• अर्चना सिंह 'जया'

पश्चाताप

जिंदगी जो हमें सिखाती है शायद वह किसी पाठशाला में हमें सीखने को नहीं मिलती। वक्त जैसे बेलगाम घोड़े की रफ्तार की तरह भागता ही जा रहा था/ ना जाने कब मैं ५९ वर्ष का एक बेबस इंसान हो गया था। भोर के ४ बजे नींद न आने के कारण आज मैं बिस्तर पर औंधा पड़ा हुआ, जीवन के पिछले उधेड़बुन में उलझ रहा था। आज जैसे अपनी गलतियों का पश्चाताप करना चाह रहा था, मगर मुझे सुनने वाला ही कोई ना था। काश! बीते उन पलों में जाकर मैं अपनी भूलों को सुधार पाता। मुझे इस बात का कभी एहसास नहीं हुआ कि मेरी भी स्थिति कभी इतनी दयनीय हो जाएगी। घर की सूनी दीवारें, दीवारों पर टंगी तस्वीरें जैसे मुझसे कई सवाल करती हों और कहती हों कि हुक्म दो, डांट लगाओ, अपनी एक आवाज में लोगों की कतार खड़ी कर दो। तुमसे तो पराए क्या, तुम्हारे अपने भी थर कांपते हैं। तुम्हारी एक आवाज में अर्पिता भागी चली आती थी और जो वह नहीं आ पाती थी तो तुम उसके मां बाप तक और उसके संस्कार तक की दुहाई दे देते थे। हां, सच ही तो है शायद मैंने उसकी अच्छाइयों को देखना ही नहीं चाहा। कहते हैं न कि दिन कभी एक से नहीं रहते और आज एक गिलास पानी देने वाला भी पास में कोई न था। यूं तो कहने को दो बच्चों का पिता हूं। गुज़रा हुआ ज़माना आज नजरों के सामने आ रहा था/ हम पांच भाई. बहन थे जिस कारण माता-पिता की जिम्मेदारियां दोहरी हो गई थीं। घर में जगह की कमी जरूर थी मगर दिलों में जगह की कमी नहीं थी। माता-पिता ने हमें शिक्षित कर दिया था ताकि हम अपने पैरों पर खड़े हो सकें। समझा जाए तो यही अपने आप में एक बड़ी बात थी। मां नवीं तक पढ़ी हुई थी वहीं पिताजी शिक्षित और एक अच्छी नौकरी में थे । मेरे विवाह के दो वर्ष पश्चात ही पिताजी का देहांत हो चुका था, मेरे साथ मेरी माता जी रहती थीं। मेरी पत्नी का नाम अर्पिता था, यानि सदा दूसरों के लिए समर्पित। मैंने कभी उसके नाम के अर्थ को समझने का प्रयास ही नहीं किया था। मैं स्वभाव से जितना ही जिद्दी और क्रोधी मिजाज का था, वह स्वभाव से उतनी ही धैर्यवान, विनम्र और मृदुभाषी थी। वह एक शिक्षित परिवार से थी, पिताजी इंजीनियर थे और स्वयं एम एस सी कर रखी थी। मेरे पिताजी शिक्षा की अहमियत को समझते थे शायद यही वजह थी कि मेरी शादी शिक्षित परिवार में हुई थी। यूं तो कहने को यह परिवार मेरा अपना था, खून का रिश्ता आपस में था, किंतु अर्पिता ने, दूसरे परिवार से होने के बावजूद भी, ससुराल के लोगों के साथ अपना रिश्ता यूं बना लिया था जैसे सारा परिवार उसका अपना हो। कई बार तो मैं अपने ऑफिस के कामों में यूं उलझा रहता था कि परिवार की कुछ छोटी-बड़ी परेशानियों के लिए समय नहीं निकाल पाता था/ वहीं अर्पिता पूरी जिम्मेदारी के साथ अपने दायित्वों को निभाया करती थी। आज समय से चाय-पानी देने वाला भी कोई नहीं था। घर में मेरे अलावा मेरा ही साया था। घर में पसरा सन्नाटा जैसे मुझे रह रहकर कचोट रहा था, मुझे मेरे अहम् का एहसास करा रहा था/ कामवाली बाई भी मुझे कमजोर जानकार अपनी मन मर्ज़ी चला रही थी। मैं जहां अर्पिता की जरा सी भूल नहीं बर्दाश्त कर पाता था, वहीं आज बाई के सारे नखरे बर्दाश्त करने को तैयार हो गया था। मैं स्वयं से चाय बनाकर लड़खड़ाता हुआ बिस्तर पर आकर बैठ गया और फिर से अपनी उस दुनिया में लौटने लगा। मैं मां,पत्नी और दोनों बच्चों के साथ दूसरी जगह लखनऊ शहर में रोजी रोटी के लिए आ गया था। पांच वर्ष के बाद ऑफिस में तरक्की तो होती गई, पर साथ ही मेरा काम का बोझ भी बढ़ता गया। जिस कारण घर के कामों में हाथ बंटाना मेरे लिए जरा मुश्किल सा होता गया। अर्पिता अंदर-बाहर के कार्यों को निभाने में सक्षम थी। बैंक जाना हो या मां को डॉक्टर के पास या शॉपिंग कराने के लिए ले जाना हो, अर्पिता बखूबी ही जिम्मेदारी को निभाया करती थी। मां के साथ उसका रिश्ता और भी पक्का होता जा रहा था। हां, अगर कभी सब्जी में नमक या मसाले ज्यादा हो जाया करते थे तो मैं बहुत ही बुरी तरह से पेश आया करता था, वहीं पर मां बातों को घुमा कर टाल जाया करती थी। दिसंबर माह में एक दिन रात के वक्त खाना खाते-खाते प्यास लगी, गिलास का पानी गुनगुना नहीं था तो मैंने जरा जोर से क्रोधित स्वर में कहा, 'क्या पानी गर्म करने के लिए वक्त नहीं मिला, मुझसे भी ज्यादा व्यस्त रहने लगी हो क्या?’ मैं न जाने उसे क्या एहसास कराना चाहता था/ वो चुप अपने काम को सही करने में जुट जाती थी। उसकी खामोशी भी जैसे जवाब हुआ करती थी। उसके दर्द को कभी समझना चाहा ही नहीं बस अपनी मर्ज़ी थोप दिया करता था। लोग कहते हैं कि एक शिक्षित लड़की से शिक्षित परिवार का निर्माण होता है। अर्पिता को स्वयं भी पढ़ने लिखने का बेहद शौक था, हमारे दोनों बेटों की स्कूली पढ़ाई को पूरी तन्मयता के साथ अर्पिता देखा करती थी। हां, आज मुझे अर्पिता की उन अच्छाइयों का एहसास हो रहा था। स्कूल के पी टी एम के समय ही मैं बच्चों के स्कूल अर्पिता के साथ जाया करता था। ये भी सच है कि दोनों बेटों के स्कूल से कभी कोई शिकायत नहीं आई। ये श्रेय अगर देखा जाए तो बच्चों की मां को ही जाता है पर मैं अभिमानी हमारा खून, परिवार की दुहाई देता रहता था। बच्चों की परवरिश में जैसे अर्पिता का कोई योगदान ही ना रहा हो। वक्त गुजरता जा रहा था, दोनों बच्चे भी बड़े हो गए/ दोनों अलग-अलग शहरों में इंजीनियरिंग व एम बी ए करने के लिए निकल गए थे। बस हम तीन लोग ही घर पर रह गए थे। अर्पिता अपने आप को व्यस्त रखने और मन लगाने के लिए पास के ही एक स्कूल में विज्ञान की टीचर का कार्य आरंभ कर दी थी। अब उसे स्कूल के कार्य के साथ-साथ ही घर और बूढ़ी सास की जिम्मेदारी भी निभानी थी। चेहरे पर मुस्कान सजाए हर कार्य को मन से जिम्मेदारी के साथ निभाती थी। मुझे ऑफिस के काम के सिलसिले में कई बार तीन-चार दिनों के लिए बाहर भी जाना पड़ता था/ ऐसे में पीछे से परिवार को देखने का दायित्व अर्पिता का बढ़ जाता था। कुछ वर्ष पश्चात दोनों ही बेटे एक अमेरिका और दूसरा आस्ट्रेलिया चला गया, मैं तो जैसे फूला ही नहीं समाया। खानदान में आज तक कोई विदेश नहीं गया था इसलिए ये गर्व महसूस करने वाली बात तो थी। पर शायद मुझ में अहम् समां रहा था मैं अर्पिता से कहता, देखो ये मेरे बच्चे, मेरा खून, मेरा गुरूर हैं। मैं इतनी तकलीफ से जिंदगी को यहां तक लाया हूं। अर्पिता चुप ख़ामोशी से सुनती कोई प्रतिक्रिया नहीं देती, बच्चों का बहुत दूर चले जाना उसे कुछ सही नहीं लग रहा था। शायद इसीलिए मेरी मर्जी व खुशी में अपनी श्हां भी शामिल नहीं किया करती थी। दरअसल देखा जाए तो दोनों बच्चे अपनी मां के ज्यादा करीब थे बजाए मेरे, दोनों ही बच्चे मेरे साथ औपचारिक रूप से व्यवहार किया करते थे। जबकि वहीं मां के साथ हंसते, बोलते, खेलते और अपने मन की बातों को कहा करते थे। हो भी क्यों न? मैं बाहर घुमा-फिरा दिया करता था, या फिर पढ़ाई से संबंधित ही बातें किया करता था। मैं कभी बच्चा या दोस्त बनकर उनके साथ खेलने का प्रयास नहीं करता था। ईश्वर की कृपा से सब ठीक ही चल रहा था कि अर्पिता की तबीयत अचानक खराब होनी शुरू हुई। डॉक्टर के पास आने-जाने का सिलसिला प्रारंभ हो गया, कुछ महीनों पश्चात पता चला कि उसे कैंसर है। मां तो इस सदमे से उबर ही नहीं पाई, उसने तो जो बिस्तर पकड़ा फिर बिस्तर से कभी ना उठ पाई। मां के नहीं रहने से अर्पिता स्वयं को अकेली महसूस करने लगी। अर्पिता का यह कहना था कि दोनों बच्चों को उसकी बीमारी की बात न बताई जाए। मैंने उसकी इस बात से असहमति जताई थी किंतु कसम दिलाकर जीवन में पहली बार उसने अपनी ज़िद मनवा ली। पूरी जिंदगी ना ही बच्चों ने और ना ही अर्पिता ने कभी किसी प्रकार की ज़िद की थी। वक्त का पहिया घूम रहा था/ मैं कभी जीवन के जिन पलों को दुख का कारण समझा करता था शायद वह दुःख था ही नहीं। दुखों का पहाड़ तो अब टूटने वाला था। डॉक्टर ने भी हिदायत दे रखी थी कि अर्पिता के खाने.पीने का विशेष ध्यान रखा जाए, बाकी सब ईश्वर की कृपा है उसकी मर्जी है। मैं अंदर से अस्वस्थ महसूस कर रहा था परन्तु कोई रास्ता नहीं था/ बेमन से उठ कर रसोई में जाकर अपने लिए दूध और कॉर्न फ्लेक्स लेना चाहा, तभी मुझे चक्कर सा महसूस हुआ और मैं वहीं पास की कुर्सी पर बैठ गया। फिर जैसे-तैसे मैं कमरे की ओर आया और बिस्तर पर लेट गया। कुछ देर बाद अचानक दरवाजे की घंटी बजी, मैंने वाक्कर के सहारे जाकर दरवाजा खोला, पैर में दिक्कत होने की वजह से मैं कभी-कभार वाक्कर की मदद ले लेता था। देखा तो बाई खड़ी थी, मैंने गुस्से में कहा, 'दो दिन बाद अब आई हो तुम्हें मेरा जरा भी ख्याल नहीं। मैं कितना परेशान.... ।' उसने बीच में ही टोकते हुए कहा, 'क्या करूं साहब मेरे पति की तबीयत सही नहीं थी, डॉक्टर के पास दिखाने ले जाना पड़ा। मेरे सिवा उसका है ही कौन?' आज अर्पिता की कमी मेरे मन को कचोट रही थी। काश! मैं अर्पिता को बचा पाता। अर्पिता के स्वास्थ्य को देखते हुए मैंने बड़े बेटे के विवाह का निर्णय ले लिया/ वैसे तो बेटे ने अपने लिए लड़की स्वयं ही पसंद कर रखी थी। बहु पसंद करने का अवसर भी हम दोनों की हाथों से जाता रहा। खैर, जिस बात में बच्चों की खुशी उसी में हमारी खुशी। दोनों ही बच्चों ने घर आने के लिए टिकट करवा रखा था/ विवाह की तैयारी जोर शोर से चल रही थी। तभी एक दिन अर्पिता की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई, उसी शाम दोनों बच्चे लखनऊ पहुंचने वाले थे। डॉक्टर ने अर्पिता को आईसीयू में भर्ती कर लिया/ अगली सुबह दोनों बच्चे मां से मिलने अस्पताल पहुंचे। मां की बीमारी के विषय में पूर्ण जानकारी मिलते ही दोनों बेटे रो पड़े और बोले, 'मां तुम ने हमें बताया क्यों नहीं? क्या हमें जानने का हक भी नहीं? मां बेसुध हो बेजान लाश सी पड़ी थी, आंखों से चुपचाप आंसू बह रहे थे। बेटे ने मां का हाथ थाम लिया और आंसू पोंछा। दो दिन बाद तबीयत कुछ संभलती सी लगी तो तीसरे दिन अर्पिता के लिए एक नर्स रखी गई और डॉक्टर की इजाज़त लेते हुए अर्पिता को घर लाया गया ताकि शादी में शामिल हो सके। शादी के घर में लोगों का आना शुरू हो गया था/ अर्पिता के साथ नर्स व उसकी बहन हमेशा साथ में रहते थे। ईश्वर की कृपा ही रही थी कि अर्पिता की मौजूदगी में बेटे की शादी हो गई। अर्पिता ने पूरी शादी व्हीलचेयर पर बैठकर ही निकाल दी और बहू का गृह प्रवेश भी बैठे-बैठे ही करवा दिया। बीमारी की अवस्था में भी अर्पिता जैसे बैठे-बैठे अपनी जिम्मेदारियों को निभा रही थी। बेटे की शादी को डेढ़ माह बीत चुके थे/ नर्स की देखरेख में जिंदगी की गाड़ी चल रही थी। अर्पिता की तबीयत को देखते हुए, मैंने वॉलेन्टरी रिटायरमेंट भी ले लिया। वैसे भी एक वर्ष ही नौकरी के रह गए थे, मैंने सोचा, सारी जिंदगी और वक्त मैंने दोनों ही पैसे कमाने में ही गंवा दिया था क्यों ना अब अर्पिता को कुछ समय ही दे दूं जिसकी शिकायत अर्पिता और बच्चों को सदा ही रही। पर एक वक्त ही है जिसे हम पैसे से नहीं बांध सकते हैं वरना हम बुद्धिजीवियों में इस बात की भी होड़ लगी होती । लाख छुपाने के बावजूद भी अर्पिता की आंखों में मायूसी के आंसू नजर आ ही जाते थे। वैसे तो दोनों बेटों से रोज़ बात हो ही जाया करती थी/ बहू का भी फोन आ जाया करता था। तभी एक सुबह अर्पिता दर्द से कराहते हुए उठी और उसकी सांसें जैसे हवा में विलीन हो गई। अर्पिता हमसे बिना कुछ शिकायत किए ही हमें छोड़कर चली गई/ हमारे पास अफसोस मनाने के अलावा और कुछ नहीं रह गया था। अंतिम काम क्रिया के लिए बच्चे बहू भी आए और कुछ दिन बाद वे भी चले गए। बच्चों ने मुझसे भी चलने के लिए कहा किंतु मैं घर – नहीं - मकान छोड़कर जाने को तैयार ही नहीं था।

बच्चों की जिंदगी चढ़ते सूरज की तरह होती है और हम ढलता सूरज होते हैं। उन्हें तो जाना ही था अकेला तो मैं रह गया। बच्चों को विदेश की चमक-दमक और पैसे अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। शायद ये मेरे ही दिखाए रास्ते थे जिन पर आज दोनों बेटे चल पड़े थे। आज तो मैं ये भी नहीं कह सकता था कि अर्पिता देखो ये बच्चे कितने बदल गए हैं/ यहां से इन्हें लगाव ही नहीं रहा, जहां उनका बचपन बीता। वैसे यह शिकायत उचित तो नहीं है क्योंकि विदेश भेजने का फैसला भी तो मेरा ही था। तुम तो मोहपाश से मुक्त हो गई पर मैं तो सांसारिक जीवन के पशोपेश में उलझा हुआ हूं। समय के साथ बच्चों को जीना आ गया था परन्तु मेरी तो दुनिया ही बदल गई थी। काश! जो समय रहते ही तुम्हारी अहमियत समझ लिया होता यूं सोचते हुए मेरी आंखें नम हो गईं। आज पश्चाताप के अलावा और कुछ नहीं था/ अब समय तो जैसे लंबे सफर की तरह लग रहा था। दीवारों पर टंकी तस्वीरें धुंधली सी दिख रही थी क्योंकि आंखों में आंसू ने और दिलों में दर्द भरी यादों ने जगह ले ली थी। वर्षों पश्चात मैं अर्पिता में पिताजी की परछाई देख पा रहा था। काश! यह बात मैं समय रहते ही समझ गया होता तो शायद आज यूं तन्हा जिंदगी के सफर में ना होता। धन-दौलत संपूर्ण सुख नहीं है जीवन साथी का साथ रहना ही संपूर्ण सुख है यह बात आज समझ आई। शायद मुझसे कहीं अच्छे से अर्पिता रिश्तों की अहमियत को समझती थी।


विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन कार्य करती रहती हूँ। कविताएँ,कहानियाँ, लेख समय समय पर प्रकाशित होती रहती हैं। राष्ट्रीय सहारा पेपर, समर्थ भारत पत्रिका, साहित्य गुंजन पत्रिका इंदौर में भी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘कृति कल्प’ NGO की पत्रिका में दो वर्षों से नियमित लेख प्रकाशित हो रहे हैं। मैंने ‘श्रेयसी पाठ्यपुस्तक’ 1 से 5 कक्षा की उत्तर पुस्तिका भी लिखी है, यह इंदिरापुरम पब्लिक स्कूल में लगी है। पेंटिग का भी शौक है। मैंने हिंदी एम ए व बी एड किया हुआ है व 17 वर्षों तक हिंदी अध्यापिका का कार्य भी किया है।

archanasingh601@gmail.com

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