• भारती पंडित

पूर्ण विराम




(1)

प्रिय अनु

तुम्हारे नाम के आगे प्रिय लिखते समय आज हाथ एक बारगी रुका है जैसे कोई अनाधिकृत चेष्टा हो रही हो मुझसे| शायद मन के कोने-कोने में व्याप्त हो चुकी है वह दूरी जो बीते सालों में अनायास ही हमारे बीच उग आई है ... एक कंटीली बाड़ जिसके एक ओर तुम हो और एक ओर मैं ... कुछ सालों तक हम बाड़ के इर्द गिर्द खड़े हुए कम से कम सहज होने का तो प्रयास कर रहे थे, मगर फिर तुमने एकाएक चेहरा पलट लिया, मैं ताकती रही, प्रतीक्षा करती रही अनवरत कि कभी तो देखोगे मेरी ओर, भले ही आँखों में वह दीवानगी नहीं होगी पर दोस्ताना भाव तो झलकेगा| वही काफी होगा मेरे लिए जीवन को सहजता से बिताने के लिए ... आज बहुत दिनों बाद तुम्हें कुछ लिखने के लिए कलम उठाई है और वह भी इसलिए कि अब सब कुछ लिख देना मुझे ज़रूरी लग रहा है| ऐसा नहीं कि इस बीच कुछ लिखा नहीं मगर तुम्हारे बारे में सोचते ही कड़वाहट की कई ग्रंथियाँ खुल जाती थीं और मुझे कलम फेंक देनी पड़ती थी| आज कोशिश करूँगी कि कलम से कटुता न झरे, कटुता की स्याही को मधुर यादों के शहद से लबरेज करने की पूरी कोशिश करूँगी, यह भी नहीं पता कि लिखने के बाद यह मसौदा तुम तक पहुंचेगा भी या नहीं ...

आज अचानक तुम मेरे सामने आ खड़े हुए| इस शहर में मेरी संगीत की इतनी बड़ी कॉन्सर्ट का यह पहला अवसर था, कार्यक्रम बेहद सफल रहा था| मैं डूबी हुई थी अपने प्रशस्ति गान में, आखिर सालों की साधना के बाद अब ये क्षण मेरी झोली में आने लगे हैं| मैं उस आनंद में डूबती-उतरती पूरी तरह से मुग्ध हो पाती, इससे पहले तुम अचानक सामने आ खड़े हुए, मुझे बधाई देते हुए| मैं हरगिज़ तैयार नहीं थी इस झटके को सहने के लिए ... तुम मेरे लिए मेरी मनपसंद पुस्तक का वह अध्याय बन चुके थे जिसे मैं बंद करके पुस्तक को अलमारी में वापस सजा चुकी थी| एक बीता कल जिसकी ओर पलटकर देखने की हिम्मत नहीं थी मुझमें| मुझे नहीं पता तुम आज कितने सहज थे मगर मैं बिलकुल ही असहज हो गई थी| तुमने कुछ और भी कहा था, शायद यह कि कैसी हो, अच्छा लग रहा है तुम्हें प्रसिद्धि के इस मुकाम पर देखकर वगैरह ... और मैं, जैसे सुनकर भी कुछ न सुन पा रही थी| बहुत लोग थे आसपास और मैं जैसे हतबुद्धि हो बस इंच भर चौड़ी मुस्कान का लबादा होंठों पर ओढ़े किसी पुतले की तरह खड़ी हुई थी|

तुम मेरे हाथ में अपना कार्ड थमा गए थे, मेरे सामने पड़ा है टेबल पर| अब सोचती हूँ लिख ही डालूँ सब कुछ क्योंकि तुम्हें शायद यह सब बड़ा आसान लग रहा है - नाता जोड़ना, फिर अलग हो जाना, फिर जीवन में आ धमकना ... मगर मेरे लिए बार-बार अतीत की खिड़की में झाँकना आँसू भी देता है और मुस्कान भी ...

तुम्हें याद होगा न अनु, हमारा साथ कॉलेज के दिनों का था| एनसीसी के उस प्रदेश स्तरीय कैंप के लिए चयनित होकर आए हम दो अजनबी विद्यार्थी अचानक एकरूप हो लिए थे| रुचियाँ एक सी थी, विचार एक से थे| दोनों ही संगीत और लेखन से आबद्ध थे, साल भर का समय था देश स्तरीय कैंप के अभ्यास के लिए अलग-अलग कैंप में साथ रहने का और सांस्कृतिक समूह में प्रस्तुतियाँ तैयार करने का| रुचियों के साथ-साथ कहीं मन भी मिलने लगे थे हमारे| और फिर उम्र भी तो कुछ ऐसी ही थी| मैं उन्नीस की और तुम बीस के...यौवन की दहलीज़ पर पहले प्रेम की गुंजन ने दोनों को ही गुंजायमान कर दिया था| तुम्हारा पता नहीं पर मैं तो दीवानगी के ही आलम में थी| रेल के डिब्बे में मेरे सामने बैठकर तुमने गाई थी वह ग़ज़ल, “ मेरे लिए तो अब यही पल है हँसी बहार के, तुम सामने बैठी रहो मैं गीत गाऊँ प्यार के” और मैं मानो प्रेम के हिंडोले में झूलती रही थी सारे सफर में| स्पष्ट स्वीकारोक्ति चाहे कुछ भी न हो, मन मिल गए थे| दिल्ली भ्रमण के दौरान समूह के साथ होते हुए भी मैं मन से तुम्हारे ही इर्दगिर्द थी| और शायद तुम भी ...

मुख्य कैंप समाप्ति के बाद विदा के क्षण आ गए थे| उस समय फोन नहीं था| भरे मन से घर के पते का आदान-प्रदान करते हुए हम विदा हो गए थे|

मैं बता नहीं सकती तुम्हारे पहले पत्र का कितना इंतज़ार किया था मैंने| पर पहला पत्र तुमने नहीं लिखा, मुझे ही लिखना पड़ा था| शायद पहल करने की आदत नहीं थी तुम्हें या फिर पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था ने तुम्हें भी अपनी तरह ढाल लिया था जहाँ अनुनय-विनय करना, प्रणय निवेदन करना स्त्री के हिस्से होता है, पुरुष तो केवल अनुग्रह करता है| खैर, पत्रों का सिलसिला शुरू हुआ, करीब साल भर चला...हम दोनों ने ही मुहर लगाई थी इस रिश्ते पर, मुझे अभी भी याद है मेरे जन्मदिन पर कैसेट के रूप में भेजा गया तुम्हारा तोहफ़ा| गुलाम अली की गज़लों के बाद एक ग़ज़ल तुम्हारी आवाज़ में... “हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू” उस ग़ज़ल को वॉकमेन पर अनगिनत बार सुना था मैंने... उस समय भी जब तुम एक झटके से मेरे जीवन से निकल गए थे|

सावन की फुहारों के बाद अचानक पतझड़ का सा एक पत्र आया और हतप्रभ कर गया मुझे...

कितना सीधा सा जवाब था तुम्हारा, यह रिश्ता आगे नहीं बढ़ सकेगा स्वप्ना, बहुत सी दिक्कतें हैं, घर में लोग नहीं चाहते कि मैं जाति बाहर जाकर विवाह करूँ| समझ लो हमारा साथ यहीं तक था| मेरी ओर से तुम आज़ाद हो, जहाँ चाहे विवाह कर लो...

माय फुट, आज़ाद हो कहने वाले तुम होते कौन थे अनु? जी किया था गिरेबान पकड़ कर तुम्हें झकझोर डालूँ...पर सामने तो एक पत्र मात्र था| बस उसे ही तार-तार कर पाई थी मैं|

सारी चिट्ठियाँ आग के हवाले कर डाली थीं मैंने पर न जाने क्यों वह कैसेट बची रह गई थी| उसके बाद तुम्हारा क्या हुआ मुझे पता न चला और मैं किस हाल में रही तुमने पता लगाने की कोशिश नहीं की| जल्दी ही संभल गई थी मैं, शायद रिश्ते के पीपल ने मज़बूत जड़ें नहीं पकड़ी थीं| मैंने अपना सारा ध्यान संगीत और चित्रकला पर लगा दिया था| जो कुछ बिखरा था भीतर उसे रंग और सुरों ने सँवार दिया था| और इस बिखराव को समेटने में साथ दिया था विशाल ने| विशाल मेरा बचपन का दोस्त था जो मुझे बहुत पसंद करता था, मैंने उसे हमेशा दोस्त की नज़र से ही देखा था पर वही दोस्त आड़े समय में जैसे काम आया| उसने मुझसे शादी का प्रस्ताव रखा| मेरे सामने इंकार की कोई वजह बची भी नहीं थी|

शादी के बारह साल बड़ी तेज़ी से बीते| करियर, घर और बच्चों के बीच समय तेज़ी से भागा जा रहा था| मन मस्तिष्क से तुम्हारा हर ख्याल धुंधला चुका था| मैं संगीत और कला की दुनिया में व्यस्त थी और घर-गृहस्थी में मस्त भी| ऐसे ही एक बार संगीत के कार्यक्रम में उज्जैन जाना पड़ा और तुम श्रोताओं के बीच अचानक सामने आ बैठे| मैं हतप्रभ थी किस्मत के इस मज़ाक पर...कार्यक्रम समाप्त होते ही मैं ग्रीन रूम में घुस गई, वहाँ स्थानीय पत्रकार व्याकुल थे मुझसे बातचीत के लिए, तुम एक कोने में खड़े दिखाई दिए उसी नेह भरी मुस्कान के साथ, जिसकी दीवानी थी मैं| पत्रकारों से थोड़ी सी बातचीत करके मैं तुमसे मुखातिब हुई, बात तो क्या करती, बस हिचकियाँ बंध गईं, अंखियाँ बरस पड़ी| तुमने शालीनता से पानी का गिलास मेरी ओर बढ़ा दिया था|

तुम्हारे कार्यक्रम का विज्ञापन देखा, तो रोक न सका अपने आप को...आजकल उज्जैन में ही हूँ| तुमने बात का सूत्र आगे बढ़ाया था|

मैं बस तुम्हें देखती ही रह गई थी|

तुम कहते जा रहे थे, अभी तो ठीक से बात न हो सकेगी, कल रविवार है, मैं तुम्हें पिक करता हूँ, बहुत सी बातें करनी हैं| मैं तब तक जैसे सम्मोहन में थी और अगले दिन तक सम्मोहन में ही रही| हम अगले दिन मिले, महांकाल के दर्शन के बाद क्षिप्रा के घाट पर बैठ तुमने बीते सालों का हाल सुनाया| घर में तुमने बात की थी हमारे बारे में मगर जाति का बड़ा बंधन था, घरवालों का भारी दबाव भी...फिर कुछ साहस की भी कमी थी...

सही है न अनु, विवाह करने में साहस लगता है, प्रेम तो यूँ ही कर लिया जाता है| अपने स्वर के कंपन को मैंने भी महसूस किया था|

काश उस समय थोडा साहस कर लेता तो आज सुख के हिंडोलों में झूल रहा होता...तुम्हारे स्वर की आर्द्रता ने मुझे कंपित कर दिया था|

तुम्हारा परिवार? मेरा आशय शादी से था|

हाँ, हो गई है, जैसे सबकी होती है और जैसे सबकी चलती है...

खुश तो हो न? मैंने हौले से पूछा था|

तुमने एक कंकड़ उठाकर क्षिप्रा में फेंक दिया था...लहरों की निस्तब्धता को कंकड़ ने भंग कर दिया था और पानी हिचकोले खाता दूर जाने लगा था| पास बैठा पंछी चीखते हुए उड़ा था|

तुम कैसी हो? तुमने प्रतिप्रश्न किया था|

मैं बढ़िया हूँ, मेरे चेहरे से समझ में आ ही रहा होगा| मैं अपनी चिरपरिचित हँसोड़ मुद्रा में लौटने लगी थी|

तुमने गहरी नज़रों से मुझे देखा था| तभी देख पाई थी, तुम्हारी पेशानी की लकीरें गहरी हो गईं थीं, आँखों के नीचे भी लकीरें नज़र आ रही थीं| कलम के बालों में सफेदी झाँकने लगी थी|

तुम्हें चिट्ठियों में बताती थी न विशाल के बारे में? उन्होंने ही संभाला उस दौर में मुझे...विशाल जान छिडकते हैं मुझ पर...मेरा स्वर उल्लासित हो गया था|

तुम्हारे चेहरे की उदासी बढ़ गई थी| उस समय मुझे लगा था कि यह मेरा भ्रम ही था पर आज सोचती हूँ तो लगता है सचमुच तुम उदास हो गए थे| तुम्हारे त्याग देने के बावजूद, तुम्हारे ज़िन्दगी में न होने के बावजूद मैं सुखी हूँ, आगे बढ़ रही हूँ...क्या यह खला था तुम्हें? तुम शायद तारणहार बने रहना चाहते थे ?

घाट पर चाय-पोहे खाते हुए घर-परिवार के बारे में सामान्य बातचीत के बाद हम उठ खड़े हुए थे| मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान करके हमने विदा ली थी| अब संपर्क में रहना पहले से ज्यादा आसान था|

मुझे अच्छा लगा था तुमसे मिलकर| तुम्हें उतना खुश न देखकर कुछ खला भी था| अब पुराने प्रेम की स्मृति भले ही मन में धुंधला गई हो, मगर पुराने दोस्त को फिर पाकर अच्छा लगा था|

तुम उस समय शायद व्यवसायिक और वैवाहिक जीवन के कठिन दौर से गुज़र रहे थे| ये सब ऐसे मामले थे जिन्हें हरेक के साथ बाँटा जा भी नहीं सकता था| तुम्हारे फोन आने लगे, कभी परेशान होते, कभी उदास, कभी मरने-मारने को उतारू| मैं तुम्हें दिलासा देने का हर संभव प्रयास करती| अक्सर मैसेज में लिखा होता, काश कि मैं अपनी गलतियों को मिटा सकता, तुम्हारे जैसा जीवन साथी खो दिया मैंने| मैं भी भावुक हो जाती पर समय बीत चुका था और कम से कम मैं तो अपने जीवन में सुखी थी...

शायद तुम भी होते यदि सुखी रहा कैसे जाता है यह जान पाते...सुख बाँटने से, सबको साथ लेकर चलने से बढ़ता है अनु, अपना हित सोचने मात्र से नहीं...

और फिर अचानक तुम्हारे फोन आना बंद हो गया| मैं फोन करती तो अनमने मन से उत्तर देते और फोन रख देते| इस तिरस्कार ने मुझे हिला दिया था| दिस वाज शीयर चीटिंग...

मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही व्यक्ति है जो कुछ दिन पहले अपनी हर बात मुझसे साझा करता था, देर तक मुझसे बातचीत करता था| धीरे-धीरे मैसेज आने भी बंद हो गए| मैं कितने ही दिन दीवानों की तरह मैसेज पर मैसेज किया करती थी पर तुम जैसे जान-बूझकर मुझे इग्नोर करने लगे थे| मेरे अंतिम फोन में तुमने कहा, यह जाल है स्वप्ना जो मुझे उलझा रहा है| मैं घबराने लगा हूँ...मैं बस अकेला रहना चाहता हूँ...विरक्ति हो गई है इस सबसे, रिश्तों से...परख रहा हूँ अपने आप को ...

मेरी स्थिति क्या हुई थी यह सुनकर, तुम्हें अंदाज़ा होता तो आज मेरे सामने फिर से आ खड़े नहीं होते| क्या चाहा था मैंने तुमसे, एक अच्छे दोस्त की तरह संपर्क में बने रहना, मेरे मन में कम से कम इस रिश्ते के लिए अन्य कुछ भी नहीं था| अगर तुम्हारा मन तुम्हारे काबू में नहीं था तो यह समस्या तुम्हारी थी, फिर दंड मुझे क्यों?

मैं इसे क्या समझूँ? यह कि तुम एक निहायत कमज़ोर, अस्थायी सोच वाले आदमी हो जो अपने आप को ही समझ न पाया आज तक? जिसे खुद अपने आप पर काबू पाना नहीं आता? या यह कि तुमने रिश्तों को एक्सप्लॉइट किया? बहरहाल जोड़कर तुमने फिर तोड़ दिया सब कुछ...इन छह सालों में बस एक मैसेज का इंतज़ार था अनु, जो मेरे दिल को तसल्ली दे सके कि हमारे बीच कुछ तो कायम है अब तक, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है मगर वह मैसेज कभी नहीं आया|

और आज तुम अचानक चले आए वापस...तुम्हें देखकर उस समय तो भावनाओं में बह गई थी मैं पर भले ही कितनी ही भावुक सही, इतना जानती हूँ कि पहली गलती संयोग होती है, दूसरी गलती गलती ही कही जाती है| कहीं पढ़ा था कि रिश्तों के लिए झुकना अच्छी बात है मगर यह झुकना यदि आपके ही हिस्से में आ रहा हो हमेशा, तो ऐसे रिश्तों से तौबा करना ज्यादा अच्छा है| रिश्ते समर्पण और समझदारी के खाद-पानी से फलते-फूलते हैं मगर हमारे रिश्ते की पौध मुरझा चुकी है| ऐसे संबंध जो सुकून की बजाय दर्द दें, उन्हें सद्गति देना ही श्रेयस्कर होता है|

तो अनु, मैं कल की फ्लाइट से वापस जा रही हूँ| तुम्हारा कार्ड मैंने कूड़ेदान में डाल दिया है| कहानी में अल्पविराम लगाते-लगाते काफी समय बीत गया, अब पूर्ण विराम लगाने का समय आ गया है|

वैसे मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया है चूंकि मैं गलती को माफ कर देने में विश्वास करती हूँ| हालाँकि इससे तुम्हारे दामन की कालिख सफेदी में नहीं बदलेगी, न ही गलत होना सही में बदल जाएगा| तुम्हें माफ़ करके तो मैं अपने दिलो-दिमाग से उस क्षण को खुरच कर बाहर फेंक देना चाहती हूँ जो हर पल मेरी स्मृति में आकर मेरा सुख-चैन छीन लेगा, मेरे साथ हुए गलत व्यवहार को याद दिलाता रहेगा| माफ करना मेरे सुख-चैन को वापस पा लेने की कुंजी है मगर तुम्हारे निष्पाप ठहराए जाने का प्रमाण कतई नहीं|

तुमसे फिर कभी न मिलने की अपेक्षा में...

स्वप्ना


 

(2)

प्यारी स्वप्ना,

जानता हूँ प्यारी लिखने का अधिकार मैं खो चुका हूँ, छह साल पहले मेरी पहली गलती को भुलाकर तुमने मुझे एक बार फिर दोस्ती का हाथ बढ़ाने का मौका दिया था मगर मैं तुम्हारी उम्मीदों पर खरा न उतर सका| आज जब फिर तुम्हारी कॉन्सर्ट का विज्ञापन देखा तो अपने आप को रोक न सका और चला आया तुम्हारे सामने| मुझे अंदाज़ है कि हम शायद अब नहीं मिलेंगे, पर ज़रूरी लग रहा है तुम्हारे सामने अपना पक्ष भी रखना| दूरियाँ भले ही कायम रहे मगर गलतफहमियाँ खत्म हो जानी चाहिए|

तो एकदम शुरू से शुरू करता हूँ| हमारी दोस्ती के फलने-फूलने का वह साल जो मेरे जीवन का अब तक का शायद सबसे खुशगवार वक्त था| तुमसे पहले कोई नहीं था मेरी ज़िन्दगी में, ऐसा नहीं है| कॉलेज के दिन शायद होते ही ऐसे हैं और इसके साथ संगीत के प्रति मेरी दीवानगी हर उस शख्स को मेरे दिल के करीब ले आती थी जो संगीत से प्यार करता था...मगर तुम आज भी उन सबमें सबसे खास हो, शायद सबसे बेहतरीन तोहफ़ा जो ईश्वर ने मुझे बिन माँगे दिया था और मैंने उसकी कदर नहीं की| तुम्हारे पत्रों की एक-एक पंक्ति आज भी मेरे जेहन में ताज़ा है स्वप्ना...तुमने मुझे निश्छल भाव से प्रेम किया, प्रेयसी से बढ़कर एक सच्ची मित्र सी लगी हमेशा तुम...मित्र जब जीवन साथी बन जाए तो जीवन सहज हो जाता है, यही सोचा था मन में...मेरा भी प्रेम उतना ही स्वच्छ था तुम्हारे लिए... पर मेरी साधना में शायद साहस की कमी रह गई थी| तुमने पिछली बार ताना दिया भी था न कि प्रेम करने के लिए साहस नहीं लगता, साहस तो विवाह करने के लिए लगता है|

घर में अंतरजातीय विवाह के प्रति इतना विरोध होगा, कभी सोचा ही नहीं था| यह सब पता चलता भी कैसे, मैं तो आठवी पास करते ही घर से दूर-दूर छात्रावास में ही रहा| चुपके से भाभी को बताया था तुम्हारे बारे में और वे भौचक्की रह गई थीं| बोली, प्यार-व्यार तो सही है लल्ला पर जात बाहर शादी को बाबूजी कभी न मानेंगे, उनको नाराज़ करके कैसे काम चलेगा? भाभी ने बात भैया तक पहुंचाई, भैया से माँ तक और दीदी तक...ऐसा काम न करना लल्ला, सारे खानदान की नाक नीची हो जाएगी| भले ही लड़की भी ऊँची जात हो पर जात बाहर तो है न बिटवा...माँ ने गुहार लगाई थी|

क्या करता स्वप्ना, उम्र थी बस 22 और पढ़ाई का अंतिम चरण था| जिस शादी के लिए इतना विरोध हो उससे हासिल होगा भी क्या? जबरन शादी की ज़िद का अर्थ था जायदाद से बेदखली, रिश्तों से बेदखली...बाबूजी का कड़क स्वभाव सभी का जाना-पहचाना था| सच कहूँ तो साल भर पहले बने रिश्ते के लिए खून के रिश्तों की बलि दे देने में कुछ लाभ समझ में आ नहीं रहा था मुझे| सब कुछ गड्डमड्ड हो गया था| फिर लगा कि जब कुछ संभव है ही नहीं तो तुम्हें क्यों धोखे में रखा जाए, हम अभी इतना भी आगे नहीं बढ़े थे कि पीछे लौटा न जा सके| बस यही सोचकर तुम्हें वह पत्र लिख दिया था, तुम्हें नहीं बता सकता उसे लिखते समय और पोस्ट करते समय दिल किस तरह ज़ार-ज़ार रोया था|

यह सब लिख देने के बाद भी तुम्हारे पत्रों का इंतज़ार रहता था मुझे...तुम तो खूबसूरत यादों की तरह नुमाया थी न मेरे दिल की किताब के पन्नों पर| सच कहूँ स्वप्ना तो कम समय में मैंने तुम्हें बहुत जीया था| दोस्ती में स्पष्टता, स्निग्धता और पवित्रता के क्या मायने होते हैं, तुमसे ही जाना मैंने|

साल बीतने लगे, तुम्हारी यादें भी धूमिल पड़ने लगी, शायद रिश्ते के पौधे ने गहरी जड़ें पकड़ी नहीं थीं| पढ़ाई खत्म करके नौकरी की तैयारी में समय बीतने लगा| दिल्ली में पोस्टिंग मिली| उस समय एक बारगी तुम्हारा ख्याल आया था...सोचा तुम्हें पत्र लिखूँ पर तभी ऋषि मिला एक दिन...ऋषि को जानती हो न, नेवी विंग का कैडेट? उसी ने बातों बातों में तुम्हारी शादी की खबर दी| मेरे अन्दर बहुत कुछ भरभराकर ढह गया था स्वप्ना...जब तक खबर न थी, एक उम्मीद थी मन में कि शायद किसी मोड़ पर हम फिर आ मिलेंगे पर अब वह उम्मीद भी खत्म हो गई थी| मेरी स्थिति उस मकड़ी के समान थी जो अपने ही रचे जाल में उलझ कर रह गई हो| इसके बाद मैंने अपने आप को जीवन की नदी में बहने-उतराने के लिए छोड़ दिया था|

शादी हुई और मेरा तबादला धार हो गया, घर वापसी हो गई| तुम्हें शायद हैरानी होगी जानकर कि मैं शादी से पहले रचना (मेरी पत्नी) से मिला तक नहीं था| बस फोटो देखकर हाँ कह दी थी| जीवन जैसे कर्मकांड की तरह जीए जा रहा था मैं| हर लड़की तुम्हारी ही तरह होगी, पता नहीं क्यों ऐसा मानकर चल रहा था मैं...रचना बहुत अच्छी है पर हम दोनों ही ...वो कहते हैं न परफेक्ट मिसमैच...बस ऐसा ही कुछ था| मैं संगीत का दीवाना और उसका दूर-दूर तक कला से नाता नहीं, मैं अंतर्मुखी और उसके लिए तो सारा मायका-ससुराल इर्द गिर्द चाहिए...कुछ साल लड़ते-मनुहार करते बिताए, मैं भी अपनी पर ही अड़ा था, उसे बदलने की पूरी कोशिश में और वह अपनी पहचान खोने को तैयार न थी| इस बीच अनुभा का जन्म हुआ...बच्चे पति-पत्नी को जोड़ते हैं मगर उसके जन्म के बाद हमारे बीच खाई बढ़ने लगी| रोज़ की कलह से तंग आकर मैंने अपना तबादला करवा लिया और उज्जैन आ गया|

यही वह समय था जब तुम्हारी कॉन्सर्ट का विज्ञापन देखा समाचार पत्र में...देर तक तुम्हारे चित्र को निहारता रहा था| तुम वैसी ही थी, मधुर-मोहक मुस्कान चेहरे पर लिए, बस चेहरा थोड़ा भर गया था| रात मैंने करवटें बदलते हुए काटी| तुम संगीत की दुनिया में नाम कमा रही थी और मैं...अपनी उलझनों में जकड़ा कहीं पीछे छूट गया था| मैं साथ नहीं था पर तुम आगे बढ़ रही थी...प्रेम भंग में तबाह होते सुना था पर आबाद होना? तुमने प्रमाण दे दिया था|

बहुत हिम्मत जुटाकर तुमसे मिला| खुशी, आनंद, उल्लास किसे कहते हैं, एक बार फिर जी लिया था मैंने उन सारे पलों को...क्षिप्रा के तट पर बैठ मैंने कुछ गिरह खोली थीं तुम्हारे सामने मन की| तुम उतनी ही स्निग्ध थी, उतनी ही स्नेहिल, वैसी ही निश्छल...हँसना, खुश रहना भी इंसान की प्रकृति में ही शामिल होता है, खुशी को अनायास ओढ़ा नहीं जा सकता| थोड़ी ही देर में तुम पुराने हँसोड़ रूप में वापस आ गई थी| तुम अपने जीवन में खूब खुश हो, यह तुम्हारे रोम-रोम से झलक रहा था|

पता है अनु, तुम्हारे मेरे जीवन से निकल जाने के बाद विशाल ने ही संभाला मुझे, और देखा कितने स्नेह से सहेजा मुझे कि आज यहाँ ला खड़ा किया है, मेरे मनचाहे मुकाम पर...तुम्हारी बातें मेरे लिए अनपेक्षित थीं|

अचानक ही विशाल नाम के उस भाग्यशाली व्यक्ति से ईर्ष्या हुई थी| तुम्हारे साथ जीवन बिताने का मेरा ख्वाब इस व्यक्ति ने हथिया लिया था और उसे वह इस तरह जी रहा था कि तुम्हारी ज़िन्दगी से मेरा नामो निशाँ तक मिटा दिया था, मुझे बाहर ला पटका था|

क्या सोचकर मिलने गया था मैं तुमसे? शायद कि तुम रोओगी, शिकायतें करोगी, मेरे अचानक मुँह मोड़ लेने की बात कहोगी...पर ऐसा कुछ भी न हुआ| तुम रोई ज़रूर पर भावावेश में, पुराने मित्र से सालों बाद मिलने के आवेग में...

मेरे भीतर कहीं कोई खरोच आ गई थी|

हम फिर संपर्क में आ गए और रिश्ता जुड़ गया| इस बार सच्ची दोस्ती का… पता है स्वप्ना, मुझे लगता है पहले भी हम जुड़े थे कुछ एक सी पसंद के चलते...हम दोनों संगीत के दीवाने थे, साहित्य के मुरीद थे, यही सब हमें पास लाया था और वह उम्र ही ऐसी थी कि लगा हम प्रेम में है| वह वास्तव में समान विचारधाराओं के दो लोगों के बीच का स्नेह सेतु था स्वप्ना, मित्रता का सेतु...

घर की कलह, दूरियाँ और नौकरी में काम के दबाव के उस नाज़ुक वक्त में तुम्हारा संपर्क एक बड़ा संबल था मेरे लिए...जब मन करता तुम्हें फोन या मैसेज करता, तुमने कभी आनाकानी नहीं की मुझसे बात करने में| हमेशा समझाती कि मुझे कि कैसे रचना को खुश रखा जा सकता है या कैसे मैं अपने अहं पर काबू पाकर अपने जीवन को व्यवस्थित बना सकता हूँ| मुझे उस सबमें रुचि नहीं थी स्वप्ना, मेरी रुचि तुमसे बात करने में थी, बस...

आज एक बात सच बताना चाहता हूँ, तुमसे मिलने के बाद मेरे दिमाग में पुराने दिनों की स्मृति जीवंत हो गई थी| लगता था कि कुछ भी बदला नहीं है, हम अब भी वैसे ही हैं| मेरी शादी, तुम्हारी शादी सब कुछ अड़ंगे से लगने लगे थे मुझे, यह भी कि तुम मेरे बिना अपनी ज़िन्दगी में इतनी खुश कैसे रह सकती हो| बेहद आत्मकेंद्रित और स्वार्थी हो चला था मैं उन दिनों में स्वप्ना| तुम्हारे लिए मेरे मन में जो भी था, सब तुम्हें कहने लगा था मैं, बिना इस बात की परवाह किए कि अब हम दोनों ही अलग-अलग दुनिया के वाशिंदे थे और मेरा इस तरह का व्यवहार हम दोनों के लिए ही दिक्कत बन सकता था| आज अपने मैसेज या बातों के बारे में सोचता हूँ तो शर्म आती है| यह तुम्हारी उदारता ही थी कि तुमने मेरी हर अनर्गल बात को मेरी परिस्थितिजन्य तकलीफ का परिणाम समझते हुए अनदेखा किया और मेरी मदद करने की भरसक कोशिश की|

मैं तो अनियंत्रित होता ही जाता स्वप्ना यदि ऋषि मुझे न हड़काता|

ऋषि उज्जैन आया था और एक रात हम साथ बैठे थे| हल्का-फुल्का नशा था, तुम्हारी बात निकली और मैंने सब बयां कर दिया| स्वप्ना फिर मेरी हो जाएगी देखना...जोश-जोश में इस दावे के साथ मैंने ऋषि को एक पत्र दिखाया जो मैंने तुम्हें लिखा था| आज याद करता हूँ तो चुल्लू भर पानी में डूब मरने को जी चाहता है अपनी हरकत पर| उस पत्र के मजमून को पढ़कर ऋषि सन्न रह गया था...

क्या ख्याल है? ठीक लिखा है न मैंने? मेरे इतना पूछते ही ऋषि ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ मेरे गाल पर रसीद कर दिया था..बास्टर्ड, एक भली लड़की तुझसे दोस्ती के रिश्ते के तौर पर बातचीत कर रही है और तू इतनी नीच बात सोच रहा है? तेरे लिए वह अपना घर-बार छोड़ दे? और तू भी? कहाँ गया था यह साहस जब शादी करने की बात उठी थी उससे? साले लालची, तब तो डर था कि जायदाद से बेदखल न कर दिया जाए...शर्म आती है सोचकर कि तू मेरा दोस्त है...वह तमतमाया उठ खड़ा हुआ था|

और हाँ, मैं विशाल को और स्वप्ना को दोनों को निजी तौर पर जानता हूँ| दोनों खुश हैं और अच्छी तरह से कट रही है ज़िन्दगी उनकी| अगर उसकी खुशियों में पलीता लगाने की कोशिश की तो...मुझसे बुरा कोई नहीं होगा..सोच लेना| ऋषि नाराज़ होकर चला गया था|

होश आने पर मैंने पत्र फिर से पढ़ा| सचमुच उसमें इतना कुछ अनर्गल था कि...मैंने ऋषि को फोन किया और उससे माफी माँगी| उसने एक ही सलाह दी, अनुराग, जितनी जल्दी हो सके इस रिश्ते को खत्म करो अन्यथा...

मुझे भी अपनी अवस्था समझ में आ रही थी| इस विभ्रम से निकलने का एक ही रास्ता था, तुम्हें और अपने आप को थोड़े समय के लिए फिर मानसिक संत्रास में डालना, मगर कोई और चारा नहीं था मेरे पास...और मैं फिर तुमसे अलग हो गया|

तुमने मेरे बारे में जो भी सोचा हो पर मेरे लिए यह अलगाव ही अपरिहार्य था स्वप्ना| हम आदमी शायद इसी सोच में जीते हैं कि कोई स्त्री यदि अच्छे से बात भर कर ले तो इसका अर्थ है वह इम्प्रेस हो गई है या अवेलेबल है| किसी व्यक्ति की सोच गढ़ने में समाज की बड़ी भूमिका होती है| मैं भले ही तुम्हारा मित्र सही, भले ही सुशिक्षित सही, विचारों पर मान्यताओं का प्रभाव पड़ता ही है, उन मान्यताओं को जो आपके आसपास का समाज लगातार प्रस्तुत करता रहता है| मैं भी इसी समाज का हिस्सा हूँ...

बहुत समय लगा अपने आप को वापस पटरी पर लाने में, तुमसे अलग होकर मैंने फिर से तुम्हें जीने की कोशिश की| और ऐसा तुम्हारी बातों पर अमल करके, तुम्हारी सलाहों को अपनाकर किया मैंने...ज्यादा कुछ नहीं पर थोड़ा सा सोच में बदलाव किया, परवाह को ज़िन्दगी में शामिल किया, जीवन का उद्देश्य ही खुशियाँ बाँटना है, इसे समझा... सालों बाद ही सही, मेरे वैवाहिक जीवन की गाड़ी पटरी पर आ गई है| रचना हैरान है इस परिवर्तन पर, खुश है बहुत...उम्मीद है उसे तुम्हारे बारे में बताने का साहस जुटा सकूँगा| कह सकता हूँ कि अब सब ठीक है और यह सब है सिर्फ तुम्हारी बदौलत...

इस बार तुम्हें तकलीफ देने का मकसद नहीं था मेरा, मेरे जीवन में तुम्हारी वजह से जो कुछ सुधरा, उसी का शुक्रिया अदा करना था, इसीलिए चला आया कॉन्सर्ट में...पर तुम्हें फलक छूते देखने का सम्मोहन इस इस तरह हावी हुआ कि धन्यवाद तक न कह सका| बस कार्ड तुम्हें देकर आ गया|

तुम्हारा चेहरा बहुत पारदर्शी है स्वप्ना, मैंने पहले कहा नहीं कभी...कल मुझे देखकर तुम्हारे चेहरे पर जो वितृष्णा के भाव आए थे, उनसे मैं इतना अनुमान लगा पाया हूँ कि तुम न तो मुझसे मिलना चाहोगी न बात करना...

अगर कार्ड देख लोगी तो उस पर मेरा पता, फोन और मेल आई डी है| चाहो, तो संपर्क कर लेना|

यूँ भी सोशल मीडिया पर तुम्हारे प्रशंसकों में तो दर्ज हो रहूँगा|

किस्मत ने मौक़ा दिया तो फिर मिलेंगे...

सस्नेह

अनुराग


 


लेखक परिचय – भारती पंडित




नाम - भारती पंडित जन्म – 2 मार्च कर्मक्षेत्र - भोपाल

व्यवसाय - अध्यापन साहित्यिक प्रकाशन - महक ज़िंदगी की (कहानी संग्रह), सी बीच और अकेली लड़की (कविता संग्रह) अकादमिक प्रकाशन – कक्षा 1 से 8 तक की हिन्दी पाठ्यपुस्तकों का प्रकाशन (नॉर्दन हिल्स पब्लिकेशन नोएडा) अनुवाद - मंजुल प्रकाशन और जयको प्रकाशन हेतु 10 पुस्तकें अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवादित उपलब्धियाँ – 100 से अधिक आलेख, कहानियों और कविताओं का प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशन, जेंडर विषयक लेखन सामग्री का प्रकाशन, सभा संचालन और सभा वक्तव्य का अनुभव, कई काव्य गोष्ठियों का संचालन और प्रतिभाग, दूरदर्शन भोपाल पर कविता पाठ में हिस्सेदारी संपर्क – bhartipandit@gmail.com

204, कृष्णा, आकृति एन्क्लेव, त्रिलंगा, भोपाल –

8226005064







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