top of page

संपादक के शब्द - नवम्बर 2025

  • ई-कल्पना
  • 13 नव॰ 2025
  • 1 मिनट पठन

धर्मपाल महेंद्र जैन की कविता “अकेलापन” अपने भीतर एक पर्वत की तरह ठहरी हुई है ...

स्थिर, गहरी और शब्दों के पार जाती हुई।


यह कविता उस नीरवता की बात करती है जो मनुष्य के भीतर सदा जीवित रहती है ।


जहाँ मौन, भय और आत्म-स्वीकृति एक-दूसरे में घुलकर

झरने, नदी और प्रवाह में बदल जाते हैं।


यह एकांत का शोक नहीं, उसका रूपांतरण है।



नोटिस (महत्वपूर्ण):

अब से ई-कल्पना प्रकाशन-समाचारों की ई-मेल सूचना बंद कर रही है।प्रकाशन की सारी सूचनाएँ केवल फेसबुक पर साझा की जाएंगी। इसलिए अनुरोध है कि आप हमारे फेसबुक पेज से जुड़े रहें,ताकि नई कहानियों, कविताओं और विशेषांकों की सूचना सहज उपलब्ध हो सके।

टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें

आपके पत्र-विवेचना-संदेश
 

ई-मेल में सूचनाएं, पत्रिका व कहानी पाने के लिये सब्स्क्राइब करें (यह निःशुल्क है)

धन्यवाद!

bottom of page