top of page
  • भावना सक्सेना

नौबत




परोसा निकला रखा था। जिसके लिए निकला था वह आज न जाने कहाँ रह गया था। रसोई समेटती अम्मा चिहुंक कर बोलीं, " अरी सुन इसे उठा कर बाहर मेज पर रख दे और पत्तल से ढक देना। जाने कहाँ रह गया आज। कल ही कहा था कि थोड़े सवेरे आकर हाथ बंटवा दिया कर, मगर उस मनमौजी को कहां फिकर है। जहां दो बूंद तेल कोई टपका दे वहीं उम्र गुज़ार दे सारी मुआ।"

अम्मा की नाराजगी देखकर वह मन ही मन मुस्कुरा दी थी। कितना कुछ कह लें लेकिन ब्याह के घर की गहमा-गहमी में भी अम्मा नौबत का परोसा निकालना न भूलतीं थी। बारह साल की विद्या जानती है, ऊपर से कितना भी नाराज़ हो लें अम्मा वह ऊपरी है। उनका नरम दिल तो उसकी गोलगोल मटकती आंखों और हाथ घुमाकर माथे पर मारते ही फिसल जाएगा।

वह भी दौड़ता हुआ आया और अम्मा को पालागन अम्मा कहता आँगन के किनारे लगे हैंडपम्प के पास बड़ी परात में लगे बर्तनों के ढेर को माँजने जा पहुँचा।

"अरे क्या कर रहा है", अम्मा डपटते हुए बोलीं "पहले खाना खा ले। कब से परोसा रखा तुझे पुकार रहा है"।

"ना अम्मा, पहले काम निबटाऊँ तब रोटी खाऊं। तुम तो जानो ही हो मुझे।"

"तुझे बोला न पहले खा ले। तीसरा पहर जाने को है, न कोई पता न ठिकाना। कहां रह गया था?"

"अरे मेरी अम्मा नाराज़ मत हो, यूँ कर पहले जरा सा तेल दे दे। तेल मल लूँ तो आराम पड़े। पल्ले चौक के भैया ने साला…"

"देख रे गाली यहां नहीं। कितनी बार समझाया, बच्चों का घर है, ज़बान संभाल कर बात किया कर।"

"गलती मेरी अम्मा, गलती भई गलती। अब न दोहराऊं।"

"आगे से इधर गाली निकाली तो न रोटी मिलेगी न तेल।"

"अरे रे ऐसा जुल्म न करियो मेरी माई। रोटी न दीजो चाहे, मेरे तेल पे डंडी मत मारियो।"

अम्मा ने आले में रखी बोतल उठाई और उसकी अंजुरी भर दी।

बीच की माँग पाड़े, कान को ढकते, गर्दन तक चिपटे, चीकट बालों में एक चुल्लू भर तेल और उड़ेल उंगलियों के पोरों से उसे मलते उसके चेहरे का तृप्त भाव यूँ था मानो किसी राजा ने अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लिया हो।

कुछ देर उसी अवस्था में बैठ जब उसने आंखें खोली तो भोलेपन से मुस्कुराते हुए बोला, “तुम्हारे तेल ने खरीद रखा मोय अम्मा”।

“अम्मा नौबत चाचा इतना तेल क्यों लगाते हैं?” एक दिन पूछा था विद्या ने।

“कौन बताए बिटिया, बावला है, न माँ न बाप। शायद ज़िन्दगी की कमी को पूरा करने का यही उपाय दीखता हो उसे”

अक्सर होता है कि इंसान एक कमी को पूरा करने के लिए किसी असामान्यता का शिकार हो जाता है। नौबत का वह तेल शायद ऐसे ही किसी गहरे खोखलेपन को भरने का प्रयास था। बचपन से ही मातृ-पितृ विहीन रहा नौबत अम्मा का मुँहलगा था। अम्मा ने बताया था कि नौबत की माँ उसके जन्म पर ही गुज़र गयी थी। अम्मा ने ही सम्भाला था उसे, इसीलिए अम्मा के लिए कुछ भी कर गुजरने को तत्पर। यूँ मोहल्ले भर में वह सभी घरों में सहज आता-जाता और एक अंजुरी तेल के लिए सभी का छोटा-मोटा काम कर देता लेकिन अम्मा से विशेष स्नेह था। अम्मा, चाचा के पुराने कपड़े नौबत को दिया करती थीं और हर दीवाली पर कुर्ते पाजामे का एक नया जोड़ा। वह कभी पुराने वाले कपड़े पहने नहीं दिखा। हमेशा धुला हुआ सफेद किंतु ज़रा मटमैला और कालर पर चिकटा कुर्ता और टखने से ऊँचा पायजामा। गर्मी ज़्यादा हो तो कभी-कभी बाजू वाली बनियान और बड़े-बड़े लाल चौखाने वाली नीली तहमद में गली में घूमता था। हाथ का पंखा घुमाता मद्धम स्वर में कुछ गुनगुनाता रहता। लेकिन उस पोशाक में वह कभी किसी के घर के भीतर नहीं जाता था।

एक दिन विद्या ने पूछ लिया "नौबत चाचा इतना ऊंचा पायजामा तो मोहल्ले में कोई नहीं पहनता, फिर आप क्यों पहनते हो।" वह बोला, "लल्ली, काम में अटकता न है"। विद्या को बिल्कुल पसंद नहीं था कोई उसे लल्ली पुकारे, तो ऊंचे पायजामें की गुत्थी भूल वो चिढ़कर बोली, नौबत चाचा हमारा नाम विद्या है, लल्ली ना है।

“अच्छा बिद्या रानी, याद रखेंगे अब से। बिद्या रानी बड़ी सयानी…” वह धीमे-धीमे बोलता अपने काम में लग गया।

बुआ के ब्याह से कुछ दिन पहले घर के रंग-रोगन के दौरान अम्मा ने कुछ पुराना समान निकालकर रख रखा था, बोली, “अरे नौबत, देख इनमें कोई तेरे काम का हो तो ले जा।“

“अम्मा ले तो सब कुछ जाऊं पर धरूँगा कहाँ और मैं अकेली जान, क्या करूंगा समान भरके घर में। जितना कम समान रहेगा उतना जीना आसान रहेगा”

उस अकेली जान से विद्या की अम्मा की जान में जान रहा करती। बुआ के ब्याह में घर के किसी आदमी से ज्यादा काम अकेले नौबत चाचा ने किया होगा। सब काम समेट अम्मा जब उसे कुछ इनाम के रुपए देने लगीं तो उसने मना कर दिया। अम्मा अपनी बहन के ब्याह में काम करने के कोई रुपए लेता है क्या! रोटी कपड़ा सब मिल ही रहा है, और क्या करेंगे रुपयों का। विद्या मन ही मन सोचती, ये नौबत चाचा बिल्कुल बुद्धू है। अम्मा पैसे दे रही हैं तो रख ले, जाकर कुछ रबड़ी या गुलाब जामुन ही खा ले,लेकिन अम्मा ने हमेशा की तरह बाबा से उसकी संतोषी प्रवृत्ति की खूब प्रशंसा की।

पहले पल्ले चौक के पास झर रही कच्ची दीवारों पर नाममात्र का छप्पर ही उसका बसेरा हुआ करता था। फिर एक रोज़ जब रात भर बरसात हुई और सुबह वह अपनी झिंगोला चारपाई में काँपता हुआ मिला और दो दिन तक बुखार में तपता रहा तो चाचा ने उसे अपने ही मोहल्ले में दुमंजले वाले मुन्ना गोसाईं की छोटी बैठक किराए पर दिला दी थी और किराया हर महीने समय पर चला जाए उसके लिए पड़ोस में ही रहने वाले घसीटा हलवाई के साथ बर्तन धोने के काम पर लगवा दिया। अम्मा जरा नाराज़ हुई थी, कि अब नौकरी करने के कारण नौबत का आना कम हो गया था। लेकिन फिर भी वह खुश थी कि उसका जीवन संवर जाएगा। वह भी सुबह काम को जाते और शाम को घर लौटते समय अम्मा बाबा को पालागन करके ही निकलता। उसके अलावा भी जब समय लगता चला आता। अम्मा के बाहर के काम अभी भी उसी के हवाले थे। कभी कभी जब तगड़ा सहालग होता या जब दूसरे गांव जाना होता तो ज़रूर कुछ दिन बीत जाते अन्यथा उसकी सुबह-शाम की हाजरी पक्की थी। नौबत अपना काम खूब मगन होकर करता था और काम करते अक्सर गुनगुनाता, झोलियाँ भर रहे भाग वाले लाखों पतितों ने जीवन सँवारे।

विद्या एक दिन पूछ बैठी "नौबत चाचा तुम काहे नहीं भरते अपनी झोली"। और वह बोल उठा "अरी कहा तो भाग वाले। भाग वाले झोली भरते हैं और अभागे दूसरों का पानी। हम तो अभागे रहे... पैदा भए तो माँ मर गई और याद में रहे उससे पहले बाप। ये तुम्हारी अम्मा ही ने रोटी खिला-खिला कर ज़िंदा रखा है हमें। उसके स्वर की पीड़ा बींध गई थी।

तभी अम्मा का स्वर सुनाई दिया, “किसके भाग का हिसाब कर रहा है रे? चक्की पर गेंहू भेजा था सुबह, जा जरा देख रामरतन ने पीस दिया हो तो उठा ला”।

“हाँ अभी लाया”, कहकर वह आँख के कोने पर रखी बूंद को गर्दन में लटके गमछे में समेट चला गया और विद्या सोचती रही कि नौबत के परिवार में क्या और कोई न था जो उसका ध्यान रखता।

अम्मा का भरोसे का पात्र था नौबत। वैसे अम्मा के उस आँगन की रौनक ही अलग थी। वहां हंसी खिलखिलाहट और रिश्ते पलते थे। वहाँ जो भी आता था, उससे एक रिश्ता होता था, यहां तक कि मेहतरानी भी चाची हुआ करती थी। दोपहर में जब वह टोकरा लेकर रोटी लेने आती तो सख्त हिदायत थी कि रोटी बहुत प्यार और इज़्ज़त के साथ उसके टोकरे में रखी जाए। उस आँगन के पार भी मोहल्ले के हर घर से नेह का नाता जुड़ा था। कोई छज्जे वाली ताई, तो कोई चौक वाली दादी। बुआ और चाचा तो हर घर में थे ही। दिल के रिश्ते थे सारे, ओढ़े हुए औपचारिक नहीं।

एक बार पड़ोस के गुड्डू से झगड़ा होने पर जब गुड्डू के बाबा ने दोनो को डाँट दिया तो विद्या खीझती हुई घर आई और गुस्से में बोली, हमारी गलती न थी फिर भी डाँट दिया गुड्डू के बाबा ने। नौबत चाचा चने का साग छा रहे थे, तुरंत बोले, गुड्डू के ही बाबा हैंगे, तुमाए कछु नाय?

विद्या सकपका गयी और बोली, “शरारत गुड्डू ने की थी नौबत चाचा। वह अपने बाबा के कुर्ते की जेब से दो रुपये बिना पूछे ले आया था और ढेर सारी लेमनचूस खरीद कर मुझसे सारे बच्चों में बाँटने को कहा। बाबा ने हम सबको लेमनचूस खाते देखा तो हमसे बिना कुछ पूछे कहने लगे कि हमने गुड्डू को उकसाया होगा चोरी करने के लिए। यह क्या ठीक बात है। मैं तो अब कभी न गुड्डू के घर जाऊँ न उसके साथ न खेलूँ”।

लेकिन जाना पड़ा था विद्या को गुड्डू के घर। बहुत बुरा दिन था वो। गुड्डू कहीं नहीं मिल रहा था आस-पास सब गली-मोहल्ले ढूंढ लिए। बड़ा-बाजार, छोटा-बाजार, पंजाबी कॉलोनी, हाइडल वाली कॉलोनी, विश्नोई मोहल्ला सब जगह लाउडस्पीकर वाले रिक्शे से मुनादी भी करा दी लेकिन गुड्डू न मिला। कहीं भी न मिला। हैरान करने वाली बात यह थी कि उस शाम नौबत चाचा भी काम से लौटकर न आए। सुबह तो चबूतरे पर बैठे बाबा को पालागन पंडितजी कहकर गए थे लेकिन शाम को उन्हें किसी ने न देखा।

समझदारों के संसार में संशय की सुई सबसे पहले गरीब पर आ अटकती है। वही हुआ। जबकि ऐसा कोई भी कारण न था कि नौबत पर शक किया जाए लेकिन उसका गुड्डू के साथ ही लापता हो जाना शक को पुख्ता कर रहा था। अम्मा का मन न मानता था काम करते हुए खुद से बड़बड़ाए जा रही थीं "ऐसा नहीं हो सकता उस लड़के ने आज तक एक चवन्नी तो क्या एक सुई भी इधर से उधर न की, कैसे मान लूँ। गरीब होने का मतलब यह तो नहीं कि वह लड़का गलत हो। क्या पता वह खुद भी किसी मुसीबत में हो। लेकिन पड़ोस के लोग न माने थे और परेशान व दुखी गुड्डू के बाबा ने थाने में रपट लिखवा दी थी। पुलिस ने आकर नौबत की कोठरी का दरवाज़ा खोला तो उसमें पूरी दीवार पर शिवजी, हनुमानजी, सिया-राम और राधा-कृष्ण के पुराने कैलेंडरों से काटकर चिपकाए हुए चित्र मिले थे। उन्हीं के सामने बैठ अकेले में गाता होगा वह – ‘झोलियाँ भर रहे भाग वाले’। पूँजी के नाम पर एक पतीली, एक परात, एक मुड़ा हुआ गिलास और एक थाली थे। एक कोने में दरी लपेटकर रखी हुई थी। ईमान और दारिद्र्य के अतिरिक्त कुछ न मिला वहां। दबे स्वरों में फुसफुसाहटें हुई, “भई देर कितनी लगती है ईमान बिगड़ने में! वैसे तो लड़का भला है पर हो सकता है गलत सोहबत में पड़ गया हो…” अस्सी के उस आरंभिक दशक में बच्चों को, उठाने, भिखारी बनाने को बेचकर कहीं दूर ले जाने की कई कहानियां सुनने में आती थीं।

विद्या नहीं समझ पायी थी कि बच्चों को बेचकर क्या होता है, उसने पहले भी बच्चा उठाने वाले गिरोह के बारे में सुना था, लेकिन वह सोचती थी कि कोई बच्चे को उठाकर क्यों ले जाएगा, उसका तो ध्यान और रखना पड़ेगा। फिर अम्मा ने समझाया था कि बच्चों के हाथ पैर काट देते हैं या आँख फोड़ देते हैं और उनसे भीख मंगवाते हैं। वह डर कर तीन दिन तक घर के बड़े दरवाजे तक भी न गई थी। दरवाजा खोलने को भी नहीं।

तीसरी शाम मोहल्ले में पुलिस आई थी, गुड्डू और बुरी तरह पीटे गए नौबत चाचा के साथ। उनकी एक आँख इतनी सूजी हुई थी कि खुल भी नहीं पा रही थी, होंठ फटा हुआ था, और खून ठोड़ी तक आकर सूख चुका था। तेल की जगह बालों में धूल भरी थी। कपड़ों की हालत देख लगता था कि खूब दूर तक घसीटा गया है उन्हें।

गुड्डू के बाबा ने सब जगह उसके पोस्टर लगवा दिए थे। रेलवे स्टेशन पर भी। तभी तो सियालदाह से उतरते ही पूड़ी वाले ने पहचान लिया था तुरंत और टिकट-बाबू को बता दिया था। टिकट-बाबू ने झट से रेल पुलिस बुला दी और रेल पुलिस ने उन्हें तब तक बिठाए रखा जब तक नगर पुलिस उन्हें लेने न आई, पहले थाने ले गए, पूछताछ की, नौबत ने कुछ कहना चाहा, लेकिन उसे बोलने न दिया गया। बिना सुनवाई, उसे मुजरिम करार दे दिया गया था। गुड्डू से पूछा था उन्होंने लेकिन वो कुछ नहीं बोला था। बस फटी आँखों से देखता रहा था। बच्चा डरा हुआ है, परिवार से मिलकर शायद बोल देगा कुछ, इसलिए ले आये थे। मोहल्ले के सब लोग इकट्ठा होने लगे तो पुलिस ने भगा दिया। गुड्डू को घरवालों को सौंप कर नौबत को पुलिस अपने साथ ले गयी वापिस, अम्मा ने बताया कि उसे जेल में डालने ले गए।

विद्या ने छत पर जाकर देखा था, गुड्डू अपने आंगन में चारपाई पर बैठा था, उसका चेहरा धर्मशाला के बाहर लगे काठ के पुतले जैसा हो गया था। विद्या को डर लगा था उसे देखकर।

लेकिन गुस्सा भी आ रहा था उस पर। उसका मन था वह गुड्डू को कंधों से पकड़कर झकझोर दे और कहे "बोल गुड्डू, बोल नौबत चाचा ने कुछ नहीं किया। सच बात बता, बोल, कुछ तो बोल!"

अम्मा को भी यकीन नहीं था पुलिस की बात पर लेकिन समस्या यह थी कि न गुड्डू कुछ बोला था न नौबत। गुड्डू के पिताजी उसे नहला धुलाकर शर्मा डॉक्टर के पास ले गए थे तो उन्होंने कहा सदमे में है, कुछ रोज़ में अपने आप बात करने लगेगा। बस उससे इस घटना के बारे में बार-बार कुछ न पूछा जाए और पहले की भांति सामान्य व्यवहार किया जाए।

अगले रोज़ गुड्डू की माँ सरला ताईजी आईं थी और अम्मा को समझाकर विद्या को अपने साथ ले गयी कि बच्चे आपस में मिल-बैठ कर खेलेंगे तो मन बहल जाएगा गुड्डू का। उन्होंने पड़ोस के कुछ और बच्चों को भी बुला लिया और सब को खेलने को कहकर पापड़-करौली तलने चली गई। विद्या जानती थी कि गुड्डू से उसके जाने की बात नही करनी, ताईजी ने मना किया था आते समय लेकिन उसके पास नौबत चाचा का सच जानने का बस यही अवसर था। वह उसे खोना नहीं चाहती थी।

विद्या ने सहजता से पूछा था, “अरे गुड्डू ये तो बता दे नौबत चाचा के साथ कहाँ-कहाँ घूमकर आया? कहाँ-कहाँ ले गए थे वे तुझे”?

सरोज भी बीच में बोल पड़ी, “हाय काश हमें ले जाते, स्कूल की छुट्टी तो मिलती”।

गुड्डू धीमे से बोला, “वह थोड़े न लेकर गए थे। औऱ सरोज तू पागल है। स्कूल से बचने को कुछ भी कहती है”।

बात कोई दूसरा रुख ले, उससे पहले विद्या वापस अपनी बात पर आ गई- “तो फिर क्या तू उन्हें ले गया था?”

“नहीं बन्ने मुझे ले जा रहा था, मैं तो बाबा के कोट की जेब से दो रुपए लेकर लेमचूस लेने को निकला था, बन्ने ने कहा कि वह मुझे एक अलग स्वाद वाली लेमचूस दिलाएगा जो बड़े लोग लेते हैं। मैंने सोचा एक बार खा कर देख लूँ”।

“फिर”

“फिर मैं उसके साथ चल दिया, वो आम के बाग में क्रिकेट खेलने, आम तोड़ने और माली काका द्वारा पकड़े जाने के मज़ेदार किस्से सुनाता रहा और मैं मजे से सुनता चला जा रहा था”।

“जब मैं पूछता दुकान कहाँ है, वह कहता बस ज़रा सा आगे। चलते-चलते हम बड़ी मंडी तक पहुंच गए।

बड़ी मंडी के बाद जब बन्ने आगे बढ़ता गया तो मैंने उससे कहा कि मेरे पैर दुख रहे हैं आगे नहीं जाना। वो न माना तो मैं रोने लगा”।

सरोज बीच में बोल पड़ी “तू तो है ही रोतड़ू”

विद्या की आंख देखकर चुप हो गई।

गुड्डू भी उसकी बात अनसुनी करके बोलता रहा- “उसने कहा, अरे जरा सा ही आगे तो है”।

मुझे घबराहट भी होने लगी थी और प्यास भी लग रही थी।

बन्ने बोला यहाँ रेल के फाटक के पास नल है चल वहाँ से पानी पीकर चलेंगे। उसके बाद की मुझे याद नहीं, लेकिन आँख खुली तो सिर दुख रहा था ज़ोर से और मैं रेल में था। बन्ने मुँह लटकाए बैठा था और नौबत चाचा उससे गुस्से में कह रहे थे, अगर लड़के को कुछ हो गया तो तुझे ज़िंदा रेल के नीचे फेंक दूंगा, तेरी हिम्मत इतनी बढ़ गयी कि तू हमारे मोहल्ले के बच्चे को आँख उठाकर देखेगा।

मैं हिला तो नौबत चाचा, चुप होकर मेरा नाम पुकारने लगे, उन्हें देखकर मेरी हिम्मत बंधी और मैं रोने लगा। नौबत चाचा का ध्यान मेरी तरफ हुआ, उधर रेल धीमी हुई और बन्ने कूद कर भाग गया। फिर वो रेल रुकी नहीं और शाम को एक स्टेशन पर रुकी। हम वहीं उतर गए। नौबत चाचा ने पता किया वहाँ से वापसी दूसरे दिन ही हो सकती थी, नौबत चाचा बारबार कहते, भला हो भगवान का आज ही तन्ख्वाह के पैसे मिले।

मैंने नौबत चाचा को सब बात बताई, मुझे बहुत डर लग रहा था कि जब बाबा को पता लगेगा तो वह बहुत नाराज़ होंगे और पिताजी तो कसकर मार लगाएंगे। नौबत चाचा ने मुझे वादा किया कि वह किसी को नहीं बताएंगे और मुझे भी मना कर दिया।

“नौबत चाचा संग गए थे तुम्हारे”?

“संग कहाँ गए थे”

“तो”

ये यो मुझे भी न पता कि वो कहाँ से हमारे पीछे आए, लेकिन वो न होते तो मैं पता न कहाँ होता। शायद वो अपनी दुकान से लौटते समय हमें देख हमारे पीछे चले हों।

“लेकिन जैसे ही हम उतरे हमें स्टेशन पर ही पकड़ लिया, मैं बहुत डरा था, मैं कुछ बोल भी न पाया”

विद्या मन ही मन बहुत प्रसन्न थी, मतलब वह और अम्मा सही थे। नौबत चाचा गलत नहीं हैं, वह उन पर गर्व कर रही थी, वह गुड्डू को बचाने के लिए पीछे-पीछे चले गये थे। विद्या एक पल न रुकी थी। उसकी एकमात्र उम्मीद थी उसके छोटे चाचा थे। उसने तुरंत उन्हें सब बताया, गुड्डू की अम्मा पुकारती रह गई कि कुछ खाकर जा, लेकिन विद्या पर कुछ और ही सवार था। चाचा ने धैर्य से उसकी बात सुनी। अम्मा भी विद्या के साथ बोली थी, जाओ नौबत को छुड़ाकर लाओ, पता नहीं किस हाल में रखा होगा उसे।

चाचा कोई दो घण्टे बाद लौटे थे नौबत की जमानत कराकर। घर पहुंचे तो अम्मा ने कहा अकेला क्यों आ गया, उस लड़के को ले आता, जाने कब से कुछ खाया भी होगा कि नहीं। चाचा ने कहा, नौबत ने उनसे कहा कि वह पहले अपने कमरे जाकर नहा धोकर आएगा। लेकिन वो नहीं आया। अम्मा आज भी परोसा निकाल कर बैठी रहीं लेकिन नौबत चाचा न आये।

चाचा को दोबारा बुलाने भेजा तो पता लगा वह कमरे पर जाकर थोड़ी देर में यूं ही निकल गया था। चाचा चौक तक देख कर आए थे, सब से पूछा था, लेकिन नौबत का कहीं पता न था।

साँझ गहरा रही थी, विद्या कई बार गली झांक कर देख आई थी, कमरे की कुंडी हमेशा की तरह बिन ताले के लटकी थी, खुली हुई थी, विद्या ने दरवाजे को धक्का दिया, झरोखे से आती ढलते सूरज की धूप दीवार के नीचे पड़े फटे मुड़े-तुडे पोस्टर व कैलेंडरों पर पड़ रही थी। शायद वह सिर्फ उनपर नाराज़गी उतारने आया था जो उस अभागे की झोली न भर सके थे।

महीनों बीत गए, लेकिन अम्मा जब तब उसे याद कर लिया करती थीं। मोहल्ले में अक्सर उसके साथ हुई नाइंसाफी की चर्चा होती। गुड्डू भी ठीक था, ज़रा सुधर ही गया था, अब अकेला घर से न निकलता था लेकिन विद्या की नाराज़गी उसपर बनी रही थी। जिस रोज़ नौबत चाचा गए उसके बाद से वह गुड्डू के घर कभी न गयी थी।

गंगा स्नान पर मंझली चाची के छोटू का मुंडन होना था। उसके बाल उतरवाने पूरा परिवार बड़ी गाड़ी करके बैराज पर गंगा मैया के घाट गया था। विद्या बहुत उतावली थी। अपनी याद में वह कभी गंगा किनारे नहीं गयी थी। फिल्मों में उसने देखा था नौका की सैर करते लोगों को और नौका से झुक अंजुरी में जल भरते हुए। वह अपनी अँजुरी में नदी का जल भर उँगलियों के बीच से उसे वापिस नदी में गिरते देखना चाहती थी।

उसी उतावलेपन में चप्पल पहने ही पानी मे चल पड़ी, और अचानक, नीचे की रेत के साथ चप्पल उसके पाँव से आगे सरक गयी। जरा पानी से बाहर हो वह चप्पल की खोज में आगे बढ़ रही थी कि कान किसी परिचित स्वर पर लग गए और पांव वहीं ठिठक गए। इकतारे के संग झोलियाँ भर रहे भाग वाले, लाखों पतितों ने जीवन सँवारे…

उस स्वर के अलावा कुछ समानता न थी, गेरुआ कपड़ों में लिपटी उस आकृति में। लंबे बाल, लम्बी दाढ़ी, बालों में तेल का रंचमात्र निशान नहीं...क्या यह नौबत चाचा हो सकते हैं, सोच में घिरी विद्या ने अकस्मात पुकार लिया नौबत चाचा!

आकृति उसकी ओर मुड़ी तो विद्या का संदेह पुख्ता हो गया, जटाजूट से घिरी पनीली आँखें धोखा नहीं दे सकती थीं उसे।

"यहाँ! ऐसे! क्यों छोड़ आये सब"?

"कुछ था ही कहाँ बिटिया"?

"कह कर तो आते न!"

"फिर तुम और अम्मा आने देते क्या"।

विद्या ने ना में सिर हिला दिया, आँखें अपना काम किए जा रहीं थी। नौबत अपनी रौ में कहे जा रहा था- "आया तो था गंगा मैया की गोद में सो जाने को, लेकिन लाखों पतितों ने जीवन सँवारे गाता हुआ, जब बढ़ रहा था, तो अपने ही बोल भीतर उतर गए। भीतर से कौंध उठी, पतित भी सँवार सकते हैं तो तू क्यों नहीं? तू अपना जीवन नहीं सँवार पाया तो क्या, औरों के संग अपना सँवार सकता हैI

मन में ये आया ही था कि एक महाराज प्रकट हो गए। वे अपने संग ले गये। यहीं पास में अनाथाश्रम है, तब से वहीं सेवा कर अपना जीवन सँवारता हूँ।"

"अब तेल नहीं लगाते"? विद्या ने मुस्कुराने की कोशिश की।

"बिटिया अब तन मन सब यूँ ही शीतल रहा करता है"।



नोट - इस कहानी को हरियाणा साहित्य अकादमी से कहानी प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है


 

लेखक - भावना श्रीवास्तव

bhawnasaxena@hotmail.com


68 दृश्य