• डॉ० रजनीकांत

बूहा करे झम झम


मेरा शैशव अमृतसर में बीता है। अमृतसर वास्तव में सिफतियों का घर है। मैं प्रारंभ से खिलंदड़ प्रकृति का रहा हूँ। स्वर्ण मंदिर के समीप जलियांवाला बाग की पश्चिम की ओर खुलने वाली गली में हम रहा करते ते थे।मेरे पिता जी किसी नामी प्राईवेट स्कूल में शिक्षक थे। उस समय अध्यापन व्यवसाय की बड़ी कद्र थी,बड़ा सम्मान हुआ करता। तब किराये पर मकान भी सस्ते मिल जाते थे। हमारे पास उस समय हालनुमा दो बड़े- बड़े कमरे थे। हमारे कमरे के बिल्कुल साथ लगते कमरे में मेरी माता जी की मौसी के बेटे सोमराज रहा करते थे। वह किसी पंजाबी प्रिंटिंग प्रेस में कर्मचारी थे। बड़े हंसमुख। ज़िंदादिल इंसान थे -सोमराज मामा। हर समय उनका माथा खिला - खिला रहता था।मैं उन्हें मामा' कह कर -।मामा संबोधन सुनना उन्हें भला लगता। मामा सचमुच बड़ा प्रसन्न होते । उस समय सिनेमा बड़ा सस्ता था।मैंने मामा संग पहली बार पहली पिक्चर आई मिलन की बेला 'केवल मात्र पिचहत्तर पैसे में देखी थी।उस दिन मुझे जैसे कारू का खजाना मिल गया था। बोलते,गाना गाते और हंसते हुए पात्र बड़े भले लग रहे थे।। मुझे सचमुच इस पिक्चर का नशा कई दिनों तक रहा।रोज़ मैं उन दृश्यों को याद करके हंसता रहता।

मामा सोम के साथ मुझे घुला मिला देखकर माँ मुझे प्राय: डांट पिला देती

-मैंने नोट किया है तू सोम के साथ घूमता फिरता रहता है।देख पढाई सबसे पहले!बाकी के काम बाद में।अपने पढने -लिखने का काम भी सबसे पहले निपटा लिया कर। सोम तो छड़ा- छटांक है।इसका क्या? अभी तक उसकी शादी भी नहीं हुई। तुझे तो अभी बहुत कुछ करना है।पढ़ लिखकर बड़े बनना है।सुन रहा है मैं क्या कह रही हूँ।

-माँ! मैं स्कूल का सारा काम करके ही मामा के साथ जाता हूँ।आप ऐसे ही नाहक चिंता करते हैं।फिर मैं चुपी ओढ़ लेता। पर पता नहीं क्यों,मामा के साथ मैं बड़ा प्रसन्न रहता।मुझे इस बात का अहसास था! उनकी संगति में दिलेर बन जाता। मामा सोम थे भले आदमी। मैंने मामा के माथे पर कभी भी शिकन नहीं देखी। मामा सदैव मुस्कराकर बात करते। मुस्कराहट लिए सामने वाले को भा जाते। मामा सोम में किसी को अपना बनाने के सभी गुण विद्यमान थे। सुख हो या दुःख हो सदा मुस्कान बिखेरते रहो 'मामा का मूल - मन्त्र था।मामा के पास एक रेडियो था। मैं गाने सुनने अक्सर मामा के यहाँ चला जाता। मुझे संगीत का जैसे चस्का लग गया था। मामा अक्सर रेडियो के साथ- साथ गुनगुनाते। मामा सोम के हाथों की फुर्ती देखने वाली होती। आटा गूंथते ,सब्जी बनाते ,मामा हमेशा कोई न कोई गीत,टप्पे अथवा लोकगीत गुनगुनाते मिलते।

कोई बीस सीढियाँ ऊपर चढ़कर लंबी -चौड़ी छत थी। जिस के अंतिम छोर पर चार फुट की लोहे की रैलिंग लगी हुई थी।छत के ऊपर से बाजार का पूरा नज़ारा दिखाई दे जाता था। कोठे के ऊपर से प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर दीख जाता। मैं और मामा अक्सर वहीँ खड़े मिलते। रेलिंग पर गली के परिदृश्य बखूबी देखे जा सकते थे।बाजार में हर समय रौनक रहती। जलियाँ वाला बाग की गलियों में कंचे खेलते हुए बच्चे, पतंगें उड़ाते,पतंगों के पीछे भागते,बच्चे अक्सर दीख जाते। बिलकुल सामने शहीदी कुआँ,गोलियों के निशान वाले स्थान,पानी के फुहारे,बखूबी देखे जा सकते थे। हमारे मकान के बिलकुल सामने वाले मकान की बड़ी छत बड़े मैदान की झलक प्रस्तुत किया करती। एक कोने में एक कबूतर खाना बनाया हुआ था। एक बड़े से बक्से में अलग अलग खानों में कई प्रकार के दड़बे बनाये गये थे। दड़बे में घुसते -बाहर आते,नीले -सफेद कबूतर बड़े सुंदर लगते। नीली गर्दन के स्वामी। शिव के नीलकंठ होने का भ्रम पैदा करते हुए। गुटरगूं करते कबूतर।निरीह और भीरु उड़ारी भरते कबूतर। चुग्गा -चुगते समूह में कबूतर। हमें भले लगते।हम उन्हें खड़े बस निहारते रहते। यह हमारा रोज का शगल था।कबूतरों का मालिक अधेड़ उम्र का था। वह रोज उनकी चोंच का निरीक्षण करता। उनके मुंह खोल कर देखता। अपने हाथ पर उन्हें चुग्गा खिलाता।उन्हें पानी पिलाता। सभी क्रिया कलापों को हम दूर खड़े बड़ी बारीकी से देखते।हमें यह देखना बड़ा अच्छा,बड़ा भला लगता।

हमने देखा बीच- बीच में उस अधेड़ पुरुष की लड़की की भी छत पर दृष्टिगोचर हो जाती। उस लड़की की आयु कोई बीस बाईस बरस की रही होगी। साफ़ गोरा रंग। बड़ी- बड़ी आँखें। लंबी चोटी जो उसके घुटने तक पहुंचती। कभी वह अपनी चोटी को हाथ में लेकर घुमाने लग जाती। इस अदा पर हमारा मामा सोम फ़िदा हो जाते। मामा का चेहरा रंग बदलने लगता।उनका रंग लाल गुलाल हो जाता। जब वह युवती कबूतरों के पीछे दौडती। खूब खिलखिलाती। जोर- जोर से हंसती। शायद उसे पता था कि कोई उसे निहारता है। उस समय हमारा मामा सोम भी पच्चीस वर्ष का युवक पट्ठा था!सांवला रंग। गठीला शरीर। पांच फुट साढ़े पांच ईंच कद। किन्तु आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे - हमारा मामा श्री सोमराज। युवती की विभिन्न भाव भंगिमाओं से मामा के दिल पर सैंकड़ों छुरियाँ चलती।मैं अब कुछ - कुछ समझने लग गया था कि मामा का दिल सामने वाली युवती के लिये धडकता जरूर है।

उस लड़की को देखने का मामा को तो बहाना चाहिए था। मामा मुझे पढ़ने के बहाने ऊपर बुला लेते। माँ को संदेह न हो जाये इसलिए मामा मेरा स्कूल का गृह कार्य वही पर संपन्न करवा देते। कभी कभी मामा मुझे काम पर लगाकर खुद रेलिंग पर आँखें सेकने डट जाते। मामा बड़े ध्यान से उस लडकी के क्रिया कलापों को बड़े गौर से देखते। ध्यान निमग्न।एकटक।इस समय दीन दुनिया की मामा को खबर न होती। जैसे कोई तपस्वी तप में लीन हो जाता है। सुध -बुध भूलकर। यह तो मामा का दैनिक कार्य था।खाना भी बनाना है,कभी कभी यह भी भूल जाते। मैं याद दिलाता मामा आज खाना नहीं बनाना क्या?तब जाकर मामा वहां से हिलते।

फिर,महाराज!एक दिन दोनों की नजरें मिलीं।और तय मानिये कि सचमुच शरमा गईं।इसी मुकाम पर,हसीन जिन्दगी धोखा खा गईथी। ऐसा लगता जैसे मामा को तो मानो कोई अलौकिक कारु का खजाना मिल गया हो।अब तो सोम मामा का चेहरा खिला - खिला रहने लगा। मामा सांय पांच बजे काम से छुट्टी करके कोठे पर ड्यूटी संभाल लेते। बिल्कुल उसी तरह जैसे कोई फौजी अपना मोर्चा कर्मठ होकर संभालता है। क्या मजाल कि कोई दिन खाली चला जाए जिस दिन हमारा मामा सोम उस कन्या को निहारे बगैर रह जायें। और वह कन्या भी निश्चित समय पर अपनी छत पर पहुंच जाती! और इधर से अपना नौजवान पट्ठा,हमारे मामा श्री सोम जी आँखों में सुरमा डाल और कमीज की जेब में लाल रुमाल सहेजकर,कोठे पर मोर्चा संभाल लेते। युवती ने अब कबूतरों की तीमारदारी का काम खुद संभाल लिया था। कई दिनों से युवती का बाप दिखाई नहीं दिया था। मामा अब इस्त्री किये वस्त्र पहनते। क्या मजाल कि कोई सिलवट मामा के कपड़ों पर आपको मिल जाए। कपड़ों पर सेंट की खुशबू दूर से पता चल जाती।सिर में अंग्रेजी तेल की सुगंधि दूसरे व्यक्ति को ओर आकर्षित करती।

मामा अब नौ पर नौ रहने लगे। कितनी बार शीशे के सामने खड़ा होकर खुद को निहारते। कई कोणों से कपड़ों को देखते। जायजा लेते। कई बार तो मुझसे पूछ लेते

-मुन्नुआ!सच सच बताना मेरी कंघी जच्च रही है ना। कहीं बाल बिगड़ तो नहीं गये क्या?

-मामा सच बताऊँ आप तो फ़िल्मी हीरो धर्मेन्द्र की माफिक लग रहे हो। कसम से। और मामा नई दुल्हन की तरह शरमा जाते। मामा का मुखड़ा लाल हो जाता।

मामा यह पंक्तियाँ दिन में एक दो बार जरुर दुहराते।

बूहें बैठीं भैण बूहा करे भैण भैण

बूहैं बैठी माँ बूहा करे बां बां,

बूहें बैठी रण बूहा करे झम झम।

झम झम वाली पंक्ति पर मामा बहुत प्रसन्न होते।इसे कई बार दुहराते।तब उनकी आकृति देखने वाली होती।रन्न’ शब्द पत्नी के लिए प्रयुक्त होता है।एक नवयुवक अपनी भावी पत्नी को लेकर कई सपने संजोता है।शायद मामा ने भावी पत्नी के लिए बहुत कुछ सोच रखा होगा।तभी तो दरवाजे पर बैठी पत्नी से दरवाजा भी झम -झम करने लगता है। रन्न ‘शब्द के आगे सब रिश्ते पानी भरने लगते हैं।फीके पड़ जाते हैं।मामा की आयु वर्ग के युवा ऐसे ही व्यवहार करते हैं।सुंदर युवतियों की कल्पना करते हैं।कहते हैं कि जवानी मारोमार करती आती है।इस आयु के पड़ाव में युवक खुद को खूब सजाता है।कपड़े पहनकर कई कोणों से दर्पण में देखता है।मामा सोम का व्यवहार बिलकुल ऐसा ही था।

अक्सर मामा सोम माँ से आते - जाते प्रणाम अवश्य बोल लिया करते।माँ भी मामा को आशीष के बोल बोल देती।लम्मियाँ उमराँ होण।मेरे भाऊआ! एक दिन माँ को सोम मामा पर संदेह हुआ और माँ ने पूछ ही लिया

-भाऊ!क्या बात है?आजकल बड़ा बन -ठन कर रहता है।आँखों में सुरमा। कपड़ों में सैंट।मैं यह हर रोज़ देख रही हूँ। मुझे तेरे लछण ठीक नहीं लग रहे। सच सच बता!शादी के लिए कोई कुड़ी तो नहीं देख रखी क्या?भाई,मुझे बता जरूर देना। नहीं तो मेंरी मासी मुझे मीहणे मारेगी।कहेगी -कुड़िये तूने मुझे आगाह क्यों नहीं किया?एक छोटा भाई तेरे हवाले किया था!तूने इसका ध्यान नहीं रखा।पूरी उम्र मौसी मुझे बातें सुनाती रहेगी!सो सोम भाई।अपने दिल की बात कम से कम मुझे जरुर बता देना।छिपाना मत। अगर कोई कुड़ी तूने पसंद भी की है तो आकर बड़ी बहिन के कान में बता जाना।मेरा भाऊ और किसको बतायेगा?ले देकर पूरे शहर में एक अकेली तेरी भैण है।सोच ले।नहीं तो तेरी शादी की बात मुझे ही कहीं चलाने पड़ेगी मौसी से।माँ ने सहज स्वभाव कह दिया था।सुनते ही मामा को जैसे करंट लग गया।

-बहिन जी!आपके पैर पड़ता हूँ।कुछ मत बोलना माँ से। आपको मेरी कसम!पता नहीं माँ पता नहीं कैसी अनपढ़ और गंवार कन्या मेरे लड़ बाँध दे।कहीं उम्र भर का रोना मेरे पल्ले न पड़ जायेगा।कहाँ अमृतसर का शहरी गभरू? कहाँ पेंडू और गंवार कुड़ी गाँव की।,न बाबा न!कुछ मत बताना माँ को। मैं तो शहरी कन्या के साथ ही शादी करूंगा। देख लेना। आप देखते रहना बस। एक सांस में बोल गये थे - मामा सोम।

-जली गया तेरा नक्क(नाक )। बड़ा आया शैहरी। मुंह देखा अपना कभी शीशे में। शैहरी कुड़ी तुझे बेच कर खा जाएगी। क्या समझे?तू साईं लोक है।भोला है मुन्नू तू। तूने दुनिया नहीं देखी अभी सोमेया। माँ का स्वर था

-ना बहिन जी! ऐसी कोई बात नहीं,शहरी लडकियाँ पढ़ी लिखी होती हैं!पढ़ी लिखी लड़कियां पूरे परिवार को पढ़ा देती हैं। बहिन जी। मैंने अपनी भरजाइयां देखी हैं!मेरी भाभियाँ इकदम बुद्धू और निरी मूर्ख औरतें है।,न दीन का पता न दुनिया की खबर!न बैठने का ढंग,न उठने का शऊर !और बच्चे तो इनके पूछों मत!निरे नलकट हैं। भैण जी,आप बस रहने ही दो,पेंडू कुड़ियों को। मामा के तर्क माँ बड़े गौर से सुनती। और हंस देती। माँ मामा को अक्सर शादी के नाम पर चिढ़ा देतीं।

-जा चौबरा तेरी मर्जी! खुश रह,मुन्नुआ!माँ हंस देती।मैंने नोट किया मामा माँ के सामने बहुत कम ही आते। माँ से बड़ा घबराते थे।

छोटे से शीशे में मामा दिन में दस -दस बार खुद को निहारते।शायद यह उमर का पड़ाव ही ऐसा था। छोटे से दर्पण को एक दिन मामा सोम ने तोड़ दिया और दूसरे दिन मामा सोम पता नहीं कहीँ से एक बड़ा सा दर्पण ले आये! दर्पण देखते हुए मामा कुछ न कुछ बोलते रहते। कुछ बड़बड़ाते रहते।अपने आप से बातें करते।नये -नये फ़िल्मी गीत गुनगुनाते खुद को व्यस्त रखते। मामा अपने आप को किसी समकालीन नायक से कम नहीं समझते थे। एक दिन मामा बाजार से एक सस्ती शायरी की पुस्तक भी खरीद लाये। उसमें से अब कई शेर मामा ने मुख जुबानी रट भी लिए थे।मामा को कई कहावतें और लोकोक्तियाँ स्मरण थीं।उनकी स्मरण शक्ति गजब कीथी।

खुद से प्रेम करने की एक उम्र हुआ करती है।शायद यही उम्र मामा सोम की थी। मामा का खिला चेहरा सारी कहानी बयां कर देता। पता नहीं मामा के कान में किसी ने फूक मार दी कि सोमवार के निरंतर व्रत से इच्छित युवती प्राप्त हो जाती है। महाराज!सोम मामा ने सोमवार के व्रत निरंतर रखने शुरू कर दिए। सोमवार के दिन मामा मौन व्रत भी धारण किये रहते।। मामा और चीज़ शायद भूल जाएँ पर शाम को कोठे पर जाना कभी नहीं भूलते थे। क्या मजाल कि कोई इस कर्तव्य में खलल डाल जाए। या किसी किस्म का व्यवधान पड़ जाए। नियम बनाना और उनका पालन करना तो कोई मामा सोम से सीखता।

सामने वाली वह युवती भी शाम को निश्चित समय पर कबूतरों को चुग्गा डालने पहुंच जाती।यह नित नेम मैंने कभी टूटते नहीं देखा।चाहे मौसम कैसा भी रहा हो। यह कड़ी कभी टूट नहीं पाई। मामा को देखकर वह युवती जैसे गदगद हो जाती। खिल- खिलाती!जोर --जोर से हंसती। अपनी ओर आकर्षित करने का एक नायाब ढंग था उसका। फिर हंसते हंसते,यकायक एक कबूतर को हाथ में पकड़ लेती!उस की गर्दन में अपने गोरे हाथ फ़िराने लग जाती।कभी - कभी भावुक होकर किसी कबूतर को चूम लेती। मैंने पाया ऐसा करते हुए मामा को वह अक्सर निहारने लगती। मामा सोम को यहीं खड़े -खड़े सिरहन सी महसूस होती। मामा का रंग लाल हो जाता।उसके बाद मामा अपने बाल एक अदा के साथ झटक देते। मुझे बखूबी याद है कोठे पर से नीचे आते हुए वह गंभीर मुद्रा अपना लेते!

दिन पंख लगाकर उड़ रहे थे। एक दिन मामा ने उक्त लड़की को गली में आते देखा। पूर्ववत लिखे रुक्कानुमा खत को अपनी जेब से निकाला और मुझे पकड़ाते हुये मेरे घर के नाम से पुकारा और कान मेँ फुस फुसाते हुए कहा

-कुक्कू ! मेरी बात बड़े ध्यान से सुन। तुझे आज मेरा एक जरूरी काम निपटाना है। मुझे पता है कि तू ही इस काम को करने में सक्षम है। यह पुर्जा उस सामने वाली कबूतर कन्या को देकर आना है।और ध्यान रहे किसी और अजनबी के हाथ में यह पुर्ज़ा न आये। कोई जितना भी पूछे तूने किसी को बताना नहीं। और एक बात और दीदी को भी यह राज़ मालूम न हो। देख,यह राज़ तेरे मेरे बीच ही रहे।मेरी लाज अब तेरे हाथ में है!सुन, अगर तू पुर्जे को पहुचाने में कामयाब हो गया तो तुझे मैं पिक्चर दिखाने अवश्य ले जाऊँगा। यह मेरा वायदा है तुझसे। पक्का वाला वायदा। सट वाचे पर वाचा। मेरे हाथ पर अपना उल्टा हाथ मारते हुए मामा ने कहा।

पहली बार मैंने मामा की आँखों में झांककर देखा।बहुत कुछ समंदर की तरह गहरा- गहरा सा।मैं उस दिन से मामा का हमराज बन गया। सन्देशवाहक की भूमिका के महत्व को मैं पहली बार समझा था।पुर्जा मैंने निक्कर के हवाले किया। गली अंतिम छोर में किसी का इंतजार करती उस कबूतर -कन्या को वह पुर्ज़ा पकड़ा दिया। उसे संकेत से बता भी दिया कि किस प्राणी ने उसे यह पुर्जा दिया है? मैंने यह काम तत्परता से,बड़ी होश्यारी से और पलक झपकते ही कर दिया था। साथ देख भी लिया कि कोई मुझे देख तो नहीं रहा है। खुद भी हैरान था कि मुझमें इतनी ऊर्जा और इतनी शक्ति कहाँ से आ गई?मेरा सांस ऊपर का ऊपर और नीचे का नीचा था। मैंने अपनी छत पर आकर संतोष की साँस ली।मैंने मामा का इतना बड़ा दुष्कर कार्य जो कर दिया था! मामा सोम ने मुझे पिक्चर दिखाने का दृढ निश्चय दुहराया।

शाम की बेला। अभी गली में लाइटें नहीं जली थीं।उधर से एक कबूतर ने उडारी भरी। और एक रुक्कानुमा पुर्जा फैंक कर चला गया। इस पुर्ज़े में रात्रि आठ बजे मामा को जलियाँ वाला बाग़ में मिलने हेतु बुलाया था। पुर्जे के नीचे नाम लिखा था -लाजो। मामा ने उस पुर्जे को कई बार चूमा। मामा ने चार बार लाजो नाम अपने होठों से पुकारा। मामा का चेहरा लाल हो गया। सामने छत पर खड़ी लाजो मुस्करा रही थी।हाथ हिला रही थी। मामा ने नीचे आकर ईस्त्री किये वस्त्र डाले। नये एक दम चकाचक। फिर कपड़ों पर सेंट छिड़का। दर्पण के सम्मुख खड़े होकर खुद को कई कोणों से संवारा। कंघी की। बाल काढ़े। एक नयी प्रकार की शैली से बाल बनाये। एक नये रुमाल को पेंट की जेब के हवाले किया।

-मामा आप तो एकदम हीरो लग रहे हो।कसम से। किसी की नजर न लग जाए मेरे मामा को। खुदा बुरी नजर से बचाए मेरे प्यारे मामा को। मामा ने धन्यवाद की मुद्रा में हाथ ऊपर उठाया।मामा जमीन पर कहाँ थे?वह आसमान में उड़ रहे थे। बहुत ऊँचे।

-तू भी तो अपनी भावी मामी को देखने मेरे साथ जा रहा है। मेरे साथ -साथ ही रहना। कहीं खिसक न जाना। मेरे साथ भी तो कोई साथी होना चाहिए। अकेला तो अकेला होता है। बस एक बात का ध्यान रखना कहीं तेरी मम्मी को इस बात का पता न चलने पाए।नहीं तो बना बनाया खेल बिगड़ जायेगा। बस, यह होश्यारी रखना। मेरे प्यारे दोस्त। अब तू तो मेरा पक्का राज़दार हो गया है। इतनी बड़ी पदवी।मैं सचमुच बड़ा प्रसन्न था।

-और मेरे दोस्त की पिक्चर पक्की। एकदम पक्की। मामा ने अपना वायदा एक बार फिर दुहरा दिया।सचमुच फिल्म के लाल्ली पॉप ने मुझे बाँध लिया था।

मैं दबे पांव चलकर , मामा से पहले गली में पहुँच गया। माँ को कानों - कान भी इस बात की खबर नहीं हुई। हमने इस बात की हवा नहीं लगने दी।मैं और मामा सोम बाग़ के प्रमुख द्वार पर इंतजार कर रहे थे। मामा अपनी घड़ी को एकटक देखे जा रहे थे। कहीं यह मरजानी खड़ी तो नहीं हो गई। फिर घड़ी को बार बार कान से लगाकर सुनने लगे। मैं मामा की स्थिति को बखूबी समझ रहा था।उनकी उतावली किसी को भी विस्मय में डाल सकती थी। कुछ- कुछ मेरी समझ में आ रहा था। कई विदेशी पर्यटक शहर में पधार चुके थे। कुछ विदेशी पर्यटक हाथों में महंगे कैमरे लिए हमारे आगे -आगे चल रहे थे। अभी साढ़े सात ही बजे थे। आधा घंटा शेष था। मामा मुझे लगभग घसीटते अपने साथ लिये जा रहा थे। उद्विग्नता का आधिक्य मेरी बाल- बुद्धि की समझ से बाहर था। मामा जल्दी से जल्दी शहीदी कुएं के पास पहुंचना चाह रहे थे। कहीं समय से पहले ही लाजो न आ गई हो। ऐसा भी तो हो सकता है।मैं और मामा एक कोने में जाकर खड़े हो गये। लोग आ जा रहे थे।खूब रौनक थी आज।

सवा आठ का समय। ट्यूब लाइटें खूब जगमगा रही थी। हर चीज प्रकाश में चमक रही थी।बाग़ में फवारे चल रहे थे। बच्चे खड़े होकर दृश्य को निहार रहे थे।महाराज। लाजो मुख्य -द्वार से प्रकट हुई। मैंने ज़िंदगी में पहली बार कोई इतनी खूबसूरत लडकी देखी थी। एक दम गोरी -चिट्टी।सोलह कला संपन्न। सुन्दरता की प्रतिमा। मानो खुद खुदा ने फुर्सत में उसे घड़ा हो। मामा तो उसे इक टक निहारे जा रहे थे। लाजो हमारे और समीप आ गई थी।सफेद सलवार कमीज़ में वह परी से ज्यादा सुंदर लग रही थी। मामा ने मुख खोला और तोल -तोल कर बोलना शुरू किया

-ऐ रब्बा। तू मुझ पर इतनी जल्दी मेहरबान हो जायेगा। मैंने तो सपनों में भी सोचा नहीं था। मुझे तो यह पता भी नहीं था कि नसीब मुझ पर इतना दयालु हो जायेगा। लाजो तूने अपने वायदे को साकार कर दिया। तेरा बहुत बहुत शुक्रिया मेरे मालिक।किन शब्दों में तेरा धन्यवाद करूँ ऊपर वाले।मुझे तो खुद पर यकीन नहीं हो रहा है।मैं सच कह रहा हूँ। इसमें लेशमात्र भी झूठ नहीं। लाजो आकाश से उतरी कोई स्वप्न सुंदरी लग रही थी। मुझे आशंका हो रही थी कि कहीं मामा आज अपना मानसिक संतुलन न खो दे।और उधर लाजो छुई- मुई की तरह शर्मा रही थी। वह नजर झुकाए अपने दायें पैर के अंगूठे से जमीन कुरेद रही थी।

-लाजो तू भी तो कुछ बोल। देख आज चुप मत रह।अपने प्यार का इजहार कर।प्लीज़,मेरे लिए दो शब्द कह दे।ताकि मेरे दिल को चैन मिल जाए।इसे करार आ जाये।इससे पहले मेरे दिल की गति कहीं बढ़ न जाये,अपनी जुबान से दो बोल बोल दे।देख,शरमा मत।अच्छा,इससे शरमा रही है।कोई बात नहीं। यह छोटा अपना ही दोस्त है.।रिश्ते में मेरा भानजा लगता है। घबराने की कोई बात नहीं। जो बोलना चाहती है सब बोल दे। मेरे कान तेरे बोल सुनने के लिए बेताब हैं। अब और सहा नहीं जाता। अगर तू इस तरह से चुप रही तो मुझे लगता है कि कहीं मैं गिरकर बेहोश न हो जाऊं। बस, मेरे कानों में रस घोल दे। देख तुझे मेरी कसम।मामा ने जो सोच रखा था,वह सब अपने अंदाज़ में सब ब्यान कर दिया था।

अरे यह क्या?लाजो ने अपना दायां हाथ मुंह और कानों के पास ले जाकर संकेतों से बताया कि वह न बोल सकती है। और न ही सुन सकती है!मामा को काटो तो खून नहीं। यह सब एकदम हो गया कि मामा को संभलने का मौका भी नहीं मिला। मामा सोम की जगह कोई और होता उसे भी जोर का झटका लगता। मामा कभी लाजो की ओर देखते और कभी मेरी ओर देखते। मैंने देखा लाजो की मोटी- मोटी आखों से नीर बह रहा था। वह सुबक सुबक कर रो रही थी। लाजो ने मामा को एक बार कातर दृष्टि से देखा। एक असहाय नजर। मजबूरी की दृष्टि। बेबसी की नजर। वह नज़र मुझे आज तक याद है। लाजो को पता नहीं क्या सूझी।वह रोते -रोते विपरीत दिशा की ओर भागी भागती चली गई। यह इतनी जल्दी हो गया कि मैं भी सकते में आ गया। यह हो क्या रहा है ?मुझे सोचने का समय नही मिला। इस बात का हमें दुःख था कि हम लाजो को चाहकर भी रोक नहीं सके।

मैं किंकर्तव्य विमूढ़ स्थिति में था। मामा तो वहीँ बैठ गये थे। उनकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया ।! मामा ने एक हाथ से रेलिंग पकड़ रखी थी। मामा मन मसोस कर रह गये। क्या सोचा था और क्या हो गया?.इसकी कल्पना भी मामा ने कभी की नहीं होगी। मन कड़ा कर मामा सोम अपनी जगह से उठे।मेरे कंधे पर हाथ रखा। उड़ती दृष्टि से आकाश की ओर देखा। जैसे कह रहे हों

-नीली छतरी वाले। मेरे साथ कौन से जन्म का बदला लिया तूने।आज क्या दिन दिखला दिया तूने?मामा के आंसू रुक नहीं रहे थे। मामा आज एक बच्चे की तरह रो रहे थे जिसका प्रिय खिलौना किसी ने छीन लिया हो।एक के साथ मेरी पींगें क्यों बढने दी? अगर प्रेम के जाल में फंसाना ही था तो उस बेचारी की जुबान क्यों ले ली?मामा अकेला बड़बड़ा रहे थे। दो घंटे पहले वाला जोश अब बिलकुल गायब था।लुप्त था। मामा अब भारी मन से धीरे -धीरे कदम बढ़ाकर चलने का प्रयास करने लगे थे।बोझिल कदम उनका साथ नहीं दे पा रहे थे।उनके सपने चूर चूर जो हो गये थे। आदमी सोचता कुछ है और होता कुछ है।जैसे उस ऊपर वाले को मंजूर।

और अगले दिन मामा ने सुबह तड़के ही सारा सामान सिमेटना शुरू कर दिया।खटखट की ध्वनि से माँ को पता चला।कमरे में देखा सोम मामा को बिस्तर बाँध रहे थे। माँ ने उसी समय पूछ लिया

-भाई सोम। क्या बात है?बहिन से क्या कोई नाराजगी है। क्या बात तू अपना सामान बाँध रहा है?क्या कोई नया मकान ले लिया तूने?तेरे कमरे से खटखट की आवाजें आ रही थीं।मुझे शक हुआ कि सोम इतने सवेरे कर क्या रहा है?मैं तुझसे पूछ रही हूँ सोम!सच सच बता,क्या हुआ तेरे साथ?क्या किसी पड़ौसी ने कुछ कह दिया ?जरा मैं भी उनसे पूछूं?देख छिपाना मत कुछ भी मुझसे।माँ ने मामा से साधिकार सब कुछ पूछ लिया।

-नहीं,बहिन जी।आपसे काहे की नाराज़गी।आपने तो मुझे अपने बेटे जैसा रखा। बहिन जी।आपसे क्या छिपाना?प्रेस के नजदीक ही एक अच्छा सा मकान मिल गया है। किराया भी कम है।मुझे यहां से प्रेस पहुंचने में एक घंटा लग जाता है।वहां मकान लेने से मेरा आने जाने का समय बच जायेगा। बहिन जी। मेरा समय यहां बड़े अच्छे से बीता है।दो साल पता नहीं कैसे कट गए?आपको मैंने दुःख ही दिए हैं। तंग ही किया है। कहा सुना माफ़ बहिन जी। मैं आपके पास आता रहूँगा।मामा की आँखों से आंसू बह रहे थे।माँ भी मामा के जाने से निराश और दु;खी थी।

माँ को माथा टेक मामा चलते बने। मैं मामा को जाते देख रहा था। मामा की आँखों में आंसू थे। मेरा एक अच्छा दोस्त जा रहा था।मैं मामा को चाहकर भी रोक नहीं सका। सच कहूँ,कुछ दिन मेरा दिल नहीं लगा। मामा का बंद कमरा उनकी अनुपस्थिति की चुगली खा रहा था। कुछ दिन ऐसे ही भान होता रहा कि मामा अभी आयेंगे मेरे साथ बतियायेंगे।पर मामा सोम कहाँ आने वाले थे?मामा मकान क्यों छोड़ गये हैं यह राज़ मुझे ही पता था।मैंने वह राज़ किसी को नहीं बताया।

समय सचमुच बहुत बेरहम होता है। किसी के लिए कहाँ रुकता है? एक दिन किसी काम के सिलसिले में मामा के गाँव जाना हुआ। देवयोग से मामा सोम भी वही मिल गये। मैंने झट पहचान लिया।मामा मुझसे बगलगीर हो गये। चेहरे की चमक गायब थी। कलमों पर सफेदी आ गयी थी। दिखने में भी कमजोर लग रहे थे।

-पहचाना मुझे?मैंने उन्हें छेड़ दिया था। कहीं भूल तो नहीं गये आप?

-ओ मुन्नुआ। मैं भला तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ? मेरे अच्छे राज़दार। तुम तब से मेरे दिल के कूजे में बंद हो गये हो।वही आत्मीय स्वर था।

-मामा!आगे से बड़े कमजोर लग रहे हो। क्या बात मामी खाना नहीं देती क्या?

-तू पूछ मत। घर गृहस्थी जली है बहुत खराब। इस चक्की में पिसकर आज तक कोई साबुत बच सका है? अब यह समस्या। अब यह चिंता। अब वह फ़िक्र। जवानी में तो इन्सान कला बाजियां मारता फिरता है।उलटबाजियां मारता है।आदमी बिन पंखों के उड़ता है।कभी मन में विचार आता है क्या मुझ पर जवानी आई भी थी या नहीं।आई भी क्या मुझसे बिना पूछे ही चली गई। मामा का निराशापूर्ण स्वर था।

-मामा जी। अपनी घर-गृहस्थी के बारे बताओ?आपके बच्चे कितने हैं?अब तो काफी बड़े हो गये होंगे।आजकल क्या करते हैं?मैंने जिज्ञासावश उनसे पूछ लिया था।

-पूछ मत भाई।तू ढकी रहने दे।मुट्ठी बंद रहे तो लाख खुल गई तो खाक की।किसी ने सत्य कहा है।चलो तुमने अगर पूछ लिया है तो बताता हूँ।मैं तीन- तीन लड़कियों का पिता बन गया हूँ। उन्हें अभी पढ़ा रहा हूँ।तीन- तीन बेटियों का बोझ ने मुझे कूबा कर दिया है कुक्कू।मुझे बूढा बना दिया है।क्या बताऊं?बेटियां तो पराया धन होती है। कल को बेटियाँ अपने घर चली जाएँगी। फिर रह जायेंगे हम दो बूढ़े प्राणी। लड़ते रहेंगे। झगड़ते रहेंगे। और क्या?अपना भविष्य धूमिल दिख रहा है ।

-हमारी मामी जी कैसी हैं ?हमारी प्रिय मामी का कैसा स्वभाव है?मैं मामाजी से व्यक्तिगत प्रश्न पूछ लिया था।

-इस औरत के विषय में तू मत पूछ।इससे तो रब्ब बचाए। महालड़ाकी। घर में छोडूं तो अम्मा से लड़ाई।और अमृतसर ले जाऊं तो पड़ोसनों से लड़ाई। किसी से इसकी बनती ही नहीं। क्या करूं?हर समय झगड़ा फसाद। मैं सामंजस्य करके इस औरत से निबाह कर रहा हूँ। अगर मेरी जगह और कोई होता कोई तो कल्ले बताल (बेताल )की तरह चीख मारकर घर से भाग गया होता। कभी कभी दिल में आता कि जोगी बन जाऊं। जंगल में जाकर ताड़ी लगा लूं। पर जब बच्चों की ओर देखता तो मन भावुक हो उठता। मामा सोम की आवाज में दर्द था। मैं और मामा छत पर खड़े होकर बातों में व्यस्त थे।

-मामा। वह कबूतरों वाली लाजो क्या आपको याद आती है या नहीं?या आप कहीं उसे एक बुरे सपने की तरह भूल गये?सच सच बताना।

-मूआ। वह कबूतरों वाली लाजो अब तक मुझे भूली नहीं है।कभी दिल के किसी कोने में उसके लिए एक हूक सी उठती अवश्य है। बस उसमे एक कमी थी कि वह बोल नहीं सकती थी। इस अनपढ़ औरत से तो बीस साबित होती।इतनी सुंदर,सुन्नखी।मैंने तो इतनी खूबसूरत औरत अपने जीवन में नहीं देखी।तूने तो उसे साक्षात् देखा है।प्रत्यक्ष को प्रमाण कि क्या जरूरत?यह तेरी मामी तो उसके पासंग भी नहीं। कहाँ जाकर छलांग लगा दूँ?तू ही बता।क्या करें?जैसे ऊपर वाला रखे वैसे ही आदमी को रहना पड़ता है।जीवन में हर जगह एडजस्ट करना पड़ता है। पुराने कर्मों का भुगतान तो इसी जन्म में करना पड़ता है।सो भुगत रहे हैं।निःश्वास आह छोड़ते मामा का स्वर था। ऐसा लग रहा था कि सोम मामा ने जीवन के युद्ध में हथियार डाल दिए हैं।

-हाथों की लिखी कौन मिटा सकता है?मेरी किस्मत में यही नमूना लिखी थी।मिट्टी का माधो। न थूकते बनता है न निगलते बनता है। गुस्सा तो भली लोक के जैसे नाक पर रखा है। मूई लड़ने को हर वक्त तैयार। किससे अपने दिल की बात कहूं? लोक तो महाराज। हंसते हैं। किस किस की बात सुनूं। तेरे साथ दिल की बात कर ली। तू तो मेरा राज़दार है बहुत पुराना। यह बातें भी सभी से नहीं बताई जाती। तू किसी से बताना भी मत। मामा ने मेरे कंधा थपथपा दिया था।

-मामा धीरज रखो। नहीं बताता। क्यों बताऊंगा?आपकी मेरी दोस्ती ऐसी कच्ची थोड़ी है।कभी यह मैत्री टूट सकती है भला? मैं हंस पड़ा था।

-यह तो ठीक कहा तूने। कबूतरों वाली लाजो कभी- कभी दिल के दरवाजे पर दस्तक दे देती है। सपनों में घेर लेती है। पहला प्यार किसे भूलता है?--नहीं भूल सकता। मामा का चेहरा मैंने पढ़ लिया था।उसचेहरे को मैंने बड़े समीप से देखा हुआ था।

-मामा सच- सच बताना। झूठ मत बोलना। अब भी सपनों में कहीं से बूहा झम -झम करता है क्या? मैंने एक प्रश्न उछाल दिया था।

-चूल्हे दी धूड। मराई गईयां मरचां। सोम मामा अपने घर से विदा होती लड़की की तरह रो पड़े थे। मुझे मामा सोम बड़े कमजोर,अवश और असहाय प्राणी लगे थे। अब मेरे कंधे पर मामा का सिर था।


 


नाम रजनीकांत

पिता का नाम -स्व० प्रकाशचंद शर्मा

योग्यता -एम०ए०-पीएच०- डी०

प्रकाशन -पांच कहानी संग्रह -तितली ,तिनका तिनका आशियाँ ,बीते लम्हों का दर्द ,मकड़जाल,स्मृतियों के आईने से |व्यंग्य संग्रह -कहाँ जाएँ पति बेचारे |

उपलब्धियां -कई सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरस्कृत |

आकाशवाणी शिमला और दूरदर्शन शिमला और जालंधर से हिंदी ,हिमाचली ,कविताएँ ,कहानियां और लघु कथाएं प्रसारित |

संपर्क सूत्र -गाँव -भंजाल ,तहसील -घनारी ,जिला -ऊना हिप्र०177213

चलित-94183 44159

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