सम्पादक के शब्द - नवम्बर 2025
- ई-कल्पना
- 2 दिन पहले
- 2 मिनट पठन
“रिश्ते अक्सर शब्दों से नहीं,
उन ख़ामोशियों से टूटते हैं
जिन्हें हम सुनने से इंकार कर देते हैं।”
नीरज नीर की कहानी “रिश्ता टूट गया” हमें उसी जगह ले जाती है - जहाँ प्रेम, अहसान, इच्छा, अधिकार और परंपरा धीरे-धीरे एक अदृश्य रस्सी की तरह खिंचते हैं और अंत में किसी एक मोड़ पर चटक जाते हैं।
इस कहानी की खूबसूरती यह है कि यह किसी को दोष नहीं देती - सब अपने-अपने सच के साथ खड़े हैं, अपनी जिद, अपने दर्द और अपनी मर्यादाओं के साथ।
वजीर अहमद की अपेक्षाएँ, शकूर अहमद की विवशताएँ, मुस्कान की चुप उदासी - हर पात्र अपने भीतर एक पूरा संसार लिए चलता है।
कहानी यह प्रश्न छोड़ती है -
क्या हम रिश्तों को निभाते हैं
या अपनी इच्छाओं को न्यायोचित ठहराते-ठहराते
रिश्तों को अनजाने में थका देते हैं?
आप कहानी पढ़िए, और स्वयं तय कीजिए कि असल टूटन कहाँ से शुरू हुई थी
दिल से, परिस्थिति से, या उस एक अनकहे वाक्य से जो कभी बोला ही नहीं गया।
- मीरा मालिनी
द्वितीय सम्पादक, ई-कल्पना
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