... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

सृजन तो मेरा है

उफ ! उस उद्वेलन के आवेग से बिनती अब तक उबर नहीं पा रही थी। साइड टेबल पर रखा साहित्य अकादमी का स्मृति चिन्ह मुंह चिढ़ाता हुआ मानो ठठा कर हंस रहा था। सोफे पर पड़े अलमस्त फूलों के बुकों की भीनी खुशबू सड़ांध मारती लग रही थी। एक ही झटके में शिशिर ने बिनती को क्षोभ, ग्लानि और अपमान के समंदर में डुबो कर रख दिया था। बिनती ने तो प्यार से उलाहना दिया था कि जब रात आठ बजे घर पहुंच गए थे तो सम्मान समारोह में क्यों नहीं पहुंचे, लेकिन शिशिर ने उलाहना के प्रत्युत्तर में अवहेलना के दो टूक कह डंक सा मार दिया। उस डंक की जहरीली चुभन अभी तक बिनती से अलग नहीं हो पाई है। शिशिर के आग उगलते शब्द “ हुंह..ये पुरस्कार तुम्हारे उपन्यास को नहीं तुम्हारी देह को मिला है।“  बिनती के कानों में पिघला शीशा जैसे रिस-रिस कर बह रहा था।

 

 

इतनी कड़ुवाहट शिशिर के दिल में भरी है, कभी उसने जाहिर भी नहीं होने दिया। एकाएक उसे ये क्या हो गया। सुनते ही फट पड़ी थी बिनती ‘हाऊ डेयर यू’ तुम ये क्या कह रहे हो। देह को पुरस्कार छि: कितनी गिरी मानसिकता है तुम्हारी।

गरज पड़ा शिशिर हां..हां..। मैं गलत नहीं कह रहा हूं, वरना तुम जैसी सैकड़ों लेखिकाएं हैं सभी को फिर क्यूं नहीं मिल जाता पुरस्कार। तुमको ही क्यों दिया? मैं सब समझता हूं आजकल पुरस्कार किसी की योग्यता और मेरिट के आधार पर नहीं दिए जाते हैं। कहीं न कहीं कोई स्वार्थ जरूर छिपा होता है।

सुनकर आंखों में आंसू लिए बिनती ने जोर से अपने कान बंद कर लिए। प्लीज, चुप हो जाओ..। झनझनाता हुआ शिशिर तो ऊपर के कमरे में चला गया लेकिन बिनती स्तब्ध, पत्थर की तरह जड़ हो दोनों हाथों में मुंह छिपाए सिसकते हुए वहीं कमरे में निढाल सी नीचे बैठ गई।

बिनती तो अपनी जिंदगी एक आम गृहिणी की तरह व्यतीत कर रही थी। पति, बच्चे, घर आए मेहमानों का आत्मीय स्वागत, शिशिर के दोस्तों का गाहेबगाहे आ जाना और आनन - फानन में स्वादिष्ट भोजन तैयार करना और फिर शिशिर का गर्व से सीना फूलना यह सुनकर कि, भाभीजी के हाथ में तो जादू है वो लौकी और बैगन में भी फाइव स्टार शेफ को पछाड़ सकती हैं, इतना स्वाद ला देती हैं। शिशिर खुशी से हाथ चूम लेता था, कहता मेरी जान, सच में तुम तो जादूगरनी हो क्या कमाल है तुम्हारी इन उंगलियों में जो भी करोगी वो सबसे अलग होगा। और वही जब उंगलियों ने सबसे अलग हटकर कुछ करना चाहा तो इतना उलाहना, इतनी पीड़ा दिल को इतना बड़ा घाव। क्या मेरी जिंदगी सिर्फ मुस्कराकर अच्छे और सलीके से तैयार होकर अपनी पाक कला का हुनर ही दर्शाना है, दिल की चाह क्या डाइनिंग टेबल पर सजे व्यंजनों के बघार में धुआं होना है।

 सृजन की कल्पना तो बचपन से कभी नहीं की थी बिनती ने। न कभी लेखिका बनने का स्वप्न भी देखा था। स्कूल में बस स्नेह सम्मेलन के दौरान कविता, निबंध, भाषण प्रतियोगिता आदि में भाग लेती थी। ऐसा नहीं कि पुरस्कार भी खूब मिलते थे। लेकिन जब भी पुरस्कार मिलता और घर आती तो बाबा निहाल हो जाते । हर आने-जाने वाले को उसका प्रमाण पत्र दिखाते और गर्व से कहते मेरी बिनती एक दिन खूब नाम कमाएगी। कॉलेज में आने के बाद स्मारिका आदि में कहानी, लेख वगैरह देती,लेकिन इससे सृजन के मार्ग प्रस्तर तो नहीं हो जाते। न ही कभी जुनून से भर अपनी जिम्मेदारियों से मुख मोड़ लेखनी को सर्वोपरि माना। पति की सेवा, मुस्कान और पल्लवी का पालन सब कुछ बेहतर ढंग से हो रहा था। बचा हुआ समय ही कागजों पर उतर पाता था। उपन्यास छपने की तो कभी उसने कल्पना भी नहीं की थी। एकाएक शशि उसके पन्नों को उठा कर न ले जाती तो आज ये नौबत भी न आती। गालों पर आंसू की मोटी परत जम चुकी थी लेकिन बिनती के आंसू थम नहीं रहे थे।

बिनती का अच्छी सहेली थी शशि। वो एक अखबार में काम करती थी। अचानक उसके हाथ बिनती की कुछ कहानियां लग गईं। उन्हें जबर्दस्ती उठाकर ले गई और अपने अखबार में छाप भी दीं। अच्छा लगा था बिनती को अपनी कहानियां छपी देखकर, किंतु तब भी लेखिका बनने की लालसा पैदा नहीं हुई। फिर एक दिन शशि चिट्ठियों का पुंिलदा लेकर आई। उसकी कहानियों पर काफी बड़ी संख्या में पाठकों की प्रतिक्रियाएं आई थीं। अधिकतर ने उसकी कहानियों को अपने जीवन की सत्य घटना बताया था। हर कोई अलग-अलग तरह से कहानी के पात्रों के साथ आइडेंटिफाई कर रहा था। बिनती के लिए तो यह अनापेक्षित अनुभव था। लेखन की इतनी कद्र होती है, किसी के दिल में अपना लिखा हुआ इस कदर भी उतर जाता है। और तब बिनती ने ठान लिया कि वो लिखेगी अपने मन की भावनाओं को औरों के लिए प्रकट करेगी। कहानियां छपने पर शिशिर तटस्थ बना रहता, यों बिनती ने भी उससे कभी बहुत ज्यादा अपेक्षा भी नहीं की थी। शिशिर को भी कंपनी की तरफ से कई पुरस्कार मिल चुके थे। कभी सर्वश्रेष्ठ बजट समरी पर, कभी सर्वश्रेष्ठ प्रोजेक्ट प्रेजेंटेशन पर , लेकिन कभी भी इनको लेकर घर में ज्यादा चर्चा नहीं होती थी। लेकिन उन पुरस्कारों का एक तंत्र होता था सिर्फ प्रमोशन और तनख्वाह में छलांग मारना। इसलिए बिनती ने भी महत्व नहीं दिया कि शिशिर क्या सोचता है?

                      कहानियां लिखते-लिखते अनायास कुछ शब्द, भावनाएं, घटनाएं विस्तार पाती गईं। कुछ महीनों बाद उन शब्दों ने एक उपन्यास का आकार ले लिया। शशि के कहने पर बिनती ने उपन्यास छपवाया। बस इसके आगे बिनती के दिमाग में नहीं आया। वह तो शशि थी जो मनोयोग से उसके लिए भागदौड़ करती रही। ऐसे ही एक दिन शशि ने बिनती को छेड़ दिया-सुंदर लोगों के मन और भावनाएं भी सुंदर हों ऐसा बहुत कम होता है। पुरस्कार के लिए उपन्यास का नामांकित हो जाना और फिर उसे साहित्य का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार मिल जाना बिनती को किसी चलचित्र की भांति लग रहा था। अखबारों में जब फोटो के साथ खबर छपी तो शिशिर ने कहा वाह! तुममें तो बड़े भेद भरे हैं। सारी दुनिया तुम्हें जान गई मैं ही नहीं जान पाया। मेरे पास कुछ फोन भी हैं आए  कि भई मिसेज वशिष्ठ तो काफी प्रेजेंटेबल हैं लगता है उनका उपन्यास भी उनकी तरह अच्छा होगा। हठात ! बिनती कुछ परेशान सी हो गई, लगा जैसे शिशिर के बोल में शहद का माधुर्य नहीं वरन नीम की कड़ुवाहट जैसा कुछ है। पर शिशिर जैसे कुछ भांप सा गया एकाएक संभलकर गंभीरता की चादर फेंक दी और कहा आपकी सक्सेस को जोरदार ढंग से सेलिब्रेट करेंगे। कंधे उचका कर बोला, आपके वो साहित्यिक फंक्शन तो बड़े आम होते हैं दो तीन झोला छाप लेखक आएंगे घंटों बोलेंगे और आपको एक स्मृति चिंह साथ में फूलों का एक गुलदस्ता जैसा कुछ देकर सम्मान कर दिया जाएगा। मैं देखना क्या ग्रेंड फंक्शन करूंगा। एक बड़े होटल में अपने एमडी को सपत्नीक बुलाकर उनसे तुम्हारा सम्मान करवाऊंगा लजीज डिनर दूंगा और तमाम अपने बिजनेस डेलीगेट्स को इनवाइट करूंगा। दूसरे दिन सुबह के अखबार अपनी ही खबरों से पटे होंगे।

बिनती ने कमजोर में आवाज में कहा लेकिन ये सब साहित्य के लिए मिले गए पुरस्कार के बदले में करना क्या ठीक लगेगा ? अरे, बस कह दी ने वही सो काॅल्ड लेखक वाली बात। इसे भुनाना चाहिए, फायदा उठाना चाहिए कब कौन काम आ जाए क्या पता। शिशिर के बोलने में सिर्फ फायदे का सौदा वाला दंभ था, कोई भावना नहीं, कोई आकार नहीं। बिनती भी प्रतिकार नहीं कर सकी।

सम्मान समारोह में ससम्मान श्री और श्रीमती वशिष्ठ को बुलाया गया था। किंतु समारोह वाले दिन शिशिर की जरूरी मीटिंग मुंबई के लिए निकल आई। सुबह सिर्फ बधाई, शुभकामना कहते हुए शिशिर ऑफिस चला गया वहीं से उसे निकलना था। समारोह में बिनती पर अनमस्यकता हावी रही। शशि ने टोका भी क्या बिनती चेहरे पर मुस्कुराहट की ताजगी लाओ, मीडिया वाले आएंगे, कल अखबारों में तुम्हारी फोटो ऐसे उदास और लटका चेहरा लिए छपेगी तो सोचो कितना बुरा लगेगा, ये अवसर बार-बार नहीं आते इसलिए सबकुछ भूल जाओ और नॉर्मल रहो। मंच पर शिशिर के बिना बैठना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। हां..सामने अपनी दोनों बेटियों को बैठा देख शिशिर की कमी कुछ समय के लिए भूल गई थी। लेकिन मंच पर अपनी प्रशंसा, उपन्यास की प्रशंसा के बीच वह शिशिर को बुनती रही। काश! शिशिर अपने कानों से बिनती की प्रशंसा सुनता । खैर, वीडियो कैसेट साथ देखकर संतोष कर लेंगे।

सम्मान समारोह में सहभोज की भी व्यवस्था थी। घर लौटते हुए काफी रात हो चुकी थी । अकादमी की ओर से उसे घर छोडऩे का प्रबंध किया गया था। गेट खोलते ही शिशिर की गाड़ी नजर आ गई। अरे, क्या शिशिर लौट आए। बड़ी मुश्किल से सोती हुई मुस्कान-पल्लवी को घर के अंदर ले गई। अंदर पांव धरते ही शिशिर के लौट आने को जान वह हुलस पड़ी थी। खुशी के मारे आत्मविभोर हो समारोह का आंखों देखा हाल सुनाने को बेताब हो उठी थी कि शिशिर ने मानो जलती चिता में उठाकर फेंक दिया।

‘देह को पुरस्कार’ शब्द बिनती के कानों में सांय-सायं कर रहे थे। कब निढाल हो वह सोफे पर सिर टिकाकर सो गई पता ही नहीं लगा। तंद्रा टूटी प्रभात अपनी सहस्त्र किरणों के साथ उदित हो रहा था। इधर-उधर सब बिखरा पड़ा था। बरामदे में सुबह के अखबार पड़े थे। स्थानीय पेजों पर कल के सम्मान की खबर को खूब विस्तार से प्रमुखता से छापा गया था। उसके कहे गए शब्दों को भी कोट कर जगह दी गई थी। मुख्य अतिथि ने उसकी प्रशंसा में जो कहा था उसे एक बाक्स बनाकर दिया था। उस खबर और उसमें छपी फोटो के देखकर कोई कह सकता था कि वाकई बिनती ने मुकाम की ओर एक कदम बढ़ाया है।

चीजें उठा ही रही थी कि फोन की घंटी बजी। हैलो..कौन भाभीजी, मैं कमल बोल रहा हूं। आपको बहुत..बहुत बधाई । कल मैंने और शिशिर ने साथ बैठकर आपका समारोह देखा। मुंबई की मीटिंग अगले महीने होगी। काफी देर हो चुकी थी इसलिए शिशिर और मैं आपके वहां आने की बजाए घर आ गए। हमने साथ में डिनर किया। आप बहुत-बहुत अच्छी लग रही थीं, कल ही यह बात मैंने शिशिर से कही थी कि यू आर वेरी लकी। भाभीजी इज सो इंप्रेसिव। अच्छा भाभीजी..अब जल्दी से पार्टी का इंतजाम कर लीजिए। और हां....उसमें अपने नए उपन्यास के बारे में भी जरूर बताइगा कि वो कब तक छपकर आएगा। जरूर..जरूर बिनती ने उदास स्वरों में कहा। फोन रखा ही था कि फिर घंटी बजी, किसी सामाजिक संस्था का था, आप बिनती जी बोल रही हैं, मैं फलां..संस्था से बोल रहा हूं.. पहले तो आपको बहुत - बहुत बधाई। हम आपका सम्मान करना चाहते हैं कि एक गृहिणी होते हुए भी आपने एक उदाहरण पेश कर दिया आप ऐसी महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं, तो बताइए आप कब समय निकालेंगी। बिनती के तो कानों में जैसे ये शब्द दूर से आते लग रहे थे, संभलकर बोली जी..अभी एकदम नहीं बता सकती आप अगले हफ्ते फोन करिएगा।

हां..हां..जब आप चाहें। कहकर बिनती ने फोन रख दिया। कुछ पल शून्य में ताकती रही। फिर बुकों को उठाकर डस्टबिन में फेंक दिया। स्मृति चिंह उठाकर अपनी अलमारी में बंद कर दिया। अखबारों को यों ही लापरवाही से सोफे के एक ओर पटक दिया फिर सोचा आज के इन अखबारों को स्टोर रूम में पटक देती हूं, शिशिर का माथा इन्हें देखकर फिर ठनकेगा छुट्टी का पूरा दिन बरबाद हो जाएगा। और सचमुच अखबारों को रद्दी के ढेर के नीचे दबा आई।

घड़ी में देखा आठ बज रहे थे। वो तो अच्छा है कि आज रविवार है नहीं तो आज बच्चों और शिशिर के स्कूल-ऑफिस की छुट्टी करना पड़ती। शिशिर के लिए बेड टी बनाने के लिए भगौने में पानी गैस पर चढ़ाया। खौलते पानी के साथ धीरे-धीरे विचार भी खौलने लगे। जो लिखा पूरी सच्चाई और शिद्दत से लिखा, मेरे शब्द किसी का नैतिक संबल भी बने, किसी को पल-दो पल की खुशी भी मिली, खुद मुझे भी तो वो खुशी आत्मविभोर कर गई। तो क्या मैं इतनी स्वार्थी हो गई या इतनी कमजोर हो गई कि औरों को बर्दाश्त करने की, गलत बात का विरोध करने की सीख देने वाली खुद दोहरे पात्र को अपना रही हूं। नही..मैं लिखना जारी रखूंगी। मेरा सच पारदर्शी है, अब तो मुझे और दृढ़ता से लिखना है। बिनती ने कमरे में वापस आकर स्मृति चिंह को अलमारी से निकालकर टीवी के ऊपर सजा दिया। डस्टबिन से बुके उठाकर उनमें ताजा पानी डालकर एक कोने में सजा दिए। रद्दी के ढेर से अखबार करीने से टेबल पर सजा दिए।

चेहरे में दोहरी आभा लिए वो शिशिर के लिए जब चाय लेकर पहुंची तो शिशिर पलंग पर बैठे गहरी सोच में डूबे थे। बिनती के हाथ से चाय की ट्रे एक ओर रख उसके दोनों हाथ पकड़ कर शिशिर बोले बिनती..प्लीज , आय एम सॉरी..कल रात जो मैंने कहा मुझे नहीं कहना था। मुझे तुम पर गर्व होना चाहिए, पता नहीं क्या हो गया था कल मुझे। मेरे अलावा कोई और तुम्हारी प्रशंसा करे, मुझे अच्छा नहीं लगा था। लेकिन मैं भूल गया था कि बाहर तुम्हारा वजूद तुमसे है तुम्हारी रचनात्मकता से है, इसमें तो मुझे बीच में आना ही नहीं चाहिए। तुम कल से नहीं, बल्कि आज से ही एक नए उपन्यास को लिखना शुरू कर देना। अब तुम्हारी जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ गई है पाठकों के लिए मेरे लिए तुम बहुत सम्मानीय हो गई हो। मैं बहुत खुशकिस्मत हूं तुम्हारा तन मन दोनों बहुत अच्छे हैं। अब तुम्हें पूरा ध्यान अपने लेखन पर देना है। वो एकटक शिशिर के चेहरा देख रही थी और टटोलने की कोशिश कर रही थी कि इन शब्दों में व्यंग या ईर्ष्या की कितनी भावना है । शिशिर ने कहा...मुझ पर विश्वास नहीं हो रहा ..दिल से कह रहा हूं मेरी हमसफर.. मुझे माफ कर दो। बिनती  के तो चेहरे पर जैसे सौ फूलों की मुस्कान खिल गई। शिशिर ने कहा पुरस्कार की खुशी में मेरी ओर से आज रात को होटल  में ग्रैंड पार्टी..कमल और शशि को भी इनवाइट कर लेना, लेकिन अगली बार जब तुम्हें पुरस्कार मिलेगा तो उस पार्टी में सिर्फ मैं और तुम होंगे। बिनती ने बड़े प्यार से कहा...मैं एक बार और चाय बनाकर लाती हूं।

 

मेरे बारे में ...

मैं आठ सालों से लेखन से जुड़ी हूं। कहानी  लिखना मेरा सबसे पसंदीदा शौक है। आसपास जो कछ घटता है उसका तानाबाना शब्दों में ढाल देती हूं। मेरे पात्र काल्पनिक नहीं सजीव होते हैं और बहुत ही निकट होते हैं।कहानी के अलावा कविता लिखने का भी शौक है। एक कहानी संग्रह प्रकाशन के लिए तैयार है।

 

 

seemavergees@gmail.com

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