... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

ई-मेल में सूचनाएं, पत्रिका व कहानी पाने के लिये सब्स्क्राइब करें (यह निःशुल्क है)

हुर्रे !

 

 

विधा की रातों की नींद मानों उससे आईस्पाई खेल रही थी.कभी वह उठ कर बालकनी में टहलने लगती कभी बोतल से पानी पीती और कभी लेट कर जबरदस्ती आंखे बन्द कर सोने का प्रयास करती.पर नींद भी कम चतुर न थी उसके हाथ न आती.

तीसरी बार जब वह बिस्तर से उठी तो राजुल ने कहा ‘‘ सो जाओ यार क्यों दिमाग खराब कर रही हो ’’

विधा कैसे मान ले कि वंदन अपना बेटा नहीं है उसके बिना रहने की वह सोच भी नहीं सकती पर ‘ चिन्मय ?’ वो मेरा खून है ,उसने मेरी कोख में नौ महीने बिताए है मेरे हदय का टुकड़ा उससे मैं कैसे दूर रह सकती हूँ।

 वंदन चिन्तन दोनो उसे अपनी ओर खींच रहे हैं दोनों पुकार रहे हैं ‘‘ तुम मेरी मम्मा हो तुम मेरी मम्मा हो ....’’ विधा उलझन और कुछ न सोच पाने की विवशता में अपनी मुठ्ठी मेज पर दे मारती है .आजकल उसके सात तालों में बन्द करने पर भी जीवन की डायरी के पन्ने  फड़फड़ा फड़फड़ा कर, चीख चीख कर अपनी इबारत दोहराने पर तुले हुए हैं.

राजुल एक मल्टीनेशनल कम्पनी में असिस्टेंट डायरेक्टर, वंदन शहर के सबसे बड़े स्कूल का मेधावी छात्र और सुख सुविधाओं से घिरी पति और बेटे के जीवन की धुरी बनी विधा , जीवन में इससे अधिक चाहने की वह लालच करना भी नहीं चाहती थी.किसी मदमस्त नदिया सी उनकी जिंदगी की धार बिना बाधा बह रही थी वह ,वंदन और राजुल।

घटना तो साधारण सी थी राजुल को जाण्डिस हो गया था डाक्टर शलभ ने सावधानीवश उसे अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह दी.शलभ का बचपन से इलाज वही करते आये हैं उन्हीं के नर्सिंग होम में उसका जन्म ही हुआ था अब बारह वर्ष बाद फिर यहाँ  भर्ती हुआ था.सुबह सिस्टर चित्रा जब उसको दवा देने आयीं तो उसे जगाने से पूर्व कुछ क्षण को ठिठकीं ,वंदन पैरों के बीच में तकिया रख कर सो रहा था .

उन्होने वंदन को सोते हुए देखा फिर विधा से बोलीं ‘‘ ये ऐसे ही सोता है क्या’’?

विधा ने हँस कर कहा ‘‘ हाँं इसकी ऐसी ही आदत है जब तक इसे एक सिर के नीचे और एक पैरों के बीच में तकिया न मिले इसे नींद नहीं आती.’’

‘‘ अजीब बात है ’’वह स्वतः से बोलीं फिर विधा से पूछा ‘‘ क्या आप या इसके पापा भी ऐसे ही सोते हैं ?’’ विधा को उनके इतनी छोटी आदत पर इतना महत्व देना अजीब सा लगा पर उसने कहा ‘‘ नहीं बस इसी की आदत है.’’

‘‘ ये आपका ही बेटा है न? ’’

अब विधा की सहनशक्ति जवाब देने लगी उसने खीज कर कहा ‘‘ आप को कोई शक है ?’’

सिस्टर ने सकपका कर कहा ‘‘ नहीं नहीं आप नाराज न हों पर अभी अभी मैं एक और पेशंेट के कमरे से आ रही हूं वो भी ऐसी ही सोने की आदी है इसलिये मुझे आश्चर्य हुआ.’’

‘‘ अरे इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? यह एक महज एक इत्तेफाक होगा ’’विधा ने तनिक क्रोध से कहा .

‘‘जी जी सारी मैडम, आप नाराज न हों बस अभी अभी दो पेशेंट की एक सी आदत देख कर आश्चर्य हुआ तो पूछ लिया था मेरा और कोई मतलब नहीं था.।’’

व्ंादन एक सप्ताह  अस्पताल में रहा ,आज जब डाक्टर शलभ उसे देखने आये तो उन्होने कहा ‘‘ विधा जी अब आप केे बेटे की स्थिति में काफी सुधार हो रहा है आप इसे  घर ले जा सकती हैं , पर हाँ अभी इसकी दवा और परहेज चलता रहेगा.’’

विधा ने चैन की साँस ली एक सप्ताह से अस्पताल और घर के चक्कर लगाते लगाते परेशान हो गयी थी.वह सामान समेट रही थी कि सिस्टर चित्रा आई .विधा ने कहा ‘‘ सिस्टर आप ने मेरे बेटे की बहुत अच्छी तरह से देखभाल की थैंक्स.’’

सिस्टर चित्रा ने कहा ‘‘ माई प्लेजर मैडम यह तो हमारी ड्यूटी है ’’

फिर कुछ कहते कहते रुक गयीं मानो वह कहना चाह रही हैं पर समझ नहीं पा रही ंकि कहें कि न कहें .चित्रा ने उसकी झिझक देख कर कहा ‘‘ सिस्टर क्या बात है आप कुछ कहना चाहती हैं क्या? ’’

‘‘ जी बात यह है कि जब से मेंैने आपके बेटे को देखा है एक बात मेरे मन में लगातार घुमड़ रही है मैं जानती हूँ कि आप सुन कर नाराज हो जाएंगी ,पर बिना कहे भी रहा नहीं जा रहा है.’’

विधा को पहले दिन वाली बात याद आ गयी उसने हँस कर कहा ‘‘ अच्छा अच्छा आप अभी भी मेरे बेटे की  पैरों के बीच तकिया रख कर सोने की आदत में उलझी हैं, अरे भई ये सौ प्रतिशत मेरा बेटा है.’’

‘‘ मैडम केवल एक वही आदत नहीं आपके बेटे के हाव भाव रंग रूप भी 32 नम्बर कमरे वाली पेशेंट से इतना मिलता है कि बार-बार मेरा ध्यान चला जाता है ,यदि एक बार आप भी उस पेशेंट से मिलेगी तो आप भी सोच में पड़ जाएंगी.’’

अब विधा को भी उस पेशेंट को देखने की उत्सुकता हुई ,वह सिस्टर के साथ कमरा नम्बर 32 में गयी .वहां लगभग उसी की आयु की एक पेशेंट लेटी थी .सिस्टर की बात गलत नहीं थी .सच में वह वंदन से काफी मिल रही थी.विधा का दिल धड़क उठा ‘‘ तो क्या वंदन उसका बेटा नहीं ....नहीं नहीं इस विचार से ही उसकी धरती हिलने लगी.आश्वस्त होने के लिये उसने उस महिला मरीज से उसका हाल चाल पूछा फिर उसके बच्चांे आदि के बारे में पूछा .विधा गयी तो उत्सुकतावश थी पर वह वहाँ जा कर उसने स्वयं ही अपने लिये एक कुआँ खोदने का काम किया जिसमें वह गिरती ही जा रही थी।

उस महिला को अपना सामान्य परिचय दे कर विधा ने उसके बारे में पूछा, उसने बताया कि उसका नाम रंजीता है और बातों बातों मे ही उसने यह भी बताया कि 6 नवम्बर को इसी अस्पताल में उसके बेटे का जन्म हुआ था।

विधा को चक्कर सा आ गया साथ खड़ी सिस्टर ने उसे पानी दिया .उसने सिस्टर को संकेत से कमरे से बाहर जाने को कहा.सिस्टर के जाने के बाद विधा ने पूछा ‘‘ अब आपका बेटा कहाँ है ?’’

‘‘ मेरे घर पर है पर क्यों आप ऐसे क्यों पूछ रही है ’’?

‘‘ नहीं कुछ नहीं ’’ विधा को यह जान कर कुछ आश्वस्ति हुई कि उनका बेटा उनके पास है ।

पर वंदन और रंजीता की समानता ने उसके मन में संशय का बीज तो रोप ही दिया था.घर आ कर उसने राजुल को पूरी कहानी बतायी .राजुल ने बात को हवा में उड़ा दिया उसने कहा ‘‘ तुम लोग फालतू की बात सोचती रहती हो अरे सभी के दो आंख कान एक नाक होती है तो कहीं उस लेडी का कुछ वंदन से मिलता लग रहा होगा ,इस बात को इतना तूल देने का क्या मतलब ? ’’

‘‘ पर वो तकिया पैर में दबा कर सोने की आदत ,उसका क्या? ’’

राजुल ने कहा ‘‘ अरे दुनिया में सर्वे करने जाओ तो तुम्हे इस आदत के करोड़ों लोग मिल जाएंगे इस छोटी सी बात पर तुम्हे अपना बेटा ही पराया लगने लगा.’’

व्ंादन के पराये होने की बात तो वह सपने में भी सोचती तो उसकी साँसें रुक जातीं उसने तड़प कर कहा ‘‘ नहीं नहीं मेरा वंदन पराया कभी नहीं हो सकता वो तो मेरी जान है ’’

‘‘ फिर फालतू की बातें सोचना बंद करो ’’

विधा ने सोच लिया कि वह ऐसी बातें नहीं सोचेगी पर यदि मन इतना ही वश में होता तो उलझनें ही न होतीं ,मन बार बार उसे उकसा रहा था .यह इत्तेफाक कैसे हो सकता है कि रंजीता और वंदन की सूरत आदत सब मिलती है और उसके बेटे और वंदन का जन्म उसी अस्पताल में एक ही दिन हुआ, कहीं दोनो बच्चे बदल तो नहीं गये , क्या किसी ने जानबूझ कर ऐसा किया ,क्या गलती से ऐसा हुआ?’’

एक ओर यह विचार ही उसके लिये जानलेवा था कि वंदन उसका बेटा नहीं वहीं कहीं मन में यह भी प्रश्न उठ रहा था कि क्या उसका बेटा कहीं और है ?’’

विधा का मन यह सच जानने को व्यग्र हो उठा उसे न वंदन का दूर होना स्वीकार था न यदि उसका बेटा कहीं और है तो उसे बिना देखे रह पाना.उसकी बेचैनी इतनी बढ़ी कि उससे रहा नहीं गया एक दिन अस्पताल पहुंच गयी.पता चला कि रंजीता अपने घर जा चुकी है ,वह अस्पताल से पता ले कर रंजीता के घर जा पहुंची .रंजीता उसे देख कर आश्चर्य में आ गयी .औपचारिकता वश उसने उसे बैठाया ,उसकी आँखों में यह प्रश्न साफ झलक रहा था कि विधा क्यों आयी है? विधा ने अपने मन का संशय उसे बताया.यह सुन कर उसका भी लगभग वही हाल हुआ जो विधा का हुआ था।

रंजीता ने कहा ‘‘ क्या मैं आपके बेटे को देख सकती हूं ?’’

रंजीता भी घबरा गयी कि कहीं उसका बेटा चिन्मय उससे छिन न जाए पर वह भी वंदन को देखने की उत्सुकता रोक नहीं पा रही थी दोनो माँएं एक ही नाव पर सवार थीं .एक मन कह रहा था कि दोनो अपने अपने घर जाएं फालतू का वहम न पालें पर मन में जो संशय फन उठा कर खड़ा हो गया था वह उन्हे चैन से रहने देता तब न ?

जब रंजीता के पति सुमित जो वकील थे को सारी कहानी ज्ञात हुई तो उनकी प्रतिक्रिया राजुल के सर्वथा विपरीत थी, उनके लिये अपना खून ही सबकुछ था, वो डीएनए टेस्ट कराने पर अड़ गये.यद्यपि राजुल अंत तक इस निर्णय के विपक्ष में ही खड़े रहे उनके अनुसार यह केवल स्वयं के पैर पर कुल्हाड़ी मार कर उलझने खड़ी करने का प्रयास था।

विचित्र उहापोह की स्थिति थी सभी के अंतस में कहीं न कहीं सच जानने की उत्सुकता ने तो जन्म ले ही लिया था.अंततः अपना दिल कड़ा करके दोनो बच्चों का डीएनए टेस्ट कराया गया रिपोर्ट आने में काफी समय लग गया तब तक दोनो माँएं ईश्वर से रिपोर्ट में उनके संशय के गलत आने की प्रार्थना करती रहीं ।पर ईश्वर संभवतः उनके मातृत्व की परीक्षा लेने को आतुर थे .रिपोर्ट आयी तो वही हुआ जिसका डर था, वंदन का डीएनए रंजीता से मिलता था और चिन्मय का विधा से.संभवतः बच्चों की कलाई में लगे टैग बदल गये होंगेे और अन्जाने में बच्चे पैदा होने के बाद एक दूसरे के पास चले गये।

उन दोनो दंपतियों के संसार में ज़लज़ला आ गया .इस ज़लज़ले का प्रभाव डाक्टर शलभ पर भी कम  न था उनके अस्पताल में हुई यह भूल उनके वर्षों के नाम पर पानी फेरने के लिये पर्याप्त थी अतः वह भी इसे अपने स्तर पर सुलझाने का भरसक प्रयास कर रहे थे।

  विधा को तो इस ज़लज़ले में उड़ते गुबार में सब कुछ धुँधला लग रहा था.कभी उसे वंदन की आकृति दिखायी पड़ती और वह उसे पकड़ने आगे बढ़ती तो वह उड़ जाती विधा तड़प कर रह जाती , तो कभी उसे चिन्मय दिखायी देता मानो कह रहा हो मम्मा तुम्हारा बेटा मैं हूं तुम वंदन को क्यो प्यार करती हो , उसके लिये कोई भी निर्णय लेना सरल न था  वह न तो वंदन से दूर जा सकती है और चिन्मय जो उसका खून है जिससे वह इतने वर्षेंा तक अन्जाने में दूर रही उसे भी गले लगाने को हृदय आतुर था.वह उस कुघड़ी को कोस रही है जब सिस्टर चित्रा की बातों में आ कर वह रंजीता से मिलने चली गयी थी ।

आज रंजीता, सुमित, राजुल और विधा डाक्टर शलभ के अस्पताल में एकत्र हुए।विधा ने साहस करके  रंजीता से कहा ‘‘ देखिये रंजीता जी आपके तो दो बेटे हैं आप चिन्मय को मुझे सौंप दीजिये मैं दोनो को पाल लूंगी’’।

यह सुन कर पास बैठे सुमित ने गुस्से से कहा ‘‘ हद है आप ही बहुत होशियार हैं ऐसा कैसे हो सकता है आप अपना बेटा भी ले लेंगी और मेरा भी फिर अपने बेटे को तो पालेंगी और मेरे बेटे से दुराव करेगी आखिर अब तो आपको अपना बेटा मिल जाएगा न ?’’

‘‘ नहीं नहीं मैं ऐसा तो सोच भी नहीं सकती वंदन तो मेरा पहला प्यार है मैं वादा करती हूं कि दोनो बच्चों को अपनी दोनो आंखों के समान पालूंगी.’’

 रंजीता ने कहा ‘‘ विधा जी जिस तरह वंदन आपकी आँख का तारा है चिन्मय भी मेरे हदय का टुकड़ा है मैं उसे कैसे दे दूंगी मैं भी तो वंदन और चिन्मय दोनो केा नहीं छोड़ पा रही हूँ ? ’’

सुमित ने आक्रोश में कहा ‘‘ जो भी हो आप ले जाइये अपना बच्चा , हमें अपना बच्चा चाहिये.आप नहीं देंगे तो हम कोर्ट से अपना बच्चा लेंगे ’’.

समस्या के धागे उलझते ही जा रहे थे तब बहुत सोच कर राजुल ने कहा ‘‘ यदि आप लोग मेरी बात माने तो मैं भी कुछ कहूँ कोर्ट में चक्कर लगाने से बेहतर है कि हम दोनो अपने अपने बेटों को लें लें.’’

‘‘नही नहीं हम अपना बच्चा नहीं देंगे’’ दोनो माँए एक साथ बोल पड़ीं. पर सुमित के हठ के आगे किसी की न चली,उसे तो एक ही धुन थी कि उसे उसका अपना बेटा चाहिये.भरे मन से दोनो दंपति अपने अपने जैविक बच्चों को अपने घर ले गये.

 विधा चाह कर भी, वह चिन्मय जिससे मिलने के लिये कुछ दिनों से आतुर थी, को पा कर प्रसन्न नहीं हो पा रही थी उसका मन वंदन के लिये कचोट रहा था.उसने चिन्मय को गले लगाया तो वह चिहंुक कर परे हट गया.उसने उससे पूछा ‘‘ मेरा बेटा खाने में क्या खाएगा ?’’

चिन्मय ने तुनक कर कहा ‘‘ आप तो मेरी मम्मी हैं क्या आपको नहीं पता मुझे क्या पसंद है, मेरी मम्मा को तो सब पता है वो बिना पूछे ही मेरे मन का खाना बना देती हैं.’’

विधा की आँखों में आँसू आ गये वो समझ रही थी चिन्मय का दर्द.उस रात चिन्मय   विधा और राजुल तीनो ही की रात करवटें बदलते हुए बीती.विधा ने तरह-तरह के पकवान बनाये पर चिन्मय को अच्छा नहीं लगा.वह स्कूल जाने को भी तैयार न हुआ भला स्कूल में वह क्या बताता कि उसके मम्मा पापा रंजीता और सुमित नहीं कोई और हैं.वह न बोलता न खाता पीता बस गुमसुम नाराज सा बैठा रहता.

तीसरे दिन विधा प्रातः उठी ही थी कि घंटी बजी, उसने द्वार खोला तो सामने रंजीता और वंदन खड़े थे.वंदन को देखते ही उसने उसे हृदय में भींच लिया, वंदन भी रुँआसा हो गया ‘‘मम्मी मुझे अपने पास रख लो न ,प्लीज......’’

‘‘ विधा! मेरा बच्चा कहाँ है? उसने कुछ खाया क्या वह तो अभी भी मेरे सिवा किसी के हाथ का बना खाना नहीं खाता उसकी कपड़ों की पसंद आदतें सब मैं ही तो जानती हूं मेरे बिना वह कैसे रह रहा है?  ’’रंजीता एक साँस में ही बोल गयी।

 तभी चिन्मय चहकता हुआ बोला ‘‘मम्मा आई मिस यू ’’और रंजीता के गले लग गया.विधा ने तीन दिनों में पहली बार चिन्मय को प्रसन्न देखा था।

  विधा ने निर्णय ले लिया, उसने कहा ‘‘ मैं ने सोच लिया है मैं किसी की नहीं सुनूंगी वंदन मेरे पास रहेगा और चिन्मय तुम्हारे पास ’’ फिर उसने रंजीता से अनुनय करते हुए कहा ‘‘ रंजीता तुम क्या मुझे कभी कभी चिन्मय से मिलने दोगी?’’

रंजीता ने उसका हाथ पकड़ कर कहा ‘‘ तुमने मेरे मन की बात कह दी ’’

‘‘ तो तय रहा आज से हम दोनो ही देवकी भी हैं और यशोदा भी’’ विधा ने निर्णायक स्वर में कहा।

यह सुन कर दोनो बच्चे एक साथ बेाल पड़े ‘‘हुर्रें . ’’

मैं ,अलका प्रमोद ने भले ही इलाहाबाद विष्वविद्यालय से वनस्पति विज्ञान में एमएससी किया और जीविकोपार्जन हेतु उ0प्र0 पावर कारपोरेशन विभाग लखनऊ को चुना पर छात्र जीवन में लिखी गई कालेज पत्रिका व आकाशवाणी में प्रकाशित प्रसारित रचनाए सिद्व करतीं हैं मेरे मन में सुप्त रचनाशीलता के बीज की। 
     जब जीवन के मोड़ पर अचानक  कठोर  धूप से सामना हुआ तो ताप में झुलसते मन को पापा साहित्यकार  श्री कृष्णेष्वर डींगर ने लेखन के लिये प्रेरित किया  । काल के कठोर प्रहारों से विचलित भटकते मन को ठंडक मिली सृजन की छांव में। लगभग वर्ष1992-1993 में पुनः गति पा कर आज तक सतत गतिशील है और जब भी मन व्यथित हुआ है तो सृजनशीलता ने संरक्षण दिया है। प्रथम कहानी मुक्ता पत्रिका में प्रकाशित हुई तब से अभी तक पांच कहानी संग्रह 1.सच क्या था 2.धूप का टुकड़ा 3.समान्तर रेखाएं 4.स्वयं के घेरे 5. रेस का घोड़ा, 6.उपन्यास-.यूं ही राह चलते चलते तथा नौ बाल विज्ञान एवं साहित्य की पुस्तकें 7.नन्हे फरिश्ते 8.. चुलबुल-बुलबुल , 9. अन्तरिक्ष की सैर 10.. मशीनी जिन्न 11.. सौर ऊर्जा और उसके प्रयोग 12..विज्ञान कल से आज तक, 13.मशीनी मानव रोबोट  ,14. चन्द्रशेखर वेंकट रमन, 15.डा0 ए पी जे अब्दुल कलाम , अस्तित्व में आ चुके हैं।                                                  

जिनके लिये यदा कदा मिलने वाले लगभग 22- 23 पुरस्कारो/ सम्मानों,जिनमें उ0 प्र0 हिन्दी संस्थान के विद्यावती कोकिल जैसे महत्वपूर्ण सम्मान तथा होमी भाभा संस्थान ,दिल्ली प्रेस द्वारा प्रदत्त प्रतिष्ठित पुरस्कार भी सम्मिलित हैं, ने मुझे प्रेात्साहित किया तो मेरी कुछ रचनाओं के अनुवाद और शोध छात्रों द्वारा मेरे रचना संसार पर शोध ने मेंरे आत्मविश्वास में वृद्धि की। द संडे पत्रिका ने सदी की 111 महिला साहित्यकारों मे स्थान दे कर मुझे  कलम को निरंतर चलने के लिये प्रेरित किया ।
      मेरे जीवन में प्रायः मन पर हस्ताक्षरित आस-पास की घटनाओं ने मन को उद्वेलित कर कलम उठाने को विवश किया तथा कल्पना के ताने बाने में  गुंथ कर कहानी/ उपन्यास के पात्र अनायास ही आ खड़े हुए । इस प्रकार कहानी और उपन्यास   आकार ग्रहण करते रहे हैं। मन के भावों के संप्रेशण हेतु  कविताओं ने जन्म लिया।
    प्रत्येक रचना के जन्म ने मुझे मात्त्व का सुख दिया और हर बार जब रचना प्रकाशित हुई तो लगा मेरी संतान ने सफलता के सोपान चढ़ मुझे गैारवान्वित किया है। हां मेरा यह मानना है कि भले ही सृजन अभिव्यक्ति का माध्यम हो पर वह मात्र तभी तक स्वांतः सुखाय  होता है जब तक डायरी के पन्नों में बन्द रहता है। जब कोई भी रचना पाठकों को समर्पित होती है तो वह समाज की थाती बन जाती है अतः रचनाकार का समाज के प्रति गंभीर दायित्व हो जाता है अतः विधा कोई भी हो विचार यथार्थ हो या कल्पना मेरा यह प्रयास अवश्ष्य रहता है कि मेरी रचना समाज में मनोरंजन के साथ साथ समारात्मकता विस्तारित करे। 

pandeyalka@rediffmail.com

 

Share on Facebook
Share on Twitter
Please reload

eKalpana literary magazine

​​Contact & Social Media -

ekalpanasubmit@gmail.com

सभी रचनाएं
ekalpanasubmit@gmail.com पर भेजें
Please reload

Please reload