... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

ईयरफोन

 

‘रंगरेज़ा रंग मेरा तन मेरा मन ले ले रंगाई चाहे तन चाहे , मन रंगरेज़ा रंग...’

ईयरफ़ोन से आती इस आवाज़ के साथ वो कब गुनगुनाने लगा था उसे पता ही न चला. अचानक उसे महसूस हुआ जैसे कोई दो जोड़ी आँखे उसी की ओर देख रही हैं. उसकी सीट के सामने खड़े दो लड़के उसे अबूझ निगाह से देख रहे थे. उन लड़कों के चेहर पे खिली मुस्कुराहट उसे अजीब सी लगी. तभी उसे याद आया कि इतनी देर से वो बस के अंदर ही गुनगुना रहा था.

'इतनी देर से... कितनी देर से??.. शायद बिलासा ताल से ही.. या शायद पहले से..'  उसका दिमाग विचारों से भर जाता है. अचानक उसे याद आया कि थोड़ी देर पहले बाजू की सीट पर बैठी लड़की ने उसे जलती हुई निगाह से देख अपना मुँह दूसरी ओर घुमा लिया था.

‘अच्छा! अब समझा... अह्ह!.’

वो परेशान हो उठा . सवाल को एक ओर कर वो खिड़की से बाहर देखने लगा. बारिश के दिन में यहाँ की सड़क बेतरतीब फैले गड्ढों का समूह हो जाया करती जिस पर बस किसी जहाज़ की तरह हिचकोले खाती महसूस होती. बस कृषि विश्वविद्यालय प्रवेश द्वार पार करती लोधीपारा में प्रवेश कर रही थी, जहाँ कई कच्चे मकान शहर में आने वालों के स्वागत हेतु कतारबद्ध खड़े रहते. ‘मिट्टी के बने नीले घर!! एक ही कमरे वाले घरों में रह कैसे लेते हैं ये लोग.. ? नो प्राइवेसी एट ऑल!’ बस सड़क पे खेल रहे बच्चों को बचाते हुए धीमे धीमे आगे बढ़ रही है, बस को आता देख बच्चे अपने साज़ो सामान सड़क से इस तरह समेटते हैं जैसे खोमचे वाले पुलस की गाड़ी आने पर अपना माल समेटते हैं-दोनों को उतनी ही जल्दी है. किनारे जाते ही बच्चे बहस में लग जाते हैं और अपनी-अपनी जीत का दावा पेश करने लगते हैं. लोगो को खेलता हुआ देख उसे बड़ा सुख मिलता. बस की दाहिनी ओर कहीं, सूरज टंगा हुआ सा प्रतीत हो रहा था . किसी ओट के हटते ही धूप बस के हर कोने में छिटक जाती, धूप दाहिनी खिड़कियों से प्रवेश कर, राह तलाशती बाईं खिड़कियों से पार हो जाती. वो सड़क के किनारे बन रहे बस के उबड़-खाबड़ साये को निहारने लगता है – ‘कितनी उजली और स्पष्ट आकृति!’

ईयरफोन से आती तबले-पेटी की लयदार आवाज़ उसे फिर कहीं खींच लेती है. ‘कुन फाया कुन , कुन फाया कुन कुन फाया कुन , फाया कुन फाया कुन फाया कुन ... जब कहीं पे कुछ नहीं भी नही था वही था वही था, वही था वही था ...’

ब्रेक के झटके से उसे दुनिया और दुनिया में मौजूद बस के होने का अहसास होता है. बस के अंदर लोग कतारबद्ध हो कर खड़े थे. वो अपनी सीट से बस के पिछले भाग से लेकर आगे के अंदर लोग कतारबद्ध हो कर खड़े थे. वो अपनी सीट से बस के पिछले भाग से लेकर आगे के दरवाज़े तक पूरी कतार को निरुद्देश्य ही गौर से देख रहा था. कोई भी एक दरवाज़े से उतरता तो दरवाज़े के आसपास सारे लोग उतरने को अधीर हो जाते . सब के चेहर पे घर पहुँचने का संतोष और कतार में लगने से पैदा हुई अधीरता का मिला जुला रंग दिख रहा है. उसे अचानक कोहनी पे कुछ महसूस होता है, बाजू सीट वाली लड़की उठकर कतार से मिल गयी थी. सीट अगले दरवाज़े के ठीक पीछे होने की वजह से लड़की दरवाज़े पर जल्दी पहुँच गयी. उसके के उतरने के बाद वो फिर खिड़की से बाहर की ओर देखने लगता है. महामाया चौक ... बस से उतरे सारे लोग आगे की ओर जा रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे सब सड़क पर भी कतारबद्ध हैं. ग़ुलामी से चंद घंटों की राहत पाये ये सारे छात्र अपनी-अपनी पीठ पर अपनी बेड़ियाँ लटकाए जा रहे थे . सीटी की आवाज़ के साथ बस दोबारा चलने लगी, खिड़की से आती हवा उसके बाल को उड़ा रही थी जैसे उसे संकेत दे रही थी कि बस से उतरने का समय नज़दीक है. उसे बड़ी निराशा हुई

‘... मोड़ के बाद पूल, पूल के बाद नेहरू चौक ... एक गाना भी पूरा न हो पाएगा ...’

महामाया चौक के मोड़ पर उसे वही लड़की दिखी जो रास्ते भर उसके बाजू में बैठी थी.

‘किसी का वेट कर रही होगी ...'

अचानक लड़की की नज़र उस पर पड़ी, वो न जाने कब से उसे ही देख रहा था. पहले की ही तरह लड़की ने उसे देखकर नज़र दूसरी ओर कर ली .

‘क्या मैं फिर से गाने लगा था ??.... ओह याररर !!’

नेहरू चौक से 5 मिनट की पैदल दूरी पे उसका घर था. कुछ महीने पहले तक वो इन 5 मिनट में भी ईयरफोन से अलग न होता था पर जब से उसके पिता इस दुनिया से विदा हुए हैं वो उनकी दी हिदायतों का ज़्यादा ख़्याल रखता. रास्ते भर की चीज़ों को निहारते हुए वो अपने घर के दरवाज़े पर पहुँचा. बाल, बटन वगैरह ठीक कर वो बड़ी ही सावधानी से दरवाज़ा खोलता है ताकि उसकी आवाज़ से माँ की नींद में खलल न हो, अगर माँ जाग गईं तो दस तरह के सवालों का जवाब देना पड़ेगा- ‘टिफन खाया?... या दोस्तों को खिला दिया?... सब्जी कैसी बनी थी?... आज बस टाइम पे मिली या ऑटो में आया है? ऑटो में मत आया कर बेटा बहुत खतरनाक चलाते हैं वो लोग ...'

लेकिन दरवाज़ा हाथ से छूट गया और ज़ोर की आवाज़ करता बंद हुआ.

‘ओ शीट ... पक्का जाग गई होंगी ...’

उसने माँ को देखने के लए हड़बड़ाहट में बिना जूते उतारे ही भीतरी दरवाज़ा खोला.

‘माँ ...? आप जाग रही हैं?... आप कहीं जा रही हैं?’

‘मैं नहीं जा रही, हम दोनों जा रहे हैं. याद नही आज शुक्रवार है.’

‘मतलब मंदिर?’

‘हाँ.’

‘मतलब चकरभाठा?’

‘हाँ...

‘माँ’

‘पुत्तर ...’

‘च्च’

‘कभी तो बात मान लिया कर बेटा ... पिछले शुक्रवार भी ऐसे ही टाल के चला गया था ... एक बार दर्शन ही तो करना है कितना टाइम लगेगा ... मै मन्नत..’

‘ माँ कितनी बार कहता हूँ ये सब मत किया कीजिए. आप समझती क्यों नही ... मै ठीक डॉक्टर की दवाई से होता हूँ और आपको लगता है मन्नत की वजह से चंगा हुआ, ऐसा होता तो आज ...’

बात अपने आप ही उसके मुँह से निकल गई, वो फिर से अपने पिता की बात नही निकालना चाहता था. उसने देखा कि कैसे माँ निराश हो कर रसोई की ओर चली गई थी. टेबल पर कैसरोल रखा हुआ था, वो हाथ धोकर खाने के लए बैठ जाता है. एक हाथ से टी.वी. का रिमोट उठाकर दूसरे हाथ से कैसरोल खोलता है, कैसरोल के अंदर सब्जी की कटोरी पड़ी थी.

‘माँ ... चैनल बदलते हुए इसमें तो सिर्फ ...’

बात पूरी हो इससे पहले ही टेबल पर थाली रखने की आवाज़ आयी. माँ बिना कुछ बोले फिर से अंदर चली गई. उसने गौर किया कि माँ ने थाली भी ज़रा ज़ोर से टेबल पे रखी थी, निश्चित ही माँ रूठ गयी थी. उसने मुश्किल से आधी रोटी ही खाई थी कि माँ दूसरी रोटी ले कर रसोई से बाहर आई. वो रोटी थाली में डालकर वापस मुड़ गई, वो टी.वी. म्यूट करते हुए हड़बड़ाहट में कहता है, ‘माँ ... वो अअ.. आपकी बाई आयी थी आज?’

‘हाँ आयी थी.’

माँ मुड़कर वापस रसोई में चली गयी. माँ का रूखा जवाब सुन उसका मन अब टी.वी. में न लगा. वो माँ से अपनी बातचीत फिर से सामान्य कर देना चाहता था. उसने अपना खाना बड़ी बेचैनी से ख़त्म किया. सामान्यतः माँ अब तक रसोई से बाहर आकर उसके पास बैठ जाया करती और दिन भर का हालचाल लेती पर आज वें अभी तक अंदर है. माँ जब थोड़ी देर और बाहर नहीं आयी तो वो अधीर हो उठा और अपनी थाली उठा रसोई के अंदर चला गया. माँ किसी डब्बे से एक-एक कर सारा सामान निकाल रही थी, उसे देखते ही माँ अपनी नज़र सीधी कर अपना काम और फुर्ती से करने लगी . वो माँ के कुछ न कहने से निराश था, वैसे माँ हमेशा उसके कम खाने पर नाराज़गी जताया करतीं पर आज उसके हाथ में थाली देखकर भी उन्होंने कुछ नही कहा. थाली बेसिन के पास रखकर वो धीरे-धीरे बाहर जाने लगा.

‘कैसरोल मे और फुल्के पड़े हैं ...’

माँ की आवाज़ सुन वो बड़ा खुश हुआ . कुछ भी हो पर माँ रोटियों के बारे में कैसे भूल सकती है

 ‘नहीं माँ मैंने ठीक से खा लया है.’

माँ ने फिर कुछ न कहा. रसोई से बाहर निकल वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगा, वो भी कुछ और नही कहना चाहता था, उसे डर था की माँ फिर से मंदिर की बात छेड़ न दे.

‘बेटा ...’

माँ की आवाज़ सुन वो ठिठक गया. उसे पता था माँ अपनी अंतिम कोशिश करने जा रही है. न जाने कितनी बार वो इस अंतिम कोशिश वाले जाल में फंस चुका था. इस बार नही. माँ अब रसोई से बाहर आ चुकी थी.

‘चल ना बेटा ... ज़्यादा टाइम नही लगेगा, बस दर्शन कर के वापस आ जाएंगे…’

‘माँ ...’

‘इतनी सी बात नही मान सकता तू मेरी, अच्छा आखिरी बार चल फिर नही कहूँगी .’

उसका चेहरा सख्त हो गया.

‘मै आपके लिए रिक्शा बुला लेता हूँ, आप जायें.’

जवाब सुन माँ हताश हो गयी.

‘कितना अक्खड़ है ये लड़का, बेवकूफ़ … कोई ज़रूरत नही ... अभी इतने हाथ पैर चलते हैं मेरे ...’

माँ का चेहरा गुस्से से लाल पड़ गया था, वो आगे कुछ कहना चाहती थी पर न जाने क्यों न कह सकी.

हाँ ठीक है, कहता हुआ वो सीढ़ियाँ पर पैर पटकते हुए ऊपर चढ़ने लगा. 'नहीं जाना तो नहीं जाना ... इन सब पर नहीं विश्वास तो क्या करूँ.मुझ से ना होगा दिखावे का काम. रहो गुस्सा मुझे क्या.’

कमरे के अंदर वो अपने को शांत करने की कोशिश में लगा रहा. बैग सलीके से टेबल पर रख कम्प्यूटर चालु करने लगा, सी.पी.यू . का बटन दबा कपड़े बदलने लगा. हर काम इस तरह से करता कि जैसे कुछ हुआ ही ना हो, ये उसकी खुद को शांत करने की प्रक्रिया थी. आमतौर पर ढुलमुल ढंग से किये जाने वाले काम बड़े सलीके से होने लगते- जीन्स, बेल्ट, शर्ट आदि जिन्हें आते ही पलंग पे फेंक दिया जाता वो इस तरह खूंटी में टाँगे जाते जैसे ये कभी उतारे ही ना गए थे. उसे शुक्रवार की अपनी दिनचर्या से बेहद लगाव था. हर शुक्रवार कॉलेज से आकर कम्प्यूटर पे कोई फिल्म देखता, शाम को छः साढ़े छः बजे नीचे जा कर माँ के साथ चाय पीता और दोस्तों के आते तक बिना चिंता किये समय व्यर्थ करता- ‘आखिर शुक्रवार ही तो है’ . दोपहर भर फिल्म देखने के अलावा उसे सबसे अच्छा काम लगता देर रात तक इंटरनेट चलाना. वैसे तो हर रात वो देर रात तक ही नेट पे लगा रहता पर शुक्रवार की बात अलग है, अगले दिन जल्दी उठ कर कॉलेज जाने का दबाव नही रहता. पर उसके पिता के जाने के बाद उसका शुक्रवार वैसा नही रहा था. अब उसे अपने कमरे में खाली बैठना अच्छा न लगता. अब वो कमरे में आते ही कम्प्यूटर या किताब में लग जाता, इनके बंद होते ही ये कमरा उसे खाने के लिए दौड़ता. अकेला होने पर न जाने उसे कितनी बार अपने पिता के होने का आभास हुआ था, न जाने कितनी बार इस तरह वो उनसे बात कर चुका था पर आभास टूटते ही उसका अकेलापन और बढ़ जाता.

फिल्म देखते हुए उसे कुछ समय हो चुका है पर अब तक उसका ध्यान फिल्म में नही लगा. कुछ देर वो खुद को समझा कर स्क्रीन पर ध्यान लगाता, फिर कुछ देर में किसी उधेड़बुन में लग जाता. उसे माँ से किये अपने बर्ताव पे बड़ा पछतावा हो रहा था, पर उसे खुद को माफ़ी मांगने के लिए तैयार करने में कठिनाई हो रही थी. एक पल वो खुद को नीचे जाने के लिए तैयार करता तो दूसरे पल कुछ सोचकर खुद को रोक लेता, ये सिलसिला कब से चलता रहा था.

‘अब ना हो पाएगा.’

उसने फिल्म बंद कर दी और डेस्कटॉप को निहारता न जाने किस याद में डूब गया ...

‘क्यों नही गए मंदिर?’

‘मुझे इन सब पर विश्वास नहीं है पापा ...’

‘तो ...?’

‘तो माँ को समझना चाहिए न ...’

उसके पास और कोई जवाब नही था.

‘तुम्हे भी अपनी माँ को समझना चाहिए.’

‘हां पर मैं किसी मन्नत की वजह से ठीक नही हुआ था .. डॉक्टर की दवाओं से हुआ था.’

‘पर तुम्हारी माँ को विश्वास है कि वो मन्नत का असर था.’

‘तो वें करें विश्वास … मैं ऐसे ही किसी मन्नत के लिए मंदिर जा कर समय खराब नही कर सकता.’

‘पर तुम अपनी माँ की ख़ुशी के लिए तो जा सकते हो ना. उन्हें अपनी मन्नत पूरी करने के लिए जाने दो, तुम ये सोचो कि तुम्हारा वहाँ जाने का मकसद तुम्हारी माँ की ख़ुशी है.’

धीरे-धीरे याद में पिता की वो छिव धुंधली हो गई और वो वर्तमान में वापस आ गया- ‘आह !.. कितनी खूबसूरत मुस्कान थी उनकी.’ डेस्कटॉप पर इंतज़ार में लाल होते 'शट डाउन' बटन का इंतज़ार ख़त्म हो गया और वह तेज़ी से कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया.

‘माँ, रेडी रहिए मैं रिक्शा ले कर आता हूँ.’

‘अकेली जा कर क्या करूँगी, मन्नत तेरे जाने की थी ...’

‘मैंने कब कहा आप अकेली जा रही हैं.’

माँ ने इस बातचीत में पहली बार उसकी ओर देखा, उसने नए कपड़े पहने थे और उसके चेहरे पर मुस्कान थी.

‘आता हूँ.’

‘मन के मेरे ये भरम , कच्चे मेरे ये करम, ले के चलें हैं कहाँ मैं तो जानूँ ही ना. तू है मुझ में समाया कहाँ ले के मुझे आया ...’ ईयरफोन से आती इस आवाज़ ने टेम्पो से आ रही घरघर की आवाज़ के साथ मिलकर अजीब सा वातावरण बना दिया था. वो खुश था, उसकी मुस्कान देखने लायक थी. यही मुस्कान जो शाम से ही उसके चेहरे पे खिली थी, मंदिर से लौटते वक्त उसकी ये मुस्कान और लंबी हो गयी थी. ठसाठस भरे टेम्पो में दरवाज़े की सीट पर बैठा वो कभी बाहर चाँद को देखता कभी अंदर अपनी माँ की ओर. माँ उसके ठीक सामने वाली सीट पर बैठी थी, ऊपर लगे छोटे से बल्ब की रौशनी में चेहरों के हाव-भाव रहस्यमय ढंग से उभर रहे थे. माँ का चेहरा बेहद गंभीर और शांत था, वें बार-बार आँख मूंद कर कुछ बुदबुदाने लगती.

‘मंदिर से आते ही माँ इतनी सीरियस क्यों हो जाती है?’

टेम्पो में बैठे सारे लोगों के चेहरों पर एक अजीब सी शून्यता नज़र आ रही है, चेहरे पर सारे दिन की थकान लिए ये सारे लोग घर जाने के ख्याल से बेहद संतुष्ट नज़र आ रहे थे. दिन का आखिरी ट्रिप आते-आते ड्राईवर की ऊर्जा ने जवाब देना शुरू कर दिया है, कोई स्टॉप आते ही वो बिना कोई आवाज़ दिए ही टेम्पो रोक देता और उतरने वाले से किराया मिलने तक रुका रहता. पैसा मिलते ही वो गाड़ी भगा लेता, चिल्हर न होने की सूरत में 4-5 रुपए छोड़ भी देता. दिन के इस वक्त उसे चिल्हर के लिए झिकझिक पसंद नही थी. टेम्पो के अंदर लोगों और उनके हावभाव जी भर देख लेने के बाद अब वो बाहर देखने लगा, खिड़की से आती ठंडी हवा उसके बाल बिखेरने लगती है, वो टकटकी लगाये चाँद को देखने लगता है. ‘आह्!’ ‘कुन फाया कुन, कुन फाया कुन कुन फाया कुन , फाया कुन फाया कुन फाया कुन ... जब कहीं पे कुछ नहीं भी नहीं था वही था, वही था, वही था वही था ...’

 

 

मेरा जन्म एवं शुरुआती अध्ययन छत्तीसगढ़ के एक छोटे से कस्बे रतनपुर में हुआ. जैसा कि कस्बे में रहने वाले बहुत से मध्यम वर्गीय परिवारों के साथ होता है, हमारा परिवार भी बेहतरी की तलाश में शहर आ गया- बिलासपुर शहर. नया शहर होने का एक असर ये हुआ कि ज्यादा दोस्त न होने की वजह से मैं अपना ज़्यादातर समय घर में बैठकर किताबें पढ़ते गुजारता. तब मुझे आर. के. नारायण बेहद पसंद थे. आज से कुछ सालों पहले तक बिलासपुर में पुस्तक मेले लगा करते थे और लगभग हर पुस्तक मेले में मेरे पिता मुझे ले जाते. मैंने अपना पहला उपन्यास इन्ही में से किसी मेले में खरीदा था- गोदान. शायद मुंशी जी की रचनाएं ही थी कि जिनकी वजह से मेरा साहित्य की ओर रुझान बढ़ा. लिखने की शुरुआत डायरी से ही हुई. डायरी में कहानियां और कवितायें लिखता. लिखता तो सिर्फ अपने ही लिए था पर मन में एक दबी-छुपी चाह भी थी कि कभी किसी रचना को तारीफ़ मिल जाए. अब भी लिखने के बाद यही सोच रहती है कि किसी एक व्यक्ति को मेरी रचना पसंद आ जाए.. कोई एक कह दे कि तुमने जो लिखा मैंने सब समझ लिया है. इसीलिए हर जगह-हर प्लेटफॉर्म में मौका तलाशता रहता हूँ. खैर, बाद में कॉलेज समारोहों के लिए भी कुछ चीज़े लिखी जिन्हें अपने स्तर पर खूब प्रसंशा मिली. पत्र/ पत्रिका की बात करें तो ई-कल्पना में ही मेरी पहली कहानी “ईयरफोन” छपी थी, जिसकी वजह से लिखने की काफी हिम्मत आई. हमेशा छपते रहना मुश्किल होता है इसलिए मैं अपने ब्लॉग दायरा के ज़रिये भी लिखता हूँ. ख़ास कर कवितायें. मैं लिखता हूँ क्यूंकि मुझे लगता है कि खुद को ज़ाहिर करने का मेरे पास इससे बेहतर कोई साधन नहीं और खुद में रह जाने से बुरा इस दुनिया में कुछ भी नहीं. कहानियों के अलावा आगे चलकर मैं फिल्मों के लिए स्क्रीनप्ले लिखना चाहता हूँ. पर चूँकि मैं अभी नया हूँ और अपने लेखन के प्रति बहुत आश्वस्त नहीं हूँ, इसलिए सिर्फ लेखन ही करूं, ऐसा नहीं सोचा. इसलिए फ़िलहाल कंप्यूटर एप्लिकेशन की पढाई और बाद में उसी में नौकरी की तलाश रहेगी. अंत किसी को पता नहीं होता. हो सकता है किसी दिन साहित्य में एक बड़ा नाम कमाऊं, हो सकता है किसी दिन एक सफल स्क्रीन-लेखक बन जाऊं, या ये भी हो सकता है कि सॉफ्टवेयर की नौकरी करते-करते खुद ही एक प्रोग्राम बन जाऊं. अंत किसी को पता नहीं होता, इसीलिए मुझे कहानियाँ लिखना इतना पसंद है. ऐसे में एक कहानीकार जो स्वयं कितने ही अंतर्द्वंद्व- अंतर्विरोधों में उलझा हो, अपनी कहानियों का अंत सुलझा रहा होता है और उन चंद लम्हों के लिए अपनी कहानी भुला देता है. बहरहाल, लिखने का प्रयास जारी रहेगा. -आकाश हिन्दुजा

hinduja.aakash@gmail.com

 

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