... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

वो तीन

 

 

उसके दोनों साथी गहरी नींद में बेढंगे तरीके से हाथ पैर फैलाए सो रहे थे, उसकी पोजीशन ठीक कर कम्‍बल उड़ाया। उनकी ओर नजर पड़ी तो आंखों के कोरों में मोती सा कुछ चमक रहा था, शायद अतीत के आने पर द्वार के तोरण जैसा। वह एक टक-छत ताकता हुआ गहरे चिंतन में खोया था। व्‍हील चेयर बढ़ाते-बढ़ाते मेरे हाथ रूक गए। विचारों की लकीरे मस्तिष्‍क पर खिचने लगी। इन कठोर ह्दय में भी संवेदना की कोमल पांखुरी जुड़ी है जो आंखों के कोरों तक तो आती है, पर बाह्य छदम रूप की मर्दानगी उसे बाहर नहीं आने देती। कल तक जो दुष्‍ट बंदूक की नोक पर मुझसे बात कर रहे थे आज कहां गया उनका रौद्र रूप। लड़ाई के मैदान से वीर सिपाही की तरह वर्षों बाद लौटकर मां की गोद में सिर रख वो दोनों सोये हुए थे। और यह तीसरा तो शायद ह्दय के किसी नाजुक तारके छिड़ जाने से खोया हुआ जाग रहा था। मैं सोचने को विवश हो गई ये हैवान हैं या जानवर........ नहीं ये भी इंसान है। उसे टोकना उचित न समझा, पता नहीं कब मैं नींद के आगोश में समा गई।

     चाय का कप जमीनपर गिरा, झटके से नींद खुली मैं चौंकी, मुझसे ज्‍यादा वह चौंका। हड़बड़ाकर उठकर कप उठाने लगा, सहमा सा सफाई करता हुआ बोला –‘’मैनें देखा नहीं आंटी आप कब चाय रख गई।‘’ बड़ी नम्रतापूर्वक बोलते हुए मेरे पास आया आप चेयर पर ही सो गई। मेरी आंखों में बेटे नयन का चेहना घूम गया। वह गलती करने पर इसी तरह गिल्‍टी महसूस करता था। ‘’ मैं तो अक्‍सर ऐसे ही सो जाती हूं बेटे, अब कौन रखा है, रोज-रोज मुझे लिटाने वाला। उपर के फलैट में कुछ बच्‍चे रहते हैं जो ऑफिस से आते वक्‍त कभी-कभी मुझे पलंग पर लिटा जाते हैं। मैं इतना तो कर ही लेती हूं कि अपनी व्‍हील चेयर खोलकर पैर पसार लेती हूं उसी पर सो जाती हूं वह दयनीय दृष्टि से मुझे देख रहा था‘’ चलिये मैं आपको लिटा दूं। ‘’तुम सो जाओ’’ बम्‍बई जैसे शहर में इतनी जगह नहीं है जहां तीन पलंग बन सकें और मेहमानों के आने पर घर में पैर पसार के सो सके। तुम शायद अभी सोये नहीं हो, रात बहुत हो चुकी है। दयनीय दृष्टि से मुझे देखता हुआ वह पलंग पर दोनों हाथों में सिर पकड़कर गर्दन झुकाकर बैठ गया।

‘’क्‍या बात है, सिर में दर्द है, चाय बनाकर पी सकते हो।‘’

‘’आज तो नींद आने वाली नहीं है।‘’वह बुदबुदाया।  कोई बोझ सा उसके उपर महसूस करते हुए मैं बोली - ‘’ मै देख रही हूं तुम बहुत देर से कुछ सोच में डूबे हुए हो मैंने तुम्‍हें कुदेरना उचित नहीं समझा। किंतु बेटा दर्द बांटने से हल्‍का होता है। तुम अपनी प्राब्‍लम मुझसे कह सकते हो। मैं लाचार हूं किंतु शरीर से, मन से नहीं। हो सकता है मैं कुछ मदद कर सकूं। ‘’मेरी ममता जाग उठी।‘’

क्‍या कहूं आंटी आज वो..........बहुत याद आ रहे हैं’’ वह रूका....... कहां के रहने वाले हो वैसे भी तुम इंडियन तो हो नहीं, तुम्‍हारी इंग्लिश बोलने की स्‍टाईल अमेरिकी है, बोलो तुम अमेरिकन हो न।‘’ वह चोर निगाहों से देख मुस्‍कुराया। यस आंटी यू आर राइट। किंतु प्‍लीस आंटी आप किसी से मत कहिए। हमारी जिंदगी सूली पर टंगी है। न जाने कब मारा जाउं। बस एक बार अपने देश वापस जाना चाहता था पर.............आंखों का समन्‍दर बह निकला, चुपचाप आंसु पोंछ, सोने के लिये कम्‍बल तानने लगा। शायद मुझसे नजरें चुराने का प्रयास कर रहा था।

‘’ तुम सो नहीं सकोगे बेटे, मैं तुम्‍हारी मां जैसी हूं। अमेरिकन नहीं इंडियन मदर, जो अपने बच्‍चों की खुशी के लिये संघर्षों से जूझने में नहीं कतराती। अच्‍छा तुम्‍ही बताओ, तुम्‍हें मां की याद आती है या मित्रों की।‘’

‘’नेचरल है मित्रों की, क्‍योंकि मेरा अधिक समय उन्‍हीं के साथ बीतता था। मेरी गर्ल फ्रेंड थी क्‍वीन, शायद वही मेरी जिंदगी थी पर..........आंटी आप सो जाइए।‘’

तुम निश्‍चिंत होकर अपने इस मुकाम तक की कहानी सुनाओ। मैं जानती हूं जान जोखिम में डालने के काम वही करता है, जिसकी जान जोखिम में हो। मैं किससे कहूंगी, कहां जाउंगी यहां से निकलकर.........वैसे भी मैं तो कई साल से इसी कमरे में कैद हूं। यहां कोई आता जाता भी नहीं। कभी-कभी दूर के रिश्‍ते के बहिन बहिनोई आ जाते हैं, एक तो इस शहर की व्‍यस्‍तता और फिर लम्‍बी दूरियां। रिश्ते अब खून के भी नहीं निभाए जाते, उम्‍मीद ही बेमानी है। उम्र का पड़ाव तो पार करना ही है, पता नहीं कितना लम्‍बा है, ये जिंदगी भी बड़ी विचित्र चीज है जो जीना चाहता है उसे बिन बुलाए यमराज का बुलावा आ जाता है और जो राह ताकता है उसे नसीब कहां।

     मैने तुम्‍हे बेटा कहा है – मैं तुम पर कोइ आंच न आने दूंगी, बताओ तुम कैसे इस काम में आए और क्‍या चाहते हो।‘’

हां.... शायद मौत से पहले मुझे अपना अतीत याद कर लेना चाहिए।‘’

मैं मौन थी वह कुछ क्षण मौन रहा...फिर बोला – ‘’उस समय मैं आठ वर्ष का था, माता-पिता का तलाक हो गया था, तीन माह मां के पास रहने के बाद उन्‍होने मुझे बोर्डिंग स्‍कूल के सुपूर्द कर दिया। जहां पढ़ना रहना खाना-पीना सब कुछ होता पर गार्जियन नहीं। सभी के पेरेंटस महिने छ: महिने या साल में एक बार आवश्‍य मिलने आते पर मेरे मॉम डेड ने कभी मेरी खबर न ली। एक वर्ष बाद मेरे डेड अवश्‍य आये थे अपनी न्‍यू वाइफ के साथ, मेरा परिचय कराकर बोले थे अब तुम्‍हारी जिंदगी यहीं निकलेगी, जैसा चाहोगे  बना लोगे। न अधिक बोले न मुझे बोलने का अवसर दिया। पता चला मां ने भी दूसरी शादी कर ली थी मैं बेटा तो उनका था, पर अब वो मेरे मां बाप नहीं थे। मुझे वहां छोड़कर उन्‍होनें अपने दायित्‍वों से मुक्ति ले ली। एक गहरी सांस छोड़ते हुए उसने कहा सुना है इंडिया में तो बच्‍चे जीवन भर मां-बाप का साथ देते हैं और मां-बाप बच्‍चे की हर खुशीका ख्‍याल रखते हैा ‘’तुमने सच सुना है।‘’ वहां रहते हुए मैं हमेशा एकांत मैं बैठकर गॉड से अनेकों प्रश्‍न पूछता रहता। मैं क्‍यों जन्‍मा? किसके लिये? कौन है मेरा? क्‍या करनाहै मुझे? मैं जानता था उस उम्र में भी, मौत आती है। सोचता मरकर कहां जाते होंगे लोग? फिर से जन्‍म लेते हैं तो कैसे? मैं प्रश्‍न ही करता रहता, उत्‍तर कभी न पाता। मुझे पढ़ाई में लड़कों से बहुत कम समय लगता जल्‍दी ही समझ में आ जाता और कक्षा में प्रथम आता। हमेशा ही अनमना रहता। समय बीतता गया। जब मैं दसवी कक्षा में था मेरी दोस्‍ती क्‍वीन से हो गई वह अपने नाम के अनुरूप कोई क्‍वीन से कम न थी। बड़ी-बड़ी चमकदार झील सी नीली आंखे घुंघराले गोल्‍ड हेयर सुंदर सी नाक उसके नीचे कमल पंखुड़ी से गुलाबी होंठ...... जब वह मुस्‍कुराकर देखती तो मेरे मन में एक हलचल सी मच जाती। मुझे लगता मैं हर वक्‍त उसके आसपास रहूं। हम साथ में घूमते बहुत बातें करते किंतु क्‍लास में हमारी शीट अलग होती वह कनखियों से मुझे देखती रहती और मुझे एक गुदगुदी सी अनुभव होती। अब मेरा मन पढ़ाई में न लगता मैं अधिकतर उसी के ख्‍यालों में खोया रहता, कभी-कभी उससे अपने प्रश्‍नों के उत्‍तर मांगता वह हंस पड़ती, कहती- ‘’तुम्‍हें ये सब फिजूल की बातें नहीं सोचना चाहिए, तुम्‍हें तो बस यही सोचना चाहिए तुम कब बड़े होगे मैं कब बड़ी होउंगी, तुम कब काबिल बनोगे।‘’ वह खिलखिला कर हंसती और मैं उसकी हंसी में अपने प्रश्‍नों को ह्दय के किसी कोने मं ढ़ककर रख देता। मैं उसे प्‍यार करने लगा था।

     वह हमारे कॉलेज में दाखिले का प्रथम दिन था हम मिले बहुत सारी बातें की किंतु मैं जो ठानकर गया था वह बात न हो सकी। आज मैं उसे शादी के लिये प्रपोज करने वाला था कि उसने रॉबिन की चर्चा छेड़ दी – ‘’मैं तुम्‍हें सरप्राइज देना चाहती हूं।‘’ मैं अपनी बात भूलकर उसकी बात सुनने लगा – ‘’मैं और रॉबिन परसों शादी करने वाले हैं, हम दोनों एक दूसरे को बहुत प्‍यार करते हैं और अब हम एक होना चाहते हैं। पिघले हुए शीशे से वाक्‍य मेरे कानों में दहकने लगे। मुझ पर वज्रपात हुआ था। मैं पत्‍थर का बुत बन गया और वह चहकती हुई अपने भविष्‍य के सपने बुनने लगी। बोली – ‘’लगता है तुम खुश नहीं हो।‘’ मैं क्‍या कहता, पूरी तरह टूट गया। उसी दिन से भारी टेंशन के कारण तेज बुखार रहने लगा। मैं कॉलेज न जा सका। हफते भर बाद जब स्‍वस्‍थ्‍य हुआ तो प्रश्‍न था, ऐसी किस जगह जाउं जहां क्‍वीन का चेहरा मुझे न देखना पड़े। मुझे याद आया वह पाकिस्‍तानी मित्र अहमद, जो एक वर्ष पूर्व ही अमेरिका से पढ़ाई छोड़कर पाकिस्‍तान चला गया था। शीघ्र ही उससे संपर्क हो गया, उसने मुझे बुला लिया। मैंने दो महिने में वीज़ा आदि की व्‍यवस्‍था की और पाकिस्‍तान पहुंच गया। जहां दोस्‍त अहमद ट्रेनिंग ले रहा था वहीं उसने मुझे भी शामिल कर लिया जिसमें समय ही न मिलता हो? उसने एक नजर अपने उन सोए हुए साथियों पर डाली जो खुर्राटे ले रहे थे, फिर शंकित सा मेरी ओर देखा, कुछ हिचकिचाहा सा बोला –‘’दूसरे देशों में आतंक फैलाने, बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों को ध्‍वस्‍थ करने के लिये बमों का उपयोग, आत्‍मघाती बमों के उपयोग, निशाना साधना, गुप्‍त दस्‍तावेज प्राप्‍त करने जैसे आतंकवाद की ट्रेनिंग एक संगठन द्वारा दी जाती थी। मैं एक ही वर्ष में पूरी तरह ट्रेंड हो गया और इनके साथ काम करने लगा।

‘’तुम जानते हो यह कितना खतरना‍क और गलत काम है।‘’ वह चौंककर बोला - ‘’मौत से खेलना ही अब हमारा मकसद है, हमें जीकर भी क्‍या करना है, हमारा है भी कौन? गार्जियंस ने मुझसे बचपन में ही छुटकारा पा लिया था, प्रेमिका ने भी अपना रूप दिखा दिया। अब तो मरना और मारना ही हमारा म‍कसद है। एक बार अपने देश पहुंचकर.... क्‍वीन सहित पूरे देश को तबाह करना ही मेरी अंतिम इच्‍छा है। वह समय भी जल्‍दी ही आएगा। वह उत्‍तेजित सा हो गया। मुझे अत्‍यंत धैर्य और प्‍यार से काम लेना था ‘’हां बेटे जब कोई टूटता है तो ऐसा ही लगता है।‘’ किसी भयानक उदेश्‍य का स्‍मरण कर लम्‍बी-लम्‍बी सांसे भरने लगा। अंदर चल रहे युद्ध की लकीरे उसके चेहरेपर स्‍पष्‍ट दिख रही थी, मैंने बात पलटते हुए कहा- ‘’ अभी इंडिया में कितने दिन रूकने का प्‍लान है।‘’

‘’ जब तक काम नहीं हो जाता।‘’ वह चादर खीचनें लगा।

‘’यहां क्‍या करने का लक्ष्‍य है।‘’  साहस बटोर सहजता से मैंने पूछा। तीखी नजरों से उसने देखा, मैं सहम सी गई।

‘’खैर मैं नहीं पूछूंगी, तुम सो जाओ, रात बहुत हो चुकी है।‘’ मैं भी कुर्सी फैलाकर सो गई।

     सूरज खिड़की से झांकने लगा। आकाश की रक्तिम आमा खिड़‍की के शीशों पर दस्‍तख्‍ देने लगे। खिड़की खोली तो नर्म रोशनी की कुछ किरणें मेरे चेहरे को झकझोरने लगी। उनकी ओर देखा, तीनो उसी अल्‍हड़ अवस्‍था में अस्‍त-व्‍यस्‍त सो रहे थे। मुझे अपने बेटे नयन की याद आ गई। जब तक पास न बैठा लेता उसे नींद न आती। कितना सुखी था मेरा परिवार नयन के पिता कँवलजीत भी कितना प्‍यार करते थे मुझे। संडे का कार्यक्रम दो दिन पहले ही निर्धारित कर मुझे बता देते थे। कितनी ही बार नयन के दोस्‍तों का पिकनिक पर जाना, उनके साथ क्रिकेट, बेडमिंटन और कितने ही खेल मित्रों की तरह खेलते। फुरसत से बैठना तो कँवल को आता ही न था। ऑफिस के आने के  बाद एक दो घंटे दोस्‍तो के साथ हंसी मजाक न हुआ तो क्‍या बात। जितना खुला दिल उतनी मुक्‍त हंसी। याद नहीं आता मुझे कभी किसी काम को रोका हो। कभी-कभी तो लेडीज क्‍लब से लौटते-लौटते देर हो जाती, डरते-डरते घर आकर देखती, मुझे सरप्राईज देने वो जल्‍दी-जल्‍दी किचिन में खाना बनाने में जुटे रहते। देखते ही भोलेपन से बैठ जाते, लो भई तुम्‍ही सम्‍हालो अपना काम। मैं सोच रहा था आज तुम्‍हारे आने पर मैं भी वैसे ही खाना लगाकर रखूं, जैसे तुम मेरे लिये रखती हो। गले में बांहें डालकर कहते – तुम जैसी बीवी पाकर मैं धन्‍य हो गया हूं। मैं मुस्‍कुरा पड़ती, ‘’हाय तुम्‍हारी इसी मुस्‍कुराहट का तो कायल हूं।‘’ ‘’बस-बस अब रहने दो ये मस्‍करा।‘’

     एक कर्मठ और ईमानदार इंसपेक्‍टर की छवि उन्‍होनें बनाई थी। कर्तव्‍यनिष्‍ठा तो ऑफिस और घर मे समान रूप से थी। नयन दसवी कक्षा का छात्र था, जब वह भयानक हादसा हुआ। उस समय उनकी पोस्टिंग ग्‍वा‍लियर के भिंड में हो गई थी, भिंड के दस्‍यु गिरोह को पकड़कर जब वह तेजी से जीप से लौट रहे थे, सामने से आते ट्रक से जीप टकराई, ड्राईवर और कँवल स्‍पॉट पर ही खत्‍म हो गये। बहुत दिनों तक पागलों जैसी हालत में रही। नयन की खातिर स्‍वयं को संभाला। सदमें में डूबा नयन जैसे-तैसे पढ़ाई कर एक कंपनी में नौकरी करने लगा। कंपनी ने जल्‍दी ही उसे इंग्‍लेंड भेज दिया और वर्ष भर बाद भारत आया तो एक गोरी मेम को जीवन संगिनी बना चुका था। लौटा तो फोन का सिलसिला भी जल्‍दी ही खत्‍म हो गया और अब तो इंडिया आने से मना ही कर दिया। ‘’अब मेरा परिवार यहां है मां, आप समझती क्‍यो नहीं, मैं वहां नहीं आ सकता। ‘’तो मुझे वही ले चल बेटा’’ यह नहीं हो सकता मां, क्‍वीन को किसी और को अपने साथ रखना पसंद नहीं है। ‘’हो भी कैसे सकता है, जिस देश की संस्‍कृति बच्‍चों के बोर्डिंग और पति-पतिन के तलाक संबंधों पर टिकी हो उसे तुम भारतीय कैसे बदल सकते हो।‘’ बेरूखे जवाब के बाद फोन आना भी बंद हो गया, फोन लगाने पर काट दिया जाता, बेटे के इस व्‍यवहार से अक्‍सर मेरे हाथ पैर सुन्‍न हो जाते। खर्च तो पति की पेंशन से चल जाता पर अकेलेपन में दीवारों से बातें और अतीत के भंवर में डोलते एक दिन पैरो में जो शून्‍यता आई तो डॉक्‍टर ने पैरालिसिस की घोषणा कर दी। जब से दवाओं का सि‍लसिला चला तो आज भी व्‍हील चेयर के साथ व्‍हीलचेयर बन गई। इस शहर में हजारों हादसे होते रहते हैं और पड़ोसियों को खबर भी नहीं होती। मैं बेसहारा मजबूर औरत बनकर दिनभर खिड़की से भागती गाड़ि‍यों के रेले और रात में करोड़ों बल्‍बों से जगमगाते शहर को देखती जीने का संघर्ष झेल रही हूं। बस एक नौकरानी ही जो एक हजार रू. में आधा सा काम कर जाती है अब मुझे भी तो टाइम पास करना होता है तो खाना तो मैं ही बनाती हूं। बोलने के लिये एक वही होती है किंतु उसे भी इतनी जल्‍दी होती कि वह मुराद भी पूरी नहीं होती।

     आंखों का पानी पूरा सुख चुका था तकलीफें आती और पतझड़ सी समय के अंतराल को पार कर जाती। अनुभूतियों ने सहनशीलता को साथी बना लिया पथराई आंखों में न तो अब किसी का इंतजार था न उम्‍मीद की किरण।

     फागुन का महिना था खिड़की से पलास के कतार-बद्ध पेड़ दहकते अंगारे से ह्दय को स्‍पर्श कर रहे थे। प्रकृति का सौरभ देह को रोमांचित कर रहा था। मध्‍यम आवाज में रेडियों मिर्ची के रोमांटिक गाने गुदगुदा रहे थे। अतीत के झरोखे से कंवल ने आकर मुझे अपनी बांहों में थामा ही था, कि तेजी से किसी ने दरवाजे पर जोर का धक्‍का दिया, चौंककर देखा तीन लड़के बड़े-बड़े बैग के साथ अंदर घुसे, सरसी निगाह से घर का मुआयना करते हुए एक ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। क्षण भर को कुछ आतंकित हुई तत्‍क्ष्‍ाण संयत हो गई। कैसा भयᣛ? लुटेरों के लिये तो कुछ है नहीं, और मरने के लिये तो मैं सदा तत्‍पर हूं। आने का पूछा, तो पहले वाले ने मुंह पर अंगुली रख चुप रहने का इशारा करते हुए पिस्‍तौल तान ली। मैनें मौन साध लिया और चुपचाप उनकी हरकतें देखने लगी।

‘’ऐ शोर मत करना, जान ले लूंगा।‘’ दरवाजा मत खोलना। पुलिस हमारा पीछा कर रही है। छिपने की जगह है कोई, वो मेरी ओर देखा। बाथरूम की तरफ इशारा कर दिया। कारतूस से भरे बैग पलंग के नीचे छिपा दिये गये। दो कमरों का छोटा सा फलैट तीनों की आंखों से बारी-बारी तलाशा गया।

     मौन तोड़ा- जाकर मुंह हाथ धोलो, किचिन में खाना रखा है, मिल बांटकर खा लो। बाई तो अब सुबह आयेगी और मैं तो अपना खाना ही मुश्किल से बना पाती हूं। आंखे चढ़ाकर एक मुझे देखने लगा, शंकित सा बोला- ‘’ऐ कोई फोन-वोन मत करना।‘’ व्‍हील चेयर सरकाकर किचिन तक पहुंची, तब उन्‍हें मेरी स्थिति का ज्ञान हुआ। मैं जानती हूं कठोर दिखने या भयावह काम करने वाले भी संवेदनशून्‍य नहीं होते, प्‍यार की भाषा शून्‍यता तोड़ देती है। उन्‍होंने मेरी प्‍लेट भी लगा दी। एक का खाना चार लोगों में बंट गया।

‘’आप घबराना नहीं आंटी, हम कल यहां से चले जाएंगे।‘’ अधिक जवाब सवाल से जरूरी था मौन रहकर उन्‍हें समझना। मैनें दोनों पलंग की ओर इशारा किया – ‘’रात बहुत हो चुकी है वहां सो सकते हो।‘’ जैसे हिमालय की चढ़ाई से नीचे उतरे हो,’’ सोने की व्‍यवस्‍था देख एक पलंग पर दो और एक पलंग पर एक सोने की कोशिश करने लगा। मुझे नींद नहीं आ रही थी और शायद मेरी ही तरह उसे भी। मैंने व्‍हीलचेयर उसके पलंग के पास सरका ली। उसकी रामकहानी तो जान सकी पर इसके ये दोनों साथी तो अमेरिकन नहीं लग रहे, जो भी हों, हैं तो आतंकवादी ही।

     मैं उनकी तरफ देख रही थी वह, समझ गया बोला –‘’वो दोनों मेरे पाकिस्‍तानी दोस्‍त हैं असलम और सलीम हम तीनों ने एक ही साथ ट्रेनिंग ली है।‘’

तुम लोग ऐसे काम क्‍यों करते हो, सर पर कफन बांधकर चलना भी कोई जिंदगी है। मैं तो अपाहिज हूं, तुम्‍हारी कोई सेवा नहीं कर सकती, तुम लोग मेरे अतिथि हो, पर मैं मजबूर हूं। किसी चीज की आवश्‍यकता हो तो किचिन में जाकर ले लेना।‘’ उनकी दृष्टि में नम्रता जागी। मैंने कहा -

‘’तुम लोग यह काम छोड़ क्‍यो नहीं देते, अभी उम्र ही क्‍या है तुम लोगों की? बेकसूरों की जान से खेलकर तुम्‍हें क्‍या मिलता है?’’ असलम जो अभी जाग गया था, बोला – चाहते तो हम भी यही हैं, नारमल लाइफ, पर अब तो बहुत देर हो चुकी है। न तो मैदान छोड़ा जा सकता है और न खेलने का मन है। मौत दोनों तरफ है फिर क्‍यों न हम अपने वतन की खातिर कुर्बान हो जाए। वैसे भी हम दोनों पा‍किस्‍तानी घर से निकाले जा चुके हैं। नफरत के गहरे कुंए में उन्‍होंने ढ़केल दिया है। मां बाप भाई बहन होते हुए भी हम अनाथों की सी जिंदगी जी रहे थे। उस दिन जब बाहरवी बोर्ड परीक्षा में हम दोबारा फेल हो गये तो घर जाने का साहस हम दोनों में न था, पिछले साल के रिजल्‍ट पर हम दोनों के पिता ने हमारी भरपूर पिटाई की थी। सीधे नदी किनारे चले गये, सोचा आत्‍माहत्‍या कर लूं, तभी हसन ने हमे देख लिया और ले गया अपने ठिकाने पर। अच्‍छा खाना-पीना, पैसा और आतंकवादी बनने का प्रशिक्षण देकर हमसे काम करवाया जाता है। अब देश-विदेश में बम फोड़कर आतंक फैलाना हमें कोई कठिन काम नहीं है। अब तो हमें इसी में मजा आता है। सूली पर तो लटके ही रहते हैं, फिर चाहे कोई कीले ठोके या गोलियों से भून दे, एक ही बात है।‘’

     ‘’नौकरी की तो हमारे देश में भी मारामारी है। डिग्री धारियों के पैरों में छाले पड़ जाते हैं, नौकारी ढूंढते-ढूंढते। रहा-सहा भी गवां बैठतें हैं, फिर हमें कौन नौकरी देता।

गरीब मां-बाप की संतान अच्‍छे नंबर से पास हो जाए तो आशा का दिया जलता रहता है पर फेल होना तो गरीबी में गीला आटा ही हुआ न..... मां-बाप पर बोझ बनने से तो यही काम अच्‍छा है। आदत चाहे अच्‍छी हो या बुरी एक बार बन गई सो बन गई, अच्‍छा बुरा सोचने की फुर्सत किसे है। पहली बार तो अपने ही देश के एक नेता की सभा में टाइम बम रखा था तो अपनी आंखों से लोगों के चिथड़े उड़ते देख दिल दहल गया था। पर धीरे-धीरे मजबूत होते गये। अब यह काम भी तो जरूरी है किसी न किसी को तो करना पड़ेगा। सभी दोस्‍त नहीं होते फिर दुश्‍मनों का नाश करने में क्‍या बुराई। देश से प्रेम तो सभी करते हैं पर देश के लिये जान जोखिम में डालने का काम कौन करता है। हम तो अपने देश के लिये समर्पित है। काम कैसा भी हो जान तो उसी के वास्‍ते जाना है। अब तो........ पांच बरस हो गये, खून की होली खेलते-खेलते । क्‍या भरोसा पुलिस के गोली के शिकार हो जाए अब आत्‍मसर्मपण भी तो नहीं कर सकते। वह मौन हो गया। ‘’क्‍यूं नहीं कर सकते आत्‍मसर्मपण’’ जब आंख खुली तभी सबेरा होता है, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा – तुम सब आत्‍मसर्मपण कर मेरे साथ रह सकते हो।‘’

एक ठहाकेदार भारी आवाज में वह गुर्राया – ‘’अब जेल की सलाखों में रहेंगे या आपके पास । मुझे तो आत्‍महत्‍या या आत्‍मसर्मपण में कोई अतंर नजर नहीं आता।‘’जुड़ी हुई संवेदना के टुकड़े यहां वहां बेतरतीव बिखर गये। कल्पित सा मोहवास बांध रहा था मुझे उनसे। अकेलेपन से निजात की चाह या स्‍वार्थ था मेरे बेटे का गम भुलाने का। सच, जब शरीर अपना साथ नहीं देता तो पराई उम्‍मीद की मिथ्‍या कल्‍पना निराधार है। अकेलेपन का सुख-दुख व्‍यथा, कथा का यथार्थ जानते हुए भी स्‍वीकार्य करना क्‍या सचमुच कठिन है। पर जीवन की विवशता और कमजोरियों की सोच ऐसी होना लाजमी है।

अपाहिज और अकेली होना ही कम नहीं है, औरत या मर्द का फर्क कोई मायनें नहीं रखता पर औरत जानकर कुछ मर्दनुमा बच्‍चे जो ऊपर की मंजिल में रहते हैं। नई-नई सर्विस कर रहे हैं। शायद सुसंस्‍कृत भी हैं एक फोन करने पर तुरंत हेल्‍प के लिये आ पहुंचते हैं। उस दिन तीनों पिक्‍चर देखने गये होंगे। मेरे बाथरूम का दरवाजा अंदर से लॉक हो गया, फोन किया तीनों थियेटर में बैठे थे, छोड़कर तो आ नहीं सकते, आते भी तो लौटने में कम से कम दो घंटे तो लगते। वही व्‍हील चेयर पर बैठी-बैठी सो गयी। पांच घंटे बाद जब वो लौटे तब दरवाजा खुला। बंबई है कोई गांव का घर तो नहीं कि आवाज देने से पड़ौसी आ जाते और अब तो गांव में भी कोई नहीं है, न नाते रिश्‍तेदार न जमीन न घर।

वो आतंकवादी थे, भयानक अपराधी और मैं एक इर्मानदार जज की बेटी और इंसपेक्‍टर की पत्नी, पर वो भी तो किसी के बच्‍चे हैं, इन्‍हें अपने पास रखकर अच्‍छा इंसान बनाने का ख्‍याल है क्षण में टूट गया।

सुबह उन्‍हें निर्दिष्‍ट स्‍थान पर जाना था बमों और कारतूसों से लैस होकर। बेटे नयन जैसे तीन मासूम चेहरे गरीबी, हताशा और उपेक्षा के शिकार हो चुके थे। हालात का उत्‍तरदायित्‍व किसे सौंपा जाए। पिता के अभाव से नयन ने भी मां की उपेक्षा का मार्ग चुना है। पिता का अभाव मां की कर्तव्‍य परायणता, क्‍या मां के प्रति कोई नहीं? एक मां ही तो है जो हर अपराध को क्षमा कर देतीहै। निर्दोषों का खून इन्‍हें मौत की सजा के सिवा क्‍या देगा।

सुबह पुलिस ने घंटी बजाई। हालात सामने थे बाथरूम की पिछली खिड़की खुली थी। आंधी सी हलचल आंगन मे हुई पर तूफान पता नहीं कहां से आया होगा। कल अखबार बोलेंगे तबाही का मंजर कहां दहशत लाया होगा, कितने बेकसूरों की जान पर कफन चढ़ाया गया होगा।

 

 

लेखिका

मीना गोदरे ‘अवनि’

इंदौर -9479386446

परिचय

नाम --  मीना गोदरे "अवनि"
शिक्षा --एम. ए .अर्थशास्ञ  ,संस्कृत इन डिप्लोमा ,एन.सी सी कैडेट कोर्स सागर विश्वविद्यालय,
धार्मिक शिक्षा --प्रथम भाग से लेकर रत्नकरंड श्रावकाचार एवं मोक्ष मार्ग तक की विधिवत शिक्षा, परीक्षाएं उत्तीर्ण एवं अन्य शास्त्र अध्ययन

सामाजिक गतिविधियां --लगभद २० वर्षों से  समाज सेवा के कार्यों में संलग्न रही ,         पूर्व अध्यक्ष ----रोटरी इनरव्हील इंटरनेशनल क्लब, ,अखिल भारतीय दिगंबर जैन महिला परिषद शाखा सागर,   सद्भावना महिला मंडल सागर ,
पूर्व प्रांतीय संपादक अखिल भारतीय दिगंबर जैन महिला परिषद

संस्थापक-- सद्भावना महिला मंडलसागर

वर्तमान पद --प्रांतीय सह सचिव अ.भा.दि. जैन परिषद,  सह संपादक-- सागर पञिका जे .एम. डी.पब्लिकेशन नई दिल्ली, सदस्य इंदौर लेखिका संघ

साहित्यिक गतिविधियां-
दो पुस्तकें गीत संग्रह --आस्था के पुंज  और काव्य संग्रह  समुद्र के सीप  का प्रकाशन हो चुका है

अन्य प्रकाशनार्थ संग्रह में - दो गजल संग्रह दो कहानी संग्रह एक काव्यसंग्रह ,दोहा वली व निबंध संग्रह तैयार हैं अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन होता रहता है ,                                जे एम डी पब्लिकेशन की लगभग दस  पुस्तकों में रचनाओं का प्रकाशन ,
माञभाषा डॉट कॉम पर निरंतर रचनाओं का प्रकाशन

सम्मान--- शब्द शिल्पी सम्मान , भाषा सम्मान,  हिंदी साहित्य सम्मान , भारत की सर्वश्रेष्ठ कवित्री सम्मान  ,काव्य श्री सम्मान हिंदी सेवा सम्मान नई दिल्ली एवं साहित्य सेवा सम्मान भिलाई
आकाशवाणी छतरपुर व इंदौर से रचनाओं का 18 वर्षों से प्रसारण भोपाल दूरदर्शन पर काव्य पाठ
दैनिक भास्कर भोपाल द्वारा आर्टिकल हेतु दो बार पुरस्कृत,मुक्ता पञिका में कहानी हेतु पुरस्कृत

सामाजिक संस्थाओं में सभी पदों पर पुरस्कृत
तीन संस्थाओं में बेस्ट प्रेसीडेंट अवार्ड से सम्मानित  , 
कनाडा से बेस्ट  इम्यूनाइजेशन   पुरस्कार

अन्य उपलब्धियां ड्रेस डिजाइनर हेंडीक्राफ्ट आर्ट ब्यूटीशन आदि
पूर्व संचालिका --अंकुर कला केंद्र एवंओशन - बुटीक
पूर्व पद-- पब्लिक रिलेशन ऑफिसर विद्यासागर कॉलेज

लेखन का उद्देश्य प्रेरणा देना, सामाजिक विघटन रूढ़ियों को दूर करना, सकारात्मक विचार धारा द्वारा जीवन और विकास को नई दिशा नव गति देना ,सतना ऊर्जा का संचार करना ,सामयिक  समस्याओं के हल में विचारों द्वारा देश व समाज हित में योगदान देना
                            द्वारा---
                              मीना गोदरे "अवनि"
                                       इंदौर

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