काली मर्सिडीज़

 

नवम्बर शुरू हो चुका था। अब दिन छोटे और रातें बड़ी होने लगी थीं। वह काफी देर से इस सुनसान से बस स्टैंड पर खड़ा था और 15 नं बस का इंतजार कर रहा था। यह 15 नं बस उसे ज्ञानी बार्डर पर छोड़ देगी फिर वहाँ से थ्री व्हीलर मुश्किल से बीस मिनट में घर पहुँचा देगा। घर का खयाल आते ही सब चीजें उसके सामने आने लगीं। पहले दरवाजे पर लगी घंटी बजेगी फिर अंदर से  निर्मला निकलेगी, दरवाजा खोलकर बिना उसकी तरफ  देखे हुए लौटकर वापस अपने बेडरूम की तरफ चल देगी, वह पेंशन में मिले रुपये उसे थमा देगा आदि आदि।  शायद इसी को थॉट प्रोसेस कहते हैं। एक विचार आया नहीं कि बरगद की तरह उसकी शाखायें फैलने लगती हैं। पता ही नहीं चलता कि इन विचारों का सिलसिला कितना समय पी जाता है। यह तंद्रा सी स्थिति  तभी भंग  होती है जब कोई छेड़ दे, पूछ ले ' अंकल जी !  टाइम क्या हुआ है' या 'बता सकते हैं - मिस्टर गोगिया कहाँ रहते हैं?

ऐसी ही बेकार की बातें सोचता-सोचता वह कुछ थक सा गया था तभी एक चमत्कार हुआ। जी हाँ चमत्कार होते हैं। अपनी जिंदगी की किताब के पन्ने पलट कर देखिये, मिल जायेंगे ऐसे कई चमत्कार। तो चमत्कार यह हुआ कि एक काले रंग की मर्सडीज चुपचाप उसके बगल में आकर खड़ी हो गई। सफेद वर्दी पहने ड्राईवर उतर कर आया और पास आकर बोला - "अंकल, मैडम को पता है कि आप सविता विहार में रहते हैं, वे आपको जानतीं हैं और कह रही हैं कि वे आपको छोड देंगीं।"

उसने एक मिनट तो सोचा फिर कार की तरफ  बढ़ गया। वह ड्राइवर की बगल में बैठने को हुआ तो कार में बैठी महिला ने उसे पीछे की सीट पर बुला लिया।

'आइये!'

महिला ने बड़ी आत्मीयता से उसे अपने पास बिठाया ।

अभी तक के घटनाक्रम को वह मंत्रमुग्ध सा एक सपने की तरह ले रहा था और समझ भी रहा था कि कुछ भी अनहोनी  हो सकती है। लेकिन वह डरे क्यों? सारी जिंदगी भरी पड़ी है चमत्कारों से और अनहोनियों से। वह बैठ गया और बड़ी तेजी से कार दिल्ली की तरफ चल पड़ी।

पहल महिला ने की - "मैं आपको जानती हूँ, आपका नाम यशपाल है मतलब यशपाल शर्मा, आपका मकान नं 43 है, आप और आपकी  पत्नि ग्राउंड फ्लोर पर रहते हैं, ऊपर की दो मंजिलों में आपके दोनों बेटे अपने-अपने परिवार के साथ रहते हैं - क्यों ठीक है न मिस्टर यशपाल शर्मा?"

यशपाल जी बड़ी अजीब सी सोच में पड़े थे - यह लड़की 40 के आस-पास की रही होगी जितनी उसकी बेटी रमा लेकिन इसने उन्हें अंकल न कह कर मिस्टर यशपाल कह कर पुकारा।

वे कुछ पूछें या बोलें वह फिर बोलने लगी - "शर्मा जी! मैं एक मल्टी नेशनल में ऐग्जीक्यूटिव हूँ , मेरा नाम निशा लूथरा है, आप मुझे निशा कह कर पुकार सकते हैं। मेरी माँ प्रीतम कौर विधवा है। वह आपके मकान से तीसरे मकान नं 40 में रहती है, ऊपर एक किरायेदार अपने परिवार के साथ रहता है और अच्छी बात ये है कि वह एक साउथ इंडियन है, मेरे ही आफिस में है और सबसे बड़ी बात  यह है कि मिस्टर राघवन  सही मायने में एक अच्छा इन्सान है। मैं हर महीने दो दिन के लिये आती हूँ और माँ की सारी दवाइयाँ और अन्य जरूरत की चीजें खरीद कर रख जाती हूँ। फिर किसी भी एमरजैंसी के लिये  माँ के पास राघवन जैसा  इन्सान  तो है ही।"

बहुत देर से यशपाल शर्मा निशा लूथरा की बातों को बिना किसी दखलंदाजी के चुपचाप सुन रहे थे। गाड़ी अब दस पंद्रह मिनट में आनंदविहार पहुँचने वाली थी। यशपाल जी के मन में सैकड़ों प्रश्न इकट्ठा हो गये थे। अभी तक तो निशा की ही कहानी अधूरी थी।

उन्होंने बड़ी हिम्मत बटोर कर अपनी बात शुरू की - "निशा ! अच्छा लगा तुम्हारे साथ यह अधूरा सफर और इस सफर में जो बातें हुईं वे भी लगभग सब अधूरी हैं। क्या यह संभव है कि कल सुबह हम लोग मेरा मतलब तुम, तुम्हारी माँ, मिस्टर राघवन, उसकी पत्नि सब एक साथ बैठकर मेरे घर पर नाश्ता करें। मुझे लाभ यह होगा कि कुछ अच्छे इन्सानों की संगत मिल जायेगी भले ही वह एक दिन के लिये ही क्यों न हो।"

काली मर्सडीज यशपाल जी के घर के सामने आकर खड़ी हो गई थी। कल के नाश्ते की बात निशा ने पक्की कर दी थी और राघवन को परिवार सहित लाने की जिम्मेवारी भी निशा ने ले ली थी ।

सुबह के दस बज चुके थे लेकिन अभी भी बूंदा बांदी हो रही थी। गत रात घनघोर बारिश के कारण कालोनी  की सड़कों पर जहाँ-तहाँ पानी भरा हुआ था । यशपाल जी अब तक दो बार बाहर जाकर देख आये थे लेकिन अभी तक काली मर्सडीज का कहीं पता नहीं था। वे फिर एक बार बाहर सड़क तक जाने को तैयार होने लगे  तो देखा निशा की मर्सडीज घर के सामने पहुँच चुकी है।

नाश्ते के बाद सब लोग चाय का इंतजार कर रहे थे तो पता नहीं कैसे क्या बात चली कि प्रीतम कौर अपने अतीत में चली गईं - यहाँ  तो  वे 1990  में आईं थीं उससे  पहले वे जनकपुरी में रहती थीं जहाँ उन्होंने अपना सब कुछ खोया था। 1984  में इंदिरा जी के कत्ल के बाद सारी दिल्ली ने हर सिख को उनका कातिल मान लिया था। जनकपुरी में सबसे ज्यादा सरदार परिवार थे। दंगाइयों ने जैसे  कसम खा ली थी कि कोई सरदार बचने न पाये। जो बचे सो अपनी किस्मत से बचे। प्रीतम कौर अतीत के उस काले कालखंड में खो गईं जिसमें उनकी सारी खुशियाँ सारे सुख दफन थे। बड़ी मुश्किल से निशा ने उन्हें संभाला। इसी बीच यशपाल जी ने बताया कि उनका दोस्त पूरनसिंह भी जनकपुरी में रहता था। किस्मत की बात है वह इस कत्लेआम से  दो दिन पहले ही छुट्टी लेकर दिल्ली आया था। हम दोनों की पोस्टिंग जम्मू में एक ही ऑफिस में थी। मैं जब  दिल्ली आकर जनकपुरी उसका पता करने गया तो बस इतना पता चला था कि पूरनसिंह के परिवार में केवल उनकी पत्नि बची थी जो लुधियाना में अपने भाई के पास चली गई थी। असल में पूरनसिंह मेरे लिये दोस्त से कुछ अधिक था। इतना कहकर यशपाल भीतर अपने कमरे में गये और एक बहुत ही पुरानी ऐलबम उठा लाये। ऐलबम में दोनों दोस्तों के कई फोटो थे। निशा और प्रीतमकौर ने जब ऐलबम खोली तो दोनों फूट-फूट कर रोने लगीं। ऐलबम में कैद पूरनसिंह कोई और पूरनसिंह नहीं बल्कि निशा के पापा और प्रीतमकौर के  प्राण सरदार पूरनसिंह ही थे।

जीवन में कब क्या हो सब कुछ सदैव अनिश्चित है। प्रीतमकौर और निशा के आँसू नहीं रुक पा रहे थे। पूरनसिंह जिस प्रीतमकौर के किस्से सुनाया करते थे वह अब यशपाल जी के सामने बैठी थी ।उसके सफेद बाल और तांम्बई रंग का झुर्रियों से भरा चेहरा बता रहा था कि प्रीतमकौर वाकई उससे कहीं अधिक सुंदर रही होगी जितना पूरनसिंह यशपाल जी को बताया करते थे। 

बड़ी मुश्किल से दो घंटे का समय बीता। यशपाल जी बडे उदास मन से दोनों माँ बेटी को विदा करके लौटे लेकिन उसके बाद एक अजीब उदासी ने उन्हें घेर लिया। अब अकसर यशपाल जी प्रीतमकौर को अपने घर बुला लेते थे और कोशिश करते थे कि किसी तरह उन्हें बीते हुए समय से बाहर लाया जाये। एक दिन निशा आई और सबको यह बताकर लौट गई कि कल सुबह की फ्लाइट से वह एक साल के लिये लंदन जा रही है। कम्पनी ने उसे प्रमोशन देकर लंदन वाले ऑफिस में पोस्ट कर दिया है।

कभी-कभी समय कुछ जिंदगियों में ऐसे भूचाल लाता है कि सब कुछ बदलता ही नहीं बल्कि तहस-नहस हो जाता है। अगले दिन निशा लंदन चली गई। एक माह बाद निर्मला जी को  दिल का दौरा पड़ा और अस्पताल पहुँचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया। यशपाल जी के दोनों बेटों ने माँ के सारे कार्यक्रम चौथे दिन ही चौथे की रस्म पूरी कर माँ के  कर्ज से मुक्ति पाली । यशपाल जी ने इसका विरोध भी किया था - हम उ. प्र. के लोगों में चौथा नहीं होता तेरहवीं होती है । लेकिन बेटे नहीं माने विशेष कर छोटे वाला जो दुबई से केवल एक सप्ताह के लिये आया था और चूँकि अपने परिवार (फैमिली -पत्नि व बेटे ) को साथ लेकर जाना था तैयारी भी करनी थी । यशपाल जी ने  खुद ही अपने मन को समझा लिया - अब निर्मला ! तेरी विदाई चार दिन में हो अथवा तेरह दिन में क्या फर्क पड़ता है। 

अब सब कुछ बदल चुका है। कभी-कभार यशपाल जी प्रीतमकौर के घर चले जाते हैं। किचन में जाकर खुद ही दो कप चाय बनाकर ले आते हैं, प्रीतमकौर को अच्छा नहीं लगता वे हर बार खुद चाय बनाने की जिद करतीं हैं लेकिन यशपाल जी नहीं मानते। उन्हें लगता है कि अभी भी  निर्मला भीतर कमरे में बैठी है। दोनों घंटों तक एक-दूसरे से अपनी पीर साझा करते हैं कभी-कभी ऐसा इत्तेफाक होता है कि जब वे दोनों चाय पी रहे होते हैं तो लंदन से निशा का फोन आ जाता है फिर वह इन दोनों से बारी बारी से बात करती है । बातचीत में वह यशपाल जी से अकसर कहती है - अंकल जी ! आप सचमुच में एक सच्चे इंसान हो, बस आप माँ का खयाल रखना, मैं एक साल के बाद लौटकर आ ही जाऊँगी। यशपाल जी एक गहरी सोच में डूब जाते हैं। वे क्या बतायें निशा को कि जब एक माह  में इतना कुछ बदल सकता है तो एक साल तो बहुत लम्बा अरसा होता है। पर वे यह जरूर चाहते हैं कि निशा उनके जीते जी लौट आये और अपनी माँ को संभाल ले। वे अब जब कभी अपने अकाउंट से पैसे निकालने बैंक  जाते हैं तो कुछ मिनट उस दिशा में देखना नहीं भूलते जिस दिन पहली बार निशा उन्हें अपनी काली मर्सडीज में बिठा कर लाई थी।

लेखक, कवि एवंम संपादक पाक्षिक समाचार पत्र ‘गौड़संस टाइम्स ‘ GT.

अभी तक प्रकाशित पुस्तकें - काव्य पर ६,मीडिया पर ३, कहानी १, नाटक १, हिंदी में तकनीकी ज्ञान पर दो ।

जन्म - १२ जून १९३६ उ प्र ।

blgaur36@gmail.com

 

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