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  • श्रद्धा पांडेय

हाय रे किस्मत!




नीलम! जल्दी से सारा सामान बटोर लो। कल घर चलना है।

पर काहे को? हम यहाँ ठीक हैं। हमें नाहीं जाना कहीं।

तुमसे पूछा है क्या? चलना है तो बस चलना है। कल सभी लोग सबेरे-सबेरे चल देंगे। कोई भी साधन मिलेगा, उसी से चल देगें।

खाना खिलाने के बाद नीलम ने फिर पूछा - क्या जाना जरूरी है। मोदी जी ने कहा है कि बस थोड़े दिन की बात है। और सरकार खाने-पीने का इंतजाम करेगी न।

तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? जब पूरे चाल में कोई न होगा तो सरकार भी इधर न आएगी। तुमको भूखे मरना है तो मरो। हम अपने बच्चों को लेकर घर जा रहे हैं तो बस जा रहे हैं।

देखो तुम गुस्सा मत हो, हमने हर महीने कुछ न कुछ बचा-बचाकर रखा है। उसी से काम चला लेंगे।

फिर वही रट! मैं कहे दे रहा हूँ जो सामान बटोर सकती है बटोर ले। आज रात का टाइम है। जो रूपया-पैसा छिपाकर रखी है, सब खोज-खाजकर संभालकर रख ले। बहुत बड़ी मुसीबत आई है। सबकी नौकरी ख़़तरे में है। अब अपने ज़मीन का ही भरोसा है। माँ-पिता की बातें नीतिका ने सुना तो इठलती हुई पापा के कंधे पर चढ़ गई और पूछने लगी-पापा हम दादी के घर जा रहे हैं क्या?

हाँ ननकी।

पर कब?

कल सबेरे-सबेरे।

ननकी खुश होकर भाई के पास दौड़ी.दौड़ी गई और उसे गोद में उठाते हुए नाचन.गाने लगी, दादा के घर जाएँगे, दूध.मलाई खाएँगे।

पूरी रात नीलम सो नहीं सकी। उठ-उठकर रूपया-पैसा खोजती रही और गिनती रही। कुल पंद्रह हजा़र रूपए निकले। उसकी खुशी का ठिकाना ही न था। सोच रही थी, कल जब राजेश को बताऊँगी कि मेरे पास पंद्रह हजा़र रूपए हैं, तब कितना खुश होगा। उसकी नज़र में मेरे लिए प्यार और बढ़ जाएगा , वैसे वह प्यार तो खूब करता है। चाल की औरतें इस बात से ईर्ष्या भी करती हैं। अपने-अपने पतियों को राजेश का उदाहरण भी देती हैं। शायद सास को पहले दिन से ही यही बात अच्छी नहीं लगी थी इसीलिए बात-बात पर नीलम पर नाराज़ होने लगी थीं। एक दिन वह रो रही थी कि तभी राजेश आ गया और नीलम को रोता देख अम्मा पर बरस पड़ा। अम्मा कब चुप रहने वाली थीं। अपने बेटे के मुँह से एक दूसरी औरत की तारीफ सुनकर अम्मा ने रणचण्डी का रूप धारण कर लिया परिणामस्वरूप पूरी रात नीलम रोती रही। वह कभी भी नहीं चाहती थी कि माँ बेटे में अनबन हो और उसका दोष उसके माथे पड़े पर शायद विधाता को यही पसंद था।

अपनी नई-नवेली दुल्हन का लेकर राजेश गुड़गाँव आ गया और तब से कभी घर नहीं गया। जब ननकी हुई तो अम्मा नीलम को संभालने आई थीं पर लड़की का जन्म उन्हें अंदर तक दुखी कर गया था जो वे छिपा नहीं पाईं और जल्दी ही वापस चली गईं। बाबू की चिट्ठी आती थी पर उसमें नीलम के बारे में ज्यादा कुछ नहीं लिखा होता था। शायद अम्मा और बाबू ने नीलम को माफ नहीं किया था। जब बेटा जन्मा तब जरूर अम्मा ने अपना प्यार नीलम पर बरसाया था और राजेश से कहा-बहू को घर भेज दे। वहाँ अच्छी देखभाल हो जाएगी। घर में गाय है, दूध मलाई खाएगी तो शरीर जल्दी ठीक हो जाएगा, पर न जाने क्यों वह नीलम को नहीं भेज पाया और अम्मा दुबारा नाराज़ होकर चली गईं।

सामान समेटते-समेटते तथा कल की असंभावनाओं को याद करते-करते नीलम को कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला। हडबड़ाकर उठी यह सोचकर कर कि सुबह हो गई। बाहर निकलकर देखा तो अभी सुबह के चार बजे थे। यह सोचकर कि अब सोने से क्या फायदा, कुछ रास्ते के लिए बना लेते हैं-वह खाना बनाने लगी।

राजेश भी उठकर सामान समेटने में मदद करने लगा। जल्दी-जल्दी दोनों ने सामान बाँधा, बच्चों को जगाकर नहलाया और फिर खा-पीकर निकल पड़े अनिश्चित यात्रा पर। चाल से बाहर आकर देखा तो भीड़ का सैलाब था। राजेश ने नीलम की तरफ देखते हुए कहा-देखा! कोई भी नहीं रुक रहा है और तू गाए जा रही थी, मोदी जी ने कहा है-बस कुछ दिन की बात है। सारे के सारे पागल हैं क्या?

वह कुछ नहीं बोली पर न जाने क्यों उसका मन उदास था। जब से राजेश ब्याह कर लाया था तब से यही थीं। यहाँ की ज़मीन से अनोखा नाता जुड़ गया था। पीछे मुड़कर देखा, सब कुछ छूट रहा था। दिल में कसक उठ रही थी पर सब जा रहे थे इसलिए जाना था। लगभग दो घंटे वहीं बैठे रहे पर कोई सवारी नहीं आई। धीरे-धीरे भीड़ बढ़ती जा रही थी। पहले कभी सोचा ही नहीं था कि यहाँ आस-पास इतने लोग रहते हैं। अचानक उसे याद आया-अरे अम्मा की दी हुई पायल और करधनी तो पेन्ट के डिब्बे में छिपाकर रखी थी। वह तो रखना भूल गई। उसने राजेश से कहा - एक मिनट तुम बच्चों को संभालो, घर में जरूरी सामान छूट गया है मैं अभी आई।

अब जो छूट गया है उसे गोली मारो और चलो।

नहीं-नहीं ऐसे थोड़े छोड़ सकते हैं। तुम संभालो बच्चों को मैं दौड़ते हुए जाऊँगी और दौड़ते-दौड़ते वापस आ जाऊँगी। जैसे ही वह चार कदम पीछे को मुड़ी कि ननकी चीखते हुए आ चिपकी। उसे देखकर मुन्ना भी रोने लगा। वह वापस आ गई और दोनों बच्चों को साथ लेकर लगभग दौड़ती हुई घर पहुँच गई। डिब्बे में से सामान निकाला और एक पुराने कपड़े में बाँधकर वापस आ गई। अरे यह क्या? वहाँ सन्नाटा पसरा था। कोई नहीं था। उसका पति राजेश भी नहीं। उसका सिर घूम गया। अब क्या करे। अपना बटुआ भी उसने राजेश को पकड़ा दिया था। उसी बटुए में एक कागज़ में सरपंच चाचा का अपने मायके का और राजेश का नंबर लिखकर रखे थी। अब फोन करे तो कैसे करे? खड़ी-खड़ी उस घड़ी को कोसती रही जब उसने घर जाकर सामान लाने का निर्णय लिया था। राजेश पर भी गुस्सा आ रहा था। ऐसी क्या बेचैनी थी जो सबको छोड़कर चला गया? रोते-रोते वहीं बैठ गई।

ननकी ने पूछा-मम्मी रोती काहे को हो, अभी पापा आ जाएँगे और हम सभी दादा के घर जाएँगे दूध मलाई खाएँगे। नीलम को इंतजा़र करते-करते सुबह से शाम हो गई। राजेश ने उसे जान कर नहीं छोड़ा होगा यही विश्वास उसके जीने का सहारा था तभी ननकी भाई से बचकर दौड़ते-दौडते आई और मम्मी से चिपककर गाने लगी-दादा के घर जाएँगे दूध मलाई खाएँगे। नीलम ने झापड़ जड़ते हुए कहा-चुप हो जा, खबरदार! जो अब दुबारा गाया?

थोड़ी देर में उधर से ट्रक निकला, उसमें लोग ठुसें हुए थे। ट्रक वाले ने रोका, ऊपर से एक औरत ने आवाज लगाई-आ जाओ, हम सब आनंदविहार जा रहे हैं। चलो तुम्हें भी ले चलते हैं।

हमें आनंद विहार नाहीं, भरौठा गाँव, जिला बलिया जाना है।

अरे तो अब सब लोग वहीं इकट्ठा हो रहे हैं। वहीं से आगे जाएँगे। चलो जल्दी आ जाओ।

हमें अपने पति का इंतजार है।

कहाँ गया है?

यहीं छोड़कर हम घर से कुछ लेने गए थे, आकर देखा तो नहीं था। ढूँढ़ते-ढ़ूँढ़ते आएगा।

अरे कोई न आने पाएगा। लॉकडाउन लग गया है। जाने के लिए हम लोग ने किसी तरह सवारी का इंतजाम कर लिया है पर आने के लिया सवारी नहीं मिल रही है। चलो तुम्हारा पति भी वहीं होगा। वहीं ढूँढ़ लेना, कब तक बैठी रहोगी अकेले? अभी वह सोच रही थी कि उस औरत ने नीचे उतरकर उसकी लड़की को ट्रक पर चढ़ा दिया और उसका व बच्चे का हाथ भी खींच कर ट्रक पर चढ़ा लिया। नीलम की समझ में नहीं आ रहा था कि उसने गलत किया या सही, बस अपने आपको विधाता के हाथ छोड़ चली जा रही थी।

आनंदविहार पहुँचकर, वहाँ की भीड़ देखकर उसका माथा ही घूम गया। जहाँ तक दृष्टि जाती थी, वहाँ तक सिर्फ सिर ही सिर नज़र आ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे लोग न हो, पानी का सैलाब हो। ऐसी भीड़ में कहाँ वह राजेश को ढूँढे़? आँखों के आगे अँधेरा छा गया। वह सोचने लगी-विधाता! भाग्य में क्या लिखा है? अब क्या करूँ आगे कुआँ है और पीछे खाईं। तभी जोर का धक्का लगा और वह गिरते-गिरते बची। एक तरफ बेटे को गोद में लिए तथा दूसरे हाथ से ननकी को पकडे़-पकडे़ पीछे की तरफ चलती चली गई। किसी भी हाल में वह अपने बच्चों की पकड़ ढीली नहीं होने देना चाहती थी। किसी तरह रात काटी। मम्मी! भूख लगी है-अचानक ननकी ने रोते हुए कहा। उसकी आवाज़ सुनकर उसे होश आया कि दोपहर भी बीतने को हो गई। पास में एक नया पैसा नहीं, खिलाए तो क्या खिलाए? तभी बगल में खाना खाते परिवार ने पूड़ी में सब्जी दबाकर उसकी तरफ बढ़ा दिया। ननकी ने कहा-एक ठो नहीं ती ठो चाहिए। एक मम्मी के लिए, एक भाई और एक मेरे लिए। नीलम ने ननकी का मुँह दबा दिया। परिवार ने एक पूड़ी ननकी को दूसरी उसके भाई को पकड़ाकर जल्दी से वहाँ से खसक गया।

अचानक शोर उठा-बस आ गई, बस आ गई। जब तक नीलम कुछ समझती तब तक भीड़ का ऐसा सैलाब आया कि बेटा हाथ से छूट गया। वह उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ी ही थी कि एक और सैलाब आया और ननकी का भी हाथ छूट गया। वह गिर पड़ी। उसके कान में ननकी की आवाज़ पड़ी-अम्मा! उसने हाथ बढ़ाया ही था कि किसी का पैर उसके ऊपर पड़ा और फिर लोग उसके ऊपर चढ़कर ऐसे भाग रहे थे मानो कोई जीव नहीं बल्कि सामान पड़ा हो! नीलम के आँखों के आगे अँधेरा छा गया। वह उठने की भरपूर कोशिश कर रही थी पर लोगों के पैरों के लगातार प्रहार से शरीर कुचलता गया। दो चार घड़ी ही होश में रही थी, उसके बाद कुछ याद नहीं। जब तक होश में थी तब तक ननकी और मुन्ना के साथ- साथ राजेश का चेहरा याद आता रहा। होंठ बुदबुदा उठे-न न की, मु न्ना।


 

लेखक परिचय - श्रदिधा पांडेय


श्रद्धा पांडे .कहानी कार, कथा वाचिका


प्रकाशित पुस्तकें-

1 सतरंगी दुनिया के अठरंगी सपने

2-समय की रेत पर

3-झिलमिल तारे आँखों में सारे

4-हाथी मेरे साथी

5-वाद-विवाद एवं संभाषण

6-कही अनकही

7-बाइस्कोप


सम्मान गोमती – गौरव सम्मान, शब्द शिल्पी सम्मान, वामा सम्मान, अखिल भारतीय अणुव्रत व्यास सम्मान, शिक्षक साहित्यकार सम्मान, हिंदी विकास मंच द्वारा शिक्षक प्रतिभा, सम्मान रीति रेखा सम्मान, Teacher Par Excellence Award


प्रकाशित कहानियां- नवनीत में, बालभारती में, नंदन में, बाल प्रहरी में, बाल वाणी में, एन•बी•टी• रीडर्स क्लब बुलेटिन में, मॉडर्न एजुकेशन रिव्यू में, साहित्य गंधा में, साहित्य अमृत में, गुफ्तगू में, नवनीत में, तथा सखी में


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