नई सवारियाँ उस कम्पार्टमेंट में चढ़ आयीं और पहले-से खड़े लोगों को धकियाकर अपने खड़े होने लायक जगह बनाने की कोशिश करने लगीं. उनके द्वारा धकियाए जाने के कारण उसके आसपास खड़े लोगों को उससे दूरी बनाए रखने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही थी.

आज कोई त्यौहार है क्या? लगातार बढ़ते जा रहे भीड़ के दबाव को अपने ऊपर झेलते हुए उसने सवाल उछाला.

किसी ने भी उसके सवाल का नोटिस नहीं लिया. सब चुप खड़े रहे. यह अवहेलना उसे बड़ी अज़ीब और अपमानजनक लगी लेकिन किलसकर रह जाने के सिवा वह कर कुछ नहीं सकता था.

कहाँ तक जाओगे? कुछ देर चुप रहने के बाद, सम्भवत: पूर्व अपमान के दंश से निज़ात पाने की गरज़ से उसने सीट के किनारे पर बैठे युवक से पूछा.

तुझसे मतलब? युवक ने तीखे अन्दाज़ में उसे लताड़ा गोया कि उस-जैसे लीचड़ आदमी का खुद से मुखातिब होना उसे बेहद नागवार गुजरा हो.

उसके इस तीखेपन का बूढ़े के पास कोई जवाब नहीं था. अन्दर ही अन्दर वह कसमसा-सा उठा. उसका चेहरा ही नहीं पूरा शरीर भी अजीब बेचैनी से भर उठा. वह कभी किसी की ओर अपना चेहरा उठाता तो कभी किसी की ओर. उसकी बॉडी-लेंग्वेज से लगता था कि आसपास खड़े लोगों द्वारा मानवोचित आदर या सम्मान न दिये जाने की पीड़ा उसे साल रही है. लेकिन तमाम बेचैनी के बावजूद उसने एक भी शब्द अपने मुँह से निकालने की हिम्मत नहीं की, चुप बैठा रहा.

ट्रेन तेज़ गति से दौड़ रही थी—धड़क-धड़क-धड़क-धड़क. इस धड़क-धड़क के साथ ही खड़ी और बैठी सभी सवारियाँ अनचाहे ही दायें-बायें हिल रही थीं. बूढ़ा अपनी बोरी पर बैठा जरूर था, लेकिन बेआराम. आराम पाने की गरज़ से वह बोरी पर थोड़ा-सा घूमा और कमर को पीछे की ओर टिका दिया.

ऐ ! उसके ऐसा करते ही युवक उस पर दहाड़ा, सीधा बैठ!!

सीधा ही तो बैठा हूँ! वह अकड़ के साथ बोला.

कमर सीधी रख… युवक अपनी टाँगों की ओर इशारा करता हुआ पूर्ववत दहाड़ा, सटकर मत बैठ.

बेमन से वह फिर वैसे ही बैठ गया जैसे पहले बैठा था. दरअसल, आसपास के लोगों में अकेला वही बदरंग है—इस बात का अहसास उसे भी था. लेकिन अपने-आप को वहाँ से वह हटा क्या, हिला भी नहीं सकता था. कम्पार्टमेंट में बैठे-बैठे सरकने तक को जगह नहीं थी, यह बात तो थी सो थी ही; उससे भी बड़ी बात यह थी कि वह यह नहीं समझ पा रहा था कि अपने-आप को वहाँ से वह हटाए क्यों?

यह सेकेंड क्लास स्लीपर कोच था—थ्री टियर. जिन लोगों की बर्थ रिज़र्व थी, वे सिमटे-सिकुड़े बैठे थे, बेबस; और मन ही मन रेलवे की नालायकी को कोस रहे थे. युवक जिस बर्थ के कोने पर बैठा था, उस पर उसके अलावा बाकी तीन-चार लोग एक ही परिवार के सदस्य थे शायद. उनमें एक प्रौढ़ महिला ने कपड़े के एक घरेलू-से थैले से एक पोटली निकाली और खोलकर एक-एक रोटी परिवारवालों को पकड़ाने लगी. महिला के पहनावे और रोटी की सेहत को देखने से पता चलता था कि वह राजस्थानी परिवार है.

रोटियाँ बँटती देख बूढ़े के भीतर भी भूख कुलबुला उठी. औरत की ओर हाथ पसारकर बोला, एक रोटी मुझे भी दे दो.

औरत ने प्रतिकार नहीं किया. सहज भाव से एक रोटी अपनी ओर बढ़ी हुई उसकी हथेली पर रख दी. रोटियाँ बाँटने के बाद उसने थैले से प्लास्टिक का एक डिब्बा निकाला और उसमें से निकालकर आम के अचार की एक-एक फाँक परिवार वालों की ओर बढ़ाने लगी.

थोड़ा अचार मुझे भी दो न! रोटी रखी हथेली को औरत की ओर बढ़ाकर उसने याचना की.

अचार नहीं है. औरत के कुछ कहने या अचार उसे देने के लिए डिब्बे में हाथ डालने से पहले ही उस परिवार के एक नौजवान ने झिड़कते हुए उससे कहा.   

यह झिड़की सुनकर बूढ़ा भौंचक रह गया. दो पल वह ऐसे उसकी ओर ताकता रहा जैसे उसने कुछ अप्रत्याशित उससे कह दिया हो. फिर सारी ताकत बटोरकर वह बोरी पर से उठा और एक-दूसरे में गुँथकर खड़े लोगों के बीच जगह बनाकर बायीं ओर वाली खिड़की पर झुक गया. रोटी वाला हाथ उसने बाहर निकाला और रोटी को हवा में उड़ा दिया. उसकी यह हरकत देखकर वह नौजवान आपे से बाहर हो गया और बुरी तरह उस पर चीखा—एऽऽऽऽ…

क्या है? जवाब में बूढ़ा भी चीखा.

रोटी बाहर फेंकने की हिम्मत कैसे की तूने? नौजवान दहाड़ा.

रंडी रोटी नहीं खाता मैं…इज्जत वाली खाता हूँ. बूढ़ा जमे हुए स्वर में बोला.

उसकी इस बात पर तो नौजवान आपे से बाहर ही हो गया. राजस्थानी खून था. रोटी और पानी की कीमत जानता था. अपनी जगह से खड़ा होकर वह उसे थपियाने को लपका—तेरी तो…स्साले, रोटी को  गाली देता है म्मादर…!

गालियाँ तू बक रहा है कि मैं? बूढ़े ने अकड़ के साथ जवाब दिया.

तूने रोटी को रंडी कहने की हिम्मत कैसे की? इस बार नौजवान पूरे आवेश के साथ दहाड़ा.

अचार की एक फाँक देने से रोक दिया माँजी को…! नंगी रोटी किसे दी जाती है…!! कुत्ता समझा है मुझे? बूढ़ा भी चीखा. यों कहकर कुछ पल वह चुप बैठा रहा; फिर एकाएक पुन: चीखा, खाना देखकर एक रोटी माँग ली तो क्या भिखारी हो गया मैं?

भिखारी नहीं तो क्या बाप है म्हारा? नौजवान बोला.

सुबह तूने सीट पर नहीं बैठने दिया… कहा—टॉयलेट गया है आदमी. बूढ़ा सुबह के जख्म को याद करके कोने पर बैठे युवक की ओर इशारा करता हुआ बोला, ...और इसे आते ही बैठ जाने दिया. यह क्या रिश्तेदार है तेरा?

मेरी तरफ उँगली उठाई तो उँगली तोड़ दूँगा, समझा. उसे अपनी ओर इशारा करते देख युवक ने लताड़ा.

बूढ़ा अपनी शारीरिक हैसियत को जानता था इसलिए उँगली तोड़ने का जवाब उँगली तोड़ने से नहीं दे सकता था. उसने युवक की लताड़ पर ध्यान न देना ही बेहतर समझा और नौजवान के साथ सुबह के अपमान का हिसाब चुकता करने में जुटा रहा. बोला, जानता है मैं कौन हूँ?

लाट साहब है! नौजवान ने उपहासपूर्वक कहा.

लाट साहब ही समझ. उसने कहा, एक ज़माने में अपने इलाके के एम॰एल॰ए॰ का दायाँ हाथ रहा हूँ मैं…

चमचा!! भीड़ में से किसी ने चुटकी ली.

बूढ़े ने उस चुटकी पर ध्यान नहीं दिया. अपनी बात कहता रहा, सेकेंड स्लीपर की बात छोड़, ए॰सी॰ फर्स्ट में चला करता था उनके साथ. सीट माँगनी नहीं पड़ती थी, तुझ-जैसे लोग खड़े होकर सेल्यूट मारते थे शकल देखते ही. ऊँची पहुँचवाला आदमी था…समझा!

सो तो दीख ही रहा है… नौजवान उपहासभरे अंदाज़ में बोला.

दूसरी दिशाओं की ओर को मुँह करके खड़े आसपास के कई लोगों के चेहरे बातों की इस हाथापाई को देखने-सुनने के लिए उसकी ओर घूम-से गये. परेशानीभरी यात्राओं में ऐसा वाद-विवाद यात्रियों के लिए थकान की तेजी को कम करने वाला बेहतरीन मनोरंजन सिद्ध होता है.

अब क्या हुआ? नौजवान बोला, एम॰एल॰ए॰ मर गया?… या उसने तुझे भगा दिया चूतड़ों पे लात मारके?

चेहरे पर उभरे तेवरों से जाहिर हुआ कि बूढ़े को उसका ऐसा कहना गहरा चुभा है. एक टीस-सी उसकी साँसों में महसूस हुई. उसकी बात का जवाब सीधे-सीधे न देकर वह बोला, जब अहसानफरामोसों ने गोटियाँ फिट कर लीं तो खुद ही कम कर दिया है जाना-आना; लेकिन इज्ज़त आज भी पूरी मिलती है. छठे-छमाहे, जब भी चला जाऊँ, हजार-आठ सौ चुटकियों में माँग लाता हूँ उनके घर-दफ्तर से…कोई न कोई पुराना आदमी मिल जरूर जाता है.

फिर करता क्या है उन हजार-आठ सौ का? नौजवान ने उसकी दीन-दशा पर हाथ लहराकर चुटकी ली.

करना क्या? आदमी न सही, कुत्ते तो अब भी पहचानते हैं उस इलाके के… वह शान के साथ गरदन ऊँची करके बोलता रहा, दुम हिलाते हुए पीछे पड़ जाते हैं…इसीलिए कुत्तों वाले बाबा के नाम से मशहूर हूँ वहाँ.

तो?

तो क्या? उसने कहा, दफ्तर के सामने…सड़क पार वाले रेस्टोरेंट के मालिक के आगे पाँच सौ फेंककर कहता हूँ—ये पकड़ पैसे…और सेंकता जा रोटियाँ. फिर रोटियाँ आती रहती हैं और मैं एक-एक कर उन्हें कुत्तों के आगे डालता रहता हूँ.…

इतने कुत्ते होते हैं वहाँ पर? पता नहीं किधर से आवाज़ आई.

कुत्तों की कमी नहीं है हिन्दुस्तान में… कोई दूसरा बोला, वो भी एम॰एल॰ए॰, एम॰पी॰ की कोठियों के आसपास…हजारों मिल जायेंगे दुम हिलाते, लार टपकाते….

बूढ़ा इन सब बातों से जैसे अछूता ही रहा. वह अपनी ही धुन में बोलता रहा, जैसे ही मालिक की आवाज़ आई कि बस; मैं तुरन्त कुत्तों से कहता हूँ—जै राम जी की भाइयो, रकम खतम, रोटियाँ खतम…फिर मिलेंगे…और…

बाकी बचे रुपयों का क्या करता है? नौजवान ने पूछा.

बाकी ? जोड़कर अपने पास रखता हूँ वक्त जरूरत के लिए. वह बोला.

उसके मुँह से यह निकलते ही आसपास खड़े लोगों को उसके बदन से जैसे बदबू आनी बंद हो गयी. कोई उसकी जेबों की ओर झाँक उठा तो कोई अंटी और उस बोरी की ओर जिस पर वह बैठा था. उन्हें लगने लगा कि उस गंदे, बदबूदार और बूढ़े आदमी के रूप में साक्षात् कुबेर उनके बीच बैठा है.

लेकिन राजस्थानी नौजवान ने हिकारतभरे अंदाज़ में धीरे से कहा , पैसा पास में होते हुए भी दूसरों की रोटियों पर नजर रखता है कुत्तों की तरह! लानत है. बूढ़े ने उसका यह जुमला या तो सुना नहीं था या अनसुना कर दिया था जानबूझकर. गाड़ी की रफ्तार कुछ धीमी पड़ने लगी थी. अगला स्टेशन आने वाला था शायद. बूढ़ा बोरी पर से उठ खड़ा हुआ. गाड़ी के कुछ और धीमा होते-होते बोरी के मुँह को उसने दोनों हाथों की मुट्ठियों में जकड़ा और उछालकर बायें कंधे पर लाद लिया  सेंटा क्लाज की तरह. नज़दीक खड़े लोगों में से एकाध ने बोरी में जगह-जगह पर उँगलियां कौंचकर देखा. गूदड़ों के बीच भर रखे नोटों के कड़कने की आवाज ही आ जाये शायद.

इस सबसे लापरवाह बूढ़ा गेट की ओर बढ़ने के लिए जगह बनाता हुआ बुदबुदाया, हटो भई हटो, आदमी की पहचान जिन्हें न हो, कौन उनके मुँह लगे? …इनसे तो कुत्ते ही भले!

तुझसे भी. उसकी बुदबुदाहट पर नौजवान तपाक् से बोला.

बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया. आसपास खड़े लोग अब उसकी गंदगी से घिनियाकर इधर-उधर सरकने की बजाय नोटों को टोहने की गरज से उससे सटने-से लगे थे. अपनी जगह से चलकर वह डिब्बे के दरवाजे तक जा पहुँचा और प्लेटफार्म के आने का इन्तज़ार करने लगा.

 

बुलन्दशहर (उ॰प्र॰) के डा. बलराम अग्रवाल हिन्दी में पीएच॰ डी॰ हैं, अब दिल्ली में रहते हैं.
प्रकाशित कृतियाँ :

  • कथा संग्रह—सरसों के फूल (1994), ज़ुबैदा (2004), चन्ना चरनदास (2004), पीले

पंखों वाली तितलियाँ (2015), खुले पंजों वाली चील (2015) बालकथा संग्रह—दूसरा भीम (1997),
ग्यारह अभिनेय बाल एकांकी (2012), अकबर के नौ रत्न (2015), सचित्र वाल्मीकि रामायण (2015)

  • विविध—उत्तराखण्ड (2011), खलील जिब्रान(2012), भारत  रत्न विजेता (2015)

अनुवाद व पुनर्लेखन :

  • (अंग्रेजी से) अण्डमान व निकोबार की लोककथाएँ (2000); करोड़पति भिखारी (2016), ऑस्कर वाइल्ड के कहानी संग्रह ‘लॉर्ड आर्थर सेविले’ज़ क्राइम एंड अदर स्टोरीज़’ का अनुवाद)

  • (संस्कृत से) सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण (2014)

संपादित कृतियाँ : मलयालम की चर्चित लघुकथाएँ (1997), तेलुगु की मानक लघुकथाएँ (2010),
समकालीन लघुकथा और प्रेमचंद (आलोचना:2012), प्रेमचंद, प्रसाद, शरच्चन्द्र आदि कुछ वरिष्ठ कथाकारों
की चर्चित कहानियों के 20 संकलन; 1993 से 1996 तक साहित्यिक पत्रिका ‘वर्तमान जनगाथा’ का
प्रकाशन/संपादन

संपर्क ई-मेल :2611ableram@gmail.com

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