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मैं, नजीब

  • चन्द्रभान प्रताप
  • 28 जून 2017
  • 2 मिनट पठन

मैं नजीब । बैठा हूँ। आख़री सड़क के आख़िरी छोर पर जो एक छोटा सा डब्बा जैसा कुछ दिख रहा है न। वहीँ। उसी डब्बे के अंदर, कोने में। दुबककर। छिपकर। कोई छुए नही। ऐसे ही पड़े रहने दें।

उम्र?

सत्ताईस साल। अब तक नौकरी मिल जानी चाहिए थी। नौकरी की बेचैनी मुझे क्लास आठ से है। आख़िर नौकरी मिलना इतना मुश्किल क्यों है ? और मुझपर नौकरी पाने का इतना दबाव क्यों है ! बचपन से ही। बाहर एक जाल जैसा कुछ है। जो मुझे भी फांस लेना चाहती है। एक कुआँ है जिसमे गिरना ही होगा। मैं इसीलिए, यहाँ दुबक के, छिप के, बैठा हूँ। मैं कुँए में नही गिरना चाहता।

हिंदुस्तानी हूँ या नही ?

हिंदुस्तानी होना क्या है ?

हाँ इस सवाल से याद आया। मुसलमान हूँ। मुझे लगता है मैं अलग हूँ। हूँ क्या? मुझे महसूस होता है और मैं थोड़ा और दुबक जाता हूँ। और हाँ ! कभी-कभी मुझे लगता है की बाबरी की ही तरह मुझ पर भी एक भीड़ चढ़ी जा रही है। पत्थर, हथौड़ा, लोहा और बल्लम लिए। मैं अब गिराया गया की तब। मुझे दुबकना पड़ता है। मुझे दुबकना ही पड़ेगा।

साँस?

चल तो रही है। भूख भी लगती है। लेकिन वही भीड़ जो अभी मेरे ऊपर चढ़ी थी पेट में त्रिशूल भोंक देती है मेरे। मेरी आँत निकाल लेती है। मरा नहीँ हूँ।

दुबक गया हूँ।

मरा थोड़े ही हूँ ---ज़िंदा हूँ। तुम्हारे अंदर हूँ। तुम्हारे मन के अंदर। वहीँ दुबककर बैठा हूँ। तुमको भी तो खींच लाता हूँ--तुम्हारे ही मन की आख़िरी सड़क के आखिरी कोने वाले डब्बे में। और तुम भी तो दुबक जाते हो उस डब्बे के अंदर जो बिस्तर है उसके नीचे।

वापस ? मैं ? कहाँ ? यहाँ !

नौकरी चाहिए। और सम्मान। और हाँ--बाबरी दुबारा खड़ी कर दो।

चंद्रभान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के इतिहास अध्ययन केंद्र में प्राचीन इतिहास के शोधार्थी हैं।

इतिहास एवं साहित्य में रुचि के साथ-साथ वे थिएटर से भी जुड़े हैं।

saahir2000@gmail.com

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