ब्राऊनी
- उषा बंसल
- 12 नव॰ 2017
- 4 मिनट पठन
वसुंधरा स्कूल से लौटी तो खुशी से झूम रही थी। उसको रोमांच हो रहा था । वह कुछ बताने के लिये अधीर थी । उसके धेर्य का बांध घर की चौखट पार करते करते टूट गया। उसने बस्ता एक तरफ रख मम्मी मम्मी पुकारती हुए मम्मी के गले से लिपटते हुए बोली , मम्मी मम्मी मेरी कक्षा में एक ब्राउनी आ गई है। अब मैं स्कूल में अकेली ब्राउनी नहीं हूँ। ‘मुझे भी एक सहेली ,एक मित्र मिल ही गई’। एक सांस में वो सब बोल गई। उसने कहा मम्मी आपको पता है कि अब तक मेरे स्कूल में सब व्हाइटस थे, जो मुझसे दोस्ती करना तो दूर मुझे ब्राउनी कह कर चिढ़ाते थे। वह पूरे जोश , और खुशी तथा आक्रोश के भावों से मिश्रित लय में बोले जा रही थी । यह सारा वार्तालाप अग्रेजी में था।
वसुन्धरा अमेरिका के सेंट डियागो के स्कूल में पढ़ती थी। उसका जन्म भी अमेरिका में ( विश्व का सबसे विकसित देश) हुआ था । जन्म से अमेरिकी होने के बाद भी नस्ल से ,रंग-रुप से भारतीय थी । अमेरिका में रंग के आधार पर लोगों को व्लैक, व्हाईट तथा ब्राउन कहा जाता है। भारतीय न तो ब्लैक न ही सुफेद हैं इसलिये उन्हें भूरा, ब्राउन कहा जाता है। वसुन्धरा को लगा कि मम्मी सुन नहीं रहीं हैं अत: है उन्हें झिझोंड़ते हुए कहा कि मम्मी उसका नाम अवनी है । और उसके एक बहिन भी है जिसका नाम अनन्या है । वह सड़क के उस पार वाले ब्लाक में रहते हैं। उसके पापा बड़े प्रोफेसर हैं और मम्मी कंप्यूटर इंजीनियर हैं। इस वीकएंड आप उनके यहां चलेगीं न । मैं ,आप, डैडी चलेंगें । डैडी को भी बहुत अच्छा लगेगा। वसुंधरा अपने उत्साह में वह सब उगल रही थी जो उसे स्कूल में पता चला था। शायद वह अपना समाज (घोंसला,परिवार) बुन रही थी । मम्मी मम्मी सुनो मैं कल उनका फोन नम्बर भी ले आऊंगीं ।
वसुन्धरा की मम्मी का मन किहीं और गहराइयों में ड़ूबा था। अमेरिका उसके लिये सपनों का देश था। जिसने गुलामी, रंगभेद, नस्लवाद, नाजीवाद, फासीवाद के खिलाफ लड़ाई लड़कर मानवीय मूल्यों पर आधारित धर्मनिरपेक्ष स्वतंत्र देश का निर्माण किया। जहां मानव की योग्यता, मानव का मानव के रुप में सम्मान, मानवीयता का आदर होता है। उस देश में स्वतंत्रता के इतने संघर्षों के बाद भी रंगभेद, नस्ळभेद आदि अमरीकी रत्त में प्रवाहित हैं, देख कर वह आहत महसूस कर रही थी।
वसुंघरा की मम्मी को वह दिन याद आ गया जब बड़े उत्साह से बेटी का नाम अमेरिका के स्कूल में लिखाया था। एक हफ्ते बाद ही उसने स्कूल जाने से मना कर दिया। जब उसे स्कूल जाने के लिये बाध्य किया तो वह फूट- फूट कर रोने लगी। बहुत पूछंने पर बड़ी मुश्किल से उसने बताया कि स्कूल में सब उसे ब्राउनी कह कर चिढ़ाते हैं। उसने भोले पन से किंतु दृढ़ आवाज़ में पूछां कि’ ब्राउनी’ क्या होता है?
मम्मी नेउसे समझाने के लिये कहा कि तेरा रंग उनसे भिन्न है इसलिये शायद ऐसा कहते हों ? उसने तुरंत कहा कि बाकी सबका तो नाम लेकर बुलाते हैं , मेरा भी एक नाम है, उसी से पुकारना चाहिये। मम्मी ने उसे प्यार से पुचकारते हुए कहा कि रंग तो स्किन-खाल का होता है। ब्राउन स्किन सबसे अच्छी मानी जाती है क्योंकि उस पर सूर्य की किरणों का नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता । खाल की उपरी परत के नीचे सबका रंग एक है । खून का रंग भी सबका एक ही है । रंग तो बदलता रहता है । वास्तिवक बात तो मनुष्य में मनुष्यता का होना है । खुद को दिखावे से उपर उठाना है ।
तब मम्मी ने उसके आँसू पोंछते हुए, सिर सहलाते हुए कहा कि उदास मत हो , इस चित्र को देख, इसमें जो पुरुष है वह काला है । उसका नाम कृष्ण है । जो गोरी स्त्री है उसका नाम राधा है । दोनो, काले कृष्ण गोरी राधा मिलकर इस विश्व को पूर्णता प्रदान करते हैं रंगोंमें बांटते नहीं हैं । एक दिन तुम इनका अर्थ जरुर समझ जाओगी तब हमारे संस्कारों की जय होगी । उस दिन से वसुंध
रा ने स्कूल के बच्चों की बात पर ध्यान नहीं दिया । उसने अपना घ्यान पुस्तकों व टी. वी. में लगा लिया। मानों उसने नियति से समझौता कर लिया हो । आज अवनी के आने से उसके अकेलेपन की दिवार चटखने लगीं। दीवारें टूटने लगी थीं । किसी के कदमों की आहट ने उसे भाव विभोर कर दिया था । वह अपने संभावित आनंद से पुलकित हो रही थी । उसके अंग प्रत्यंग से उसकी खुशी झलक रही थी । परंतु उसकी मम्मी अपने ही विचारों की तन्द्रा में खोई थी।
सेंट लुइस के म्यूजियम के बाहर लगी तख्ती उसकी नज़रों के सामने घूम रही थी। जिस पर मार्क ट्वेन के ये शब्द अंकित थे कि “सिविल युद्ध के बाद अमरीकी सभ्यता ने GUILDED AGE पतर के युग में प्रवेश किया“ जिसका अर्थ लिखा था, gold color film applied on inferior material. अर्थात सोने की पतली परत को घटिया वस्तु पर चढ़ाना । और इस परत के दिखावे व चकाचौंध में वास्तविकता कहीं खो गई थी । वह सोच रही थी कि मार्क ट्वेन का आकलन कितना सही था ।






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