नवम्बर का नौ

 

एक हल्के-पीले रंग का गोदाम-भवन, गोदाम भवन के इर्द गिर्द अनेक लोगों की भीड़ यहाँ-वहाँ हलचल कर रही है। उनमें से ज़्यादातर मजदूर हैं तो कुछ सेठ के खास आदमी और कुछ खरीददार। बहुत से मजदूरों का काम पूरा हो चुका है, वे आपस में समूह बना के तरह-तरह की बातों में लगे हैं। कुछ मजदूर अब भी काम कर रहें हैं, ये गोदाम के अंदर से धान की बोरियां पीठ में लादकर ट्रेक्टर पर चढ़वा रहे हैं। एक मजदूर ट्रेक्टर के पिछले हिस्से पर खड़ा है, जिसे ट्रेलर कहा जाता है। जब भी कोई मजदूर धान की बोरी ट्रेलर के बाहरी हिस्से में रख जाता है, ये मजदूर उस बोरी को ट्रेलर के अंदर एक के ऊपर एक के क्रम में व्यवस्थित करता है। ये मजदूर एक क्षण के अवकाश की तलाश में है पर ट्रक के अंदर वो एक अकेला है और बोरियां लादने वाले अनेक।

हल्कू गोदाम भवन के बाहर किसी की प्रतीक्षा में खड़ा है। उसकी हल्की सफ़ेद दाढ़ी शाम के इस वक्त आकाश के रंग से बिलकुल मेल खाती दिख रही है। हल्कू का काम कुछ देर पहले ही खत्म हो गया था अब वो मजूरी मिलने की प्रतीक्षा में खड़ा है। आज उसे उसकी एक सप्ताह की मजूरी मिलने वाली है। हल्कू इस खाली समय में गोदाम के आसपास की सारी हलचल को गौर से देख रहा है। उससे कुछ ही दूर कुछ मजदूर घेरा बना कर बैठे हैं। घेरे के ये मजदूर आपस में बात किये बगैर बस बीड़ी पीने में व्यस्त हैं। घेरे से बीड़ी का धुआं उड़ कर आसपास के माहौल में फ़ैल रहा है जिसकी वजह से हल्कू की नाक में तम्बाखू की तीव्र गंध पड़ रही है। आज सबेरे से ही हल्कू को बीड़ी पीने की तीव्र इच्छा थी, तम्बाखू की इस गंध ने उसकी इच्छा को और तीव्र कर दिया है। वो घेरे की तरफ लालच भरी निगाहों से देखता है और क्षण भर के लिये सोचने लगता है कि किसी से एक बीड़ी मांग कर पी ले। तभी एक आदमी उसके पास आकर खड़ा हो जाता है। उसके हाथ में एक पतली सी कॉपी है। “हाँ काका, यहाँ नाम लिख दो..”, आदमी हल्कू के हाथ में पेन दे कर कर कहता है। हल्कू उसके कहे मुताबिक़ पन्ने पर हिज्जा-हिज्जा कर अपना नाम लिख देता है। आदमी उसके हाथ में पाँच सौ का नोट थमा कर वापिस अपनी कॉपी में झाँकने लगता है। हल्कू सप्ताह भर की अपनी मेहनत की कमाई को जी भर निहारता है।

जाते-जाते हल्कू पुनः गोदाम की ओर देखता है। मजदूरों के उस घेरे से अब भी धुंआ उठ रहा है। माहौल में अब भी तम्बाखू की गंध है। अब भी ट्रेक्टर के अंदर व्यक्ति अवकाश की तलाश में बोरियां एक के ऊपर एक जमा रहा है।

********

हल्कू बड़ी बाज़ार में पैदल चल रहा है। सड़क के दोनों ओर सब्ज़ी-भाजी बेचने वाले बैठे हैं। बाज़ार में रोज़ जैसा ही शोर था। कोई अपना सामान बेचने के लिये तरह-तरह की आवाजें लगा रहा है, कोई नई-नई आई पालक पर ठंडा पानी छिड़क रहा है, कोई गाय-बछड़ों पर लाठी भांज रहा है। वैसे तो आज और दिनों जैसा ही शोर है पर सब्ज़ी दुकानों में खरीददार कम दिख और समूह बना कर बातचीत करने वाले लोग अधिक रहे हैं। इन लोगों के चेहरों का एक भाव देख कर लगता है जैसे अलग-अलग समूह होने के बावजूद, सारे समूहों में बातचीत का आज एक ही मुद्दा है। हल्कू इन लोगों की बातों को नज़रंदाज़ करता हुआ आगे बढ़ता जाता है।

हल्कू के कानों में झुनिया की आवाज़ गूंज रही है। झुनिया ने आज मजूरी मिलने पर उसे एक कम्बल लाने कहा था। आमतौर पर हल्कू गोदाम से बड़ी बाजार के रास्ते सीधे भीम चौक जाता है और वहाँ से बस पकड़ कर अपने गाँव। पर आज उसे कम्बल खरीदना है इसलिए वो पहले बाजार के रास्ते साहू गली की गद्दा दुकान जाएगा जहाँ से कम्बल खरीदने के बाद वापस बाजार के रास्ते थोड़ी दूर चलकर भीम चौक पहुंचेगा। “आज मेरे हाथ में कम्बल देख कर खुश हो जाएगी झुनिया.. कम्बल-कम्बल कर के सर खा गयी है पगली!”, हल्कू अपने आप से बात करता हुआ आगे बढ़ रहा है। चलते-चलते रास्ते में उसे पान का ठेला दिख जाता है और वो वहाँ ठिठक जाता है। “पान-बीड़ी पहले, दुनिया की किर-किर बाद में”, वो ठेले की ओर मुड़ गया।

“दो ठो पान बना दो बाबू..”, हल्कू ठेले के अगले हिस्से में हाथ रख कर कहता है। पानवाला बिना कोई जवाब दिए पान बनाने में लग जाता है। पान बनाने के दरमियान हल्कू उसे अपने पान में क्या-क्या चाहिए इस बारे में निर्देश देता रहा, पानवाला बिना कुछ कहे बस पान बनाने में लगा रहा। अंततः जब दोनों पान बन गए तो उसने हल्कू ने कहा, “भाई एक अभी दे दो, एक कागज़ में लपेट दो.. बाद में खा लूँगा..”, पानवाले ने उसे एक पान दिया और दूसरा पान कागज़ में लपेटने लगा। जब दूसरा पान भी तैयार हो गया हल्कू ने जेब से पाँच सौ का नोट निकाल कर ठेले के अगले हिस्से पर रख दिया, “ये लो भाई... एक कट्टा बीड़ी भी दे देना”। पानवाला पाँच सौ का नोट देख कर बिफर जाता है, “ये क्या है काका??” हल्कू को लगा मसला चिल्हर का है, “संझा हो गयी और दुकान में चिल्हर नहीं है.. अच्छा ऐसा करो एक कट्टा बीड़ी और दे दो.. एक-दो पाकिट माचिस भी दे देना.. ठीक??”, हल्कू को लगा इससे समस्या का समाधान हो जाएगा पर पानवाला इससे सहमत नहीं था। उसने पहले ना में सर हिलाया और फिर ठेले के पिछले दरवाज़े पर लटककर मुँह से पीक थूंका और उसके बाद कहा, “चिल्हर का बात नहीं है काका.. बात ये है कि ये नोट अब बंद हो गया है..”।  

-“बंद हो गया है??? कब??”

“कहाँ सो रहे थे काका? कल रात बारह बजे से पांच सौ – एक हज़ार के नोट बंद.. कल रात को प्रधानमंत्री आए थे घोषणा करने..”

-“कहाँ आए थे?? यहाँ??”

“अरे रतनपुर की ऐसी किस्मत कहाँ काका.. टी.वी. में आए थे, कह रहे थे कि बारह बजे के बाद ये नोट महज़ कागज़ का टुकड़ा रह जाएंगे..”

-“तो ये कहाँ जाएगा?”

 “पता नहीं.. सुना हूँ दो-तीन रोज बाद बैंक वाले पुराने नोटों के बदले नए नोट देंगे.. अच्छा दो पान का दस रुपया हुआ। एक कट्टा बीड़ी जोड़ के..”

-“मेरे पास तो दस ही रुपया चिल्हर है बाबू.. ऐसा करो दे दो.. बीड़ी का पैसा आते-जाते दे देंगे..”, हल्कू ने उसकी बात बीच में काटते हुए कहा।

“अरे नहीं बनता काका.. आते जाते वाले दोबारा नहीं आते.. वैसे भी सबेरे से सब ऐसे ही लोग आ रहे हैं.. आप बस पान का पैसा दे दो.. बीड़ी बाद में ले लेना”।

हल्कू उसकी सुन कर दुखी हो जाता है। वो कुर्ते से निकाल कर दस रुपए का नोट उसे दे देता है और वापिस बड़ी बाजार की सड़क पर आ जाता है। नोट का बंद होना उसे अब भी समझ नहीं आ रहा, वो हैरान है कि ऐसे अचानक कैसे कोई नोट बंद हो सकता है?, “नोट बंद???”

हल्कू हैरान और परेशान बड़ी बाजार से भीम चौक की ओर जा रहा है। अब वो कम्बल नहीं ले सकता, किसी ने उसकी मजूरी को महज़ कागज़ का टुकड़ा बता दिया है। इस दफा वो रास्ते में सारी आवाजों पर गौर कर रहा है इस मकसद से कि उसे पता चल सके कि आखिर मसला है क्या? वो कुछ समूहों के पास रुकता है और उन्हें सुनने की कोशिश करता है:

समूह एक: “काले धन पर रोक लगा दी प्रधानमंत्री ने तो...”

समूह दो: “देखना अब धन्ना सेठों की हालत..”

समूह तीन: “पाकिस्तानी जासूस और आतंकियों का तो इस देश में रहना नामुमकिन हो जाएगा इससे...”

समूह चार: “देखिएगा भैय्या.. अब तो चीन थर-थर कापेगा हमसे...”

किसी ने हल्कू को ये नहीं बताया कि अब उसे अपने इस नोट का क्या करना है।

*********

हल्कू किसी बंद दूकान के चबूतरे पर बैठा बस का इंतज़ार कर रहा है, शाम को ठण्ड हल्की सी बढ़ गयी है जिसकी वजह से से उसने अपने घुटने दोनों हाथो से कसकर अपने सीने में समेट लिये हैं। हल्कू चौक के आसपास की सारी क्रियाकलापों को विचारहीन भाव से बैठा देख रहा है। शाम की सी हलचल है। कोई अपनी साइकल के पीछे सामान की बोरी रख कर उसे पैदल दौड़ाता हुआ गुज़र रहा है। कोई गुपचुप वाला अपना ठेला लिये सड़क के इस ओर से उस ओर जा रहा है। बच्चे बल्ला-गेंद लिये किसी मैदान से शायद घर की ओर लौट रहे हैं। आसपास की बहुत सी दुकानों की बत्तियाँ लपलपाती हुई एक के बाद एक अब जल रहीं हैं। सबकुछ अपनी ही सी एक ताल में घट रहा है। तभी एक के बाद एक तेज रफ़्तार चार-पहिया सरकारी गाड़ियों का एक जत्था सायरन की तेज आवाज़ के साथ हल्कू के सामने से निकल जाता है। इससे हल्कू की तंद्रा भंग हो जाती है। अब वो सुस्त मुद्रा में उन गाड़ियों को नज़र से ओझल होते तक देखने लगता है। 

“हल्कू..”

जानी-पहचानी सी कोई आवाज़ हल्कू के कानों में पड़ती है। हल्कू उस आवाज़ की ओर मुड़ता है। एक आदमी अपनी दाहिने हाथ में झोला पकड़े खड़ा है। झोला इस कदर भरा हुआ है कि लगता है जैसे अभी सारा सामान टूटकर इससे बाहर निकल आएगा। हल्कू कुछ क्षण की कोशिश के बाद आखिरकार उसे पहचान ही जाता है।  

 “महेश..? यहाँ कैसे?”

-“बिलासपुर से आज ही लौटा हूँ दादा.. गाँव ही जा रहा था.. सोचा महामाया दर्शन करता चलूँ..”

“मैं भी गाँव ही जा रहा हूँ..”

-“यहाँ कैसे?”

“मजदूरी भईया..”, हल्कू अब झेंप जाता है।

-“और खेती?”

“खेती तो पहले भी इतनी बड़ी नहीं थी हमारी.. कुछ खेत धीरे-धीरे बिकते चले गए, फिर मैकू अलग हुआ तो कुछ बंटवारे में चले गए.. वैसे भी आज छोटे खेतिहर का काम खाली खेती से कहाँ चलता है.. ज़रूरत के समय मजदूरी तो करनी ही पड़ती है सबको..”

-“सहीं कहा भईया.. कुछ लोग गाँव के पास किसी कस्बे में मजदूरी करते हैं तो हम जैसे कुछ दूर शहर जा के मजदूरी करते हैं.. मजदूरी आज के किसान का सबसे बड़ा सत्य है भाईसाहब!”

हल्कू महेश की बात में हामी भर ही रहा होता है कि बस आ जाती है और दोनों बिना कुछ कहे बस में चढ़ जाते हैं।

हल्कू और महेश का गाँव कस्बे से कुछ ही दूरी में था, बस चंद मिनटों में उन्हें मंजिल तक पहुँचा देती है। बस का दरवाज़ा खुला हुआ है, हल्कू बस से उतर कर महेश की सहायता हेतु दरवाज़े के ठीक सामने खड़ा है। महेश बस के अंदर से हल्कू को अपना झोला थमाता है और बाद में खुद उतर जाता है, उतरते वक्त हल्कू को महेश के शर्ट की जेब में बीड़ी का एक पाकिट दिखता है और हल्कू की तृष्णा फिर जाग उठती है। बस निकल पड़ती है और ये दोनों मुख्या सड़क से अपने गाँव की ओर चलने लगते हैं। चलते हुए महेश को अपने बस के अंदर शुरू हुई बातचीत याद आ जाती हैं। गाँव के आने से बातचीत बीच में ही छूट गयी थी।

“......शहर में काम ज्यादा तो पैसा ज़्यादा.. पैसा ज़्यादा तो काम भी जम कर.. तय काम से कुछ ऊपर करवा लिये तो उसका अलग पैसा मिलता है शहर में.. और यहाँ गाँव-कस्बों में ऐसे कामों का तो कोई हिसाबे नहीं है..”, महेश अपनी बात का बचा हुआ हिस्सा पूरा करता है। वो हल्कू को शहर जाने की खूबियाँ गिना रहा था।

-“अपना शहर तो यही है दादा! (झोला एक हाथ से दूसरे हाथ में लेता है) कहाँ इतना दूर जाएंगे.. घर में कोई बाल-बच्चा भी नहीं है जो घरवाली का दिल बहला रहे, शाम हुई तो घर वापस आना ज़रुरी हो जाता है भाई.. ऊपर से (झोले का हाथ फिर बदल लिया जाता है) खेत छोटे भले हों पर देखभाल बराबर मांगते हैं..”

हल्कू झोले से जूझ रहा है जबकि महेश खाली हाथ तेज और स्वच्छंद गति से चल रहा है। हल्कू लगातार महेश की गति की बराबरी करने की असफल कोशिश कर रहा है। वो हर बार महेश के बराबर पहुँचता और कुछ ही क्षण में पीछे छूट जाता और फिर तेज क़दमों से भागकर उसकी बराबरी करता।

“मैं तो कहता हूँ भाई, खेत-ज़मीन-घर सब बेच के आ जाओ शहर.. काम की कोई कमी थोड़े है वहाँ.. हमारे ही वाले कारखाने में लग जाना..”, महेश अपनी बात में अड़ा हुआ है।

हल्कू के लिये ये बातचीत बस के अंदर ही बोझिल हो चुकी थी, ऊपर से महेश के आत्मविश्वास ने उसका काम और मुश्किल कर दिया है। झुनिया उसे आयदिन शहर में बसने को कहती रहती है पर हर बार हल्कू कोई बहाना बना कर बात घुमा देता है पर यहाँ तो महेश शहर का राग अलापते ही जा रहा है। कोई चारा न देख कर हल्कू ने चुप रहना ही बेहतर समझा।

हल्कू को चुप देख कर महेश ने अपनी बात जारी रखी, “दूसरी जगह का तो नहीं मालूम पर हमारे कारखाने में महीने के पहले सप्ताह में आपका पैसा आपको हाज़िर हो जाता है.. अभी यही महीना ले लो.. महीने की ४ को तनख्वाह हाथ में आ गयी थी तो हमने ५-६ तारीख को ही घर का सारा सामान निपटा लिया.. अब बताओ आठ तारीख या उसके बाद जिसे तनख्वाह मिले उसका तो सरकार ने दाना-पानी ही बिगाड़ दिया.. सरकार को का है? उसका तो कोई भी कदम पहले हम गरीबों के पेट पर पड़ता है बाद में किसी और पर।”

-“सही कहा भईया.. हमें तो लगता है सेठ ने जानबूझकर हमें बंद नोट दिया है।”

“इसीलिए तो बोल रहा हूँ, चलो शहर। ”

-“अरे कहाँ भईया! पुश्तैनी घर-दुआर छोड़ के शहर जाएंगे.. कोई संभालने वाला होता तो एक बार सोचते भी..”

महेश अब हार मानकर चुप हो जाता है।

चलते-चलते गाँव की सड़क आ जाती है और दोनों मुख्य सड़क से गाँव की ओर मुड़ जाते हैं। जामुनी रंग के आकाश में टंगा आधा-अधूरा चाँद डामर की पतली सी इस सड़क को रोशनी देने में नाकाम है। ऊपर से इसका गहरा काला रंग यहाँ कभी-कभी आने वालों के लिये इसे और भी रहस्यमयी बना देता है। माहौल में निस्तब्धता है। हल्कू और महेश सड़क पर चुपचाप आगे बढ़  रहें हैं। कोई दूर से इन्हें चलता देखें तो लगेगा जैसे सड़क पर दो परछाइयाँ एक-दूसरे से थोड़ी दूर चल रही हैं। इन दो परछाइयों में से एक ने अभी-अभी हल्की सी दौड़ लगाई है। बराबर पहुँच कर उस परछाई ने झटका देकर अपने हाथ का बोझ कंधे में लटका लिया है। ये हल्कू की परछाई है। ये दोनों में अब साथ चलते दिखाई दे रहे हैं।   

*********

झुनिया घर के आँगन में बैठी है और एक थाल लिये चांवल में से कंकण साफ़ कर रही है। आज हल्कू को आने में देर हो गयी है। झुनिया को यकीन है वो आज कम्बल लेकर ही आएगा। अभी एक कम्बल आ जाए तो हल्कू को जाड़े से थोड़ी राहत मिलेगी, वरना खेत में उसकी रात न जाने कैसे कटेगी? हल्कू को मजदूरी करता देख झुनिया को दुख होता है मगर वो भी क्या करे इस खेती भर से घर का काम तो चलता नहीं। उसका बस चले तो सब बेच-बाच के शहर चली जाए और वहाँ एक छोटा सा दुकान खोल ले, कम से कम रोज-रोज की इस झंझट से मुक्ति तो मिलेगी। दिनभर की मेहनत के बाद जो रात को चैन की नींद भी ना मिले तो ऐसे काम का क्या फायदा?  झुनिया अपने विचारों में कहीं खो ही गयी थी कि उसके कानों में हल्कू की आवाज़ पड़ी। झुनिया आँगन से दो कमरों की दूरी पार करती हुई बाहर परछी की ओर आती है तो देखती है कि हल्कू अपनी दोनों गायों को प्यार से सहला रहा था और उनसे समझाने की मुद्रा में कुछ कह रहा था। झुनिया हल्कू का खाली हाथ देख कर निराश हो जाती है।

“आज भी कम्बल नहीं लाये? जाड़ा ऐसे ही बिताने का इरादा है क्या?”, झुनिया ने हल्कू के सामने प्रकट होते हुए कहा। हल्कू अपने इस तरह के स्वागत से खिन्न हो जाता है। झुनिया की बात से आज हुई सारी घटनाएं उसे याद आ जाती हैं। “मैं आ गया ठीक नहीं लगा तुझे?... पानी पूछेगी या कम्बल के बिना पानी भी ना देगी?”, हल्कू ने क्रोध और ग्लानी भरे लहजे में कहा। झुनिया तुरंत अंदर चली गयी। उसके आते तक हल्कू ने द्वार पे बने एक चबूतरे पर आसान जमा लिया। झुनिया पानी लेकर आई और हल्कू के हाथ में पानी का लोटा थमाकर उसके कुछ बोलने का इंतज़ार करने लगी।

“बस का भाड़ा तक नहीं बचा था मेरे पास.. वो तो अच्छा हुआ कि महेश मिल गया वरना बस वाला धक्के मार के बाहर निकाल देता.. फिर इंतज़ार करती रहती तू मेरा..”, हल्कू ने खाली लोटा ज़मीन में रखने के बाद कहा।

“महेश?”, झुनिया ने पूछा।

हल्कू हैरान है कि झुनिया भाड़े वाली बात पर सुहानुभूति दिखाने की बजाय महेश के बारे में पूछ रही है।

“अरे वो सोनपारा वाला.. रामधुन चाचा का बड़ा बेटा..”, हल्कू अपनी जगह से उठकर वापस अपनी गायों के पास चला जाता है।

“वो तो शहर में रहता है न?”, शहर का नाम लेते हुए झुनिया की आँखें चमक उठती है।

“वहाँ काम करता है.. परिवार तो पूरा यहीं गाँव में रहता है..”, हल्कू ने झुनिया का इशारा भांपते हुए कहा।

-“हाँ पर वो तो शहर में ही रहता है ना..”

“ऐसा रहना भी कोई रहना है.. परिवार यहाँ.. खुद वहाँ, दूसरों के साथ.. दिनभर काम और वापिस आ के एक खोली में बंद.. दिनभर कारखाने में बंद और वापिस आने के बाद एक खोली में बंद.. ऊपर से घरवालों का सुख भी नहीं..”

-“कर भी तो परिवार के लिये रहा है न.. वहाँ से कमा के आता है तभी तो आज परिवार सुखी है..”

हल्कू को इस बहस में अब जीत के आसार कम होते नज़र रहे हैं, अब वो अपनी जगह से उठ कर घर के अंदर जाने लगता है। चलते-चलते वो अपने कुर्ते की जेब में हाथ डालकर उँगलियों से किसी चीज़ का मुआयना कर रहा है। जेब में महेश की दी हुई बीड़ियां अब भी जेब में सुरक्षित पड़ी हैं। बीड़ियों की मौजूदगी से उसे कुछ अच्छा महसूस होता है और वो अपनी गति बढा लेता है। झुनिया भी उसके पीछे चल रही है।

-“काहे का सुख.. महेश बता रहा था वहाँ हाड़-तोड़ काम कराते हैं, तुम जियो या मरो उनको मतलब नहीं है.. पईसा ज्यादा दियें है तो काम तो लेकर रहेंगे चाहे कुछ भी हो जाए.. वो तो खुद ही त्रस्त है अपने काम से.. कहता है छोटा-मोटा खेत भी होता तो कभी शहर नहीं जाता..”, हल्कू किस्सा करने की आशा से कह देता है।

 “वो सब ठीक है.. तुम कम्बल क्यूँ नहीं लाए? क्या आज मजूरी नहीं मिली?”

हल्कू इस सवाल के दोबारा पूछे जाने से आहत हो उठता है। अभी ये दोनों दूसरे कमरे तक ही पहुंचे थे कि सवाल सुनकर हल्कू वहीं ठिठक जाता है। वो गुस्सा नहीं है पर इस हालात से सामंजस्य बिठाने में नाकाम है। वो बात जिसे वो खुद ही अब तक समझ नही पाया है, वो झुनिया को कैसे समझाएगा, और यदि नहीं समझाएगा तो झुनिया बार-बार उसे कम्बल के बारे में पूछती ही रहेगी। वो झुनिया को असहाय नजरो से देखता है, झुनिया अब भी प्रश्न की मुद्रा में खड़ी है। हल्कू सर लटका कर आँगन की ओर बढ़ जाता है।

हल्कू आँगन में आ कर हाथ-मुँह धो रहा है। बाल्टी में से पानी निकाल कर धीरे-धीरे पहले पैर फिर हाथ और बाद में चेहरा धोता है। झुनिया अब भी हल्कू के कुछ कहने का इन्तज़ार कर रही है। हल्कू पास रस्सी में टंगा एक गमछा उतार कर मुँह पोंछने लगता है। वो हर काम में ज़रूरत से ज़्यादा वक्त ले रहा है। 

झुनिया का सब्र टूट जाता है, “ठंड अभी से इतनी बढ़ गयी है, आगे ना जाने क्या होगा.. तुम खुद ही खेत की रखवाली को बाहर सोते हो.. कम्बल ले आते तो खुद ही को आराम पहुँचता.. अपने लिये थोड़े कह रहीं हूँ।”

हल्कू अब उसके सामने खड़ा हो जाता है और जेब टटोलने लगता है। जेब से पाँच सौ का नोट निकाल कर कहता है, “ये नोट देख रही है झुनिया..? अब ये महज कागज़ का टुकड़ा है.. अब इसका कोई मोल नहीं..”

“क्या मतलब?”

-“हाँ.. अब ये नोट बंद हो चुका है.. कल रात परधानमंत्री आए थे घोषणा करने..”

“कहाँ आए थे? यहाँ?”

-“अरे नहीं पगली इस गाँव के ऐसे भाग कहाँ!”

झुनिया थोड़ी देर खामोशी से हल्कू के आगे कुछ कहने का इंतज़ार करती रही मगर हल्कू के पास आगे कहने को कुछ है ही नहीं। वो अपने सूखे हुए हाथों को एक बार फिर पोंछने में लग जाता है।

“काहे हुआ नोट बंद?”, झुनिया ने पूछा।

-“पाकिस्तान को मजा चखाने के लिये..”

“तो अब हमारे पैसे का क्या?”

-“भगवान जानें.. ”

माहौल में दोबारा ख़ामोशी छा जाती है। धप-धप की आवाज़ के साथ हल्कू घर के अंदर जाने लगता है। हल्कू जाते-जाते एक बार फिर अपने कुर्ते के जेब में हाथ डालता है और उँगलियों से कुछ टटोलने लगता है। वो अपनी गति बढ़ा लेता है। झुनिया उसे हैरानी से देखती रही। कुछ क्षण बाद वो दृष्टि से ओझल हो गया। थोड़ी देर बाद एक आवाज़ आई-

“मैं खेत हो कर आता हूँ...“ 

 

 

मेरा जन्म एवं शुरुआती अध्ययन छत्तीसगढ़ के एक छोटे से कस्बे रतनपुर में हुआ। जैसा कि कस्बे में रहने वाले बहुत से मध्यम वर्गीय परिवारों के साथ होता है, हमारा परिवार भी बेहतरी की तलाश में शहर आ गया- बिलासपुर शहर।  नया शहर होने का एक असर ये हुआ कि ज्यादा दोस्त न होने की वजह से मैं अपना ज़्यादातर समय घर में बैठकर किताबें पढ़ते गुजारता। तब मुझे आर. के. नारायण बेहद पसंद थे। आज से कुछ सालों पहले तक बिलासपुर में पुस्तक मेले लगा करते थे  और लगभग हर पुस्तक मेले में मेरे पिता मुझे ले जाते। मैंने अपना पहला उपन्यास इन्ही में से किसी मेले में खरीदा था- गोदान। शायद मुंशी जी की रचनाएं ही थी कि जिनकी वजह से मेरा साहित्य की ओर रुझान बढ़ा।

लिखने की शुरुआत डायरी से ही हुई। डायरी में कहानियां और कवितायें लिखता। लिखता तो सिर्फ अपने ही लिए था पर मन में एक दबी-छुपी चाह भी थी कि कभी किसी रचना को तारीफ़ मिल जाए। अब भी लिखने के बाद यही सोच रहती है कि किसी एक व्यक्ति को मेरी रचना पसंद आ जाए.. कोई एक कह दे कि तुमने जो लिखा मैंने सब समझ लिया है। इसीलिए हर जगह-हर प्लेटफॉर्म में मौका तलाशता रहता हूँ। खैर, बाद में कॉलेज समारोहों के लिए भी कुछ चीज़े लिखी जिन्हें अपने स्तर पर खूब प्रसंशा मिली। पत्र/पत्रिका की बात करें तो ई-कल्पना में ही मेरी पहली कहानी “ईयरफोन” छपी थी, जिसकी वजह से लिखने की काफी हिम्मत आई। हमेशा छपते रहना मुश्किल होता है इसलिए मैं अपने ब्लॉग दायरा  के ज़रिये भी लिखता हूँ। ख़ास कर कवितायें।

मैं लिखता हूँ क्यूंकि मुझे लगता है कि खुद को ज़ाहिर करने का मेरे पास इससे बेहतर कोई साधन नहीं और खुद में रह जाने से बुरा इस दुनिया में कुछ भी नहीं। कहानियों के अलावा आगे चलकर मैं फिल्मों के लिए स्क्रीनप्ले लिखना चाहता हूँ । पर चूँकि मैं अभी नया हूँ और अपने लेखन के प्रति बहुत आश्वस्त नहीं हूँ, इसलिए सिर्फ लेखन ही करूं, ऐसा नहीं सोचा। इसलिए फ़िलहाल कंप्यूटर एप्लिकेशन की पढाई और बाद में उसी में नौकरी की तलाश रहेगी।

अंत किसी को पता नहीं होता। हो सकता है किसी दिन साहित्य में एक बड़ा नाम कमाऊं, हो सकता है किसी दिन एक सफल स्क्रीन-लेखक बन जाऊं, या ये भी हो सकता है कि सॉफ्टवेयर की नौकरी करते-करते खुद ही एक प्रोग्राम बन जाऊं। अंत किसी को पता नहीं होता, इसीलिए मुझे कहानियाँ लिखना इतना पसंद है। ऐसे में एक कहानीकार जो स्वयं कितने ही अंतर्द्वंद्व- अंतर्विरोधों में उलझा हो, अपनी कहानियों का अंत सुलझा रहा होता है और उन चंद लम्हों के लिए अपनी कहानी भुला देता है।

बहरहाल, लिखने का प्रयास जारी रहेगा।

-आकाश हिन्दुजा

hinduja.aakash@gmail.com
 

 

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