... ON BORROWING a BOOK VS BUYING IT

""When you buy it, you are promoting the literature of your country.""

तीस में सन्यास

 

आज का पूरा वयस्क समुदाय एक प्रकार की बीमारी या यूँ कहें महामारी से ग्रस्त है | ये बीमारी है कुछ नया, कुछ अलग, कुछ हटकर करने की | और इस रोग को बढ़ावा देने का काम करती हैं सोशल नेटवर्किंग साइट्स | कहने को तो ये नेटवर्किंग साइट्स हैं पर इनपर होने वाली एक - एक पोस्ट उन किशोर - किशोरियों को चिढ़ाता है जिनकी जिंदगी एक सीधी रेखा में चल रही होती है | किशोरियाँ जहाँ अपने वयपन का प्रदर्शन करते हुए लाइक्स, लव्स और वॉवज़ की गिनती देखकर आपस में प्रतियोगिता करती हैं वहीं किशोर भी फिल्मी डायलॉग के साथ भिन्न - भिन्न  पोज़ में नज़र आ जाते हैं | इनमे कइयों को अपनी गरल सखी (गर्लफ्रेंड) मिल चुकी होती है और वो चेक-इन और कूल कपल वाले पोज़ में भी आ आ कर बाकी दोस्तों को अपनी खुशहाल जिंदगी दिखा उनके दिल में धधकती आग में घी डालने का काम करते रहते हैं | इन सब के बीच हालत बेहाल होती है उन मासूमो की जो हर दूसरी लड़की में अपनी बहन खोज लेते हैं और अगर उनसे चूक हो भी गयी तो वो लड़की उनको भाई या अंकल कहकर सारी कहानी का आगाज़ होने से पहले ही सत्यानाश कर देती है | इन्ही विपदाओं के शिकार कुछ युवको ने तय किया कि अब हिमालय पर अपनी विश्रामस्थली बनायीं जाए और वहां के वातावरण में शान्तिपूर्ण जीवन यापन किया जाए | कुछ ने तर्क दिए कि वहां ज्ञान का अपार भण्डार है; कई ऋषि मुनियों ने जाप तप करके अपना जीवन धन्य किया है यहाँ; तो कइयों ने इंद्र के सिंघासन तक को हिला डालने वाली तपस्या की है | 'हो सकता है हमारा भी उद्धार हो जाए' - ऐसी कामना के साथ उन्होंने अपना बैकपैक तैयार कर लिया | जरूरी सामान अपने साथ रखने की चेकलिस्ट बनायीं गयी और उसमें सबसे पहले चार्जर फिर पॉवरबैंक फिर मोबाइल फिर क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड उसके पश्चात कपड़ों को स्थान दिया गया |

परन्तु उनकी हिमालय पर सन्यास को जाने की उम्मीद पर पानी तो तब पड़ा जब ज्ञात हुआ कि हिमालय अब सन्यास स्थली ही नहीं रहा, तपोभूमि नहीं रही, निर्वाण का मार्ग नहीं रहा । टूरिस्ट स्पॉट बन गया है । ट्रैकिंग के लिए दूर दूर से टूरिस्ट और कपल्स आते हैं | हिमालय पर ज्ञान की प्राप्ति जरूर हो सकती है पर वो भी तब जब एक सन्यासी बनने की चेष्ठा की जाए और बर्फीले मौसम में हड्डियां ठिठुरन से कराह उठें । पर ज्ञान इतना ही मिलेगा कि ठण्ड से बचने के उपाय करके ही आयें । जाने कितने मुनियों की तपस्या को भंग करने का श्रेय प्राप्त करने वाली अप्सराएँ भी अब हिमालय के वातावरण से दूर तरायी क्षेत्र के मैदानों में आ गयी हैं । उनको भी कूल डूड चाहिए, सन्यासी नहीं । अब ३० की उम्र को न तो वानप्रस्थ कहा जा सकता है न सन्यास परन्तु लड़को की स्थिति इससे भी गयी गुजरी सी हो जाती है । पीड़ा सुनने वाले और मजे लेने वाले आसपास कम नहीं होंगे पर अगर पीड़ा का वर्णन ज्यादा देर तक चले तो लोग 'टेढ़ा' समझ लेते हैं ।

वैसे भी आज के युग में कौन सा सीधा युवक ३० में सन्यास की बात सोंचेगा ? ३० की उम्र में सन्यास की बात करने वालों से अगर ये पूछ लिया जाए कि कितने आश्रम बताये गए हैं शास्त्रों में तो उनके जवाब में शायद 'दो' ही सुनने को मिले - ब्रह्मचर्य और सन्यास | हालाँकि उन्होंने पुरजोर कोशिश की रही होगी गृहस्थ होने की पर आजकल कौन ब्याहता है बेरोजगारों को अपनी लड़की और कौन - सी लड़की तैयार हो जाती है शादी करने को ? वो भी उससे जो उसको साल में एक बार भी शॉपिंग को न ले जा सके !  खैर, इन सब बातों में क्या रखा है ! अब जब हिमालय की कन्दराओं की तरफ डग भरने की ठान ही ली है और बैग भी पैक हो चुका है तो कूच करने में देरी नहीं करनी चाहिये | इस सफर का लुफ्त ही मिले | कुछ नहीं से तो काना बेहतर होता है | अनिच्छावश ज्ञान और वैराग्य की खोज को निकलें मगर निकलें तो सही | ठहरने का मन नहीं किया तो हम भी वहाँ  टूरिस्ट बन जाएँगे, ट्रैकिंग करेंगे और फिर वापस आ जायेंगे इसी शहर, इन्ही गलियों में, पहले की सी जिंदगी जीने |

इतना सबकुछ प्लान किया ही था कि एक के घर से फ़ोन आया | पिताजी का | सब शान्त हो गए | शान्ति भी ऐसी  कि सांप सूंघ गया हो सबको | उसके पिताजी वापस बुला रहे थे उसको | बोल रहे थे यही आ जा कुछ काम धन्धा देख और कितनी जिंदगी इन्तज़ार  करेगा | जी - जान से अपना बिज़नेस शुरू कर दे बस | वह ख़ुशी से ऐसे उछला जैसे उसको तो अमेरिका की ट्रिप ऑफर हुयी हो | उसने अपना बैग उठाया और निकल लिया |

बचे किशोरों को भी आभास हो गया था कि ३० में सन्यास असंभव सा है और घरवालों को अपने पौत्र/ पौत्री को गोद में लेकर खिलाने की लालसा बढ़ती ही जा रही है यथा उनका विवाह भी अवश्यम्भावी है | उनको अतिरेक ज्ञान नहीं चाहिए | वैराग्य भी नहीं चाहिए | अपने बूढ़े माँ-बाप के इस एक सपने को तो पूरा ही कर सकते हैं | थोड़ी ही देर में सबने एक बार फिर सन्यास के विचार को त्याग कर, रोनी सी सूरत बनाकर और बैग उठाकर अपने दफ्तर की ओर बढ़ चले |

 

मेरा नाम नितिन चौरसिया है और मैं चित्रकूट जनपद जो कि उत्तर प्रदेश में है का निवासी हूँ ।

स्नातक स्तर की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से करने के उपरान्त उत्तर प्रदेश प्राविधिक विश्वविद्यालय से प्रबंधन स्नातक हूँ । शिक्षणऔर लेखन में मेरी विशेष रूचि है । वर्तमान समय में लखनऊ विश्वविद्यालय में शोध छात्र के रूप में अध्ययनरत हूँ ।

 

फ़ोन -09453152897

ई-मेल - niks2011d@gmail.com

 

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