... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

अरुणा ताई

 

अरुणा ताई, यह नाम आज शहर में किसी परिचय का मोहताज नहीं था। वह आज इतनी बड़ी राजनैतिक दल की फायरब्रांड लीडर कहलाती थी। वैसे उन्हे फायरमाऊथ कहना ज़्यादा उचित लगता। ज़ाहिर है उनकी ज़बान आग उगलती थी। और यही आग बढ़कर लोगों के दिलों में पहुंचती। और लोग इससे चार्ज हो जाते। नौजवान इनसे खास प्रभावित रहा करते। लेकिन सुना है न, घर की मुर्गी दाल बराबर। उनकी अपनी बेटी की नज़र में वे एक मां, एक पुराने खयालो वाली स्त्री या हरदम टोका टाकी करने वाली मां से अधिक कुछ न थी। अरुणा ताई बस आह भरकर कहती, “चिराग तले अंधेरा”।

अरुणा ताई, दुनिया की नज़र में हमेशा एक बोल्ड और स्ट्रॉन्ग लेडि रही है। लोग उनका सम्मान करते हैं। कम उम्र में विधवा होने के बाद, अपनी बेटी के लिये सिंगल पैरेंट की भूमिका उन्होने बहुत अच्छी तरह निभाई। वह स्वाभिमानी औरत थीं। पढ़ी लिखी और स्वाभिमानी। उन्होने कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। न मायके वालों के आगे न ससुराल वालों के आगे। वैसे भी शादी के बाद ससुराल वालों से उनकी कभी नहीं पटी और मायके वालों से भी उन्हें कोई लगाव न रहा था। वे स्कूल में बच्चों को पढ़ाती और घर में ट्यूशन लेतीं। मां बेटी के गुज़ारे के लिये यह बहुत था।

लेकिन गुज़रते वक्त के साथ-साथ एक सेल्फडिपेंड लेडी होने के अहसास पर एक बेटी की माँ होने का अहसास हावी होता जाता था और उस पर भी सिंगल पैरेंट होने का अहसास। बेटी रिद्धिमा जैसे जैसे बड़ी होती जा रही थी, उसमे अपना ही अक्स नज़र आता। रिद्धिमा न सिर्फ चेहरे मोहरे से बल्कि स्वभाव, चाल ढाल, बोलचाल और आवाज़ में भी माँ की कॉपी नज़र आती। उन्हे लगता जैसे इतिहास फिर अपने आप को दुहरा रहा है। क्या उनका अतीत फिर एक बार रिद्धिमा के रूप में उनके सामने आ रहा है?

जैसे जैसे बेटी बड़ी होती जाती, उनकी चिंताओं का आकार भी बड़ा होता जाता। क्या होगा अगर उसने...

कहते हैं, अरुणा ताई अपनी शादी से खुश नहीं थी। उनके माता पिता ने उनका विवाह ज़बर्दस्ती अपने पसंद के लडके से करवा दिया था। और तो यह भी सुना गया है कि वे प्यार में धोखा खा चुकी हैं। अतः उनके पास अपने माता-पिता की बात मानने के सिवाय कोई और चारा न रहा था। इसके बावजूद उन्होने अपने पति और अपने ससुराल से पूरी सामर्थ्य के साथ रिश्ता निभाया। हां अपने मायके से वे सारी ज़िंदगी नाराज़ रहीं। और विधवा होने के बाद तो उन्होने न ससुराल का सहारा लिया और न मायके का।

लेकिन जैसे जैसे बेटी बड़ी होती जाती, वे एक टिपिकल मां की तरह परेशान रहतीं। अब उन्हे रिश्तों की कमी बहुत खलती। वे अक्सर चिंतित रहती कि अगर किसी दिन मैं न रही तो, रिद्धिमा का क्या होगा? यही सोच-सोच कर अब उन्होने अपने ससुराल और मायके के रिश्तों को पुनर्जीवित करना शुरू कर दिया। लेकिन सारी ज़िंदगी मां के सहारे गुज़ारने के बाद रिद्धिमा को अब बाकी दूसरे रिश्ते बोझ लगते।

हां, अब उसकी उम्र अपने दम पर नये रिश्ते बनाने की थी। और ठीक यही बात अरुणा ताई को चिंतित करती। वह रिश्ते चुनने में गल्ती न कर दे। दोस्त यार तो फिर भी ठीक है; क्या होगा अगर जात बिरादरी के बाहर...

और इसके आगे वे सोंच ही नहीं पातीं? इसी चिंता नें उन्हे एक आज़ाद खयाल और वैश्विक सहअस्तित्व के समर्थक अरुणा से कब दूसरी जाति और धर्मों के प्रति भयभीत मां बना दिया, उन्हे खुद पता नहीं चला। और इसी चिंता ने उन्हे कब सार्वजनिक मंचों पर अपने इन्हीं विचारों की उद्घोषक बना दिया और कब राजनीति ने उनकी उभरती हुई छवि को भुनाना शुरू कर दिया, कब उनके विचारों में धार पैदा की और उस वैचारिक तीक्षणता का लाभ लेना शुरू किया; उन्हे पता ही न चला। यानि अपनी पुत्रि की चिंता ने कब उन्हे आग फायरब्रांड नेत्री बना दिया, कब सीधी सादी स्कूल टीचर, अरुणा मैम से अरुणा ताई हो गई; उन्हें पता ही न चला।

लेकिन दुनियाँ का कोई भी नाम, कोई भी पद कोई भी सम्मान उन्हें रिद्धिमा की माँ से बड़ा कभी न लगा। आज भी वे अपनी बेटी की माँ होना कभी नहीं भूल पातीं। वे एक टिपिकल माँ थीं। वे लगातार अपनी बेटी के फ्रेंड सर्किल पर निगाह रखती और पूछ ताछ करती रहती। यूं तो रिद्धिमा और उसके सभी दोस्त पढ़ाई में टॉपर रहे हैं। फिर भी एक लड़का अरुणा ताई की नज़र में खास तौर पर खटकता रहता। इमरान का अपना नाम ही काफी था अरुणा ताई की नज़र में खटकने के लिये। इमरान यानि मुस्लिम। और अरुणा ताई जानती थी कि देश की सभी समस्याओं का कारण ये लोग ही हैं। इसी लिये वे रिद्धिमा को हमेशा इमरान से दूर रहने की हिदायत देतीं और रिद्धिमा हमेशा चिढ़कर कहती “शट-अप मॉम! ऐसा कुछ नहीं है।“

“और यह मां को शट-अप कहना किसने सिखाया? उसी ने न?”

“क्या कह रही हो मॉम वो ऐसा बिल्कुल नहीं है। एक तो वह ज़्यादा बात नहीं करता। और करता भी है तो बहुत ही सम्हल सम्हल कर। वो मेरी तरह इतना बोल्ड भी नहीं है और न इतना फ्रेंक।“ रिद्धिमा कहती।

“जब वह तेरे जैसा नहीं है तो तू उससे दोस्ती क्यों रखती है?” अरुणा ताई कहती।

“बिकाज़ मॉम ही इस सेंसिबल पर्सन। वह कभी ओवर स्मार्ट नहीं बनता। सिर्फ पढ़ाई से ही मतलब रखता है, और अपने काम से काम। वह क्लास में टॉप पर रहता है और पढ़ाई में किसी की भी मदद करने तैयार रहता है।”

यह बात अरुणा ताई को बहुत ही खटकती। अभी तो ये लोग फर्स्ट ईयर में ही हैं। इसके साथ और तीन साल गुज़ारेगी ... ? कहीं ....?

जो भी हो, अपनी बेटी का एक मुसलमान की संगत में रहना अरुणा ताई को बिल्कुल गवारा नहीं था। क्या पता कब किस मुसीबत में फसा दे। इन लोगों का कोई भरोसा नहीं। क्या पता मेरी बेटी कहीं उससे... और यह डर किसी भी मां के लिये असह्य हो जाता। ‘...लोग क्या कहेंगे?’ वह यह सोच सोच कर परेशान रहती, ‘मां तो इनके खिलाफ आग उगलती है। इन्हे देश से बाहर करने की बात करती है और खुद अपनी बेटी को सम्भाल नहीं सकती।‘ इस बात पर मां बेटी की अक्सर कहासुनी हो जाती।

“मॉम मेरी लाईफ आपकी राजनीति नहीं है। आप अपने रजनैतिक दृष्टिकोण से मेरी लाईफ को मत देखो।”

2.

अब अरुणा ताई रिश्तेदारों में अपनी लड़की के लिये सुयोग्य वर की तलाश के लिये विनती करती जो रिद्धिमा को अच्छा नहीं लगता। अरुणा ताई जानती है, रिद्धिमा की इमरान से दोस्ती पहले से बहुत अधिक बढ़ चुकी है। रिद्धिमा आज भी किसी प्यार व्यार की बात को स्वीकार नहीं करती, लेकिन अरुणा ताई जानती है इसी तरह की फ्रेंडशिप कब प्यार में बदल जाती है पता ही नहीं चलता।

फाईनल ईयर तक आते आते रिद्धिमा, स्टडी के अलावा अन्य बातों में भी इमरान से सलाह लेने लगी थी। घर आने के बाद भी वह उसे काल करती या व्हाट्सएप पर चैट करती रहती। यह तो ज़्यादा हो रहा है; अरुणा ताई सोचती।

“मॉम आप लोगों को और कुछ नज़र नहीं आता क्या?” टोकने पर रिद्धिमा कहती।

या कभी यह कहती, “मॉम, आप लोगों के दिमाग में न, गंदगी भरी है। आप लोग हर बात को गलत नज़रिये से ही देखते हैं।”

अरुणा ताई लाचार हो जाती। लेकिन ज़िंदगी के अनुभव उन्हे निश्चिंत नहीं होने देते। उन्होने अपने साथी शिक्षकों से अपनी शंका ज़ाहिर की लेकिन सब ने यही कहा, “रिद्धिमा बहुत होशियार लड़की है, कभी ऐसा काम नहीं करेगी जिससे आप को ठेस पहुंचे। फिर वह आपकी बेटी है..."

और यही, यही तो वह बात है जिससे अरुणा ताई को सचमुच चिंता होती है। वह मेरी बेटी है...। वह मेरे जैसी है। बिल्कुल मेरी कॉपी। मेरी ही तरह विद्रोही। मेरी ही तरह तेवर। कहीं किस्मत भी मेरी ही तरह....

अरुणा ताई, एक बोल्ड और स्ट्रॉन्ग लेडी, जिसने कभी किसी की मदद नहीं स्वीकारी। हमेशा अपनी शर्तों पे जीती रही, आज अपनी ही बेटी के सामने लाचार है। लचारी तो उनके चेहरे से ही नज़र आने लगी थी। हां, पार्टी मीटिंग और पार्टी के कार्यक्रम के दौरान वे और ज़्यादा फायरब्रांड हो चली थी। पार्टी के सहयोगी भी बदलाव को स्पष्टतः पहचानने लगे थे।

3.

उस दिन रिद्धिमा कॉलेज से जल्दी आ गई। ज़ाहिर है, लेक्चर्स छोड़ आई है। अरुणा ताई ने उसे प्रश्न्वाचक दृष्टि से देखा और देखते ही समझ गई यह आज आग उगलना चाहती है। फायरब्रांड... हाँ, आखिर मुझ पर जो गई है। काश... यह मुझ जैसी न होती। मुझे भी इसकी इतनी चिंता न होती। अरुणा ताई की चिंता का सबसे बड़ा कारण तो यही था कि उनकी बेटी बिल्कुल उन जैसी ही है। वे जब भी बेटी में अपना प्रतिबिम्ब देखती खुश होने की बजाय चिंतित हो जाती।

“नहीं, मैं नहीं चाहती कि वो मेरी जैसी बने। वही सब झेले जो मैंने अपने जीवन में झेला है। हे ईश्वर, दया कर। मैं नहीं चाहती कि मेरी कहानी फिर दोहराई जाय।" वह मन ही मन प्रार्थना करती। और आज भी अरुणा ताई ने मन ही मन वही प्रार्थना दुहराई।

लेकिन इससे पहले कि वह अपनी बेटी से कुछ पूछती बेटी जैसे फट ही पड़ी।

"हो गई खुशी? मिल गई तसल्ली? कर दिया न मुझे सारे कॉलेज में बदनाम?..." वह चीखने लगी।

"हुआ क्या है?" अरुणा ताई ने पूछा।

"हुआ क्या है? इतनी भोली हो आप कि आप को कुछ पता ही नहीं। पता है आप की इस हरकत से मैं कितनी हर्ट हुई हूँ? पूरे कॉलेज में मेरी बदनामी हो गई।"

"बदनामी? ऐसा क्या कर दिया तूने...?" अरुणा ताई चीख उठी। 'बदनामी' इस एक शब्द ने उन्हे अंदर तक हिला कर रख दिया।

"मैंने नहीं आपने। आपने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा मॉम।" कहकर रिद्धिमा रोने लगी।

अब अरुणा ताई को लगा उनका कलेजा छलनी होने लगा है।

"मैने ऐसा किया क्या है?" वे बोलीं और बरबस उनकी आंखें भीग गईं।

वह आंखें रिद्धिमा ने नहीं देखी। वह बरसती रही अपनी मां पर, "मैंने आप से कहा था न मॉम अपनी पॉलीटिक्स को मेरी लाईफ से दूर रखें।"

"लेकिन बेटा मैंने कुछ किया ही नहीं...." अरुणा ताई का बाकी जवाब मुंह में ही रह गया; क्योंकि रिद्धिमा ने कुछ सुना ही नहीं। वह लगातार बोलती रही।

"मैंने कहा था न मॉम कि हमारा ऐसा कोई रिलेशन नहीं है। हम सिर्फ अच्छे दोस्त हैं। आप लोग क्या सोचते हैं; हमारे पास लव शव के सिवा और कोई काम नहीं? हम आज की जनरेशन है मॉम हमारे लिये हमारा कैरियर सबसे इम्पोर्टेंट है। और हम अच्छी तरह जानते हैं कि इस चक्कर में पड़े तो हमारा कैरियर खराब हो जायेगा। और अब आखरी सेम में आकर....।"

वह थोड़ी सी देर के लिये चुप हो गई। शायद वह अपनी उमड़ती घुमड़ती भावनाओं को वश में करने की कोशिश करती रही। लेकिन अरुणा ताई को यह अंतराल बहुत लम्बा लग रहा था।

“क्या हुआ आखरी सेम में आकर...?” वह अरुणा ताई ने व्यग्रता से पूछा।

“उन लोगों ने उसे इतना मारा मॉम, इतना मारा,” वह सिसकियां लेते हुये बोली, “बेचारा वह हॉस्पिटल में अपनी टूटी हड्डियां गिन रहा है।”

“कौन? कौन हड्डियां गिन रहा है?” अरुणा ताई व्यग्रता से पूछा। यह बात और है कि, ‘कौन’ का जवाब अरुणा ताई अच्छी तरह जानती है, लेकिन बेटी के सामने अनजान बने रहने में ही भलाई है। और माँ का यह दांव रिद्धिमा भी समझ रही थी। और यह बात उसे मॉम के प्रति और निराशा से भर रही थी।

“कॉलेज के इतने सालों में उसने मेरे लिये क्या कुछ नहीं किया और मैंने उसे क्या दिया? टूटी हड्डियां और हॉस्पिटल के बिल?” वह अभी तक रोये जा रही थी।

“लेकिन तुम खुद को दोष क्यों दे रही हो? तुमने तो कुछ नहीं किया।“

“लेकिन आपने तो किया है न?”

“क्या बक रही है? शर्म नहीं आती अपनी मां पर इल्ज़ाम लगाते?”

“यह इल्ज़ाम मैं नहीं सारा कॉलेज लगा रहा है। मॉम आपको क्या ज़रूरत थी...?”

“तू मुझे क्या कोई गैंगस्टर समझ रही है?”

“गैंगस्टर होने की ज़रूरत ही क्या है आप लोगों को? बस लव जिहाद, लव जिहाद का मंत्र पढने की देर है: बहुत से ज़ॉम्बी जो पाल रखे हैं वे अपने आप जाग जाते हैं। आप लोगों को सामने आने की भी ज़रूरत नहीं। लेकिन मॉम, ये पब्लिक पागल नहीं है। लोग सब कुछ समझते हैं।”

अरुणा ताई को कुछ सूझ ही नहीं रहा था वह क्या जवाब दे। लेकिन रिद्धिमा बिल्कुल शांत नहीं रह पा रही थी।

“आप ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा मॉम!” कहते हुये रिद्धिमा अपने बेडरूम में जा कर बिस्तर पर औंधे मुन्ह गिर पड़ी। किम्कर्तव्य विमूढ़ सी बनी अरुणा ताई उसके थरथराते कंधे देखती रही। अंततः वे रिद्धिमा के सिर पर हाथ फेरते हुये इतना ही कह सकीं, “अपनी मॉम का विश्वास करो। मैंने न कभी ऐसा कोई काम किया है और न करूंगी जिसके कारण मेरी बेटी को शर्मिंदा होना पड़े।“

इसके बाद रिद्धिमा की सिसकियां और बढ़ गईं।

4.

समय जैसे नदी की एक तेज़ धार हो...। कौन बांध सका है उसे? न अरुणा ताई, न रिद्धिमा और न ही इमरान। वे सब तो समय के हाथों की कठपुतलियां हैं। ऐसा नहीं होता तो, शायद यह कहानी ही न बनती। किंतु ऐसा हुआ। समय बदला और बदल गया इन किरदारों का भी जीने का ढंग बदल गया। धीरे-धीरे अरुणा ताई अपनी पुत्री की ओर से आश्वस्त होती गई। उनके भाषणों और उद्बोधनो में आग कम होती गई। आग कम होती गई तो उनके फालोअर्स में भी उनकी स्वीकार्यता घटती गई। सच तो यह है कि अरुणा ताई को भी अरुणा ताई की बजाय, मॉम, आंटी, और रिद्धिमा की मॉम जैसे सम्बोधन आकर्षित करने लगे। वे तो एकांत में बैठे बैठे अपने लिये ‘नानी’ या ‘ग्रैंड्मॉम’ जैसे संबोधनों की कल्पना करके रोमांचित होने लगी थीं।

अब उनकी दिनचर्या अधिकतर स्कूल और घर के दायरे में सिमटती जा रही थी। पार्टी की मीटिंग्स और कार्यक्रमों में लोग अक्सर उन्हें भूल जाते और सच तो यह है कि अक्सर वे ही इन अवसरों को भूल जातीं। क्योंकि आग उगलने वाले जीव अक्सर देर सबेर यह महसूस करने लगते हैं कि उनकी आग उगलने की क्षमता ने भले कहीं आग लगाई हो या न हो लेकिन आग उगलने वाला स्वयं अपनी आग से अपना मुख झुलसा लेता है। यह झुलसना भले किसी को दिखाई दे या न दे। लेकिन वह अपना अंतरमन और अपनी आत्मा तक को झुलसा लेता है तभी तो ग्रंथों ने और सभी धर्मों ने जलन या दहन को नर्क से सम्बद्ध किया है। अग्नि कितनी भी पवित्र क्यों न हो यह भस्म कर देती है। और फिर किसी राजनैतिक दल या दुनियाँ को भी आपकी आत्मा के कष्ट से क्या लेना देना? आप के अंदर जब तक आग है तब तक आप फायरब्रांड हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो जब तक आप उपयोगी हैं, सिर आँखों पर...। जब आप अनुपयोगी हो गये तो आपका परिवार ही रह जाता है आपका बोझ ढोने के लिये। इन्ही सब विचारों के चलते उनका जीवन सिमटने लगा था।

वे यही चाहती थीं कि स्कूल से रिटायरमेंट से पहले, बल्कि जल्द से जल्द रिद्धिमा की शादी हो जाये और वे अपनी बेटी की ख़ुशियाँ अपनी आँखों से देख लें और एक चिंतामुक्त रिटायर लाईफ का आनंद ले सकें।

किंतु बेटी रिद्धिमा घर से मीलों दूर अहमदाबाद में अपनी नई नई जॉब को इंजॉय कर रही थी। लाईफ टफ ज़रूर हो गई थी। टफ और बिज़ी इसी लिये शायद आसान लगने लगी थी। अब रिद्धिमा की ज़िंदगी यूं गुज़रने लगी थी जैसे मुट्ठी में से रेत। सारा सारा दिन जॉब को और खाली समय भी मन मस्तिष्क पर जॉब ही हावी रहता। किसी और बात के लिये सोचने का तो समय ही कहाँ होता। हां कभी कभार जब मस्तिष्क जॉब से स्वतंत्र हो और यह आम तौर पर नींद से कुछ पहले ही सम्भव हो पाता; वह अपनी भावी जीवन के बारे में सोचती ज़रूर किंतु इन विचारों से इतनी जल्दी थक जाती कि तुरंत ही नींद की आगोश में समा जाती।

ओह बेचारी बच्ची! कोई सोशल लाईफ ही नहीं रही। लेकिन ऐसा नहीं है... सोशल लाईफ के लिये मोबाईल है न। वह हर शाम नियमित रूप से मॉम को फोन करती। कॉलेज के फ्रेंड्स भी भले अब कम रह गये हों, लेकिन इसी तरह टच में ज़रूर रहते। हां इनमे इमरान ज़रूर है। और वह टॉप पर ही है। वह ज़रूर आजकल बनारस में है; अपनी जॉब में बिज़ी है लेकिन टच में है। जब दोनो फुर्सत में हो, दिन में एकाध बार बात हो ही जाती है। वर्ना व्हाट्सएप पर चैट का ऑप्शन तो है न। वह अब भी वैसा ही है। वैसा ही केयरिंग। रिद्धिमा की केयर करना शायद अब उसकी आदत में शामिल हो चुका है। वह अब भी इतनी दूर बैठे बैठे रिद्धिमा की हर प्रॉब्लम का सॉल्युशन ढूंढ लाता है फिर प्रॉब्लम चाहे लाईफ की हो या जॉब की। और अपनी हर प्रॉब्लम में उसे घसीट लाना शायद रिद्धिमा की आदत में शामिल हो गया है। वह जब भी अपने घर जाता है तो रिद्धिमा के निर्देशानुसार दिन में एक बार रिद्धिमा की मॉम से मिलकर, मीटिंग की सारी रिपोर्ट रिद्धिमा को ज़रूर करता है।

रिद्धिमा की मॉम को भी अब वह उतना बुरा नहीं लगता। 'अच्छा लड़का है बेचारा। कितना केयरिंग है?' वे सोचती और कई बार उनके मन में यह खयाल भी उभरता कि काश वह उनका बेटा होता। और तब एक बेटे का अभाव मन की गहराई में एक टीस की तरह उभरता। फिर वह सोचती कि रिद्धिमा जैसी बेटी के होते बेटे की क्या ज़रूरत है। फिर भी दिल है के मनता नहीं...|

लेकिन इस सब के बावजूद कोई बात है जो इमरान को देखते ही उनके मन में खटकती है। एक अनजाना सा भय उभर आता। यह लड़की इस पर इतनी क्यों डिपेंड होती जा रही है? कहीं....? और तब उन्हे अपनी आग उगलने वाली हर बात बिकुल सही जान पड़ती।

5.

बिना किसी पूर्व सूचना के रिद्धिमा को घर आया देख अरुणा ताई का मन यकायक आशंकाओं से घिर उठा था।

"क्या हुआ? तू कैसे आ गई?" वे घबरा कर पूछ बैठी।

"क्यों क्या मैं अपने घर नहीं आ सकती? या यह मेरा घर नहीं है?" रिद्धिमा ने अपना ट्रॉली बैग फेंकते हुये चिढ़ कर कहा।

अरुणा ताई के अंदर बैठी मां हड़बड़ा कर जाग उठी। आज कल तो इस अंदाज़ में नहीं दिखती रिद्धिमा। ज़रूर कोई बात है।

"ऐसा नहीं है बेटा, यूं अचानक..."

"देख रही हूं आजकल किसी को मेरी ज़रूरत नहीं रह गई... आप को भी नहीं..." वह रोने लगी। अरुणा ताई का दिल बैठने लगा।

"हुआ क्या है?..." और इस सवाल के साथ ही हजारों सम्भावित जवाब अरुणा ताई को डराने लगे। "जॉब में कोई प्रॉब्लम आई है क्या? जॉब ठीक तो चल रही है न? कहीं जॉब तो नहीं..."

"ओफ हो मॉम जॉब में क्या होगा? जॉब का प्रॉब्लम नहीं है।" वह चिढ़ कर बोली।

"फिर क्या बात है? तू इतनी उखड़ी हुई क्यों है?"

"उखड़ूंगी नहीं? घर आई बेटी से न प्यार न खुशी? बस पुलिस की तरह पूछ ताछ?" रिद्धिमा ने कहा और गले लग कर रोने लगी।

"बात क्या है बेटी बता! मेरा दिल बैठा जा रहा है?" मां ने भयभीत स्वर में कहा और बेटी ने तसल्ली देते हुये कहा-

"बात कुछ नहीं है मॉम, बस आप की याद आ रही थी।"

मॉम चुप हो गई। लेकिन मॉम को तसल्ली नहीं हुई थी। 'ज़रूर कोई बात है। यह मुझसे कुछ छिपा रही है। वर्ना यह रिद्धिमा का स्वभाव नहीं है।'

क्या ऐसा हुआ होगा?... क्या वैसा हुआ होगा?... और बहुत सी सम्भावनायें उन्हे डराने लगी। दिल बैठने लगा।

6.

“आखिर बात क्या है?” अरुणा ताई ने रिद्धिमा के बालों में हाथ फेरते हुये पूछा।

रात का खाने के बाद, बेडरूम में रिद्धिमा पलंग पर अपनी मॉम की गोद में सिर रखे बहुत आराम महसूस कर रही थी। शायद यही चीज़ थी जिसे वह मिस कर रही थी। उसे अपना जॉब और जॉब से जुड़ी सारी व्यसतता पसंद थी। यह व्यस्तता जीवन को आसान बना देती है। जीवन के कष्ट सहन करने की क्षमता प्रदान करती है। फिर भी जीवन में कोई कमी खलती रहती है। वह कमी क्या है? कई बार उसे लगा कि वह कमी है एक जीवनसाथी का साथ। इस बारे में उसने कई बार सोचा भी लेकिन आज इस तरह मॉम की गोद में सिर रखे उसे लगने लगा कि शायद यही वह कमी थी।

बेडरूम का टीवी ऑन था। उसका मनपसंद प्रोग्राम ऑन स्क्रीन था; लेकिन उसकी आंखें बंद थीं। इस समय उसका मन भरा हुआ था। मैं इतने दिन इस सुख से अंजान कैसे रही। मैं अपनी ज़िंदगी में, अपने बनाये दायरे में जो कुछ खोजती रही वह मेरे इतने पास था। यहीं अपने ही घर में। बस एक दायरा तोड़ने की ज़रूरत तो थी। मॉम ने इस दायरे को तोड़ने की बार-बार कोशिश की लेकिन वह मैं ही थी जिसने बार-बार उसे हतोत्साहित किया। लेकिन आज जब उसने मॉम की गोद में सर रखा तो लगा यह जनरेशन गैप वैप जैसी कोई चीज़ नहीं होती। यकायक उसे मॉम में वह फ्रेंड नज़र आई जो उसे ठीक से समझ सकती है। उसने फैसला किया कि आज वह मॉम के सामने अपना दिल खोलकर रख देगी।

“आखिर बात क्या है बेटा?” मॉम ने पूछा, “मैं जानती हूँ, सब कुछ नॉर्मल नहीं है।“

“मॉम, क्या लाईफ में सब कुछ नॉर्मल ही होना चाहिये? क्या यही हमारा ऐम होना चाहिये?”

“हां बेटा, एक नॉर्मल लाईफ। यही तो हम सबका उद्देश्य होता है।”

“और यह क्या होती है, सो कॉल नॉर्मल लाईफ?”

“बेटी इसका जवाब इतना आसान नहीं है। इसकी डेफिनेशन सब के लिये अलग अलग होती है।”

“और क्या इसे अचीव किया जा सकता है जिसे आप नॉर्मल लाईफ कहतीं हैं? क्या आपने पाई है नॉर्मल लाईफ?”

अचानक मॉम उदास हो गई। वह जैसे कहीं खो गई थी। रिद्धिमा ने उनकी दुखती रग को छेड़ दिया है। शायद अनजाने में ही। क्षण भर में जीवन की कितनी घटनायें उसके मस्तिष्क को मथकर गुज़र गईं। कोई बात, कोई जवाब उसे नहीं सूझा। यकायक रिद्धिमा को लगा उसने मॉम का दिल दुखा दिया है। कितनी ही मुश्किल से तो आज यह दिन आया था कि मां बेटी, एक दूसरे को समझने का प्रयास कर रहे थे।

“सॉरी मॉम, मैं आप को हर्ट नहीं करना चाहती थी; लेकिन....”

“नहीं बेटा! तुमने मुझे हर्ट नहीं किया बल्कि मैं तो खुश हूं कि तुमने मेरे बारे में सोचा। मेरे दर्द को महसूस किया। कितने समय से तो मैं भूल ही गई थी कि हमदर्दी क्या होती है। कितने लम्बे अंतराल के बाद किसी ने मेरे दिल को छुआ है और वह हो तुम। मेरी बेटी... मेरी अपनी बेटी... आज इशारे में ही सही, डर डर के ही सही मेरे दर्द को पहचानने की कोशिश कर रही है। इससे बढ़कर एक मां के लिये और क्या हो सकता है?”

मॉम की आंखें अब बरसी के अब बरसी। वह अपने आप को संयत रखने का भरसक प्रयत्न करने लगी। रिद्धिमा ने उठकर उसे गले लगा लिया। अरुणा ताई सो कॉल्ड फायरब्रांड लीडर, बोल्ड ऐंड स्ट्रॉन्ग लेडी पल भर में पिघलकर कहीं गायब हो चुकी थी। यहां थी एक मां। एक मां जिसकी बेटी, बचपन से जवानी के सफर में कहीं खो गई बेटी आज अचानक उसे वापस मिल गई है। आज उसके आँसुओं ने सारे बांध तोड़ कर बहने का इरादा कर लिया है। बेटी भी जैसे आँसुओं के इस सैलाब में डूब जाना चाहती है। लेकिन नहीं आज अगर वह भी रोने लगी तो मॉम को कौन सम्हालेगा...

“मैं कितने बरसों से इस दिन का इंतेज़ार कर रही थी...” उस स्ट्रॉन्ग लेडी ने अपनी बेटी के गले से लगे लगे कहा और बच्चों की तरह बिलख बिलख कर रोने लगी। रिद्धिमा से आंसू सम्हाले नहीं गये और वह भी रोने लगी। दोनो के हृदय जैसे एक हो गये थे। दोनो एक दूसरे की भावनाओं के सैलाब में गोते खाते रोते रहे। रोते रोते जाने कब सो गये। बातें अधूरी रह गईं। खुली खिड़की से रात ने आकर उन्हे सहलाया। उनके ऊपर सुकून की चादर डाल दी। हौले हौले बहती नर्म मुलायम हवाओं ने उनके लम्बे मुलायम बलों को प्यार से संवारा और रात भर उन्हे लोरियाँ सुनाती रही। मानो प्रकृति खुद आज उनकी पुरसुकून गहरी नींद की ग्यारंटी चाहती है।

7.

उस सुबह जब मां बेटी एक साथ नींद की आगोश से बाहर आये, वह एक खुशनुमा सुबह थी। आम सुबहों से अलग। यह दुनियाँ ही शायद नई-नई थी। गर्मी के तपते हुये दिन की सुबह, हलकी हलकी नर्म ओ नाज़ुक बयार किसी कमनीय, सुरबाला की तरह इठलाती बलखाती खुली खिड़की से कमरे में घुसकर सरसराती गुज़र जाती है। यह कैसी जादू भरी सुबह है। पहले तो कभी ऐसी जादू भरी सुबह नहीं आई। लेकिन वे दोनो भी तो पहले जैसी नहीं रह गई थीं। उनमें भी तो बहुत कुछ बदल चुका था। एक ही रात में। जैसे वे नई हो गई थीं। वे दोनो महसूस कर रही थीं कि उनके सिर बहुत हल्के हो गये हैं; रूई के फाहों की तरह। मानों ज़माने का बोझ आज उतर गया हो उनके सरों से। उनके चेहरे फूलों से खिले-खिले थे। और वे एक दूसरे से यूं नजरें चुरा रही थीं जैसे शादी की पहली सुबह पति-पत्नि।

कमाल है; एक दूसरे का दर्द बांटना या एक दूसरे के दर्द को महसूस करना, इतना चमत्कारिक होता है। साथ मिलकर रोना, क्या एक क्रांति होती है?

दोनो के बीच की इस झिझक को तोड़ने के लिये, रिद्धिमा ने अपनी मॉम को एक ज़ोरदार हग करके कहा, “मॉम आप स्कूल के लिये रेडी हो जाओ, ब्रेकफास्ट मैं तैयार कर देती हूँ।”

“हे ईश्वर, यह सब एक सपना न हो।” अरुणा ताई ने मन में कहा और बेटी की तरफ देख मुस्कुरा दी।

 

“तुम आज दिनभर क्या करने वाली हो?” अरुणा ताई ने डाईनिंग टेबल पर बैठे, ब्रेक्फास्ट करते हुये पूछा।

“कुछ नहीं, पहले घर की साफ सफाई, फिर एक लम्बी नींद।”

“साफ सफाई...?” मॉम ने आश्चर्य से पूछा।

“अरे मॉम, निदा फाज़ली की गज़ल है न...

अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये

घर में बिखरी हुई चीजों को सजाया जाये”

यकायक रिद्धिमा को लगा उसे यह शेर नहीं पढ़ना चाहिये था। और रिद्धिमा सही थी क्योंकि मॉम ने उसे भय मिश्रित नजरों से देखा।

“रिद्धिमा, बेटी सब ठीक तो है न? मुझे चिंता हो रही है।“ वे बोलीं।

“चिंता किस बात की मॉम।” रिद्धिमा ने कहा।

“बेटी इस बार तू बहुत बदली बदली लग रही है।“

“यह तो अच्छा है न मॉम। परिवर्तन तो संसार का नियम है न? सच तो ये है कि हर बीतते हुये पल के साथ हम बदलते जाते हैं। हर पल हमारे साथ कुछ नया जुड़ता जाता है। हर पल हम अपने आप का नवीनीकरण करते रहते हैं।“

“देख अब तू दार्शनिकों की तरह बात कर रही है। थोड़ी देर पहले तू शायरी कर रही थी। यह सब तेरे स्वभाव के अनुरूप नहीं है।“

“हां तो ठीक है न! स्वभाव भी तो बदल गया है।“

“तू मुझसे कुछ छिपा रही है, बेटी सब कुछ नॉर्मल तो नहीं है।“

“मॉम क्या लाईफ में सब कुछ नॉर्मल होना इतना इम्पोर्टेंट है। क्या एक्साईटमेंट ज़रूरी नहीं?”

“हां बेटा, एक्साईटमेंट भी ज़रूरी है। एक्साईटमेंट से आप जीवन जीने की शक्ति पाते हैं। आत्मविश्वास प्राप्त करते हैं और नये प्रयोग और नये अनुभवों के लिये तैयारी करते हो। लेकिन नये अनुभवों के लिये यह जीवन बहुत छोटा पड़ जाता है। और जब आप एक बच्चे की ज़िम्मेदारी उठाने लगते हो तब आप सचमुच कोई रिस्क उठाना नहीं चाहते। कोई एक्साईटमेंट नहीं चाहते हैं। आप अपनी संतान के विरुद्ध बहती हवा से भी डर जाते हैं...”

“मॉम...” कहते हुये रिद्धिमा ने फिर से मॉम को हग किया और बात एक बार फिर छूट गई।

“देर हो रही है।” कहते हुये मॉम उठ खड़ी हुई।

 

जब अरुणा मै’म स्कूल से घर लौटीं तो घर में वाकई साफ-सफाई की गई थी और रिद्धिमा सचमुच सो रही थी। शाम जब धूप का प्रकोप कुछ कम हुआ, रिद्धिमा ने ही नल में पाईप कनेक्ट करके पेड़ पौधों को पानी दिया। सारे आंगन में पानी का छिड़काव किया। सारा घर मिट्टी की सोंधी सोंधी खुशबू से महक उठा।

शाम की चाय लेकर दोनो आंगन में सीढ़ियों पर बैठी डूबते सूरज और रंग बदलते आसमान का नज़ारा कर रही थीं। सामने आम के पुराने घने पेड़ पर चिड़ियां चहक रही थीं। आसमान पर पक्षियों की टोलियां घर वापसी के सफर पर रवांदवां थीं। दूर बरगद के पुराने पेड़ पर सफेद बगुलों का झुंड उतर रहा था। काले काले छोटे चमगादड़ों की टोलियाँ बदहवास सी बरगद से दूर दूर बिखरती जा रही थी। सारे नजरों को रिद्धिमा जैसे आँखों से पी जाना चाहती थी। कमाल है उसने दुनियाँ को कभी पहले इस नज़र से नहीं देखा। क्या आज मेरा नज़रिया बदल गया है? या हालात बदल गये हैं जो दुनियाँ इतनी मनमोहक लग रही है। दुनियाँ तो वही रही होगी शायद मुझे पहले कभी इसे इस तरह देखने की फुर्सत ही नहीं मिली होगी। रिद्धिमा मन ही मन बहुत कुछ गढ़ रही थी और उसके सामने ज़िंदगी के जैसे नये भेद खुलते जा रहे थे।

मॉम बड़े ध्यान से रिद्धिमा के चेहरे का और उसके चेहरे पर आते जाते भावों का जायज़ा ले रही थी। वह मां थी और हर मां अपने बच्चे में अचानक से होने वाले बदलाव से घबरा जाती हैं। इतनी गम्भीरता के लिये इसकी उम्र बहुत कम है अभी। यकायक अरुणा ताई को लगा, रिद्धिमा जैसी पहले थी वैसी ही उसे पसंद थी। तेज़ तर्रार और किसी बात की परवाह नहीं करने वाली, मुंहजोर और गुस्सैल। नहीं यह मेरी बेटी रिद्धिमा नहीं है... या शायद वही है लेकिन समय से पहले बड़ी हो गई है, मेरी तरह। ‘मेरी तरह’ इस शब्द ने उन्हे डरा ही दिया। मेरी तरह...

“रिद्धु, एक बात पूछूं?” अरुणा ताई की अवाज़ में थरथराहट थी। रिद्धिमा चौंक गई। उसने चौंक कर अपनी मॉम की ओर देखा। यकायक उसे मॉम काफी बूढ़ी लगी। बूढ़ी और कमज़ोर। रिद्धिमा का कलेजा कचोट उठा।

“मॉम...” उसने इतना ही कहा। हालांकि वह कहना चाहती थी, ‘मॉम आप ऐसे क्यों पूछ रही हो?’ या शायद यह कि, ‘मॉम आपका अधिकार है...।’ लेकिन वह सही वाक्य के चयन की उधेड़ बुन में उलझी आगे कुछ न कह सकी।

“सच-सच बतायेगी?” मॉम ने पूछा।

“आप से झूठ नहीं बोलूंगी मॉम!” उसने पूरी ईमानदारी से कहा।

“उस लड़के, और तेरे बीच में क्या है?”

“वह इमरान है मॉम।”

“हाँ, वही...”

रिद्धिमा ने अपने मोबाईल में व्हाट्सएप खोला और इमरान के साथ चैटिंग का सारा डेटा ओपन कर मॉम के सामने रख दिया।

“यह क्या है?” मॉम हड़बड़ा सी गई।

“इसमे आपको सब कुछ पता चल जायेगा।“ रिद्धिमा ने कहा।

अरुणा ताई उनकी आपसी चैट पढ़ती जाती और अपनी बेटी के चेहरे के बदलते रंग देखती जाती। खुद अरुणा ताई के चेहरे पर लगातार कितने ही भाव आते और जाते। अंत तक पहुंचते पहुंचते वे अपने आंसू रोक न सकी। अरुणा ताई ने अपनी बेटी को अपनी तरफ खींच कर उसके सिर को कसकर अपने सीने से लगा लिया और रोने लगी।

“यही डर था मुझे... यही डर...। मैं अच्छी तरह जानती हूं इन लोगों को।”

“अब तो आपको खुश होना चाहिये...।” रिद्धिमा ने हैरानी से कहा।

“जब बेटी खून के आंसू रोती हो तब एक मां कैसे खुश हो सकती है।”

“लेकिन मॉम!...”

“लेकिन वेकिन कुछ नहीं। वह तेरे साथ ऐसा कैसे कर सकता है? वह अपने आप को समझता क्या है?”

“लेकिन मॉम वह आप की तो बहुत इज़्ज़त करता है। आप कैसे...?”

“मुझे नहीं चाहिये ऐसी इज़्ज़त...। मैं नफरत करती हूं उससे नफरत!!” अरुणा ताई चीख उठी। उस रात अरुणा ताई सो नहीं सकी। वह सारी ज़िंदगी जिस डर का सामना करती रही थी आज उसे वास्तविक होते देख उनका दिल बार बार भर आता। वह बार बार सोई हुई रिद्धिमा के सर पे हाथ फेरती और बहुत दर्द के साथ कहती, “मेरी बच्ची...”

8.

अबकी बार अरुणा ताई को अपनी बेटी के लिये, स्वजातीय रिश्ता ढूंढने में कोई दिक्कत नहीं आई। लड़की खुद कमाती जो है। अच्छा लड़का है। डॉक्टर है। सभी खुश हैं। अरुणा ताई के मायके वाले, ससुराल वाले रिश्तेदार सभी अरुणा ताई की तारीफ कर रहे हैं। अकेली औरत ने क्या खूब परवरिश की है अपनी बेटी की और पढ़ा लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा किया। रिश्ता भी तो कितना बढ़िया ढूंढा है। बेटी की ज़िंदगी संवार दी।

आज हर रिश्तेदार से अपनी तारीफ सुन अरुणा ताई ने अपने जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष पूरा किया कर लिया। एक सफल मां। यह तो गर्व की बात है। कल तक जो रिश्तेदार उसे अड़ियल और घमंडी, सनकी और जाने क्या क्या कहते थे। जो कहा करते थे, “देखते हैं बिना किसी की मदद के कैसे बेटी की ज़िम्मेदारी उठाती है। कहाँ ब्याहेगी? कहीं जात की बेजात न हो जाये।” वे सब आज आकर देखें अरुणा ने अपनी बेटी की कैसी परवरिश की है और कैसा बेहतरीन रिश्ता ढूंढा है।

लेकिन मन फिर भी अनमना सा है। कोई बात रह-रह कर दिल में खटक रही है। कभी कभी लगता है यह सब कुछ बेमानी है। यह सारी तैयारियाँ, ये सारी रौनकें सब कुछ जैसे नकली हो। जब जब रिद्धिमा पर नज़र पड़ती, अरुणा ताई अपने आप को अपराधी महसूस करती।

“बेटी, तू खुश तो है न?” रिद्धिमा से बार बार एक ही सवाल करती और कहती, “काश, मेरे वश में होता...”

शादी तै होते ही इमरान का फोन आया था, “मॉम, आप काम की बिल्कुल टेंशन नहीं लेना। आपका बेटा है न...?” कितना क्रूर है? इतनी मासूमियत से कोई घाव करता है। इसे शर्म भी नहीं आती। मैं तो फिर भी उसे अच्छा समझने लगी थी लेकिन...

इमरान ने भी पूरी बेशर्मी से अपना वादा निभाया। पूरे दस दिन की छुट्टी लेकर आ गया और सारी तैयारियाँ अपने हाथ में ले ली थी। रिद्धिमा अब भी उसे जिस नज़र से देखती थी तो अरुणा ताई के कलेजे पर जैसे छुरियाँ चल जातीं। अरुणा ताई का मन करता उसे उठाकर कूड़े के ढेर पर फिकवा दे; लेकिन रिद्धिमा के चलते उसे खून का घूंट पीकर रह जाना पड़ता।

रात के साढ़े नौ बज चुके थे, जब वे शादी की मार्केटिंग से लौटे थे। आज का दिन दुल्हन की मार्केटिंग के लिये तय था। अरुणा ताई और रिद्धिमा की तरह इमरान भी थकान से चूर था। वह जल्दी से जल्दी घर पहुंच कर सो जाना चाहता था। कल सुबह फिर जल्दी उठकर बाकी के काम निपटाने जो हैं। रिद्धिमा की बिदाई तक तो उसे फुर्सत ही नहीं। फिर उसके बाद...? सोंच कर उसका दिल भर आया। ‘रिद, पराई हो जायेगी। इतने दिन का साथ इतने दिन की दोस्ती...। खैर यह सब किसी और के नसीब में लिखा है।

वो दोस्ती तो खैर अब नसीब-ए-दुश्मनां हुई

वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ ही चला गया

वह एक गहरी सांस भर कर आज के काम की लिस्ट चेक कर रहा था। कहीं कोई काम तो नहीं छूट गया। फिर अभी जाने से पहले, कल के काम की लिस्ट भी तैयार करनी है। रिद्धिमा किचन में सब के लिये चाय बना रही थी। खाना वे बाहर ही खा चुके थे। यह सब क्या हो रहा है वह सोंच रही थी। इमरान कैसे इतनी बहादुरी से सब कुछ बर्दाश्त कर रहा होगा। क्या मॉम सही कहती है कि इनके दिल पत्थर के होते हैं। और यह सही है तो कबीर, मीर, गालिब, साहिर, साईं, खैयाम, खुसरो वगैरह कैसे....? नहीं मॉम... सोचते सोचते वह चाय पत्ती शक्कर सब कुछ डालना भूल गई। बर्तन में पानी उबल रहा है, शुद्ध पानी! H2O।

अरुणा ताई अपनी थकी हुई टाँगों को सामने वाली कुर्सी पर फैलाये आराम की मुद्रा में बैठी, काम में डूबे इमरान को ध्यान से देख रही है जो कभी कभी प्यारा लगता है तो कभी ज़हर। इसका हर काम सिस्टमेटिक होता है। वह सोंचती है। कुछ बात तो है इस लडके में। और वह कौन सी बात है जो मुझे इस कडके की तरफ खींचती है, और कौनसी बात है जो इसके विरुद्ध...। मेरी बेटी क्यों इसके खिलाफ कुछ भी सुनना पसंद नहीं करती? और कैसे ये लोग इतने नॉर्मल बने रहते हैं। क्या कहते हैं उसे?...कूल! शायद यह जनरेशन ही ऐसी है। प्रोफेशनल! क्या रिश्ते नाते भी इनके लिये इतने प्रोफेशनल होते हैं। भगवान बचाये इन प्रोफेशनल लोगों से। लेकिन रिद्धिमा कैसे अब भी आशा भरी नजरों से इसकी ओर देखती है। आज सारा दिन उनके साथ बिता कर वे यही सब नोट करती रहीं। कैसे वे एक दूसरे की कम्पनी इंजॉय करते हैं? कैसे वे मानसिक रूप से एक दूसरे पर डिपेंड रहते हैं। बिना एक दूसरे से पूछे वे कोई डिसीज़न नहीं लेते। बिल्कुल पर्फेक्ट कपल लगते हैं...। लेकिन यह बात कहीं रिद्धिमा की शादी शुदा ज़िंदगी बर्बाद न कर दे।

“सुनो!” वे कहती हैं। चौंक कर इमरान सिर उठाता है।

“शादी के बाद उसे कॉल या चैट कर के डिस्टर्ब मत करना वर्ना वह कभी अपनी लाईफ में सेटल नहीं हो पायेगी।“

“जी मॉम।” इमरान ने वापस अपने काम में सिर खपाते हुये छोटा सा जवाब दिया, “आई नो इट।”

‘जी मॉम।’ यह कितनी आसानी से बोल गया?  इसे कुछ महसूस होता है या नहीं। इसके सीने में दिल भी है या नहीं? और एक मेरी बेटी है...

इमरान के ठंडे से रियेक्शन से अरुणा ताई तिलमिला उठी।

“कैसे? कैसे तुम लोग इतने पत्थरदिल हो सकते हो?” जब सहनशीलता जवाब देने लगी तो अरुणा ताई फूट पड़ी। इमरान ने आश्चर्य और अविश्वास से अरुणा ताई की ओर देखा। उसकी निगाहों में प्रश्न था, ‘मैं???’

“तुमने मेरी फूल जैसी बेटी का फूल जैसा दिल तोड़ा है।” अरुणा ताई बोल रही थी, “मैं तुझ से नफरत करती हूँ।”

“मॉम, हम दोनो बेस्टफ्रेंड्स रहे हैं और इस फ्रेंडशिप को फ्रेडशिप तक रखने का फैसला भी हम दोनो का था। हम दोनो मेच्योर हैं और हमने सोच समझ कर ही डिसीज़न लिया है।” इमरान बोला।

“और मेरी बेटी के दिल पर जो बीत रही है?... वह सारी ज़िंदगी जो इस दर्द के साथ जियेगी; उसका क्या?”

“जो उसके दिल पर गुज़र रही है, वही मेरे दिल पर गुज़र रही है। और मुझे भी इस दर्द के साथ जीना होगा।”

“तो फिर यह बुज़दिली क्यों? संघर्ष क्यों नहीं करते?”

“संघर्ष किससे मॉम? आप से? आप ने किन मुसीबतों और परेशानियों का सामना कर के पाला है उसे! वह आपकी जीवन भर की जमापूंजी है। और उसे मैं आपसे छीन लेता? मां से बेटी को जुदा करने के बाद मैं किस मुंह से अपने रब के सामने हाज़िर होता? मुझे मरना भी तो है एक दिन।”

“तुमने सिर्फ अपने ही बारे में सोंचा और मेरी बेटी के बारे में? उसका दिल तोड़कर तू किस मुंह से जायेगा अपने रब के सामने?”

“समाज में आपकी जो छवि है तो वहां आपकी रुसवाई नहीं होती? आपकी बेटी आपकी रुसवाई का कारण नहीं बनना चाहती थी।”

“वह मेरी बेटी है; इसलिये....। लेकिन तुझे क्या....”

“बहुत सी बातें हैं मॉम। आज हम जिस दौर से गुज़र रहे हैं वहां एक मुस्लिम लड़के का एक हिंदु लड़की से शादी या प्यार करना लवजेहाद कहलाता है। हम नहीं चाहते हमारे कारण कोई फसाद हो और बेगुनाहों की बलि चढ़े....। अगर फसाद नहीं भी होते तो भी बहुत से बेगुनाहों को नफरत का शिकार होना पड़ता। हम इतने खुदगर्ज़ नहीं हैं। हम अपनी गृहस्थि की नीव नफरतों पर नहीं रखना चाहते थे।”

इमरान किसी जवाब के इंतेज़ार में खामोश सिर झुकाये बैठा रहा। अरुणा ताई स्तब्ध सी बुत बनी बैठी थी। ऐसा लगता था, वे किसी और ही दुनियां में पहुंच गई है। इमरान आहिस्ता से उठकर अरुणा ताई के पास जा बैठा।

“इसमे आप का कोई दोष नहीं मॉम। हमारा भी कोई दोष नहीं... यह दौर ही ऐसा है...” वह शायद आगे भी कुछ कहता लेकिन अरुणा ताई ने उसकी बात बीच में ही काट दी-

“कुछ नहीं, तुम सब एक जैसे हो। दुनियाँ की ज़माने की फिक्र है तुम्हें लेकिन एक मासूम लड़की की भावनाओं की कोई कद्र नहीं... आई हेट यु... आई हेट यु ऑल...। क्या फर्क है अनवर में और इमरान में? तीस साल... हाँ लगभग तीस साल का फासला... पूरी एक पीढ़ी का फासला.... लेकिन तुम दोनो में कोई फर्क नहीं। दोनो एक जैसे हो कायर और संवेदनहीन...” अब अरुणा ताई के सब्र का बांध टूट चुका था। आंसू थमने का नाम नही लेते और उनका प्रलाप रुकने का नाम नहीं लेता था। इमरान ने.... इमरान ने क्या, किसी ने भी कभी अरुणा ताई के इस रूप की कल्पना नहीं की थी। इमरान हैरान था; उसे कुछ समझ नहीं आरहा था।

रिद्धिमा जब चाय लेकर अंदर आई तो उसने देखा, मॉम बिलख बिलख कर रो रही है। इमरान उनके सामने घुटने के बल बैठा उनके आंसू पोछने की नाकाम कोशिश कर रहा है। मॉम प्रलाप करते करते कह रही है, “अनवर हो या इमरान, तुम सब एक जैसे हो... और इसी लिये मैं तुम सब से नफरत करती हूं...”

इमरान जाने लगा तो रिद्धिमा इमरान को छोड़ने गेट तक आई।

“यह मॉम क्या कह रही थी? और ये अनवर कौन है?” रिद्धिमा ने इमरान से पूछा।

“मेरे पापा...” कहने के लिये इमरान ने मुंह खोला लेकिन कुछ सोंच कर चुप रह गया।

 

 

अपने बारे मे. . .

अपने बारे मे मै क्या लिखूं? मैं कभी समझ नही पाता हूँ, और शायद इसी लिए मै कहानियाँ लिखता हूँ ; और इन्हीं मे अपने आप को तलाशता हूं । मै इनसे अलग हूं भी नही, फिर अलग से क्या कहूँ. . . .
यह उन दिनों की बातें हैं, जब दिन सुनहरे हुआ करते और आसमान नीला । बिल्कुल साफ शफ्फाक । मै एक विशिष्ट शहर भिलाई का रहने वाला हूं; और भिलाई के ऊपर उन दिनो आसमान बिलकुल खुला खुला सा हुआ करता, और इसके दक्षिण में क्षितिज पर एक तसवीर थी बहुत सारी चिमनियों और कुछ विचित्र आकृतियों की । वे रहस्यमयी चिमनियां , अकसर बहुत सारा गाढ़ा गाढ़ा धुआँ उगलती । कभी दूध सा उजला सफेद, कभी गेरुआ लाल जिसके बारे मे मुझे लगता कि उस सफेद धुयें मे ही ईट पीसकर मिला देते होंगे और कभी काला धुआँ, जो मै सोचता कि ज़रूर, चिमनी के नीचे डामर(कोलतार) जलाया जारहा होगा जैसे सङक पर बिछाने के लिए जलाते हैं ।
"वो क्या है?" मै पूछता ।
"वो कारखाना है ।" दादा दादी बताया करते "तेरे अब्बा वहीं काम करते हैं ।"
मेरे अब्बा एक विशिष्ट इनसान थे, वे अथक संघर्षशील, मृदुभाषी और मुस्कुराकर बात करने वाले थे । उन जैसा दूसरा इनसान मैने दूसरा नही देखा । वे जहाँ जाते लोग उनसे प्यार करने लगते । उनके व्यक्तित्व मे जादू था ।
जादू तो उन रातों का भी कम न था, जब अंधेरे के दामन पर जगह पुराने दौर के बिजली के लैम्प पोस्ट के नीचे धुंधली पीली रौशनी के धब्बे पङ जाते । जब कोई चीज उन धब्बों से होकर गुज़रती तो नज़र आने लगती और बाहर होती तो गायब होजाती । एक और जादू आवाज़ का होता । रात की खामोशी पर कुछ रहस्यमयी आवाज़ें तैरती . . . . जैसे - ए विविध भारती है. . . या हवा महल. . . . और बिनाका गीतमाला की सिग्नेचर ट्यून या अमीन सयानी की खनकती शानदार आवाज़ ।
ये आवाज़ें रेडियो से निकलती और हर खास ओ आम के ज़हन पर तारी हो जाती । मेरे खयाल से उन बङे बङे डिब्बों  (रेडियो) मे छोटे छोटे लोग कैद थे जो बिजली का करंट लगने पर बोलने और गाने लगते । और उन्हें देखने के लिये मै रेडियो मे झांकता और डाट खाता कि- करंट लग जायेगा । अब्बा जब रेडियो को पीछे से खोलकर सफाई या और कोई काम करते तो मै उसमे अपना सिर घुसाकर जानने की कोशिश करता कि वे छोटे छोटे लोग किस जगह होंगे , एकाध बार मै रहस्योदघाटन के बिलकुल करीब पहुँच भी गया लेकिन हर बार अब्बा डाटकर भगा देते । क्या अब्बा को यह राज़ मालूम था ? मै अब तक नही जान पाया ।
किसी रात जब हम बाहर सोते तो आसमान पर अनगिनत तारों को मै गिनने की कोशिश करता । ठीक है वे अनगिनत हैं , फिर भी इनकी कोई तादाद तो होगी । मै उन्हे गिनकर दुनिया को उनकी तादाद बता दूंगा, फिर कोई नही कहेगा कि आसमान मे अनगिनत तारे होते हैं । अफसोस !! हर बार मुझे नींद आ जाती और मै यह काम अब तक पूरा नही कर पाया और अब तो शहर के आसमान पर गिनती के तारे होते हैँ, जिन्हें ढूँढ ढूँढ कर गिनना पङता है ; लेकिन लोग अब भी यही कहते हैं कि आसमान में अनगिनत तारे हैं । खैर!
रातें जब सर्दी की होतीं, हम दादा दादी के साथ अपनी बाङी मे छोटी सी आग जलाकर आग तापते आस पङोस के और बच्चे भी आ जाते और दादा दादी की कहानियों का दौर शुरू हो जाता । दादी के पास उमर अय्यार की जम्बिल के नाम से कहानियों का खजाना था और उमर अय्यार मेरा पसंदीदा कैरेक्टर था । कई बार वो मोहम्मद हनीफ की कहानियां भी सुनाती । दादा की कहानियाँ मुख्तलिफ होती और वे मुझे अब भी याद हैं, उन्हें मैने अपने बच्चों को उनके बचपन मे सुनाई ।
हम बी एस पी के क्वार्टर में रहते जहां हमारे क्वार्टर के पीछे ही गणेशोत्सव होता । जिसमे नाटक, आरकेस्ट्रा जैसे कई आयोजन होते । बस यहीं से नाटक का शौक पैदा हुआ और इसके लिए मैने एक नाटक(एकांकी-प्रहसन) लिखा 'कर्ज़' इसका मंचन हुआ तब मै कक्षा छठवीं मे था । इसके बाद ज़िंदगी मे कई अकस्मिक मोड़ आये जिन्हे बताने के लिये बहुत वक्त और बहुत जगह की दरकार है । तो मुख्तसर मे यही कि नवमी कक्षा मे मै एक साप्ताहिक मे संवाददाता बन गया । दसवीं मे था तब पहली कहानी ‘क ख ग घ …’ प्रकाशित हुई जो जलेस की बैठक मे खूब चर्चा मे आई । तभी रेडिओ से एक कहानी प्रसारित हुई जिसके लिये पहली बार मानदेय प्राप्त हुआ । लेकिन लेखक बनने और दुनिया भर मे घुमते रहने के मेरे सपने ने मेरे घर मे मुझे भारी संकट मे डाल दिया । मेरे अब्बा से मेरे रिश्ते बिगड़ गये, वे चाहते थे कि मै अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर लगाऊं, खूब तालीम हासिल करूं और उसके बाद बी एस पी मे नौकरी करूं । वे मुझसे बहुत ज़्यादह उम्मीद रखते थे और अपने टूटे हुये ख्वाबों को मेरी ज़िंदगी मे साकार होते देखना चाहते थे, तो वे कुछ गलत नही चाहते थे, क्योंकि बेटे की कहानी तो बाप की कहानी का ही विस्तार होती है । लेकिन मेरे अपने अब्बा से रिश्ते बिगड़ गये और यह हाल तब तक रहा जब उस दिन सुबह – सुबह मेरी अम्मी बद हवास सी मुझे जगा रही थी । नींद से जागते ही पता चला मेरे सर से आसमान छिन गया है; सुनते ही मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई । तीन बहन और तीन भाईयों मे सबसे बड़ा बेटा था मै । अब्बा, जो हमेशा मेरी फ़िक्र मे रहते थे और मै यह बात अच्छी तरह जानते हुये भी कभी उनसे कहता नही, उस रात ट्रक एक्सिडेंट मे दुनियां से रुख्सत हुये तो हम दोनो के बीच बातचीत तक बंद थी । मै अपने दिल की बात उन्हे बताना चाहता था लेकिन …… वह हादसा मेरी ज़िंदगी का बड़ा सबक बन गया । अफ़सोस ! ज़िंदगी सबक तो देती है लेकिन उसपर अमल करने के लिये दूसरा मौका नही देती ।

अब मेरे सामने दूसरा विकल्प नहीं था, नौकरी के सिवाय । फ़िर वह वक्त भी आया जब लेखन और नौकरी के बीच एक को चुनना था और निश्चित रूप से मैने चुना नौकरी को । मैने अपना लिखा सारा साहित्य रद्दी मे बेच दिया, अपनी सारी पसंदीदा किताबों का संग्रह भी । मैने अपने अंदर के लेखक की हत्या की और अपने अंदर ही कहीं गहराइयों मे दफ़न कर दिया । मै मुतमईन था कि उस लेखक से पीछा छूटा लेकिन करीबन चौथाई सदी बाद किसीने मुझसे मेरे ही नाम के एक पुराने लेखक का ज़िक्र किया और मै चुप रहा । किस मुंह से कहता कि वह मै ही था । वह दिन बड़ी तड़प के साथ गुज़रा और रात को जनम हुआ एक कहानी का ‘एक लेखक की मौत’ । दरअसल वह एक लेखक के पुनर्जनम की कहानी थी ।

वह लेखक जो आज आपसे रू-ब-रू है …  

लेखक से सम्पर्क - zifahazrim@gmail.com

 

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