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प्रेतबाधा

  • अभिज्ञात
  • 5 नव॰ 2020
  • 8 मिनट पठन

चैत्र कृष्ण पक्ष की अमावस्या को आख़िरकार वे देवस्थान में थे। पांच दोस्त, जो हाईस्कूल के दिनों में साथ पढ़ते थे। अब कॉलेज की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। कुछ नौकरियों की तलाश में थे, कुछ का करियर बन चुका था। उनके साथ ज्योतिका और उर्वी भी थीं। उन्होंने अपने घर वालों को बताया था कि वे दोस्तों के साथ घूमने जा रही हैं, किन्तु यह नहीं बताया था कि उन दोस्तों में लड़के भी हैं, वरना उन्हें किसी भी सूरत में जाने की इजाज़त नहीं मिलती। और मिलती भी तो तमाम सवाल यहां आने के पहले और जाने के बाद उनका लगतार पीछा करते। कहां तो वे पर्यटन स्थल रामटेक जाने का कहकर निकलीं थी और जा रही थीं भूतों के मेले में।

वे महाराष्ट्र के एक छोटे से स्टेशन पर उतरे थे। वहां से उन्होंने लगभग चार-पांच किलोमीटर पैदल यात्रा की थी। शुरू में ही उन्होंने अनजाने जो रास्ता चुना था, वह पैदल यात्रियों का था। मेले में जाने वाले अधिकतर ग्रामीण थे, जो दूरोदराज़ से आये थे। वे जिस ट्रेन से उतरे थे, स्टेशन पर उतरने वाले ज़्यादातर यात्री मेले जाने वाले ही थे। जब उन्होंने किसी से बड़े संकोच के साथ भूत मेले के बारे में पूछा तो कहा गया कि यहां जितने भी लोग उतरे हैं वे सभी वहीं, उसी मेले में जा रहे हैं।

वे पांचों जाते हुए लोगों के पीछे हो लिए तो पता चला कि घने जंगलों के बीच से पगडण्डीनुमा रास्तों से होकर मंदिर पहुंचना है। चूंकि सभी पैदल जा रहे थे और कोई बता नहीं रहा था कि ठीक कितनी दूरी पर है, इसलिए भी वे पैदल निकले। उन्हें कोई हड़बड़ी नहीं थी। उनके पास वक़्त ही वक़्त था और घूमने की असीम इच्छाएं। लम्बी बहसें और गपबाजियां थीं। आड़े-तिरछे जंगली रास्तों से होते हुए वे वहां पहुंचे, जहां ग्रामीण मेला लगा हुआ था। वहां पहुंचने पर उन्होंने देखा कि वहां से चौड़ी सड़क भी स्टेशन को जा रही है और सड़क के किनारे दोनों ओर तमाम बसें लगी हुई हैं, जो सिर्फ महाराष्ट्र के दूरोदराज इलाकों से आयी हुई हैं, बल्कि दूसरे राज्यों के नम्बर प्लेट बता रहे थे कि वहां से भी लोग आये हुए हैं। किनारे कई कारें और आटोरिक्शा भी मिले। ख़ैर मेले में पैदल आने का उन्हें कोई अफसोस नहीं था क्योंकि बातों ही बातों में रास्ता कब कट गया, पता ही नहीं चला और आनंद आया सो अलग।

रास्ते भर अधिकतर लोग मेले का ही वर्णन कर रहे थे, जिससे उन्हें पता चला था कि यह देवस्थान सवा सौ साल से अधिक पुराना है। किसी संत को देवी दुर्गा ने दर्शन दिये थे और स्वप्नादेश पर उन्होंने एक निश्चित स्थान पर देवी का पिंड रखकर पूजा-अर्चना शुरू की थी। घने जंगलों के बीच यह स्थान था। कहते हैं कि जंगल में भूत-प्रेत और चुड़ैलों का भी प्रकोप था, जिसे देवी से प्राप्त शक्ति के बूते महात्मा जी उन पर आसानी से काबू पा लेते थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली और प्रेतबाधा के शिकार लोग उनकी शरण में आने लगे। धीरे-धीरे वह देवस्थान एक तीर्थ के रूप में ही विख्यात हो गया। महात्मा जी के मरने के बाद मंदिर में बिना किसी तांत्रिक-ओझा के अपने आप लोग प्रेतबाधा मुक्त हो जाते हैं। अब वहां नवरात्रि के दौरान पूर्णिमा के दिन मेला लगता है।

पूजा आधी रात के बाद शुरू होती है। मंदिर परिसर में वितरित भभूत खाने से कोई भी भूत-प्रेत से छुटकारा पा सकता है। वहां एक नीम का पेड़ है, उसके करीब आते ही भूत बताने लगता है कि उसके आने का मकसद क्या है और वह कौन है।

हालांकि उन्होंने पहले ही सुन रखा था कि प्रत्येक वर्ष वहां अमावस्या की रात भूतों का मेला लगता है। लोगों ने बताया था वहां भूत दिखाई देते हैं, सो वे वहां पहुंचे थे। वहां पहुंचने पर पता चला कि वहां भूतों का तो नहीं बल्कि ग्रामीण समुदाय के लोगों का मेला अवश्य लगा हुआ है। चारों ओर खाने-पीने की चीजों की अस्थाई दुकानें लगी हैं। एक ओर प्रोजेक्टर लगाकर फ़िल्में दिखायी जा रही हैं। कहीं स्टेज बना है और वहां कोई नाच मंडली अपने कार्यक्रम की प्रस्तुति दे रही है। वहां मोज़े, रूमाल से लेकर बच्चों के कपड़े व खिलौने बिक रहे हैं, यहां तक कि मनी पर्स, बैग व साड़ियां बिक रही हैं। लगभग एक किलोमीटर क्षेत्र में यह मेला लगा हुआ है। सारा तामझाम अस्थाई है। बस स्थायी है तो एक छोटा सा प्राचीन मंदिर।

वे पांचों दिलचस्पी से मेले की हर चीज़ का आनंद लेते रहे। तरह-तरह के व्यंजनों को उन्होंने चखा। पहले तो उन्होंने शक से हर व्यक्ति को देखा कि वह आदमी है कि भूत है। फिर पता चला वे लोग भी उन्हीं जैसे लोग हैं। उन्होंने सुन रखा था कि भूतों के पैर पीछे की ओर मुड़े होते हैं आदि-आदि लेकिन वहां उन्हें किसी के पैर वैसे नहीं दिखे। उन्हें बताया गया कि ब्रह्ममुहूर्त के ठीक पहले भूतों के प्रवेश की बेला आयेगी। मंदिर में उस वक़्त घण्टे-घड़ियाल बजेंगे। अभी काफी वक़्त था। पैदल काफी चलने के कारण उन्हें नींद सताने लगी थी। वहां अस्थाई टैंट भी किराये पर मिल रहे थे, जिसमें सोने की व्यवस्था थी और शौचालय भी था। उन्होंने टेंट में सोने का भी आनंद लिया। कुछ ही देर में नींद ने दस्तक दे दी।

मंदिर में बजने वाले शंख और निरंतर बजती घण्टों की तेज ध्वनि ने उनकी नींद को तोड़ दिया। उनींदी अवस्था में वे सब मंदिर की ओर भागे, जहां मेले में पहुंचे ज़्यादातर लोग पहुंच रहे थे। मंदिर का मुख्यद्वार अभी बंद था और लोग बेसब्री से उसके खुलने का इन्तज़ार कर रहे थे।

ज्यों ही परिसर के गेट का ताला खुला, लोग धड़धड़ा कर मंदिर के प्रांगण में प्रवेश कर गये। वहां भभूत रखा था, जिसे सभी ने चखा। मान्यता के अनुसार जिसे प्रेतबाधा है, वह उजागर होगी और फिर वह इससे मुक्त हो जायेगा। वहां पुजारी ने मां दुर्गा की आरती शुरू की। इससे पहले की आरती ख़त्म हो वहां खड़ी महिलाएं, युवतियां, युवक, बुजुर्ग में से कुछ झूमने लगे और धीरे-धीरे ऐसा करने वालों की तादाद बढ़ने लगी। आरती ख़त्म होने पर हालत यह थी कि ज़्यादातर लोग झूम रहे थे।

माइक पर प्रेत बाधा निवारक हनुमत मंत्र –

“ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ऊँ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत पिशाच-शाकिनी-डाकिनी-

यक्षणी-पूतना-मारी-महामारी, यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम्क्षणेन हन हन भंजय

भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर रुद्रावतार हुं फट् स्वाहा”

का जाप हो रहा था। फिर मंदिर में ढोल-नगाड़े की धापें सुनायी देने लगीं। यह सब प्रबंध उन लोगों ने किया था,


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जिनके परिवार के लोग प्रेतबाधा के शिकार थे। एक अजीबो ग़रीब खेल का मैदान बन गया पूरा मंदिर परिसर। कोई नाच रहा था तो कोई विचित्र तरह की आवाज़ें अपने गले से निकाल रहा था। कोई दूसरों के बाल नोंच रहा था तो कोई ख़ुद के कपड़े फाड़ रहा था। किसी को अपना होश नहीं था और ना दूसरों की कोई परवाह। कोई मंदिर परिसर में खड़े नीम के पेड़ पर चढ़कर उसकी डालियों से झूल रहा था।

जो भी पेड़ के क़रीब पहुंचता ख़ुद ही कह उठता कि वह किस का भूत या चुड़ैल है और क्यों आया है।

वहां उन पांचों ने भी वही किया, जो अन्य लोग कर रहे थे। उन्होंने पहले ही तय किया था कि यहां मस्ती करने आये हैं इसलिए भूतों के साथ मस्ती करने में कोई हर्ज नहीं। जिसे जिस रूप में मस्ती करनी है, करे। सो वे पांचों भी पूजा के बाद अजीबो ग़रीब हरकत करने लगे। उन्होंने अपने आप को तमाम बंधनों से अपने आप को मुक्त कर लिया। कुछ ज़ोर- ज़ोर से चीख़ने लगे और फिर गाने लगे। जो मन में आया अनाप-शनाप बकने लगे। उन्हें पता था उन्हें कोई नहीं देख-सुन रहा। सब एक ही रंग में रंगे हुए थे लेकिन ज्योतिका और गिरीश ने जैसे अपनी हरकतों से इस प्रेतलीला में जान डाल दी थी। उन्होंने इस प्रेत लीला को प्रेमलीला में बदल दिया था। ज्योतिका और गिरीश दोनों एक दूसरे के साथ झूमते और नृत्य करते हुए न सिर्फ़ एक दूसरे से लिपट गये थे, बल्कि ज्योतिका ने तो शर्म का सारी हदें पार करते हुए एक-एक कर अपने तमाम वस्त्र उतार फेंके। वह लगभग नग्नावस्था में गिरीश से ज़ोर से लिपटी और फिर उसे छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी। नीम के पेड़ के पास जाते ही उसने अजीब आवाज़ में पूरे ज़ोर से साफ़-साफ़ कहा - ‘मैं लैला की भटकती हुई रूह हूं और अपने मजनूं से मिलने के लिए आयी हूं। मैं अपने मजनूं से मिल कर ही रहूंगी।’

और उसने गिरीश को अपनी बाहों में भर लिया। गिरीश मदहोश सा उसके आगोश में लिपटा रहा।

**************

पौ फूटते ही सूर्य की रश्मियां के साथ प्रेत लीला का समापन होना शुरू हो गया। विचित्र हरकतें करने वाले, अजीबो ग़रीब आवाज़ में बात करने और गाने वाले लोग शांत होने लगे और थोड़ी ही देर में यह कहना मुश्किल था कि वे इस तरह की हरकतें कर सकते हैं।

वे सभी स्टेशन लौटे। रास्ते में गिरीश और ज्योतिका से जब उनकी हरकतों के बारे में कहा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें पता ही नहीं कि उन्होंने ऐसी हरकतें की हैं। उन्हें नहीं पता था कि उनमें प्रेत बाधा थी, जो यहां आकर प्रकट हुई इसलिए उन्हें अपनी हरकतों का पता नहीं चला, जबकि तीन अन्य तो वहां मौज-मस्ती के लिए नाच गा रहे थे। दोनों ने ख़ैर मनायी कि अच्छा हुआ कि वे यहां इसी बहाने आ गये और उनकी बीमारी ठीक हो गयी। हालांकि ज्योतिका ने कहा कि उसने पहले कुछ विचित्र हरकतें की हैं, जिनके बारे में उसे पता नहीं था। लोग कहते थे कि उस पर संभवतः कोई साया है, तो वह नहीं मानती थी। जब भूत मेले की योजना बन रही थी तो उसने इसलिए अतिरिक्त दिलचस्पी ली। जबकि गिरीश ने कहा कि उसे पहली बार पता चला कि उसमें प्रेत बाधा है।

किसी को कुछ न बताने की कसम लेने के बाद सभी दोस्त अपने घर रवाना हुए। और यह भी तय हुआ कि उन्हें यहां फिर आना होगा प्रेतबाधा दूर होने पर लोगों को धन्यवाद स्वरूप मंदिर परिसर के नीम के पेड़ पर लाल रंग की चुन्नियां और काला धागा बांधने आना होता है।

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पच्चीस साल बाद ज्योतिका के आग्रह पर वे फिर मिले थे। सभी अलग-अलग शहरों में रह रहे थे। सभी का जीवन आगे बढ़ चुका था। सबके अपने परिवार थे। अधिकांश के बच्चों के शादी हो चुकी थी या होने वाली थी। सब कुछ के बावज़ूद मेला नहीं बदला था। सड़क मार्ग पता होते हुए भी वे पुराने दिनों को याद करने के लिए पैदल चल कर पहुंचे थे। रास्ते भर उनकी बातें ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थीं। वे तफ़्सील से बता रहे थे उनके जीवन में नया क्या-क्या घटा है। लगभग पांच किलोमीटर का रास्ता उन्होंने कब तय कर लिया यह इस बार भी पता नहीं चला। और तो और उन्हें मेले में नींद भी नहीं आयी और समय आ गया, जब मंदिर के घण्टे-घड़ियाल बजने लगे। इस बार भी सबने मस्ती की और पुराने दिनों की याद को ताज़ा करने के लिए पहले जैसी ही मस्ती की। इस बार ज्योतिका निर्वस्त्र नहीं हुई। वह नाची भी नहीं लेकिन वह विचित्र ढंग से झूमने लगी और गिरीश को अपनी बांहों में जकड़ लिया और उसी हालत में देर तक रोती रही।

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रास्ते में दोस्तों ने ज्योतिका को बताया कि उसकी प्रेत बाधा अभी पूरी तरह से गयी नहीं है। वह रोये जा रही थी। हालांकि गिरीश ने कहा कि वह ठीक है क्योंकि उसे पता है कि मंदिर में क्या हुआ। अब वह ज्योतिका को मंदिर में झिड़क तो नहीं सकता था क्योंकि वह रो रही थी। वह इमोशनल हो गया था। ज्योतिका ने कहा- ‘मैं अगले साल फिर अपने बच्चों और पति के साथ आऊंगी। इस बार दोस्तों को तंग नहीं करूंगी।’

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विदा से पहले ज्योतिका ने चुपके से गिरीश को एक पुर्जी थमा दी थी। गिरीश ने बाद में उसे खोला, जिसमें लिखा था - 'गिरीश, जब पहली बार हम भूत मेले में गये थे, तब मैं होश-ओ-हवास में थी। मैं शुरू से ही तुम्हें बहुत चाहती थी लेकिन तुमने मेरे प्यार को समझा ही नहीं। मंदिर में जब हम पहली बार पहुंचे थे, मेरी शादी दूसरे से तय हो गयी थी। मंदिर में तुम्हारे साथ बिताये क्षण मेरी ज़िन्दगी के अनमोल क्षण हैं। आज दूसरी बार भी मुझे कोई प्रेत बाधा नहीं थी। पता नहीं हम कब मिलें। मैं तुमसे लिपटकर रोई और अपना दुःख कुछ हल्का कर लिया।-ज्योतिका।'

गिरीश की आंखों में आंसू थे। वह ग़रीब परिवार का था और ज्योतिका सम्पन्न। इसलिए वह न तब अपने दिल की बात कह सका था न अब। और यह भी नहीं बता सकता था कि उसे भी कभी कोई प्रेतबाधा नहीं थी।



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लेखक परिचय

डॉ.अभिज्ञात। कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिन्दी में पीएच.डी। दस कविता संग्रह, दो उपन्यास और दो कहानी संग्रह प्रकाशित। आकांक्षा संस्कृति सम्मान, कादम्बिनी लघुकथा पुरस्कार, कौमी एकता अवार्ड, अम्बेडकर उत्कृष्ट पत्रकारिता सम्मान, अग्रसर पत्रकारिता सम्मान, कबीर सम्मान, राजस्थान पत्रिका सृजन सम्मान, पंथी सम्मान आदि। पेंटिंग करते हैं। कुछ कला प्रदर्शनियां भी लगायीं। हिन्दी फ़ीचर फि़ल्म चिपकू और बांग्ला फि़ल्मों एक्सपोर्ट: मिथ्ये किन्तु सोत्ती, एका एबंग एका, महामंत्र, जशोदा, बांग्ला धारावाहिक प्रतिमा और शार्ट फ़िल्मों ईश्वर तथा नोमोफोबियाः एक यंत्र में अभिनय। पेशे से पत्रकार। अमर उजाला, वेबदुनिया डॉट कॉम, दैनिक जागरण के बाद सम्प्रति सन्मार्ग में कार्यरत। पता- सन्मार्ग, 160 बी,चित्तरंजन एवेन्यू, कोलकाता-700007,फ़ोन-9830277656 ईमेल-abhigyat@gmail.com

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