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सम्पादक की कलम से ... कहानी 5



हमारे यहाँ अकसर जब बच्चियाँ पैदा होती है, तो हम संस्कार के नाम पर आरंभ से ही उनके हाथ और पैर बाँध देते हैं. फिर आगे चलकर जब उनके जीवन चक्र में एक के बाद एक रोढ़े आते हैं, हम उन पर कहानियाँ लिख देते हैं. प्रकृति को यदि बंधी हुई लड़कियाँ ही चाहिये थीं, तो उन्हें एक हाथ और एक पैर के साथ ही क्यों नहीं पैदा किया? उन्हें लड़कों के समान क्यों बनाया? ऋतु त्यागी की कहानी चमकता सितारा पढ़ कर कुछ ऐसे भाव मन में आए.

आप भी कहानी पढ़िये, और बताइये.

 

फादर्स डे आ गया है. सुदर्शन वशिष्ठ जी की कविता पिता की पीठ से पिता की याद आ गई.


-    मुक्ता सिंह-ज़ौक्की

सम्पादक, ई-कल्पना


कहानी 5 की प्रतियाँ ऐमेजौन या गूगल प्ले पर खरीदी जा सकती हैं


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